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अभी बुलेटिन जाना है

कोसी का बढ़ता पानी तीन दिन मीडिया में बहता रहा। कोसी भी उचक-उचक कर देखती रही कि ख़बर में क्या चल रहा है। एक ही ख़बर को बार-बार देख बेचारी बोर हो गयी। बिहार देखता रह गया और कोसी उतार पे आ गयी।
किसी ने पूछा कि इतना सारा पानी (जो पूरे बिहार पर आफ़त बनकर टूटने वाला था) आख़िर अचानक कहाँ हवा हो गया। मैंने कहा- “पानी था ही नहीं, हवा ही थी। जो थोड़ा-बहुतेरा पानी आया था, सो मीडिया ने पी लिया।”
ठीक इसी तरह की आफ़त महीने भर पहले पॉवर प्लांट्स में कोयले की कमी को लेकर मची थी। पूरा देश अँधेरे में डूबने वाला था। खबर करंट की तरह दौड़ी। हा-हाकार मच गया। एनटीपीसी और अन्य पॉवर कम्पनियां अपना-अपना कोयला टटोलने लगीं। कोयला, जो पहले भी मीडिया का एक्सपीरियंस होल्डर रहा है, चुपचाप सारा तमाशा देखता रहा। दो दिन हल्ला मचा। ख़बर भी चलती रही और बिजली भी।
2012 में दुनिया ख़त्म होनी थी, नहीं हुई। मीडिया ने बचा लिया। फिर कानपुर में सोना निकलना था, नहीं निकला।शायद मीडिया से घबराकर किसी बिल में जा छुपा। साईं-शंकराचार्य विवाद पर हिन्दू-हिन्दू दंगे होने थे, नहीं हुए। ईश्वर ने स्वयं आकर मिडिया के पैर जो पकड़ लिए।
मैंने एक वरिष्ठ पत्रकार से पूछा- “उत्तरदायित्व का मतलब समझते हैं आप?”
वो बोले – “आधे घंटे बाद समझूंगा यार, अभी बुलेटिन जाना है।”

✍️ चिराग़ जैन

अश्लीलता – अश्लीलता

अश्लीलता समाज के लिए हानिकारक है और समाज अश्लीलता के लिए। पार्क में पेड़ के पीछे बैठी लड़की तभी अश्लील कही जा सकती है जब वो मेंरे साथ न बैठी हो। यदि उसको मेरे साथ बैठने में ऐतराज़ न हो तो मुझे नाक-भौं चढाने वालों को अनपढ़ और मैनर्सलैस कहने में क्या एतराज़ हो सकता है।
पड़ोसी की बीवी को कपड़े सुखाते देखकर आहें भरनेवाले जब उसको दूधवाले से हंसकर बात करते देखकर बातें बनाते हैं तो ऐसा लगता है जैसे योगाचार्य उबकाई को चिगलते हुए हाज़मा दुरुस्त करने की कसरत करा रहा हो। लेकिन योगाचार्य कसरत कराता है साहब। उबकाई आती रहती है। कसरत करने वाले हाथ हिलाते रहते हैं। कसरत करने वालियां सांस लेती रहती हैं। कसरत कराने वाला भी सांस लेता रहता है।
खैर छोड़िये हम अश्लीलता पर थे।
योगा में अश्लीलता कहाँ। अश्लीलता अंग्रेजी में अश्लीलता नहीं रहती। उन गलियारों में वो मॉडर्न होती है। अश्लील लोग लड़कियों को पीठ पीछे माल, बम, पटाखा, आइटम जैसे भद्दे शब्दों से बुलाते हैं लेकिन सभ्य लोग उनको मुँह पर बेहिचक हॉट और सैक्सी कहते हैं । वो एडवांस जो हैं।
अश्लीलता का दायरा लिंगभेद भी जानता है। फिल्म के पोस्टर पर सनी लियोने का भीगे कपडे से ढंका चित्र अश्लील है लेकिन पीके के पोस्टर पर आमिर खान का रेडियो की ओट में समाया बदन आर्टिस्टिक है। रेडियो और कपडे का क्या मुकाबला साहब। रेडियो आमिर खान को पसंद है। इसलिए वो ग्रेट है। सनी की चद्दर में कहाँ कुछ छिपता है यार। इसलिए विरोध हुआ। हमें अंडर एस्टीमेट कर डाला। हमने साड़ी वाली माधुरी को भी उसी सौन्दर्यपरक नज़र से देखा था, ये भीगी चद्दर वाली…..हुँह।
सड़क पर खड़ी लडकियों को जब कोई गुंडा छेड़ता है तो अक्षय कुमार उसकी धुलाई कर डालते हैं। क्योंकि वो हीरो हैं। फिर अक्षय कुमार खुद उनको छेड़ते हैं। लेकिन वो अश्लील थोड़े ही हैं, वो तो हीरो हैं।

