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अनकहे

जो कथाओं की दिशाएं मोड़कर ओझल हुए हैं
उन अभागे अनकहों का मन नहीं जाना किसी ने
दोष सारा जो लिए बैठे रहे अपने सिरों पर
उन चरित्रों का अकेलापन न पहचाना किसी ने

कैकयी की सोच में जो क्षोभ था, वो बाहर आया
लोभ रानी का जगा, तब राम ने वनवास पाया
कैकयी ने कर लिया वरदान को अभिशाप ख़ुद ही
मंथरा के भाग्य में अपयश रहा, वो भी पराया
राजपरिवारों की झूठी प्रीत का जिसमें दिखा सच
मंथरा तो थी वही दर्पण, नहीं जाना किसी ने

पुत्र का संबंध लेकर भीष्म ख़ुद गंधार आए
दम्भ में इक बालिका के स्वप्न सारे मार आए
जिस अंधेरे को तुम्हीं ने राज्य से वंचित किया था
उस अंधेरे पर किसी की राजकन्या वार आए
कौन से अन्याय की ज्वाला में शकुनि जल रहा था
हाल उसका पूछने कब लौटकर आना किसी ने

नाव का जीवन बचाने क्या सहेगी पाल पूछो
धार से घायल हुआ है चप्पुओं का भाल पूछो
आम के मीठे फलों पर मुग्ध रहते हो, रहो पर
हो सके तो आम्रवन की कोयलों का हाल पूछो
भूमिका अपनी निभाकर खो गए नेपथ्य में जो
उन अबोलों का भला गुणगान कब गाना किसी ने

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव तंत्र

भारत एक चुनाव प्रधान देश है। यहाँ जनता छँटे हुए लोगों में से कुछ लोगों को चुनती है ताकि ये चुने हुए लोग चुन-चुनकर जनता को चूना लगा सकें। जो चुन लिया जाता है वह जनता की अनदेखी करता रहता है और जो नहीं चुना जाता उसकी अनदेखी जनता करती रहती है।
चुनाव हमारी राजनीति का प्रमुख व्यवसाय है। इसलिए यहाँ सब कुछ रुक सकता है, किन्तु चुनाव कभी नहीं रुक सकता। चुनाव के समय पूरा प्रशासन जनता को उसके कर्त्तव्यों का ध्यान दिलाने लगता है। एक-एक वोट की क़ीमत समझने के लिए लाखों रुपये के विज्ञापन जनहित में जारी किए जाते हैं। जनता इन विज्ञापनों को सीरियसली ले लेती है और लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए स्वयं को महत्वपूर्ण मानने लगती है।
सर्दी हो या गर्मी, आंधी हो या बरसात; यह महत्वपूर्ण वोटर लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए लाइन में खड़ा हो जाता है। उसके मन में कभी चुनाव प्रक्रिया की धांधली का संशय सिर उठाने लगे तो भी वह स्वयं को महत्वपूर्ण मानते हुए बटन दबा देता है। उसके बटन दबाते ही लोकतंत्र की जो चीख़ निकलती है, वह उसे अपना विजयघोष समझकर ख़ुशी-ख़ुशी घर लौट आता है।
लोकतंत्र की चीख़ मद्धम पड़े उससे पहले ही राजनीति चिल्लाने लगती है। हर प्रत्याशी अपने विरोधी को गरियाता हुआ स्वयं ही ख़ुद को विजेता बताने लगता है। वोटिंग बन्द होने से गिनती शुरू होने के बीच सभी प्रत्याशी बेशर्मी और टुच्चेपन का भौंडा नृत्य करते हैं कि एक दिन के लिए जिनको लोकतंत्र में ख़ास बनाया गया था, वे अब फिर से आम हो गए। निकाल दी उनकी सारी हेकड़ी। ढीली हो गई उनकी सारी अकड़। अब हम भरी सभा में लोकतंत्र के चीर हरेंगे और ख़ुद को महत्वपूर्ण समझने वाली जनता भीष्म की तरह गर्दन नीचे किये बैठी रहेगी।
फिर पक्ष और विपक्ष मिलकर लोकतंत्र की मर्यादा को दाँव पर लगा देते हैं। जीते हुए खिलाड़ियों के फोन खड़कने लगते हैं। विचारधारा, नैतिकता, लज्जा, गरिमा और सभ्यता जैसे शब्दों को बाहर फेंक दिया जाता है और अपने-अपने तीतरों को पिंजड़े में बन्द करके हर शिकारी दूसरे के पिंजरे से तीतर चुराने निकल पड़ता है। जो दो तीतर बटोर कर लाता है उसके ख़ुद के चार तोते उड़ जाते हैं। पूरे पर्यावरण में पंछियों का कलरव गूंजने लगता है।
पशुमेलों जैसा रमणीक वातावरण होता है। जिसकी जहाँ मर्ज़ी हो वह वहाँ लीद करके लोकतंत्र की भूमि को उर्वर करता रहता है। चूँकि हमारा संविधान सबको समानता का अधिकार देता है, इसलिए सभी शिकारियों को दूसरे के पिंजरे से चोरी करने के समान अवसर प्राप्त होते हैं। स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग करके हमारे चुने हुए प्रतिनिधि किसी के भी साथ नैतिक-अनैतिक व्यभिचार करने को स्वतंत्र होते हैं।
संविधान की पीठ पर ढिठाई का सुमेरु रखकर दौलत के कोबरा द्वारा चुनाव परिणामों का मंथन किया जाता है। लोकतंत्र हलाहल पीता रहता है और राजनेता अमृत कलश लेकर सरकार बनाने निकल पड़ते हैं। शपथ ग्रहण महोत्सव में संविधान की जो शपथ ली जाती है उसके कारण संविधान की सेहत निरंतर गिरती जा रही है।
सरकार बनने के बाद सरकार अपनी सरकार बचाने में व्यस्त हो जाती है और विपक्ष पक्षी चुराने का अवसर तलाशने लगता है। जनता उस एक दिन की प्रतीक्षा करने लगती है जिस दिन उसे अपने महत्वपूर्ण होने का गुमान हो सके। जो सरकारें पाँच साल से पहले गिर जाती हैं, वे वास्तव में लोककल्याणकारी सरकारें हैं, वरना इतनी व्यस्तता में किसके पास फ़ुरसत है जो जनता को महत्वपूर्ण होने का आभास कराए!

