+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

ट्रैफिक सेंस

हमें पुलिसवाला न दिखे तो हम रेडलाइट जम्प करते हुए नहीं हिचकते। रॉंग साइड ड्राइव करते हुए हमें शर्म नहीं आती। सड़क किनारे गाड़ी लगाते हुए हम दूसरों की परेशानी की चिंता नहीं करते। हमें लालबत्ती पर दाएँ मुड़ना होगा तो भी हम सबसे बाईं लेन में सबका रास्ता रोककर खड़े होंगे। हम मोबाइल पर बात करते हुए सड़क पार करते हैं। बिना हेलमेट लगाए कान और कंधे के बीच मोबाइल फँसाए टेढ़ी गर्दन किये टेढ़ी-टेढ़ी बाइक चलाते हैं। कार ड्राइविंग के दौरान तो मोबाइल पर बात करना हमारा धर्म बन चुका है। हम ऑटो चलाते हैं, तो सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। हम बस चलाते हैं तो ब्रेक और इंडिकेटर को अछूत समझने लगते हैं। नो एंट्री और टो-अवे जैसे शब्द तो हमने पढ़े ही नहीं हैं। हम रेडलाइट पर खड़ी गाड़ी को भी हॉर्न दे देते हैं। हम स्पीड लिमिट की परवाह नहीं करते।
हम पैदल चलते हैं, तो गाड़ीवालों को दुश्मन समझते हैं। हम गाड़ी चलाते हैं तो पैदलों को मूर्ख समझते हैं। हम फुटओवर ब्रिज के नीचे भी भागकर सड़क पार करते हैं। हम ज़ेबरा क्रॉसिंग को सडकों के सौंदर्य का प्रसाधन मात्र समझते हैं। हम स्टॉप लाइन को सड़कों के अंग्रेजीकरण का कारण मानकर उसे रौंद डालते हैं।
हमारे पुलिसवाले चालान काटने को ही धर्म समझते हैं। हमारे पुलिसवाले ऑफिस टाइम पर भारी ट्रैफिक के बीच बेरियर लगाकर चाय पीने चले जाते हैं। हमारे पुलिसवाले खुद रेड लाइट जम्प करते हैं। हमारे पुलिसवाले रॉंग साइड, रॉंग लेन, बिना हेलमेट, ओवरटेकिंग, रैश ड्राइव को ड्यूटी समझकर निभाते हैं।
मिलिट्री के ट्रक, शहरों के ट्रैफिक को कीड़े, और शहरों की जनता को चींटी समझकर चलते हैं। सेना या पुलिस की वर्दी पहननेवाला शख़्स कहीं भी, कैसे भी गाडी घुसेड़ सकता है। गाड़ी पर लॉयर लिखा हो, तो उसे क़ानून से खेलने का अधिकार मिल जाता है। गाड़ी पर प्रेस लिखा हो तो उसे पुलिस को छेड़ने का अधिकार मिल जाता है। गाडी पर विधायक या सांसद प्रतिनिधि लिखा हो तो उसे जनता से खेलने का अधिकार मिल जाता है।
अतिक्रमण के कैंसर से बची खुची सड़कें बरसात की फुंसियों से त्रस्त हैं। पैदल चलने के लिए बने फुटपाथ झुग्गियों, रेहड़ियों, खोखों, स्मैकियों और मूत्रदान के लिए समर्पित हो चुके हैं। पार्किंगवाला भैया आधी सड़क घेरकर बदमाशी के स्तर तक उतरकर वसूली करता है। रिक्शावाला भैया अकेले ही पूरे ट्रैफिक का बंटाधार करने में समर्थ है। फुटपाथ का कोई पत्थर अगर सड़क पर गिर जाए तो उसे हटाने की ज़रूरत कोई नहीं समझता। डिवाइडर की रेलिंग घातक होकर सड़क तक मुड़ जाए तो उसे ठीक करने का जिम्मा किसी विभाग का नहीं है।
…हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं।