✍️ चिराग़ जैन

ऑडियन्स कैप्चर की शतरंज

बुश बैरॉन का एक टीवी हमारे पास भी था। घर का सबसे स्पेशल कोना सुशोभित होता था उससे। क़माल ये था कि संज्ञा के तौर पर टीवी ने पूरा कमरा हड़प लिया था। टीवीवाला कमरा नाम था उस चुम्बकीय कक्ष का। कुछ अपरिहार्य कर्मों के इतर, लगभग सबके सभी नित्य-अनित्य कर्म उस कमरे में सम्पन्न होते थे।
एंटीने की तकनीकी कमज़ोरी ने हमें बरखा और तेज़ हवा से घृणा करना सिखा दिया था। किसी की पतंग जब एरियल के जंजाल में फँस जाती थी, तो ऐसा लगता था कि परमात्मा ने लोगों का सुख छीनने के उद्देश्य से इस पतंगासुर की रचना की होगी। जी करता था कि पतंग उड़ानेवालों को उन्हीं की सद्दी से फाँसी लगा दें।
‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ सुनने के आदी हो चुके लोग, इसे सुनने के लिये लड़ने लगे। बेशक़ उन्हें पंडित जी के रागों, बहुभाषीय कलाकृति और चेहरे में कोई रुचि नहीं थी, लेकिन तनुजा, अमिताभ बच्चन और रेखा जैसी सूरतों को बार-बार देखना किसी मंत्रजाप से कम न था। ब्योमकेश बख्शी, मशाल, हम लोग, बुनियाद, जुनून, इम्तिहान, कैप्टन व्योम, चन्द्रकांता और न जाने कितने स्पीड ब्रेकर उग आये थे मुहल्ले की चौपाली संस्कृति तक पहुँचाने वाली सड़क पर। फिर रामानंद सागर ने ऐसा ब्रह्मास्त्र फेंका कि बस मुहल्ला कल्चर पर परमाणु आ गिरा।
स्मिता पाटिल और सलमा सुल्तान के भावविहीन चेहरों से समाचार सुनना सबको भाने लगा। जब कभी एक गंजा-सा आदमी बुलेटिन पढ़ने आ जाता था, तो देखनेवालों के चेहरे पर ऐसे भाव होते थे, जैसे बढ़िया सलाद की आखि़री किश्त में कड़वा खीरा आ गया हो। कृषि दर्शन आये या फ़ीचर फ़िल्म, टेलिविज़न अपने समभाव से चालू रहता।
जो माँ पहले खेलने-कूदने पर धुन देती थी, अब न खेलने पर धुनने लगी। बच्चों का सारा दिन टीवी के आगे बैठे रहना उसे अखरता था। लेकिन टीवी बच्चों का हमजोली बन गया था। माँ चार गाली बच्चों को देती तो दो टीवी को भी पड़ती।
धीरे-धीरे टीवी ने हमें ग़ुलाम बना लिया। रंगोली की हेमामालिनी, सुरभि की रेणुका शहाणे, शक्तिमान के मुकेश खन्ना और फूल खिले हैं गुलशन-गुलशन की तबस्सुम ने जबसे अपने आपको हमारा ‘दोस्त’ कहना शुरू किया, तब से हमने लंगोटिया यारों का रजिस्ट्रेशन करवाना बंद कर दिया।
तहक़ीक़ात की बीयर से शुरू हुआ शौक़ आज संबंधों की जासूसी के नशे तक पहुँच चुका है। मनोहर श्याम जोशी के ‘हम लोग’ आज परिवार के नाम पर घिनौने और भद्दे संबंधों का नंगा नाच देखकर ख़ुश हैं। स्टोन बॉय की सहृदयता का सिलसिला अब शिनचैन की ढिठाई तक आ पहुँचा है। सफ़र अभी ख़त्म नहीं हुआ है। मुहल्लों को दूरदर्शन खा गया, और दूरदर्शन को केबल, केबल को भी इंटरनेट का ख़ौफ़ हो गया। शेर को सवाशेर मिलता ही है। पर एक बात साफ़ है कि ऑडियन्स कैप्चर की इस शतरंज में मोहरे हैं – ‘हम लोग’!

