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ख़ामोश रहते हैं

बस इतना सोचकर हम लोग अब ख़ामोश रहते हैं
कि जब हम बोलते हैं और सब ख़ामोश रहते हैं

वो चुप हैं तो समझ लेना उन्हें सब कुछ पता होगा
जिन्हें थोड़ा पता होता है कब ख़ामोश रहते हैं

मिरे आदाब तक को लोग बेअदबी समझते हैं
यही सब देखकर हम बाअदब ख़ामोश रहते हैं

मुहब्बत एक दिन ऐसा भी मंज़र पेश करती है
निगाहें बोलती हैं और लब ख़ामोश रहते हैं

कभी हम भी सभी से हर ख़ुशी-ग़म बाँट लेते थे
मगर अब देखकर दुनिया के ढब, ख़ामोश रहते हैं

बड़ी मुद्दत से अपने दिल में जाने क्यों नहीं उठती
किसी को कुछ बताने की तलब, ख़ामोश रहते हैं

✍️ चिराग़ जैन

कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की
कोशिश करता हूँ
….सिर्फ़ कोशिश।

कभी इसका मन
कभी उसका मन
कभी सबका मन
…और कभी-कभी
अपना भी मन।

इतना ही समझ आता है मुझे
कि ‘कोशिश’
और ‘कामयाबी’
उर्दू ज़ूबान के
दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं!
✍️ चिराग़ जैन

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं
एक बिन्दु को
आशा भरी नज़रों से
लगातार।

उतनी ही देर तक
तकती रहीं
दो आँखें
छलछलाती हुईं
मुझे भी!

✍️ चिराग़ जैन

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में

जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में

कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में

कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में

लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में

हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में

✍️ चिराग़ जैन

बेअदब

बड़ी अधूरी थी ये ज़िन्दगी जो अब न रही
तुम्हारा प्यार जो पाया तो कुछ तलब न रही

ग़ज़ल मैं तेरे अदब की मिसाल देता हूँ
तवायफ़ों के लबों पर भी बेअदब न रही

तुम्हारी ओर से भी नज़्ा्रे-इनायत तो हुई
मगर जब हमको ज़रूरत थी महज तब न रही

कोई उस जीत को पाकर भला करे भी क्या
जो जीत एक भी मुस्कान का सबब न रही

✍️ चिराग़ जैन

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