✍️ चिराग़ जैन

विरोधाभास

जिसको सुख का उत्सव समझा,
वो दुख का आयोजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे,
उसका नाम विभीषण निकला

जीवन भर विश्रांत रहा जो, हमने उसको शांतनु माना
जिसने हर अनुशासन तोड़ा, उसका नाम सुशासन जाना
जिसका जीवन लाचारी था, उसका परिचय भीष्म बताया
अपशकुनों का मूल रहा जो, वह जग में शकुनी कहलाया
कृष्ण कहा जिसको दुनिया ने, वह जग का आभूषण निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला

नाम श्रवण था जिसका, उसने आहट नहीं सुनी दशरथ की
एक मंथरा क्षण भर में ही इति बन गई हर सुख के अथ की
मानी को समझाने अंगद बनकर बुद्धि स्वयं आई थी
कुम्भकर्ण तक जाग गया पर रावण पर तंद्रा छाई थी
मुख दिखलाने योग्य नहीं जो, वह कुल्हन्त दशानन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला

जिस वेला में राजतिलक होता उसमें वनवास हुआ है
उत्सव की चौसर पर कुल की लज्जा का उपहास हुआ है
कंचन मृग लाने निकले थे, घर की मृगनयनी खो बैठे
खाण्डव वन को स्वर्ग किया था, ख़ुद ही वनवासी हो बैठे
जिस अवसर पर मेल लिखा था, उसका अंत विभाजन निकला
जिसके भाव सुकोमलतम थे, उसका नाम विभीषण निकला

