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प्रश्न पूछना पाप है

साहब ने शतरंज की चाल चली। चार-पाँच चाल चलने के बाद, साहब हारने लगे। आँख बचाकर शतरंज की टेबल से उठकर, वे लूडो खेलने लगे। देश शतरंज को भूल गया और लूडो देखने लगा। थोड़ी देर बाद लूडो में भी साहब की सारी गोटियाँ पिट गईं। देश साहब की बुद्धिमत्ता पर लगाने के लिए प्रश्नचिन्ह लेने दौड़ा और जब तक वापस लौटकर आया तो साहब कैरम खेलते पाए गए। किसी जिज्ञासु ने पूछा कि लूडो और शतरंज का क्या हुआ तो साहब उसे बताने लगे कि शतरंज में मेरी गोटी लाल होने लगी तो लूडो के वज़ीर को कैरम की रानी ने शह दे दी। अभी-अभी बेसबॉल के रैकेट से दो सफेद गोटियाँ बाहर पहुँचाई हैं।
‘लेकिन आप तो कह रहे थे कि सफेद गोटियाँ विपक्षियों ने बाहर भेजी हैं!’ -जिज्ञासु आश्चर्यचकित होकर बोला।
प्रश्न सुनकर साहब के चेहरे पर महानता के चिन्ह उभर आए, लेकिन वे विनम्र होते हुए बोले- ‘यही तो हमारा बड़ा दिल है रे। हम काम करके क्रेडिट नहीं बटोरते।’
‘लेकिन आधार, मनरेगा, मंगल यान, एफडीआई के क्रेडिट लेने के लिए तो आपने सारी सीमाएँ लांघ दी थीं।’ -जिज्ञासु, साहब की विनम्रता को सत्य समझकर पूछने की हिम्मत कर बैठा।
सहब ने विनम्रता का कुर्ता उतार फेंका और राष्ट्रभक्ति की कमीज़ चढ़ाते हुए चिल्लाए- ‘अब ऊँची कूद में भी सीमा नहीं पार करूंगा तो विरोधी खिलाड़ी मुझे हरा देंगे। और मैं नहीं चाहता कि मैं हार जाऊँ और भारत की जनता को नज़रें झुकानी पड़ें।’
जिज्ञासु ने नहले पर दहला फेंकते हुए पूछा- ‘पर अपने कट्टर विरोधियों को अपनी पार्टी जॉइन करवाने के कार्य से आपने समर्थकों को नज़रें झुकाने पर विवश किया है।’
अब साहब का धैर्य डोल गया। वे अपनी फुलप्रूफ प्लानिंग का वर्णन करते हुए बोले- ‘मिस्टर जिज्ञासु! समर्थक हमारी पेड ऑडियन्स हैं। उनको स्पॉन्सर्स की उंगलियों पर तालियाँ बजानी होंगी। अभी किसी नेता के पाला बदलने पर थोड़ी ज़िल्लत उठानी होगी लेकिन कुछ दिन बाद इनके ज़ख़्मों पर नारंगी ब्रांड का मरहम लगाकर इन्हें मैनेज कर लेंगे। फिर भी स्थिति न संभली, तो आस्था की एस्टरॉयड डोज़ से फ़ास्ट रिलीफ़ की व्यवस्था कराई जाएगी।’
जिज्ञासु दुःखी होकर बोला कि यह तो चीटिंग है। पेड ऑडियन्स और डोपिंग दोनों ही खेल के नियम के खि़लाफ़ है।
अब साहब ने जिज्ञासु को कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि अपने राइट हैंड को एसएमएस किया- ‘नेक्स्ट टारगेट जिज्ञासु भाई।’
दस मिनिट में राइट हैंड का रिप्लाई आया- ‘टारगेट अचीव्ड।’

✍️ चिराग़ जैन

सपनों की शोकसभा

समय मिले तो तुम भी आना दो झूठे आँसू टपकाने
हमने जो मिलकर देखे थे, उन सपनों की शोकसभा है
तुम जिनका तर्पण कर आए जीवन नदिया की धारा में
जो आँखों में ठहर गए थे, उन लम्हों की शोकसभा है

जिनसे फिल्टर हो जाते थे, कड़वाहट के सब कीटाणु
सबसे पहले अपनेपन की दोनों किडनी फेल हुई हैं
संवादों के सन्नाटे में दिल छोटा होता जाता था
मुस्कानों को लकवा मारा, आलिंगन को जेल हुई है
जिन दीवारो-दर को हम-तुम दोनों अपना घर कहते थे
जिन रिश्तों को अपना माना, उन अपनों की शोकसभा है

तस्वीरों पर धूल जमी है, गुलदस्तों में वीरानी है
आंगन की तुलसी मुरझाई, सूखी है सुख की हरियाली
अपशकुनों ने पैर पसारे, सारी चीजें़ लावारिस हैं
सारा कलरव मौन हुआ है, सारा घर लगता है खाली
जिनको उड़ने की हिम्मत हम दोनों मिल-जुलकर देते थे
हिम्मत कर पाओ तो आना, उन पंखों की शोकसभा है

