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अथ अमरीका-इज़रायल प्रेमकथा

वाटिका में विचरण करते हुए अमरीका की दृष्टि, चुहल करती हुई इज़रायल पर पड़ी। अमरीका, इज़रायल के अप्रतिम सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। इज़रायल भी अमरीका के वैभव और साज-सज्जा से प्रभावित हुए बिना न रह सकी। आंखों ही आंखों में उपजा प्रेम, अधरों से अभिव्यक्त न हो सका और दोनों मन की बात मन में दबाए अपने-अपने महल में लौट आए। वाटिका की उस मौन मुलाकात ने दोनों की नींद में धतूरा बो दिया था।
अमरीका के कानों में किशोर कुमार की आवाज़ गूंजती थी ‘करवटें बदलते रहे सारी रात हम। और इज़रायल के चेहरे पर मीना कुमारी के अंदाज़ में ठुमरी चल रही थी ‘यूं ही कोई मिल गया था’।
आख़िर एक दिन इज़रायल ने बहाने से अमरीका को फोन मिला ही लिया। आपस का तो कोई ख़ास विषय था नहीं, लेकिन बात करने का बहाना चाहिए था तो मुग्धा नायिका ने शिकायत की सिम्पैथी हासिल करने के लिए अमरीका से कहा, ‘देखो ना, ये ईरान आते-जाते मुझे छेड़ता है। पूरे शरीर पर क्रूड ऑयल मलकर मेरे पीछे पड़ा रहता है।’
प्रेम में डूबे अमरीका की आंखों में ईरान की छवि ऐसे छप गई, जैसे किसी घायल नागिन की आंखों में दुश्मन की तस्वीर प्रिंट हो गई हो। उसने प्रेमी के रिरियाते से स्वर में गर्जना की ‘तुम चिंता मत करो प्रिये, मैं इस ईरान केे बच्चे को ऐसा सबक सिखाउंगा कि इसकी सारी हेकड़ी निकल जाएगी। मेरे होते कोई और तुम्हें छेड़ जाए, ऐसा आज के बाद नहीं होगा।’
अमरीका को काम पर लगाकर इज़रायल फिर से वाटिका में टहलने निकल गई। उधर अमरीका ने अपने सारे श्रेष्ठ योद्धा, अपना पूरा राजदरबार और अपनी पूरी ताकत ईरान पर झोंक दी। मंत्रियों ने पूछा, ‘महाराज, अचानक से ईरान से अपनी क्या दुश्मनी हो गई?’
महाराज ने आशिकी पर विश्व-कल्याण की चादर डालकर कहा, ‘मुझे रात को सपने में जॉर्ज वाशिंगटन दिखाई दिए थे, उन्होंने बताया है कि ये ईरान दुनिया की सभी ख़ूबसूरत राजकुमारियों का अपहरण करनेवाला है। और अगर एक बार इसने अपहरण प्रारंभ कर दिया तो इसे रोकना असंभव हो जाएगा।’
चूंकि सपनों का कोई प्रमाण नहीं होता, इसलिए बेचारे अमरीकी लड़ाके प्राण देने निकल पड़े। खूब घमासान हुआ। इधर से मिसाइल, उधर से बमबारी। इधर तबाही, उधर तबाही। जब लड़ाई महाभारत के युद्ध से भी लंबी खिंच गई, तो मंत्रियों ने महाराज से फिर पूछा, ‘महाराज, दोनों तरफ के इतने सैनिक मारे जा चुके हैं। मासूम बच्चों तक की जान जा चुकी है। आख़िर हम ये लड़ाई लड़ क्यों रहे हैं, और कब तक लड़ेंगे?’
मंत्रियों के दबाव पर महाराज ने रात को चुपचाप इज़रायल को फोन मिलाकर पूछा, ‘डार्लिंग, हमने ईरान से लड़ाई शुरू तो कर ली, अब बताओ, इसे खत्म करने के लिए क्या शर्त रखनी है।’
इज़रायल ने मतलब निकलने के बाद वाले अंदाज़ में कहा, ‘मैं तो ख़ुद परेशान हूं कि तुमने इतना हंगामा क्यों मचाया हुआ है? मिस्टर अमरीका, आई एम नॉट योर प्रोपर्टी। यू आर नॉट सपोज़ टू क्रिएट डिस्टरबेंस बिटवीन ऑवर नेबरहूड।’
इज़रायल के इस बदले हुए रूप से अमरीका का दिल टूट गया। उसने अल्ताफ़ राजा का गाना गुनगुनाना शुरू किया ‘जा बेवफ़ा जा, तुझे प्यार नहीं करना।’ बेवफ़ाई का बदला लेने के लिए अमरीका ने पाकिस्तान को फोन करके कहा, ‘भाई, किसी के बहकावे में आकर मैंने ईरान के साथ बिना मतलब का रायता फैला दिया है। अब तुम हमारा मामला सलटवा दो।’
पाकिस्तान ठहरा पुराना बदमाश। तहबाज़ारी और मांडवाली में उसे हमेशा मज़ा आता है। बस अब तक लोग उसकी मांडवाली करवाते थे, अब वो लोगों की मांडवाली करवाने निकला है।
इस्लामाबाद में अदालत लगी। जिस जज को शांति करानी थी, उसको तो आदत कलेश की थी। सो वही हुआ, जिसे शांतिदूत समझा था, वो तो शिशुपाल निकला। इस्लामाबाद टॉक्स फेल हो गई। ईरान अपने अपमान के लिए मरने की सीमा तक लड़ने पर उतारू है और अमरीका ‘नेतु-नेतु’ का मंत्र रटते हुए निष्काम भाव से युद्ध करने का ढोंग कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

