Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
एक वर्ग है जो दीवार के पीछे बनी झुग्गियों पर प्रश्न पूछना चाहता है। दूसरा वर्ग है, जो झुग्गियों के आगे बनी दीवार को विकास समझ कर झुग्गी के प्रश्न पूछने वालों को राष्ट्रद्रोही कह रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Donald Trump’s India Visit
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारतीय लोकतंत्र अपने सर्वाधिक वैभवशाली दौर से गुज़र रहा है। एक राजनैतिक दल ने जनता को बिजली-पानी मुफ़्त देने का ब्लूप्रिंट दिया। दूसरे राजनैतिक दल ने आटा फ्री बाँटने की घोषणा की। एक समय था जब चुनाव जीतने के लिए शराब, पैसा, सिलाई मशीन, साइकिल, लैपटॉप और साड़ियाँ बाँटी जाती थी। इस चुनावी रिश्वत का बोझ राजनैतिक दलों या प्रत्याशियों के निजी कोष को उठाना पड़ता था। उस बोझ से बचने के लिए राजनैतिक दलों ने योजनाओं की आड़ में यह ख़र्च सरकारी कोष से करने का रास्ता निकाल लिया।
एक सरकार ने किसानों के कर्ज़ मुआफ़ कर दिए। अर्थात कृषि की दशा को सुधारने की बजाय, कृषक के स्वाभिमान को ध्वस्त करने की शुरुआत की। एक सरकार ने अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित कर दिया। अर्थात पाई-पाई जोड़कर जो सरकार को रजिस्ट्री की स्टैम्प ड्यूटी, हाउस टैक्स, इनकम टैक्स चुकाकर घर बना रहा है, उसको यह संदेश दिया कि तुम मूर्ख हो जो मेहनत करके घर बना रहे हो, तुमसे अच्छे तो वे लोग हैं जो कहीं भी घेर-घारकर मकान मालिक़ बने बैठे हैं। एक सरकार ने रोज़गार देने की बजाय चावल दो रुपये किलो बाँटने शुरू कर दिए।
जो ईमानदारी से टैक्स चुका रहा है, उसके लिए कोई सुविधा नहीं; उसे कोई प्रोत्साहन नहीं। बल्कि ऐसी व्यवस्था कर छोड़ना कि वह टैक्स चुराने की सोचे। लेकिन जिसने केवल सरकार से लेना सीखा है, उनके हाथ जोड़-जोड़कर उन्हें अकर्मण्यता की प्रवृत्ति के लिए प्रोत्साहित करते रहो। इस देश का वित्तमंत्री अपने बजट भाषण में कहता है कि ‘मध्यम वर्ग अपना ध्यान ख़ुद रखे!’
क्यों भाई? जब मध्यम वर्ग को अपना ध्यान ख़ुद रखना है तो वह सरकार को पैसा क्यों दे? इस देश की राजनीति ने घर के कमाऊ पूत को नोच-नोच कर नाकारा बेटों की रोटी में घी भरा है। इस देश की राजनीति ने मांगनेवालों को बाबाजी कहा है और देनेवालों को तमंचा दिखाया है। यह काम सबने किया। कोई भी इसमें कमतर नहीं है।
इसी ट्रेंड पर जब दिल्ली में एक पार्टी की सरकार बन गई तो पराजितों ने सोशल मीडिया पर दिल्ली को मुफ्तखोर घोषित कर दिया। यह पहली बार हुआ है कि किसी दल विशेष के समर्थक जनमत को कोस नहीं रहे, बल्कि धिक्कार रहे हैं। यह पहली बार है कि लोकतंत्र में जनमत को गाली दी जा रही है। यह पहली बार है कि पूरे प्रदेश को एक ही शब्द से हाँका जा रहा है।
सामान्यीकरण की यही प्रवृत्ति है जिसके कारण दस-पाँच लोगों की हरक़त पर पूरे विश्वविद्यालय को ग़द्दार घोषित कर दिया जाता है। जनारालाइज़ेशन की यही प्रवृत्ति है कि एक पूरी कौम को बुरा मान लिया जाता है और दूसरी पूरी कौम को अच्छा मान लिया जाता है। सामान्यीकरण की यही बीमारी है जो कपड़े देखकर डीएनए बताने लगती है, जो नाश्ते की थाली देखकर भविष्य बताने लगती है, जो पोहा खानेवालों का अतीत बताने लगती है।
इन्हीं पूर्वाग्रहों और दुराग्रहों ने राजनैतिक माहौल में कटुता भर दी है। इन्हीं धारणाओं के कारण समाज में विद्वेष भरता जा रहा है। और इस अभ्यास का दुष्परिणाम यह है कि आज सोशल मीडिया पर खुलकर बोला जा रहा है कि दिल्लीवाले मुफ़्तखोर हैं, दिल्लीवाले स्वार्थी हैं, दिल्लीवाले राष्ट्रद्रोही हैं, दिल्लीवाले हिंदूविरोधी हैं।