✍️ चिराग़ जैन

शहर का बयान

सारी जिम्मेदारी मेरी, सब सहना लाचारी मेरी
प्राण लुटाकर गाली खाना, बस इतनी सी पारी मेरी
फिर भी जब अवसर होगा सब गाँवों का गुणगान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

जब सुविधा का प्रसव कराने, गाँवो ने इनकार किया था
तब मैंने ही आगे बढ़कर ये दुखड़ा स्वीकार किया था
शुद्ध हवा ने धमकी दी जब मुझको छोड़ चले जाने की
तब भी मैंने बस लोगों की सुविधा का सत्कार किया था
सुख से दूरी जारी मेरी, सुविधाओं से यारी मेरी
मुझको लगता था होएगी, मानवता आभारी मेरी
पर गाँवों की बिछड़ी यादों का निशदिन सम्मान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

बरसातों में घर की पक्की छत के नीचे जीने वाले
गर्मी में एसी कमरों में ठंडे शर्बत पीने वाले
सर्दी में ब्लोअर की ऊष्मा से सुख की चाहत करते हैं
तब क्यों याद नहीं आते हैं कच्चे छप्पर झीने वाले
नदिया कर दी खारी मेरी, धरती कर दी भारी मेरी
मेरा शोषण करने वालों को चुभती अय्यारी मेरी
पक्की सड़कों पर दौड़ेंगे, पगडंडी पर मान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

मेरी निंदा के चर्चे हैं मानवता के अखबारों में
मुझको माना है खलनायक वक्तव्यों के व्यापारों में
पैसे की व्यवहारिकता को कविताओं में जी भर कोसा
गाँव सुखों का मोल लगाता, रोज़ाना इन बाजारों में
किसने शक्ल सुधारी मेरी, कब समझी दुश्वारी मेरी
भोलेपन की चालाकी को, खलती है हुशियारी मेरी
अंगूरों को खट्टा कहकर कुंठा का रसपान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे

✍️ चिराग़ जैन

पीड़ा का अनुमान

जिस बिरवे की हर कोंपल को अपने हाथों से दुलराया
उस बिरवे के मुरझाने पर माली पर क्या बीती होगी
चहक भरी जिसने जीवन में, तिनका-तिनका नीड़ बनाकर
उस चिड़िया के उड़ जाने पर, डाली पर क्या बीती होगी

कतरा-कतरा जोड़ा हिम ने, तब नदिया का रूप बना था
धरती का सीना छलनी कर इक मीठा जलकूप बना था
जिन हाथों में होंठों तक भी जाने का दम शेष नहीं था
उन हाथों से गिर जाने पर, प्याली पर क्या बीती होगी

दिन भर खून-पसीना देकर, जिस सूरज के प्राण बचाए
प्राची कितना सिसकी होगी, जब वो पश्चिम के मन भाए
जिसका तेज दमकता चेहरा सारी दुनिया में रौशन था
उस सूरज के ढल जाने पर, लाली पर क्या बीती होगी

जिसके नखरे पूरे करके रीझा करती रोज़ रसोई
ताती रोटी, नर्म पराँठे, चार परत आटे की लोई
जो रोटी पोए जाने तक खाली बासन खनकाता था
उस बेटे के मर जाने पर, थाली पर क्या बीती होगी