✍️ चिराग़ जैन

मित्रता

महाभारत में मित्रता के दो उदाहरण हैं। एक, कर्ण-दुर्योधन, दूसरा अर्जुन-कृष्ण। कर्ण दुर्योधन के प्रति इतना निष्ठावान है कि दुर्योधन के दुराचार पर भी उसका प्रतिकार नहीं कर पाता। और कृष्ण, अर्जुन के इतने हितैषी हैं कि स्वयं अर्जुन के ही निर्णय का विरोध करने में भी नहीं हिचकते। कर्ण का उद्देश्य दुर्योधन की गुड बुक में बने रहना है, जबकि कृष्ण का उद्देश्य अर्जुन का फ्यूचर सुरक्षित करना है। कर्ण ने अपनी महत्ता सिद्ध करने के लिए मित्र को सीढ़ी बनाया, जबकि कृष्ण ने मित्र के हित में शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा तोड़ने से भी परहेज नहीं किया। कर्ण की मित्रता दुर्योधन को समूल नष्ट कर गई और कृष्ण की मित्रता अर्जुन को युगपुरुष बना गई। अगर अर्जुन का मित्र कोई कर्ण होता और दुर्योधन के पास कोई कृष्ण होता तो महाभारत के युद्ध का परिणाम पलट गया होता

✍️ चिराग़ जैन

मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया

एक गर्भिणी हथिनी, तीन दिन तक अपने भीतर पल-पल बढ़ती टीस का कारण समझने की कोशिश में तड़प-तड़पकर मर गई। अपने जर्जर मुँह पर मनुष्य के बर्बर चेहरे के हस्ताक्षर लिए वह माँ अपने बच्चे को साथ लेकर दूर चली गई।
‘मेरे सामने से हटा लो ये दुनिया, तुम्हारी है तुम ही संभालो ये दुनिया’ की हिक़ारत के साथ उसके जलसमाधि ले ली। अपनी धर्मपरायणता का ढोंग करते मनुष्य ने कब अपने दिल में पत्थर विराजित कर लिए, पता ही न चला। स्वयं को गॉड फीयरिंग कहनेवाले आदमी के इस दुःसाहस को देखकर गॉड भी (अगर कहीं हो तो) काँप गया होगा।
हथिनी तो गणपति भाव से मनुष्य के भीतर उग आए पशु की कथा लिखकर चली गई, लेकिन उसकी मौन कराह मनुजता के ध्वंस का एक ऐसा अध्याय प्रारम्भ कर गई है, जिसका हर पलटता पृष्ठ मनुष्यता से हीन मनुष्य जाति के पटाक्षेप की वक़ालत करता रहेगा।
समुद्र से उठते भीषण चक्रवात, हवा में घुलता जा रहा विष, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघती सूनामी, रह-रहकर काँप उठती धरती, आग बरसाता आसमान, रिहायशी इलाक़ों में घुस आए तेंदुए, खेतों पर टूट पड़ते टिड्डीदल, खड़ी फसल पर गिरते ओले, हज़ारों की संख्या में बिछी चमगादड़ों की लाशें, जगह-जगह हो रहे गृहयुद्ध, चरमराती व्यवस्था में पनपती अराजकता और वर्चस्व की होड़ में अनदेखा होता अस्तित्व; चीख़-चीख़ कर मनुष्य को अल्पविराम का इंगित कर रहा है।
एक पल, ठहरकर संवेदनाओं को पोषित करने की सलाह दे रहा है। एक क्षण, बैठकर पैरों को विश्राम देने की दुहाई दे रहा है ताकि मस्तिष्क तक रक्त का संचरण हो सके और मस्तिष्क अपनी दिशा-दशा पर विचार करने में सक्षम हो पाए। एक लम्हा, रुककर धौंकनी बन चुके फेफड़ों में प्राणवायु भर लेने की सिफ़ारिश कर रहा है।
उस मूक संवेदना की इस दर्दनाक़ मौत को भी इस अल्पविराम का निमित्त नहीं बनाया गया तो पूर्णविराम लगाना प्रकृति की विवशता होगी।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Kerala Elephant Murder Case

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