अजीब मानसिकता के लोकतांत्रिक हैं आप। जो हमें वोट न दे, वह राष्ट्रद्रोही! जब इसी दिल्ली ने सातों लोकसभा सीटें जिताई थीं तब यही जनता राष्ट्रभक्त थी। जब अपने धुर विरोधियों के साथ मिलकर सत्ता पर क़ाबिज़ हो जाते हो तब जनता से नहीं पूछते कि वह कैसा महसूस करती है? अपनी पराजय के कारणों का मंथन करने की बजाय जनता को गाली देना तो सभ्यता का द्योतक नहीं हैं। सौ-पचास लोगों की हठधर्मिता को लताड़ने की बजाय दो करोड़ लोगों को दुत्कारना तो लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता। यह जनता है साहब, यहाँ आपकी पार्टी का संविधान नहीं चलता कि ‘या तो मूकदर्शक बन जाओ, नहीं तो मार्गदर्शक बना दिये जाओगे।’
इसी जनता ने अभूतपूर्व बहुमत देकर आपको सत्ता दी है। इस जनता को कोसने की बजाय अपनी नीतियों, अपने नेताओं की भाषा, अपनी कार्यशैली और अपनी ऐरोगेन्सी का आकलन करो; नहीं तो लोकतंत्र की धरती आपकी फसल को खरपतवार घोषित करके उखाड़ फेंकेगी। भारत के लोकतंत्र में आप भी बहुत महत्वपूर्ण हैं। आपकी विचारधारा इस देश के एक बड़े जन का मानसिक पोषण करती है। लेकिन अकेले आपकी ही विचारधारा का नाम भारत नहीं है। भारत विविध विचारों, विविध पंथों, विविध भाषाओं, विविध धर्मों, विविध पहनावों, विविध खानपान, विविध रंगों, विविध मान्यताओं और विविध ऋतुओं के साथ एक रहनेवाला देश है। इसे एक ही रंग में पोतकर इसके सौंदर्य का ह्रास करने का प्रयास न करो, यह आत्मघाती क़दम है। इसे एक ही ऋतु में सीमित करके, इसके वातावरण को प्रभावित करने का दुस्साहस न करो, यह स्वास्थ्य के प्रतिकूल है।
कृष्ण ने जिनका वध किया, वे यवन नहीं थे। राम ने जिनका वध किया, उनमें कोई मुसलमान नहीं था। महावीर ने जिन्हें अहिंसा का उपदेश दिया वे सब बाहर से नहीं आए थे। राममोहनराय ने जिन कुरीतियों पर आघात किया वे हमारे ही समाज में मौजूद थीं। दयानन्द सरस्वती ने जिस कर्मकांड को दर्पण थमाया, वह हमारे ही समाज का अंश था। हर समय में, हर समाज में कुछ नकारात्मकता अवश्य होती है। इस नकारात्मकता को किसी वर्ग विशेष से जोड़कर प्रचारित करना समाज के स्वास्थ्य के लिए उचित नहीं है। कोई भी हर बार सही नहीं होता, और हर बार ग़लत नहीं होता। लोगों को मत देने के अधिकार से वंचित न करो, उनके जनमत को धिक्कारना बन्द करो, नहीं तो यह लोकतंत्र इस अहमन्यता को सिरे से नकार देगा!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
चुनाव आयोग इस बात पर एक्शन ले कि केजरीवाल ने यह बात छुपाए रखी कि मुहल्ला क्लीनिकों में बीजेपी का इलाज किया जा रहा है
झाड़ू को धुआँदार सफ़ाई की बधाई
कमल को कुछ नई पाँखुरियाँ खुलने की बधाई
और हाथ को हाथ न हिलाने की बधाई
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Delhi Election Result
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
राजनीति किसी भी दल की हो, उसकी बदतमीज़ी जनता की निष्क्रियता के बल पर ढिठाई बनने लगती है। भारतीय लोकतंत्र के वर्तमान स्वरूप में ‘मतदान’ ही एकमात्र अस्त्र है जो जनता के पास है। शेष तंत्र से हताश होकर इस अस्त्र को भी नष्ट कर देना, भ्रष्टाचारियों को बढ़ावा देने जैसा है।
जिस क्षेत्र की जनता पूर्ण मतदान कर देगी, उसकी अभिरुचियों और आकांक्षाओं को अनदेखा करना किसी भी दल के लिए असंभव होगा। मध्यमवर्ग की ज़रूरतें किसी भी राजनैतिक दल की वरीयता सूची में इसी कारण नहीं शामिल हो पातीं क्योंकि मध्यमवर्गीय नागरिक मतदान प्रक्रिया से सर्वाधिक उदासीन हैं। राजनीति हमें लोकतंत्र से बाहर करना चाहती है, ताकि अपने कैडर और कार्यकर्ताओं के वोट से ही विधानसभाओं और संसद की सूरत तैयार हो सके। आम मतदाता यदि वोटिंग की प्रक्रिया से न जुड़ा तो उसकी ओर किसी का ध्यान न जाएगा।
इस देश में, आयकर देनेवालों से किसी सरकार को कोई फ़र्क नहीं पड़ता, इसीलिए बजट बनाते समय आयकर देनेवालों को ही घोड़े से खच्चर बनाया जाता है। इस देश में नियमों का पालन करनेवाले भी सरकार के किसी काम के नहीं हैं, इसीलिए पूरी न्याय व्यवस्था अपराधियों के बचाव में जुट जाती है और पीड़ित को सिद्ध करना पड़ता है कि उसके साथ अपराध हुआ है।