✍️ चिराग़ जैन

ख़बर का असर

जेब में दस का नोट लेकर भीखू छोले-कुल्चे के ठेले पर पहुँचा और बोला- “दस रुपये के छोले कुल्चे दे दो।”
ठेले वाला मुस्कुराकर बोला – “दस रुपये में छोले कुल्चे नहीं आते।”
भीखू उदास होकर पान की दुकान तक आया और टीवी पर चल रहा न्यूज़ बुलेटिन देखने लगा। पत्रकार बता रहा था कि भारत की विदेशमंत्री तीन दिन के दौरे पर जापान जा रहे हैं। ख़बर पढ़ते हुए समाचार वाचक के चेहरे पर जो ख़ुशी थी उससे भीखू को लगा कि अब शायद बात बन जाएगी। वह दौड़कर खोमचे पर पहुँचा और बोला – “लो भैया, विदेश मंत्री देश के विकास पर चर्चा करने जापान गई हैं, अब तो दस रुपये के छोले-कुल्चे आ जाएंगे?”
“अबे पगला गया है क्या?” …खोमचे वाला झल्ला उठा। …”उसके जापान जाने से मेरे ठेले का क्या लेना देना?”
भीखू अपना सा मुंह लिए वापस बुलेटिन देखने लगा। एक संवाददाता चीख-चीख कर उत्तेजना में बोल रहा था कि फलाने मंत्री के बयान पर विपक्ष ने दो दिन संसद का कामकाज नहीं होने दिया, लेकिन अभी-अभी ख़बर मिली है कि उस मंत्री ने अपने बयान पर खेद प्रकट कर दिया है और विपक्ष ने संसद चलने देने का आश्वासन दिया है।”
भीखू ख़ुश होकर फिर से ठेले तक पहुँचा और दुखी होते हुए फिर से वापस लौट आया।
बुलेटिन अभी भी चालू था। काफ़ी कुछ हुआ उस बुलेटिन में। एक नई फ़िल्म का ट्रेलर रिलीज़ हुआ; एक निजी चैनल के सर्वे से ये पता चला कि केंद्र सरकार की लोकप्रियता बढ़ रही है; यह भी पता चला कि रामायण युग की किष्किन्धा में आज भी सुग्रीव और बाली के सिंहासन सुरक्षित रखे हैं; एक अभिनेता को कोर्ट ने बरी भी कर दिया; एक समुदाय को सामूहिक रूप से अपना त्यौहार मनाने की इजाज़त भी मिल गई; एक विधायक ने रिजॉर्ट में प्राणायाम भी किया; एक संत को राममंदिर के शिलान्यास में शामिल होने का न्यौता भी मिल गया और एकाध अफ़सरों के तबादले भी हो गए।
इतना सब कुछ होने के बावजूद भीखू की जेब में पड़े दस के नोट की पहुँच में भूखा पेट भरने की जुगत न आ सकी। शाम हो गई। भूख ने भीखू की ऊर्जा पचा ली। अंतड़ियां सिकुड़ गईं। दिमाग़ थक गया।
छोले कुल्चे वाला अपना खोमचा समेट कर जा चुका था। भीखू ने सड़क किनारे पड़ा अख़बार का एक टुकड़ा उठाया और खा गया। मैंने उसे अख़बार चबाते देखा और पूछा – “क्यों भई, अख़बार में भी कोई स्वाद है क्या?”
भीखू अख़बार पर लिसड़ा हुआ मसाला दिखाते हुए बोला – “अख़बार तो बेस्वाद है भाईसाहब, लेकिन मसाले में मज़ा आ गया।”
जो अख़बार भीखू खा रहा था उसी के तीन दिन बाद के संस्करण में छोटा सा समाचार छपा था – “राजधानी दिल्ली के अमुक इलाके में एक चालीस-बयालीस वर्ष के विकलांग की लावारिस लाश मिली है। उसकी जेब में दस रुपये का एक नोट बरामद हुआ है। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट में इस शख़्स की मौत की वजह भूख बताई गई है।”
जब पुलिस भीखू का पंचनामा कर रही थी तब पनवाड़ी की दुकान पर रखे टीवी पर समाचार चल रहा था कि विदेश मंत्री ने जापान के साथ अनेक महत्वपूर्ण डील्स पर हस्ताक्षर किये।