मंच से मन तक कुछ अलग : डॉ. हरिओम पंवार

सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग शैली गढ़ना, अपना अलग मुहावरा खोजना, अपनी अलग कहन तैयार करना और अपनी पठन्त के प्रभाव से अपनी विधा के नवागन्तुकों की महत्वाकांक्षा का लक्ष्य बन जाना किसी को ‘विशेष’ बनाता है। इसी वैशिष्ट्य का नाम है, डॉ. हरिओम पंवार।
मैं जब से कवि-सम्मेलन जगत् में प्रविष्ट हुआ हूं, तब से अब तक इनके लिए अनेक विशेषण और उपाधियां सुनने को मिलीं। किसी ने इन्हें ‘ओज का हिमालय कहा’ तो किसी ने ‘वीर रस का भीष्म पितामह’। किसी ने इन्हें ‘कवि-सम्मेलन की सफलता की गारण्टी’ कहा तो किसी ने ‘अग्नि की लपटों का शब्दानुवाद’। इन सब उपाधियों से सहमति प्रकट करते हुए मैं डॉ. हरिओम पंवार को एक ऐसे कवि के रूप में देखता हूं, जो जनमन की सबसे सटीक अभिव्यक्ति करने में सक्षम हैं।
सामान्य-जन की चर्चा से जनमत का सबसे सटीक अनुमान सुन लेने की दक्षता हैं, डॉ. हरिओम पंवार। अख़बार की सुर्खियों में राजनीति का भविष्य टटोल लेने की दृष्टि का नाम है डॉ. हरिओम पंवार। हवा की दिशा देखकर देश की दशा भांप लेने का कौशल हैं डॉ. हरिओम पंवार।
उनकी इसी प्रतिभा ने उन्हें आधी सदी से भी अधिक समय से अनवरत अपने समय का सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बनाए रखा है। डॉ. हरिओम पंवार की कविताओं का यदि देश-काल-समय के मापदण्ड पर विश्लेषण किया जाए तो आप पाएंगे कि वे हमेशा उस वृक्ष को सिंचित करते दिखाई दिए हैं, जिसमें सशक्त हो जाने की क्षमता हो। यही कारण है कि वे किसी भी मुद्दे पर सत्ता या विपक्ष के साथ खड़े होने की बजाय जनमन के साथ खड़े दिखाई दिए हैं।
समकालीन विषयों पर लेखनी चलाना, तलवार की धार पर चलने से अधिक दुष्कर कार्य है। घट रही घटना पर कलम चलाने से यश मिलने की जितनी प्रबल संभावना होती है, अपयश की भी उतनी ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे में आलोचना से अक्षुण्ण रहकर आधी सदी का सामाजिक जीवन बिता देना किसी कीर्तिमान से कम नहीं है।
डॉ. हरिओम पंवार के अमृत महोत्सव पर मुझे यह कहते हुए कोई संकोच नहीं है कि स्वस्थ रहने का नुस्खा इस व्यस्त कवि की जीवनगाथा में स्पष्ट पढ़ा जा सकता है। सामाजिक जीवन जीते हुए सहयात्रियों के साथ मतभेद और कटुता के क्षण पूरी तरह समाप्त नहीं किये जा सकते। लेकिन इन क्षणों को डील करने के लिए जो सूत्र चाहिए, वह डॉ. हरिओम पंवार के पास नैसर्गिक रूप से विद्यमान है। वे परस्पर व्यवहार में अपने किसी मनोभाव को अभिव्यक्त करने में लीपापोती करने में विश्वास नहीं करते। मन के भीतर कड़वाहट का विष निर्माण करने से बेहतर है, शब्दों के माध्यम से उसे अभिव्यक्त करके सहज हो जाया जाए।
यही कारण है कि उनके साथ यात्राएं करनेवाले जानते हैं कि वे जितनी जल्दी क्रुद्ध होते हैं, उतनी ही सरलता से क्रोध को बिसार भी देते हैं। ‘ना काहू से दोस्ती, ना काहू से वैर’ की नीति का सबसे सटीक चित्रण कहीं मिलता है तो वह उनका आचरण है। किसी बात पर अड़ने की उनकी अवधि कुछ मिनिटों का दायरा कभी नहीं लांघती।
मैं डॉ. हरिओम पंवार जी के अमृत महोत्सव के अवसर पर उनके दीर्घायु और स्वस्थायु होने की कामना करता हूं। तथा एक युग का अमृतग्रंथ तैयार करने का विचार संजोनेवाले संपादन मण्डल के श्रम का अभिनंदन करता हूं।
✍️ चिराग़ जैन

