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नये घर में

सुनो!
सब कुछ तो बटोर लाया हूँ
अपने पुराने मकान से
नये मकान में;
फिर भी
काफ़ी कुछ छूट गया है वहीं
…जस का तस।

अलमारी के पीछे
जाला पूरती रहती थी एक मकड़ी
उसका घर तहस-नहस कर आया हूँ
अपना घर बदलते हुए।

दीवाली की सुबह
रसोई की चौखट पर
सरस की टहनियाँ टाँकते थे पिताजी;
उनकी सूखी हुई डंडियाँ
चुभती हुई सी छूट गई हैं
चौखट की झिरियों में।

राखी के सोन चिपकाने से
एक निशान बन जाता था दीवार पर
वो साथ न आ सका।

और छोटी बहन ने
पूजा वाले कमरे में
थापे लगाए थे
विदा होते हुए।
…जिन्हें देखने भर से
जीवंत हो जाती थी बहन की विदाई;
…उन्हें सहेजने का
कोई ज़रिया न हुआ।

पड़ोस वाले अंकल
यूं भी
कभी बतियाते तो नहीं थे,
लेकिन आज
जब ट्रक में चढ़ रहा था उनका पड़ोस,
तो वे अपनी बालकनी में
रोज़ से
कुछ ज़ियादा ख़ामोश नज़र आए।

नये घर की दीवारें
एकदम नयी हैं।
फ़र्श पर नहीं है
किसी दीये की चिकनाई के घेरे।
ट्यूब के पीछे
अभी नहीं बसा है
किसी छिपकली का घरौंदा।
यहाँ सामने वाले छज्जे से
लुंगी पहने कोई अधेड़
आते-जाते घूरता भी नहीं है।

एक बड़े से ट्रक में
लाद तो लाए हम
एक पूरा युग
लेकिन वक़्त लगेगा
उस युग को
इन दीवारों पर छाने में
अभी वक़्त लगेगा
इस मकान को
घर बनाने में।

✍️ चिराग़ जैन

अविनय

जो अकारण ही किसी अपमान के भागी बने हैं
हो न हो उनसे किसी सम्मान की अविनय हुई है
जो बिना चाहे पतन-पथ पर चले आए अचानक
उन अभागों से किसी उत्थान की अविनय हुई है

थी अतुल क्षमता विजय की, पर पराजय का रहा डर
सामने गांडीवधारी थे, तभी रथचक्र जर्जर
यदि अचानक मार्ग बदले लक्ष्य को बढ़ता हुआ शर
स्पष्ट इंगित है कहीं संधान की अविनय हुई है

भाग्य से हारे हुए, मस्तक पकड़ जो रो रहे हैं
सम्पदा से रिक्त होकर खंडहर में सो रहे हैं
जो विवशता के किसी अभिशाप को ढोता रहा हो
उस तपस्वी से किसी वरदान की अविनय हुई है

न्याय का पलड़ा कुतर्कों से प्रभावित हो गया हो
तंत्र सारा चाटुकारों को समर्पित हो गया हो
सत्य जिनका मूढ़ताओं से पराजित हो गया हो
वो समझ जाएँ किसी विद्वान की अविनय हुई है

जो ज़रूरत पर सभी के अजनबी दृग्कोण देखे
चीख जिसकी व्यर्थ जाए, सृष्टि सारी मौन देखे
जो स्वयं निष्ठुर रहा हो, पीर उसकी कौन देखे
स्पष्ट है उससे स्वयं भगवान की अविनय हुई है

✍️ चिराग़ जैन

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं

मैं दुर्गा हूँ कमज़ोर नहीं
मुझ पर रस्मों का ज़ोर नहीं
मेरे सपनों को बांध सके
ऐसी दुनिया में डोर नहीं

कोमल हूँ कन्यापूजन में
चण्डी हूँ दुष्टों से रण में
जब ठान लिया तो मिला दिया
धरती को अम्बर से क्षण में
मुश्किल की कोई भी आंधी
मुझको सकती झकझोर नहीं

मेरे सपनों का देश अलग
मेरा ख़ुद का परिवेश अलग
सारी दुनिया की बात अलग
मेरे मन का संदेश अलग
कुछ भी सुनकर चुप रह जाऊँ
ऐसा अब होगा और नहीं