✍️ चिराग़ जैन

पिताजी की भाषा की अलंकारिकता

यद्यपि उन गद्यांशों में मेरी कभी बहुत रुचि नहीं रही तथापि उनको सुनना मेरी विवशता है क्योंकि उनके वाचक मेरे पिताजी हैं, जो स्वयं को पूज्य बनाने की जुगत में समय की सूक्ष्मतम इकाई में भी मुझे प्रवचन पेलने से नहीं चूकते। गत 32 वर्ष में से प्रारम्भ के 4-5 वर्ष छोड़कर; जिनमें परमपिता परमात्मा की असीम अनुकम्पा से मुझे कुछ समझ नहीं आने की नैसर्गिक सुविधा प्राप्त थी; मैं यही समझने की कोशिश में लगा रहा हूँ कि आख़िर मुझ निर्दोष अर्जुन को अलग से बुलाकर बिना किसी कारण अष्टादश अध्यायी सुनाने का सिलसिला कब तक चलता रहेगा!
ये बातें मैं इतनी बार सुन चुका हूँ कि अब जब कभी इनकी पुनरावृत्ति होती है तो मैं उनका साहित्यिक और वैयाकरणिक अन्वेषण करने लगता हूँ। इस अन्वेषण के दौरान मुझे ज्ञात हुआ कि पिताजी की भाषा आश्चर्यजनक रूप से अलंकृत है।
बचपन में दो रुपये का नोट भी जब वे ये कहते हुए देते थे कि संभाल के रखियो कहीं खामाखा खो-खा न जाए; तब ख वर्ण की पुनरावृत्ति से अनुप्रास की छटा देखते ही बनती थी। कई बार तो मैं अनुप्रास की छटा देख ही रहा होता था कि पिताजी दो रूपये देने के अपने इरादे को पीठ दिखा देते थे।
दादाजी के खाना खाने बैठते समय दही लेने निकालना और आधी रोटी ख़त्म होने से पहले दही ले आने की घटना वे इतनी बार सुना चुके हैं कि पुनरूक्ति प्रकाश अलंकार का उदाहरण प्रस्तुत हो गया है। बाद में इसी घटना में दही वाले की दुकान को घर से डेढ़ किलोमीटर दूर बताकर वे लगे हाथ अतिशयोक्ति अलंकार भी चिपका देते हैं।
अकेले “नहीं” शब्द को वे इतने अलग-अलग बलाघात के साथ उच्चार लेते हैं कि यमक और श्लेष दोनों के अश्व उनके इस एक शब्द के अस्तबल में घास चरते बंधे रहते हैं। शब्द की प्रयोजनीयता का उनकी भाषा में ऐसा श्रेष्ठ उदाहरण मिलता है कि रसख़ान और कालिदास की रचनाएँ भी उकड़ू बैठ कर पिताजी का भाषाई कौशल देखती रह जाती हैं। मेरे घर में प्रवेश करते ही वे तीन शब्दों के एक युग्म का प्रयोग करते हैं। इस वाक्यांश से मुझे अनायास ही यह समझ आ जाता है कि आज डिनर करते समय कौन से उपनिषद का पाठ होगा।
“कहाँ गया था” या “घड़ी देखियो ज़रा”; इस प्रकार के वाक्यांश का अर्थ है कि स्थिति सामान्य है और भोजन के समय छुटपुट नीतिशतक से अधिक और कुछ नहीं सुनने को मिलेगा।
“आ गए हुज़ूर” अर्थात् मेरे अवतरण से कुछ पल पूर्व तक माँ के साथ मेरे भविष्य की चिंता को लेकर गरज के साथ छींटे पड़ चुके हैं और मुझे भोजन के समय श्रीमद्भागवत गीता का कर्मयोग सिखाया जायेगा जिसे स्थितप्रज्ञ होकर सह लेने में ही मेरा कल्याण है।
“आ जा बेटा” अथवा “लो आ गया” सुनते ही मैं समझ जाता हूँ कि आज गरुड़ पुराण से कम में पीछा नहीं छूटना। सही समय पर सही शब्द बरतने का यह कौशल उनकी भाषा को अन्य लोगों के पिताजियों की भाषा से विलग करता है। “हमने बाल धूप में सफ़ेद नहीं किये हैं” और “हम उड़ते पंछी के पर गिन लेते हैं” जैसे वाक्यों का प्रयोग कर वे सिद्ध करते हैं कि उनकी भाषा में मुहावरे और लोकोक्तियाँ सहज ही उतर आती हैं।
अपनी अभिव्यक्ति को अधिक समर्थ बनाने के लिए मेरे पिताजी संस्कृत के वैयाकरणिक सिद्धांतों का विलोमानुकरण करने में भी सिद्धहस्त हैं। जब वे मुझे संबोधित करते हुए मध्यम पुरुष एकवचन का हिंदी में प्रयोग करते हुए “तू/तेरा” आदि शब्द प्रयोग करते हैं तो वास्तव में मैं यथोचित सम्मान पा रहा होता हूँ किन्तु जैसे ही मेरे प्रति उनके सम्बोधन मध्यम पुरुष द्विवचन पर पहुँच कर “तुम/आप” आदि हो जाते हैं तो मेरे अपमान के प्रतिमान खड़े हो जाते हैं।
पिताजी के इस भाषाई कौशल में मेरी भंगिमा सदैव अवाक् और मेरे कंठ में घुँटा हुआ शब्द संस्कृत के सम्बोधन कारक का हिंदी अनुवाद ही होता है। लेकिन करत-करत अभ्यास के मेरी जड़मति इतनी सुजान अवश्य हो गई है कि जब वे पाणिनी होकर फलम् फले फलानि जपने लगते हैं तो मैं वरदराज बनकर अपने अंगूठे से फर्श की सिल पर पड़े निशान देखता रहता हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