गिद्धों में मुठभेड़ हुई है

नभ तक वीराना पसरा है
हर मन में गहमागहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है

सबके मुँह पर ख़ून पुता है, नाखूनों में मांस भरा है
पर भोली चिड़िया के भीतर, दहशत का एहसास भरा है
इसने उसकी चिड़िया मारी, उसने इसकी चिड़िया खाई
खूब लड़े फिर समझौतों में, चिड़िया की ही दावत पाई
गिद्ध, चिरैया को सुख देंगे
ये इक झूठी खुशफहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है

किन-किन में संघर्ष हुआ था, पंख नुचे हैं किनके-किनके
उनके बीच तनी तलवारें, इनके घर हैं तिनके-तिनके
हर नन्हा पंछी घायल है, हर डाली आँसू गाती है
लेकिन गिद्धों के पंखों पर, कोई शिकन नहीं आती है
गिद्धों ने अचकन पहनी है
मासूमों पर बेरहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है

✍️ चिराग़ जैन

सनक का साक्षात् धूमकेतु : डोनाल्ड ट्रम्प

डोनाल्ड ट्रम्प को देखकर मुझे उस खिलौने की याद आती है, जिसे चाबी भरकर ज़मीन पर छोड़ दिया गया है। जिसमें किसी ने सोलर बैटरी डाल दी है और अब यह खिलौना तब तक नहीं रुकेगा, जब तक दुनिया में परमानेंट सनसेट न हो जाए।
जिसने इस खिलौने का आविष्कार किया है, उसने इसके सिर में से ब्रेन और सीने में से हार्ट निकालकर, उन दोनों स्थानों पर भी ओवर-कॉन्फिडेंस का पाउडर भर दिया है। उनके इसी बायोलॉजिकल ढांचे का परिणाम है कि उन्होंने सोचने और महसूस करने में मानवीय सीमाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है।
ट्रम्प जीपीएस से रास्ता नहीं पूछते, बल्कि रास्ता, ट्रम्प से जीपीएस पूछता है। ट्रम्प सांस नहीं लेते, बल्कि सांस जीवित रहने के लिए ट्रम्प के नथुनों में घुसती है। ट्रम्प हवाईजहाज में नहीं उड़ते, बल्कि हवाईजहाज उड़ने के लिए ट्रम्प को अपने हृदय में विराजमान करता है। वह दिन दूर नहीं जब हवाईजहाज के पायलट अपनी कॉकपिट में ट्रम्प के फोटो पर माला-वाला चढ़कर जहाज उड़ाया करेंगे।
सामान्य इंसानों की तरह ट्रम्प की शिक्षा-दीक्षा भी सामान्य नहीं रही है। बल्कि उन्हें मास्टरजी एक खाली शीट दिया करते थे, जिस पर वे अपनी अलौकिक शैली में कुछ चीट-मकौड़े बना दिया करते थे। इसके बाद पूरी सृष्टि के जीव मिलकर उनकी इस लिपि को पढ़ने का प्रयास करते थे। ट्रम्प दो बार अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए, लेकिन उनकी उत्तरपुस्तिकाएं आज तक डीकोड नहीं की जा सकी हैं। संभव है उसी लिपि को डीकोड करने के उद्देश्य से नासा ने अंतरिक्ष में अपने स्टेशन बनाए हों, ताकि इस महान जीव के शिलालेखों को अन्य आकाशगंगाओं तक पहुंचाकर, उनका अर्थ समझा जा सके।
