सावन
बरखा, बादल, बीजुरी, रिमझिम, झर-झर नीर
मीत संग सब नीक है, बिरहन कू सब पीर
✍️ चिराग़ जैन
बरखा, बादल, बीजुरी, रिमझिम, झर-झर नीर
मीत संग सब नीक है, बिरहन कू सब पीर
✍️ चिराग़ जैन
दृश्य 1
एंकर : आप जीएसटी बिल पर कांग्रेस से क्या अपेक्षा करते हैं।
भाजपाई : कांग्रेस देशहित के लिए इस बिल का समर्थन करे।
कांग्रेसी : लेकिन 2013 में तो इसी बिल का भाजपा ने विरोध किया था।
भाजपाई : बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि ले।
दृश्य 2
एंकर : आपकी सरकार कश्मीर समस्या का कोई समाधान क्यों नहीं निकाल पा रही?
भाजपाई : कश्मीर समस्या नेहरू जी की ग़लती का परिणाम है।
एंकर : आप आतंकवाद से नहीं निपट पा रहे हैं।
भाजपाई : आतंकवाद इंदिरा गांधी की देन है।
एंकर : भ्रष्टाचार और काला धन आपके नियंत्रण में नहीं आ रहा।
भाजपाई : कांग्रेस के साठ साल के शासन में भ्रष्टाचार व्याप्त हुआ है।
कांग्रेसी : लेकिन आप तो कहते हैं कि बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि ले।
भाजपाई : नहीं रे, हर जगह एक सी कविता नहीं चलती रे।
एंकर : तो यहाँ के लिए कौन सी कविता है?
भाजपाई : लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।
✍️ चिराग़ जैन
स्कूटर के पीछे सधकर बैठी अधेड़ महिला
बचाती जा रही थी स्वयम् को
ट्रैफिक जाम में फँसे
अपने पति की बेफिक्री से।
रह-रहकर
आशंका और भय से भरी आँखें
मुस्कुरा कर
क्षमायाचना कर लेती थी
गाड़ी वालों से
ताकि उनकी झल्लाहट
पहुँचने न पाए
उसके पति तक।
आख़िरकार
मेरी गाड़ी के किनारे से
टकरा ही गया उसका पाँव।
…ज़ोर से लगी होगी उसे
लेकिन उसने एक पल भी नहीं देखा अपने पैरों की ओर
बल्कि झटाक से
दोनों हाथ जोड़कर मुझे देखा
फिर कसकर पकड़ ली स्कूटर की स्टॅपनी!
…और पति महाशय
ट्रैफिक जाम से गुस्साये
झल्लाते जा रहे हैं
उन्हें लगता था
वो कोई बोझा-सा ढो रहे हैं
अपने स्कूटर पर!
✍️ चिराग़ जैन
हमें पुलिसवाला न दिखे तो हम रेडलाइट जम्प करते हुए नहीं हिचकते। रॉंग साइड ड्राइव करते हुए हमें शर्म नहीं आती। सड़क किनारे गाड़ी लगाते हुए हम दूसरों की परेशानी की चिंता नहीं करते। हमें लालबत्ती पर दाएँ मुड़ना होगा तो भी हम सबसे बाईं लेन में सबका रास्ता रोककर खड़े होंगे। हम मोबाइल पर बात करते हुए सड़क पार करते हैं। बिना हेलमेट लगाए कान और कंधे के बीच मोबाइल फँसाए टेढ़ी गर्दन किये टेढ़ी-टेढ़ी बाइक चलाते हैं। कार ड्राइविंग के दौरान तो मोबाइल पर बात करना हमारा धर्म बन चुका है। हम ऑटो चलाते हैं, तो सारे नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। हम बस चलाते हैं तो ब्रेक और इंडिकेटर को अछूत समझने लगते हैं। नो एंट्री और टो-अवे जैसे शब्द तो हमने पढ़े ही नहीं हैं। हम रेडलाइट पर खड़ी गाड़ी को भी हॉर्न दे देते हैं। हम स्पीड लिमिट की परवाह नहीं करते।