डिग्रियों का बोलबाला

देश में डिग्रियों का बोलबाला है। कोई प्रधानमंत्री से डिग्री मांग रहा है तो कोई डिग्री से प्रधानमंत्री। ऐसे में मैं स्पष्ट कर दूँ कि डिग्री देखने की ललक छोड़ कर काम की क्षमता पर ध्यान दो।
प्रोडक्टिविटी और केपेसिटी हो तो डॉक्टरेट की डिग्रियाँ पांचवी फेल डिग्रीलेस को सलाम बजाती हैं। अंगूठा छाप मिनिस्टर हो गए और प्रशासनिक सेवा परीक्षा का अव्वल छात्र उनका सचिव। सर्वाधिक पढ़े लिखे प्रधानमंत्री का अध्यादेश एक मंदबुद्धि बालक फाड़ देता है और कोई कुछ नहीं कर पाता।
दंतकथाओं पर विश्वास करें तो कालिदास से अधिक विद्वान् ‘विलोम’ भाग्यहीन रह गया और विद्योत्तमा का मूढ़ पति युग का महाकवि हो गया। राजनीति में कुछ ऐसे भी हैं जो अपनी असली डिग्री दिखा दें तो विश्वविद्यालय और शिक्षानीति दोनों की क्षमताएँ कठघरे में आ जाएंगी।
जिन गुणों से व्यक्ति महान बनता है उनकी शिक्षा डिग्रियों में नहीं लिखी होती। विजय जी माल्या को कला की कक्षा में नहीं पढ़ाया गया था कि कन्याओं के कितने कपडे उतरवाकर गले में हाथ डालोगे तो फोटो अच्छी आएगी। न ही उन्हें विज्ञान के अध्यापक ने बताया था कि बैंकों के पैसे में विटामिन होते हैं। और तो और फिज़िकल एजुकेशन में भी उन्हें यह पाठ नहीं पढ़ाया गया था कि संकट की स्थिति में किस देश की ओर दौड़ना उचित होगा। …फिर भी माल्या साहब महान बने कि नहीं।
श्री मान केजरीवाल जी से ही पूछ लेते हैं कि उन्होंने अन्ना जी को अधन्ना बनाकर खुद हज़ारी हो जाने का कौशल किस स्कूल में सीखा था? अपने गले में मफलर बाँध कर भाजपा और कांग्रेस का गला घोंटने का पाठ NCERT की किस पुस्तक में शामिल था। अपनी कमीज़ बाहर निकाल कर बाकियों को विधानसभा से बाहर निकालना किस अभ्यास पुस्तिका में लिखा था। फिर भी केजरीवाल जी महान बने कि नहीं।
मोदी जी की विश्वविद्यालय की डिग्री देख कर भी क्या कर लोगे। जो पढ़कर डिग्री हासिल की वो उन्होंने कभी किया ही नहीं। बचपन से पढ़ते आए थे कि बड़े-बुज़ुर्गों का सम्मान करो, उन्होंने किया क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘अपना घर छोड़ कहीं और न जाया जाए’; वे माने क्या? बचपन से पढ़ते आए कि ‘तोल-मोल कर बोल’ …किस किस चीज़ की डिग्री देखोगे?
सन्नी द्योल ने दामिनी फ़िल्म में एक डायलॉग बोला था। उसी अंदाज़ में समझ लो – “सिसोदिया समझा इसे, काग़ज़ पर छपी हुई ये डिग्रियाँ जमुनापार में बहुत मिलती हैं, लेकिन इनसे कुर्सी पाने का जो मुक़द्दर है ना, वो दुनिया के किसी स्कूल में नहीं मिलता; नेहरू-गांधी खानदान उसे लेकर पैदा होता है। पुलिस की थर्ड डिग्री जब दिखती है ना, तो आदमी बोलता नाहीं …बोल जाता है।”