वे जो कुछ करते हैं, वह महान और ऐतिहासिक होता है। विश्व में सबसे बड़ा, विश्व में सबसे उंचा और विश्व में सबसे लम्बा उनके हर कार्य के साथ जुड़ जाता है। और यह बात तो दुनिया भी मानती है कि फेंकने के मामले में वे विश्व में सबसे लम्बी फेंकते हैं।
अपने कीर्तिमानों की लिस्ट बनाने के लिए वे घटनाओं के मोहताज नहीं हैं। उनसे जुड़कर छोटी से छोटी घटना भी महान हो जाती है। किसी दिन वे यह भी घोषणा कर सकते हैं कि वे विश्व में सबसे नीला कोट पहनते हैं या फिर वे पहले ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जो हंसते हुए आंखें बंद कर लेता है।
वे एक विराट पुरुष हैं। पूरी कायनात उनके आगे हाथ बांधकर उनसे पूछती रहती है, ‘मेरे बाप, आखिर तू चाहता क्या है।’ यह प्रश्न सुनकर वे अपने होंठों को उड़न-तश्तरी के आकार में फैला लेते हैं, उनकी आंखें मुंद जाती हैं, उनके हाथ-पैर थिरकने लगते हैं और वे परम-आनन्द की मुद्रा में नृत्यमग्न हो जाते हैं।
उनके मस्तिष्क को ठीक करने के उद्देश्य से जब कोई हवा का झोंका उनकी जुल्फ़ों के गहन जंगल में प्रवेश करता है, तो वे अपने सिर को ऐसे झटकते हैं कि हवा के झोंके गश खाकर गिर जाते हैं। समझ नहीं आता कि वे हवा से चिढ़कर ऐसा कर रहे हैं या फिर उन्हें आनन्द आ रहा है। अंततः हवा को सीधे पूछना पड़ता है, ‘हुज़ूर, कृपया स्पष्ट बताएं कि मैं चलूं या रुकूं?’
जब वे किसी की प्रशंसा का ट्वीट करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई लड़की, ब्याह से पहले, अपने होनेवाले ससुराल के विषय में अपनी सहेलियों को बता रही हो। ससुराल के लोग तो छोड़ो, ससुराल की गली के कुत्ते-बिल्लियों को भी श्रेष्ठ सिद्ध कर रही हो। लेकिन जब वे किसी की आलोचना का ट्वीट करते हैं, तो ऐसा लगता है कि ब्याह के बाद ससुराल से मायके लौटी लड़की अपनी सास और ननद को भर-भर कर गालियां दे रही हो।
हिटलर, मुसोलिनी, गद्दाफी और यहां तक कि तुगलक जैसे ऐतिहासिक सनकी भी ट्रम्प की प्रतिभा के आगे नतमस्तक हैं। दुनिया के अनेक देश इस सनकवीर की महानता का अनुभव कर चुके हैं।
दरअस्ल ट्रम्प, धरती पर आ गिरे एक ऐसे पिंड हैं, जो अपनी गैलेक्सी का रास्ता भटक गए हैं। दुनिया उन्हें भटका हुआ मुसाफ़िर न समझ ले, इसलिए वे दुनिया को भटकाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं।

✍️ चिराग़ जैन

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