अर्पण की घड़ी अगर आई
अपना सर्वस्व लुटा दूंगी
धोखे से छलना चाहोगे
भारी विध्वंस मचा दूंगी
हर पल कोमल भी नहीं मगर
हर पल को बहुत कठोर नहीं

आँखों में सपना पलता है
दिल हिरण चैकड़ी भरता है
क़दमों में बिजली सी तेज़ी
मन में बेहद चंचलता है
मैं दौड़ जिसे छू नहीं सकूं
ऐसा तो कोई छोर नहीं

✍️ चिराग़ जैन

कला का मुँह काला कर दिया जाए

“कला का मुँह काला कर दिया जाए” -ये हुक्म अपने आप को दिया है कलयुग के कुकर्मियों ने। कोलाहल पर किलोल की विजय न हो जाए। अपनी महत्वाकांक्षाओं को मनोरंजन के सत्य भाषण से बचाने के लिए सियासत रोज़ नए पैंतरे खेल रही है। कोई मुज़फ्फरनगर के दंगों पर बोलने लगे तो उलेमाओं का फ़तवा उछाल दो, कोई पंजाब के सुट्टे पर बोले तो उसे सेंसर की देहरी पर रगड़ दो। कोई दिल्ली की समस्याओं पर कलम चलाए तो उसे मोदी का चापलूस कहकर अपमानित करो। कोई केंद्र सरकार की किसी नीति पर ऊँगली उठाए तो उसे “कांग्रेसी कुत्ता” कहो। कोई कांग्रेस की हरकतों पर लिखने की कोशिश करे तो उसे संघी कहकर प्रताड़ित करो। कोई फकीरों की मज़ार पर क़व्वाली गाने लगे तो उसे गोली मार दो।
ऑल इण्डिया बकचोद, बिग बॉस, ग्रैंड मस्ती और सनी लियोने जैसे प्रतिमानों की खिड़की से कला का आकलन करो ताकि कलाकार ख़ुद ब ख़ुद शर्मसार होकर ख़ुदकुशी कर ले। कला फिल्मों को आर्थिक विपन्नता से घोंट दो और फिर व्यावसायिक फिल्मों के उदाहरण प्रस्तुत कर फिल्मों की अनुपयोगिता का ढोल पीटो।
कोई हँसने-हँसाने की कोशिश में व्यंग्य के चौबारे में टहलने लगे तो उस पर मानहानि का मुक़द्दमा दर्ज कर दो। कोई न्यूज़ चैनलों से उत्तरदायित्वहीनता का कारण पूछ ले तो उसे चैनल पर दिखाना बंद कर दो। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जुमला झूठे सर्वेक्षण और अश्लील विज्ञापनों के पक्ष में मुखर होना चाहिए। कला, कलाकार और सत्य… -इन सबको तो फांसी चढ़ा देना चाहिए।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Comedian got arrested for his sarcasm

मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून

ख़ुद को ख़ुदा के बन्दे और जेहादी कहने वाले खूंखारों ने ख़ुदा की इबादत और ख़ुदा से मुहब्बत का पैग़ाम देने वाली एक बेहतरीन आवाज़ को ख़ामोश कर दिया। रूह से उठने वाला वो अलाप जो सुनने वालों को सीधे रूहानियत के गलियारों तक लिए जाता था, वो अलाप स्वयंभू जेहादियों पर एक धिक्कार के साथ हमेशा के लिए बंद हो गया।
दहशतगर्दी की दुनिया रूहानियत को नहीं समझ सकती, क्योंकि रूहानियत का तअल्लुक़ रूह से होता है। ईश्वर, अल्लाह, ख़ुदा या जो भी कोई पारलौकिक सत्ता इस सृष्टि के पीछे है; उसके कोप की इस समय आवश्यकता है। अब इस दुनिया को समझना होगा कि संसार में सिर्फ दो ही तरीके के लोग हैं- 1) दहशतगर्द और 2) इंसान।
दहशतगर्दी के खिलाफ इंसानियत को एक होकर लड़ना होगा; तभी मुहब्बत के पैगम्बरों के लिए सुकून मुहैया हो सकेगा।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Death of Amjad Farid Sabri

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