✍️ चिराग़ जैन

लूट का तंत्र न तोड़ो साहिब

दिल्ली के ऑटो-टैक्सी वालों ने सरकार को बताया है कि हम जो सदियों से जनता को लूटते रहे हैं, मीटर से चलने से इनकार करते रहे हैं, तीन-चार गुना से लेकर दस-बारह गुना तक किराया मांगते रहे हैं, मीटर से चलने की मांग करने वालों को गाली बकते रहे हैं, पुलिस का डर दिखाने वालों की खिल्ली उड़ाते रहे हैं; ये सारी परंपराएं ओला और ऊबर जैसे आधुनिक और पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित ऑपरेटर्स ने बंद करवा दी हैं। जो आम आदमी ऑटो तक को हाथ देने से डरता था वो अब झटाक से ऊबर-ओला कैब बुलाने लगा है। इनके कारण हमें नदिरेस्टे, पुदिरेस्टे, हनिमुरेस्टे और हवाई अड्डे पर थके हारे मुसाफिरों से मनमानी करने का अवसर नहीं मिल पा रहा है। इस पाश्चात्य सेवा ने हमारी पुरातन परम्पराओं पर ताला डाल दिया है। हमारी खड़-खड़ करती नॉन एसी गाड़ियों के काले पीले रंग को चमचमाती नई एसी गाड़ियों ने कहीं का नहीं छोड़ा। जनता को लूट कर हम रोज़ शाम महफ़िल जमाते थे लेकिन अब दो वक़्त की रोटी भी नसीब नहीं हो रही।
इस वेल मैनेज्ड सर्विस को तुरंत बंद नहीं किया गया तो हम हड़ताल कर देंगे।
सरकार बोली- लेकिन तुम तो बोल रहे हो कि तुम्हारे धंधे पर आलरेडी ताला पड़ गया है, फिर उसी कुंडे में हड़ताल वाला ताला कैसे डाला जा सकता है।
सुनकर यूनियन वाले रोने लगे। बोले सरकार आप इन सेवाओं को बंद करवा दो तो हम कानून का पालन करने को तैयार हैं।
सरकार बोली- लेकिन कानून तो पहले भी था जिसे तुम धड़ल्ले से चीथड़े करते रहे हो।
यूनियन बोली- तो आप जनता को कोई हेल्पलाइन दे दीजिये जिस पर हमारी मनमानी की कंप्लेंट की जा सके।
सरकार बोली- उस पर कंप्लेंट करने वालों को तुम पीटने लगते हो।
यूनियन बोली- अब नहीं पीटेंगे माई बाप।
सरकार फिर बोली- अगर तुम ईमानदारी से चलो तो तुम वैसे ही उबर ओला को पछाड़ दोगे, फिर इन्हें बंद क्यों किया जाए।
अब यूनियन वाले हँसते हुए बोले- हुकुम, आप तो जानते ही हो सवारी देखकर थोड़े पैसे कमाने का लालच जाग जाता है, आखिर हमारे भी बाल बच्चे हैं।
बाल बच्चों की बात पर सरकार भावुक हो गई। बोली चलो कल से उबर ओला की धरपकड़ शुरू करवा देंगे। तुम अपनी पुरानी टैक्सियों के मीटर की ओइलिंग करवा लो।
यूनियन वाले ख़ुशी ख़ुशी सचिवालय से बाहर आए। बाहर आते ही उस ओला को हिक़ारत से देखा जिस में बैठ कर सचिवालय आए थे। फिर एक कपडा निकाला और अपनी गाड़ी की धूल ओला की गाडी पर उड़ाते हुए जनपथ को रौंदते हुए दौड़ गए। ओला की गाडी फुटपाथ पर चिलम फूंकते “जनहित” नामक नागा के बराबर में खडी होकर अपना कलेजा जलाने लगी।