✍️ चिराग़ जैन

गुरूपूर्णिमा

एक महान आदमी में सीखने की प्रवृत्ति इतनी अधिक थी कि उसने गधे को भी गुरू बना लिया। लेकिन आजकल लोग गुरु को गधा बनाने पर तुले रहते हैं। इसका कारण ये नहीं है कि नयी पीढ़ी उद्दंड है बल्कि सुभद्रा मैया जब पिताजी की डींगों का इम्प्रेशन अभिमन्यु पर झाड़ रही थी तो अभिमन्यु माँ के पेट पर पेट के बल लेटा था।
गुरु पूर्णिमा का पर्व बढ़िया पर्व है। लेकिन गुरू का आकार इतना विशाल है कि पूर्णिमा को गुरु अपने पीछे छिपा लेता है। चेले पूर्णिमा को देख ही नहीं पाते। गुरुर्ब्रह्मा…… टाइप के श्लोक या गुरु गोविन्द दोउ खड़े….. टाइप के दोहे दोहराने में ही उनकी अमावस हो जाती है और पूर्णिमा गुरू के आभामंडल में समा जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

मारो वरना मारे जाओगे

लड़ना हमारी पौराणिक परम्परा है। हम सृष्टि के आदि से लड़ते आ रहे हैं। रामायण में लड़े, महाभारत में लड़े, बंगाल में लड़े, पानीपत में लड़े, उत्तर-दक्खिन-पूरब-पश्चिम हर दिशा में हमने किसी न किसी कालखंड में लड़ने की संभावनाएँ तलाश ही लीं। समाज ने शांति के लिये संतों का निर्माण किया, संतों ने आपस में लड़ना शुरू कर दिया।
हमारे इस युद्ध प्रेम को देखकर तुर्कों, मंगोलों और अफ़गानों से लेकर अंग्रेजों, पुर्तगालियों और फ़्रांसिसियों तक ने अपने निठल्ले बैठे लड़ाके हमारी ओर रवाना किये। किसी से सत्रह बार हारे तो किसी को सत्रह बार हराया।
अंग्रेज़ बेचारे यहाँ व्यापार करने के उद्देश्य से आये, लेकिन यहाँ की लड़ाका प्रतिभा को देखकर अपने मूल उद्देश्य से पथभ्रष्ट होकर ऊलजलूल लड़ाइयों में फँस गये। हमने उनसे कहा कि हम लड़ लड़ कर अपने देश का नास करेंगे। ये सुनकर वो हमसे लड़ने लगे और बोले, ऐसे कैसे नास करोगे। हमारे रहते तुम नास नहीं कर सकते। …बस इसी भावना से प्रेरित होकर वो यहाँ रेललाइनें बनाने लगे, पुल बनाने लगे, शहर बसाने लगे। हमें लगा कि नास और विकास की लड़ाई में हम हारे जा रहे हैं। बस फिर क्या था, हमने ज़ोर की लड़ाई की और अंग्रेज़ों को देश से बाहर खदेड़ दिया।
उनके जाते ही हम बँटवारे के नाम पर लड़े। फिर हैदराबाद, कश्मीर, जूनागढ़, बांग्लादेश, अरुणाचल और मुम्बई ने समय समय पर लड़ाई का मुद्दआ बनकर इस देश की परम्परा की रक्षा की।
नेहरू जी ने चीन के प्रधानमंत्री को एक बार इस मिट्टी का भोजन कराया, अपने बग़ीचे की हवा खिलाई, भाई इस हद तक प्रभावित हुआ कि चीन लौटते ही कर्ज़ चुका दिया। शास्त्री जी ने ताशकंद जाकर शांति समझौता किया, हमने उनसे लड़ाई कर ली कि आपकी हिम्मत कैसे हुई शांति समझौते पर हस्ताक्षर करने की। उनकी हालत से सबक लेकर इंदिरा जी ने पाकिस्तान से लड़ाई की तो हम इंदिरा जी पर राशन पानी लेकर चढ़ गये, कि लड़ने की क्या ज़रूरत थी। उनको अपनी भूल का एहसास हुआ, उन्होंने तुरंत शिमला समझौता कर लिया तो हम उनसे फिर लड़े कि ये क्या बात हुई, पहले लड़ी फिर समझौता कर लिया।
तब से राजनेताओं ने सबक ले लिया ,वज़ह मत तलाशो, बस लड़ते रहो …अब इसने कुछ कहा है …चलो लड़ते हैं, अब इसने कुछ नहीं कहा है …चलो लड़ते हैं। लड़ाई का ये अनवरत क्रम देश के अस्तित्व का आधार बन गया है।
सीमा पर पाकिस्तान ने हमारे सैनिकों से लड़ाई की। ख़बर मिलते ही सरकार और विपक्ष संसद में लड़ने लगे। चैनल आपस में लड़ने लगे कि ख़बर किसने सबसे पहले दी। एक ने कहा मैंने सबसे पहले बताया कि पाँच सैनिक मरे हैं। दूसरे ने कहा, मैंने तो पहले के मरते ही न्यूज़ फ़्लैश कर दी थी कि पाँच मरेंगे। तीसरे ने कहा, मैंने तो सुबह ही ज्योतिषि से बुलवा दिया था कि शाम तक पाँच मरेंगे। एक ने संवेदनशील होते हुए कहा, ये पाँचों जब सेना में भर्ती हो रहे थे, तभी हमने घोषणा कर दी थी कि इनका मरना तय है।
बहरहाल, ख़बर तो आ चुकी है। अब संसद इस विषय पर लड़ रही है कि आगे किस तरह लड़ना है। किसी का कहना है कि गोले-बारूद से लड़ो, किसी की सलाह है कि बातचीत में लड़ो। किसी विद्वान ने सलाह दी है कि लड़ो मत, लड़ने की चर्चा करते रहो। इससे लड़ाई का माहौल बना रहता है और लड़ाकों का हौंसला भी बना रहता है।
महापुरुषों के कथन काम आ रहे हैं- हार मत मानो, जीवन एक युद्ध है, जीवन एक रणक्षेत्र है, अपने हक़ के लिये लड़ो, सच के लिये लड़ो, लड़ते रहो, भिड़ते रहो, मरते रहो, मारते रहो… उस मसख़रे को भूल जाओ जिसने कहा था- जीवन एक रंगमंच है, इस सत्य को याद रखो कि तुम्हारा जीवन एक एक्शन फ़िल्म है… सेंसर की परवाह मत करो, लड़ो, लड़ो, मारो वरना मारे जाओगे।

