Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम एक सुदृढ़ लोकतंत्र से वापस कबीलाई समाज व्यवस्था की ओर अग्रसर हैं। और सही कहें तो अग्रसर भी नहीं ‘उग्रसर’ हैं।
हर कबीले में लड़ाकों की और अपराधियों की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। लेकिन हर क़बीले के अपने नियम हैं। हिन्दू क़बीले का कोई बलात्कारी यदि मुस्लिम क़बीले की किसी लड़की को दबोच लेता है, तो यह गुनाह नहीं है लेकिन यदि हिन्दू क़बीले का कोई लड़का हिन्दू क़बीले की ही किसी लड़की का बलात्कार करता है तो क़बीले को सवर्ण-दलित, कांग्रेस-भाजपा या शैव-वैष्णव के आधार पर विभक्त होकर आपस में लड़ना होगा। जिस वर्ग में लड़की आएगी, उस वर्ग के लोग अपनी क्षमता के अनुरूप दंगा, धरना, प्रदर्शन, रैली, तोड़फोड़, मारपीट, बदले की कार्रवाई, क्रिया की प्रतिक्रिया अथवा कैंडल मार्च करेंगे। ठीक इसी तरह जिस वर्ग में बलात्कारी आएगा उस वर्ग के लोग विपरीत पक्ष के किसी बलात्कारी की पुरानी फाइल को सनद बनाकर अपने प्रत्याशी के पक्ष में तर्क देगा या फिर लड़की को चरित्रहीन सिद्ध करके अपने प्रत्याशी को कर्मफलदायक घोषित कर देगा।
स्त्री-पुरुष के विभाजन से प्रारम्भ हुआ यह क्रम अमीर-ग़रीब, अगड़ा-पिछड़ा, कांग्रेसी-भाजपाई, हिंदी-मराठी-तमिल, राष्ट्रवादी-वामपंथी-सेक्युलर, मोदी खेमा-आडवाणी खेमा और साक्षर-निरक्षर तक विकसित हो चुका है। विभाजन के इस क्रम के विकास की कोई सीमा नहीं है। यह तब तक ज़ारी रह सकता है जब तक मनुष्य नितांत एकाकी न हो जाए। हर व्यक्ति स्वयं में कबीला होगा। हर व्यक्ति का निजी संविधान होगा जिसकी धाराएँ प्रतिदिन उसके अनुसार बदलती रहेंगी।
राम, कृष्ण, पैग़म्बर, ईसा, नानक, महावीर, बुद्ध, गांधी, नेहरू, अम्बेडकर और पटेल जैसे कुछ लोग कबीलाई संस्कृति के इस विकास क्रम को भंग करके मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की फालतू बातें करने लगे तो हमने उनकी बातें अनसुनी करके उनके चित्र को ध्वजा बनाकर नए क़बीले बना लिए।
न्याय, कानून, मनुष्यता और करुणा को नपुंसक करके हम अनवरत विभक्त हो रहे इस स्वर्णयुग की आभा बढ़ा रहे हैं। बहुत जल्दी हम प्रति व्यक्ति एक क़बीले तक की व्यवस्था देख पाएंगे; लेकिन इस बीच हमें यह सावधानी बरतनी होगी कि तर्क, चिंतवन, निष्पक्षता, मनुष्यता और सहृदयता के शब्द लेकर कोई इस राह में अड़चन बनना चाहे तो उसे हर प्लेटफॉर्म पर गालियाँ बकनी आवश्यक है अन्यथा एकाकी खड़े रह जाने का सपना कभी पूरा न हो सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
किस राजा ने दांव लगाया
किस शकुनि ने फेंके पासे
किस देवर ने चीर उघाड़ा
कौन ससुर हैं आज रुआँसे
इन प्रश्नों में मत उलझाओ, चीरहरण के वादी सब हैं
लड़ते रहना युद्ध भले तुम, पर सचमुच अपराधी सब हैं
दुर्योधन के कान कहेंगे, हमने इक उपहास सहा था
जाति बताकर रश्मिरथी ने, इक दहता संत्रास सहा था
भीष्म बंधे हैं सिंहासन से, दुःशासन मद में ऐंठे हैं
द्रोण द्रुपद से अपमानित हैं, पाण्डव दास हुए बैठे हैं
कुल की लज्जा से इस पल में, मौन-मुखर संवादी सब हैं
लड़ते रहना युद्ध भले तुम, पर सचमुच अपराधी सब हैं
शांतनु-से कामुक पुरखे का कोई पिछला पाप फला हो
सम्भव है गांगेय तुम्हीं कोे, अम्बा का अभिशाप फला हो
जाने कब किस दुःशासन ने, किसके कुल की लाज घसीटी
जाने कब किस राजभवन में, किस कामी ने जंघा पीटी
अवसर मिलने पर अपराधी हो जाने के आदी सब हैं
लड़ते रहना युद्ध भले तुम, पर सच में अपराधी सब हैं
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
बचपन से देखते आए हैं। घर के एक कोने में दो झाडुएँ रखी होती थीं। एक फूलबुहारी और एक सींक वाली झाडू। कमरों के भीतर का फ़र्श बुहारना होता था तो फूलबुहारी प्रयोग की जाती थी। और आंगन या चौबारा झाड़ना होता था तो सींकों वाली झाड़ू काम आती थी। यही सिद्धांत सीख लें तो सोशल मीडिया का प्रयोग करना आ जाए। घर के भीतर कुछ गन्दगी हो तो उसे ऐसे उपकरण से साफ किया जाता है जो शोर भी न करे और कचरा भी साफ हो जाए। और घर के बाहर का कचरा पूरे ज़ोर शोर से धूम धड़ाके से रगड़ रगड़ कर साफ किया जाना चाहिए। हर समस्या पर विमर्श और चर्चा आवश्यक है लेकिन हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि व्हाट्सएप्प फूलबुहारी है और फेसबुक सींकों वाली झाड़ू।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
आपस का ये झगड़ा कुछ तो उसको भी खलता होगा
बस मैं ही तन्हा थोड़ी हूँ, वो भी तो तन्हा होगा
मैं तो हर मिलने वाले से मिलने से कतराता हूँ
वो भी सबसे मन की बातें करने से बचता होगा
शाम ढले मजबूरी में मैं बेमन से घर जाता हूँ
क्या वो भी घर के रस्ते पर रुक-रुक कर चलता होगा
अपने गम में रो लेने की फुरसत किस कमबख्त को है
मैं यूँ रोता हूँ वो मेरी यादों में रोता होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कौम को लूट के खाना नहीं सीखा हमने
इतनी शिद्दत से कमाना नहीं सीखा हमने
वक्त के साथ ही बर्ताव बदल जाता है
बस यही तौर-ए-जमाना नहीं सीखा हमने
कोई कश्ती ही पलट जाए तो मर्जी उसकी
बीच में छोड़ के जाना नहीं सीखा हमने
जिन चिरागों से हुआ एक भी लम्हा रौशन
उन चिरागों को बुझाना नहीं सीखा हमने
एक वो हैं कि गिनाए चले जाएँ अहसान
एक हम हैं कि जताना नहीं सीखा हमने
✍️ चिराग़ जैन