✍️ चिराग़ जैन

हर त्योहार हर रोज़

आज एक टीवी चैनल पर समाचार प्रस्तोता टाइम पास करने के लिए बोल रहा था कि ये दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग साल में कुछ ही दिन देशभक्ति के गीत गाते हैं। हम साल में एक ही दिन शहीदों को याद करते हैं। मुझे उसकी बात सुनकर लगा कि सचमुच करते तो हम ग़लत ही हैं। यह परंपरा बंद होनी चाहिए।
मैं प्रधानमंत्री जी को एक पत्र लिखकर अनुरोध करूँगा कि वे अपनी दिनचर्या बदलें। उन्हें चाहिए कि वे रोज़ सुबह उठकर सबसे पहले अमर जवान ज्योति, राजघाट, विजयघाट, शक्तिस्थल और शांतिवन पर पुष्प चढ़ाते हुए लालकिले जाएं। वहाँ झंडारोहण करके राष्ट्र को संबोधित करें। उसके बाद सीधे विजय चौक पहुँचकर गणतंत्र परेड में सम्मिलित हों। उसके बाद देश को ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईद-ए-मिलाद, मिलाद-उल-नबी, शब्-ए-बारात, मुहर्रम, होली, दीवाली, बिहू, ओणम, पोंगल, रक्षाबंधन, हरियाली तीज, मकर संक्रांति, लोहड़ी, महावीर जयंती, रामनवमी, गुरुपर्व, बुद्ध पूर्णिमा, वसंत पंचमी, वाल्मीकि जयंती, जन्माष्टमी, दुर्गापूजा, गणेश चतुर्थी, पर्यूषण, विश्वकर्मा जयंती, ईस्टर, गुड फ्राइडे, रविदास जयंती, बैसाखी, अहोई अष्टमी, सकट चौथ जैसे सभी पर्वों की शुभकामनाएं दें। इसके बाद दोपहर का भोजन करें और फिर विवेकानंद, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष, तिलक, अशफ़ाक़ुल्लाह खान, रामप्रसाद बिस्मिल, बिनोवा भावे, विपिनचंद्र पाल, लाला लाजपत राय, महाराणा प्रताप, वीर सावरकर, राजाराममोहन राय, पन्ना धाय, सम्राट अशोक, रणजीत सिंह, बिरसा मुंडा, कुँवर सिंह, खुदीराम बोस, स्वामी श्रद्धानंद, छत्रपति शिवाजी, और जो जो भी महान हैं उन सबके बलिदानों को याद कर गमगीन होकर बैठे रहें। वहां से निवृत्त होकर रामलीला मैदान पहुंचें और हवा में तीर छोड़कर बुराई पर अच्छाई की विजय के पर्व को याद करें। वहां से जामा मस्जिद पहुँच कर दावत-इ-इफ़्तार में शामिल हों। और उसके बाद किसी गिरिजा में जाकर जीसस को जन्मदिन की बधाई देते हुए संता के कपड़े पहन कर बच्चों को उपहार बाँटने निकल पड़ें। रात भर उपहार बांटने के बाद सुबह फिर से फूल लेकर राजघाट की ओर निकल लें।
यदि हमारे प्रधानमंत्री जी रोज़ इस दिनचर्या का पालन करें तो कोई आहत होकर यह न कह पाएगा कि हम साल भर में सिर्फ़ एक दिन शहीदों को याद करते हैं, या हमें बुद्ध, महावीर, देश या समाज की याद साल में एकाध दिन ही आती है। और ऐसा करते हुए इस बात की बिल्कुल फ़िक्र न करें कि लोग रोज़ मेरी एक जैसी दिनचर्या देख कर बोर हो जाएंगे, क्योकि एक महीने बाद कोई दूसरा प्रधानमंत्री इस दिनचर्या को करता दिखेगा। उसके एक महीने बाद कोई और… और फिर कोई और और इन सब प्रधानमंत्रियों का योगदान भी रोज़ याद किया जाएगा।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!