✍️ चिराग़ जैन

चुनावी माहौल में

कुछ पुरानी बहसें देख रहा था यूट्यूब पर। चुनावी माहौल में मुँह में तिनके दबाये कई भेड़िये रंगे सियारों के समर्थन से स्वयं को महान सिद्ध करते नज़र आये। “जनता”, “लोकतंत्र”, “ईमानदारी”, “राष्ट्रहित”, “जनसेवा” और “भारत माता” जैसे शब्दों को बोलकर अपना वाक्युद्ध जीतने पर जब वे कुटिल मुस्कान मुस्काते थे तो ऐसा जान पड़ता था कि जिस्म का धंधा करने वाली कोई त्रिया, सावित्री और अनुसूया से अपनी तुलना कर पावनता के मुख पर तमाचे मार रही हो।
मैं लोगों के मुख पर मुस्कान पिरोने वाला एक अदना सा कलाकार हूँ। सामान्य स्थितियों से हास्य जुटाना मेरा काम है। शब्दजाल बुनना और वाक्पटुता से सम्मोहन करने की कला मुझे और मेरे सहकर्मियों को माँ सरस्वती ने जन्म के समय सौगात में दे दी थी। ऐसे में किसी प्रकार की लच्छेदारी में से झाँक रही रंगदारी को पहचानना मेरे लिये कठिन कार्य न था।
हर चैनल की हर बहस में अनवरत एक-दूसरे की कुत्ता-फजीहत और खिखियाती हँसी का जब बहावानुवाद किया तो ये स्वर सुनाई पड़े- “तुम सब मूर्ख हो सालो! हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाओगे। हम ऐसे ही चैनलों पर टाइम पास करके चले जायेंगे और तुम अपने-अपने टीवी के सामने बैठे ये देखकर ख़ुश होते रहना कि फ़लां ने फ़लां को बढ़िया जवाब दे दिया। ये न्यूज़ चैनल भी हमारे ही चमचे हैं।”
वे जानते हैं कि हम इस बात से कोई सरोकार नहीं रखते कि जिन सवालों के जवाब इन बहसों में तलाशने का ढोंग किया जा रहा है, वे दरअसल हमारे हैं ही नहीं। वे ये भी जानते हैं कि इन बहसों को जनता ऐसे ही सुनती है जैसे बालिका वधु देख रही हो। सास-बहू पर विज्ञापन आ गये तो एनडीटीवी लगा लिया, थोड़ा मज़ा रवीश का ले लिया, फिर वहाँ विज्ञापन आये तो डिस्कवरी लगा लिया, तेंदुए और तेंदुई का संभोग देख लिया, वहाँ से कहीं और, और वहाँ से कहीं और।
हम रिमोट पर उंगलियाँ टिकाये लगातार अपने आप को बेवक़ूफ़ बनाये जा रहे हैं। हर पार्टी के अपने स्पोक्सपर्सन हैं, ये वो लोग हैं जो बहस बहुत अच्छी कर लेते हैं। ये वो टेस्ट खिलाड़ी हैं जो हारे हुए मैच को ड्रॉ की ओर ले जाने का हुनर जानते हैं। ये वो लोग हैं जो बहुत कम, य बहुत ज़्यादा बोल कर बहस का टाइम पास करना जानते हैं। ये वो लोग हैं जिनके किसी भी बयान को “उनकी निजी सोच” बताकर पार्टी अपना पल्ला झाड़ सकती है। यदि देश सेवा का हित है तो प्रवक्ताओं की क्या ज़रूरत? (मेरी इस बात पर कुछ लोग मेरा राजनैतिक बचकानापन कहकर खिल्ली उड़ासकते हैं) लेकिन उनको मैं पहले ही बता दूँ कि संगीन राजनैतिक अपराधों के इस दौर में राजनीति इसी बात का लाभ उठा रही है कि उन्होंने जनता को आपस में लड़ना सिखा दिया है।