हम पैदल चलते हैं, तो गाड़ीवालों को दुश्मन समझते हैं। हम गाड़ी चलाते हैं तो पैदलों को मूर्ख समझते हैं। हम फुटओवर ब्रिज के नीचे भी भागकर सड़क पार करते हैं। हम ज़ेबरा क्रॉसिंग को सडकों के सौंदर्य का प्रसाधन मात्र समझते हैं। हम स्टॉप लाइन को सड़कों के अंग्रेजीकरण का कारण मानकर उसे रौंद डालते हैं।
हमारे पुलिसवाले चालान काटने को ही धर्म समझते हैं। हमारे पुलिसवाले ऑफिस टाइम पर भारी ट्रैफिक के बीच बेरियर लगाकर चाय पीने चले जाते हैं। हमारे पुलिसवाले खुद रेड लाइट जम्प करते हैं। हमारे पुलिसवाले रॉंग साइड, रॉंग लेन, बिना हेलमेट, ओवरटेकिंग, रैश ड्राइव को ड्यूटी समझकर निभाते हैं।
मिलिट्री के ट्रक, शहरों के ट्रैफिक को कीड़े, और शहरों की जनता को चींटी समझकर चलते हैं। सेना या पुलिस की वर्दी पहननेवाला शख़्स कहीं भी, कैसे भी गाडी घुसेड़ सकता है। गाड़ी पर लॉयर लिखा हो, तो उसे क़ानून से खेलने का अधिकार मिल जाता है। गाड़ी पर प्रेस लिखा हो तो उसे पुलिस को छेड़ने का अधिकार मिल जाता है। गाडी पर विधायक या सांसद प्रतिनिधि लिखा हो तो उसे जनता से खेलने का अधिकार मिल जाता है।
अतिक्रमण के कैंसर से बची खुची सड़कें बरसात की फुंसियों से त्रस्त हैं। पैदल चलने के लिए बने फुटपाथ झुग्गियों, रेहड़ियों, खोखों, स्मैकियों और मूत्रदान के लिए समर्पित हो चुके हैं। पार्किंगवाला भैया आधी सड़क घेरकर बदमाशी के स्तर तक उतरकर वसूली करता है। रिक्शावाला भैया अकेले ही पूरे ट्रैफिक का बंटाधार करने में समर्थ है। फुटपाथ का कोई पत्थर अगर सड़क पर गिर जाए तो उसे हटाने की ज़रूरत कोई नहीं समझता। डिवाइडर की रेलिंग घातक होकर सड़क तक मुड़ जाए तो उसे ठीक करने का जिम्मा किसी विभाग का नहीं है।
…हम विकास के पथ पर अग्रसर हैं।
✍️ चिराग़ जैन
इस कदर नफ़रत बढ़ी है, हो गये त्योहार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
ईद को डर है, वजू की हौद में तेज़ाब ना हो
शाम की मजलिस कहीं बस दो घड़ी का ख़्वाब ना हो
रह नहीं जाएँ नयी नस्लें मिठासों से नदीदी
दे न दे कोई क़फ़न की शक्ल में इस बार ईदी
मस्जिदों की सीढ़ियाँ ज़ख़्मी हैं, कुल बाज़ा घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
सावनी उत्सव सभी दहशत के रंगों में रंगे हैं
जिस जगह झूला पड़ा था, अब वहाँ मातम टंगे हैं
तीज पर बाबुल के घर का रास्ता मुश्किल कटा है
जिस डगर आएगी लाडो, उस डगर कल बम फटा है
भाई-बहनों का कलाई पर सँवरता प्यार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
आयतों की आड़ में गोली चली रमज़ान रोया
स्वर्ण मंदिर में बहा खूँ, शौर्य का बलिदान रोया
मौत का तांडव मिला है, धर्मगुरुओं के दरों पर
सब पे शासन की तमन्ना छा गई गिरजाघरों पर
शस्त्र से सब शास्त्र आहत, स्वार्थ से अवतार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
आपसी सद्भाव इतना हो कि नफ़रत टिक न पाये
फूल का बाज़ार यूँ पनपे कि असला बिक न पाये
ज़ख़्म को मरहम मिला तो दम घुँटेगा दहशतों का
आदमीयत ही पढ़ेगी फ़ातिहा इन नफ़रतों का
काश मानवता दरिंदों को करे इक बार घायल
रात भर की नींद घायल, सुब्ह का अख़बार घायल
✍️ चिराग़ जैन