लेकिन इस देश में वोट देनेवाले से हर सरकार को फ़र्क़ पड़ता है, इसीलिए झुग्गियों की पीड़ा हर पार्टी सुन पाती है और हाउस टैक्स भरनेवाला बेचारा दफ़्तरों के चक्कर लगा-लगाकर टूट लेता है; इसीलिए अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित किया जाता है और बिल्डरों को पूरी क़ीमत चुकानेवाला नागरिक किराये के मकान में रहकर, अदालतों के चक्कर काट रहा है। वोट को अनावश्यक समझोगे तो राजनीति के लिए अनावश्यक हो जाओगे। इस देश के लिए न सही, लोकतंत्र के लिए न सही; अपने अस्तित्व के लिए ही सही, वोट ज़रूर डालें।
इससे पहले कि लोकतंत्र फीका हो जाए, अपनी उंगली पर नीला निशान लगवा आओ।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय सिनेमा की बुनियाद में जो नगीने जड़े हुए हैं, उनमें कवि प्रदीप भी एक हैं। जिन दिनों स्वाधीनता संग्राम चरम पर था, तब भारतीय सिनेमा भी राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया था। जनता में राष्ट्रभक्ति का ज्वार भरने के लिए सिनेमा ब्रिटिश हुक़ूमत के खि़लाफ़ मुखर हो उठा।
सन 1940 में बंधन फ़िल्म के लिए कवि प्रदीप ने हिम्मत से भरी चेतावनी को गीत में पिरो दिया। गीत के बोल थे, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालो, हिन्दुस्तान हमारा है’! यही भारतीय स्वाधीनता संग्राम का मूल स्वर भी था। अपनी क़लम के इस तेवर से जब वे ब्रितानिया हुकूमत की आँखों में खटकने लगे तो गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हें भूमिगत रहना पड़ा।
प्रदीप जी की लेखनी आमूल-चूल राष्ट्रबोध से सुसज्जित थी। युवाओं में जोश भरने के लिए ‘चल-चल रे नौजवान’ भी लिखा और बच्चों को भारत का दर्शन कराने के लिए ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की’ भी लिखा; गांधीहत्या से आहत होकर ‘दे दी हमें आज़ादी’ भी लिखा और गिरते हुए मानवीय मूल्यों से त्रस्त होकर ‘आज के इस इंसान को ये क्या हो गया’ भी लिखा; आज़ादी की क़ीमत ज़ाहिर करने के लिए ‘हम लाए हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के’ भी रचा और भारत-चीन युद्ध के शहीदों को नमन करते हुए ‘ऐ मेरे वतन के लोगो’ भी लिखा। ‘चल अकेला, चल अकेला’ जैसा उत्साहवर्धक गीत भी प्रदीप जी की ही लेखनी का वरदान था और ‘सैंया प्यारा है अपना मिलन’ सरीखा प्रेमगीत भी उसी लेखनी का क़माल है।
कवि प्रदीप ने फिल्मों में कुछ गीत गाए भी हैं- ‘देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान’; ‘पिंजरे के पंछी रे तेरा दर्द न जाने कोय’ और ‘आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ’ जैसे गीत उनके कण्ठ से सँवर उठे हैं।
जब दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में चीन युद्ध के शहीदों की याद में कार्यक्रम आयोजित हुआ, तब लता जी ने एक गीत प्रस्तुत किया- ‘ऐ मेरे वतन के लोगो, ज़रा आँख में भर लो पानी’; भावुक माहौल में वह गीत लोगों के दिल को छू गया। प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की आँखें छलछला आईं। पण्डित जी ने अधिकारियों से कहा कि इस गीत के रचनाकार को बुलाओ। अधिकारियों ने बताया कि प्रदीप जी को इस कार्यक्रम का निमंत्रण ही नहीं भेजा गया। इतना सुनते ही पंडित जी नाराज़ हो गए, और अधिकारियों को डाँटते हुए बोले- ”कवि की कविता इस्तेमाल करते हो और कवि को निमंत्रण भी नहीं भेजते।“
सुनते हैं कि नेहरू जी पहली फ़ुरसत में ही मुंबई जाकर कवि प्रदीप से मिले, उस गीत की रचना के लिए उन्हें बधाई दी और अधिकारियों की लापरवाही के लिए क्षमा मांगी। समंदर के किनारे बैठकर माचिस की डिब्बी पर लिखा गया विचार एक अमर गीत में कैसे तब्दील हुआ यह कहानी कवि प्रदीप ने लम्हा-लम्हा जी है। भारतीय गीतों के इतिहास में कवि प्रदीप का योगदान नक्षत्रों के चूर्ण से अंकित है।
✍️ चिराग़ जैन