✍️ चिराग़ जैन

देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर

‘राजनीति महत्वाकांक्षी मस्तिष्कों का क्रीड़ाक्षेत्र है।’ -यह एक सूक्ति मात्र नहीं बल्कि मतदाताओं की उम्मीदों पर वज्रपात भी है। समाजसेवा और देशप्रेम का क्रीम-पाऊडर लगाकर कोई व्यक्ति जनता को मुँह दिखाने क़ाबिल बनता है। निरंतर ब्यूटी पार्लर भ्रमण करने के फलस्वरूप जनता एक दिन यह यक़ीन कर बैठती है कि चेहरे की यह चमक वास्तविक है। जैसे ही जनता को यह यक़ीन होता है उसी क्षण नया नेता भागकर किसी पार्टी के दफ़्तर में जाता है और अपने मेकअप पर हुए ख़र्चे की बोली लगाने का उपक्रम शुरू करता है।
पार्टी में बैठे पुराने घाघ नेता, फाउंडेशन के दम पर बनी उसकी पब्लिक फाउंडेशन का पार्टी के हित में आकलन करते हैं और एक कुशल गृहिणी की तरह आलू-प्याज की शैली में उससे उसकी औक़ात का मोलभाव करने लगते हैं। उचित मूल्य लग जाने के बाद नवनिर्मित नेताजी का चेहरा दो भागों में बाँट दिया जाता है। पार्टी कार्यालय के भीतर उनका आचरण ठीक वैसा होता है जैसा ग्राहक जुटा लेने के बाद किसी गणिका का अन्य गणिकाओं से होता है। पार्टी कार्यालय के बाहर वही गणिका अन्य ग्राहकों के सामने चरित्रवती बनकर लानत भेजने लगती है।
प्रत्येक गणिका के जीवन में एक समय ऐसा अवश्य आता है जब उसका आसामी उससे ऊब जाता है और उसे ग़ैरत की क़ीमत चुकाने में आनाकानी करने लगता है। इस परिस्थिति में हर गणिका यह समझ जाती है कि उसका ग्राहक अब ज़्यादा दिन उसे नहीं झेलेगा। मूर्ख गणिकाएँ ऐसी स्थिति को दिल से लगाकर आसामी को नपुंसक कहने लगती हैं और बिस्तर पर की गई उसकी हरक़तों को सार्वजनिक करके उसकी चरित्र हत्या का प्रयास करती हैं। किन्तु प्राणहीन की हत्या संभव कहाँ है?
समझदार और अनुभवी गणिकाएँ ऐसा नहीं करतीं। वे ग्राहक की ऊब को भाँपकर अतिरिक्त विनम्र हो उठती हैं। अन्यान्य उपायों से भरसक प्रयास करती हैं कि उसका आसामी उससे ख़ुश रह सके। किन्तु जब कोई उपाय नहीं दिखता तो वे एक दिन ग्राहक के भोजन में विष मिला देती हैं और उसकी लाश का अंगूठा कोरे काग़ज़ पर लगाकर उसकी संपत्ति का हरण कर लेती हैं। ये गणिकाएँ सर्वाेच्च पदों तक पहुँचने की क्षमता रखती हैं।
विभीषण जब रावण से अपमानित हुआ तो उसे राम याद आए। उसने राम को बताया कि मैं तो लंका में रहकर भी आप ही के नाम की उपासना करता था। सुनकर राम प्रसन्न हो गए और विभीषण को राज्यसभा भेजने का वचन दे दिया। अपनी राज्यसभा की सीट पक्की होते देख महात्मा विभीषण ने रावण की लंका, भाई-बहन और यहाँ तक कि अपने राष्ट्र से भी मुख़ालफ़त करने में हिचक न की। विभीषण के इस समर्पण से राम बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें भक्त-शिरोमणि की उपाधि दी।
उधर सुग्रीव का भाई उसकी बदतमीज़ीयों से उकताकर उसे घर-निकाला दे चुका था। सुग्रीव में इतनी हिम्मत न थी कि भाई के कान पर दो टिका दे। दुःखी सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे सीताहरण लाइव देख रहे थे। उन्होंने रावण को ऐसा पाप करने से रोकना चाहा किन्तु उन्हें लगा कि सीता का पता बताने के बदले में मैं राम से सौदेबाज़ी कर सकता हूँ। उन्होंने सीताहरण होने दिया। राम जब विकल होकर पहुँचे तो सुग्रीव उतने ही प्रसन्न हुए जितने संजीव कुमार के हाथ काटकर गब्बर सिंह जी हुए थे। उन्होंने राम से कहा कि मैं आपकी केस स्टडी तो करना चाहता हूँ लेकिन ‘फोर्स्ड बैचलर’ होने के कारण कंसन्ट्रेट नहीं कर पा रहा हूँ। राम अब तक फोर्स्ड बैचलर की पीड़ा जान चुके थे। लक्ष्मण तो इस फील्ड में सीनियर फैलो थे ही। दोनों भाइयों ने मिलकर पीएसी की मीटिंग में बाली को धूल चटाने की योजना बनाई। इसके लिए सबसे पहले सुग्रीव को पार्टी से निलंबित किया गया। उसने बाली को गालियाँ देने का अधिकृत लाइसेंस पा लिया। कुछ दिन गालियों से अभिषेक करने के बाद सुग्रीव को वापस पार्टी की सदस्यता दे दी गई। इस स्टेप से बाली बौखला गया। उसकी बौखलाहट का लाभ उठाकर उसे पार्टीविरोधी सिद्ध करते हुए राम ने बाली की हत्या कर दी।
अंगद सबसे समझदार रहा। उसने चाचा को पटाए रखा। क्योंकि वह जानता था कि राजनीति में पासा कहीं भी पड़ सकता है। यदि चाचा जीता तो अंगद की स्वामिभक्ति उसकी राज्यसभा सीट का ग्राउंड बना देगी और अगर चाचा निबट गया तो इकलौता पुत्र होने के कारण उसका अपने पिता की संपत्ति पर अधिकार रहेगा ही रहेगा।
अब प्रश्न यह है कि इस सबके बीच जनता क्या करे। अरे भई, हरि का गुन गाओ…. राम का नाम भजो और अपनी दो जून की रोटी की चिंता करो। क्योंकि भूखे पेट न भजन गोपाला!

✍️ चिराग़ जैन

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