किसी ने कोई बयान दे दिया, किसी ने उसका खंडन कर दिया, किसी ने स्याही फेंक दी, किसी ने चप्पल फेंक दी… हम देश की राजधानी में जीवन यापन कर रहे हैं। राजनीति जहाँ श्वास लेती है उस वातावरण से हम भी सिंचित हो रहे हैं। देश भर को प्रभावित करने वाली बौद्धिक तरंगें जब उद्घटित होती हैं तो सर्वप्रथम हमसे टकराती हैं। जब इस दौर से इतिहास प्रश्न करने खड़ा होगा तो उस समय दिल्ली की आम जनता से भी यह पूछा जायेगा कि तुमने क्यों इन सपोलियों को अपने आस-पास पनपने दिया। मैं जानता हूँ कि आप कहेंगे कि हम क्या कर सकते हैं? प्रश्न ये नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं; प्रश्न ये है कि हमारी कुछ करने की इच्छाशक्ति कहाँ चली गयी।
चुनाव हो चुका है, 4 दिसम्बर से पहले मैं ये बातें करता तो लोग इसमें किसी पार्टी की महक ढूंढने लगते। इंदिराजी ने सबसे पहले मीडीया की ताक़त को समझा और आपातकाल के दौरान सर्वप्रथम मीडिया को पंगु बना दिया गया। सरकारी मीडिया आज तक उन सरकारी इंगितों का उल्लंघन करने का साहस नहीं जुटा पाया। तब से आज तक टीवी हमें बेवक़ूफ़ बनाता जा रहा है। अब तो राजनैतिक पार्टियों ने बाक़ायदा मीडिया प्रबंधन के लिये प्रकोष्ठ बना दिये हैं। साइबर मैनेजमेंट के लिये कार्यालय खोल दिये हैं। ठीक चुनाव के दिन जबकि चुनाव प्रचार बंद हो चुका है, सुबह-सुबह आपके घर पर एक अख़बार आता है और उसका मुखप्पृष्ठ एक पार्टी विशेष का विज्ञापन कर रहा होता है।
मैं ये नहीं कहता कि इन सब बातों को पढ़कर क्रांति की मशाल उठा लो। इस दौर में क्रांति के लिये घर-बार फूँकना कदाचित् कठिन न हो, लेकिन एक काम तो हम कर ही सकते हैं कि जब इस प्रकार के ढोंगी चैनलों पर राजनेताओं को बिठाकर एक-एक घंटे के बुलेटिन बनाये जा रहे हों तो उस वक़्त अपना चैनल बदल दो। जिस टीआरपी के दम पर ये लोग हमको बेचे जा रहे हैं, उसी टीआरपी को अपनी ताक़त बनाओ। जब इस तरह की बहसों की टीआरपी घटेगी तो कम से कम इन चैनल्स से मिलने वाली फ़ुटेज के दम पर राजनीति करने वाले लोग तो कम होंगे।
किसने क्या बयान दिया, या दिल्ली में किसकी सरकार आयेगी इस पर किस नेता की क्या राय है… इस प्रकार की बहसों से अगर हमने चैनल बदलना सीख लिया तो कम से कम लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की दरारों को भरने में हम कुछ कर सकेंगे।

✍️ चिराग़ जैन

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