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इक नया रास्ता

ज़िन्दगी जब भी आज़माती है इक नया रास्ता दिखाती है न तो पिंजरे में चहचहाती है न ही अब पंख फड़फड़ाती है जब कभी माँ की याद आती है ये हवा लोरियाँ सुनाती है वो मरासिम को यूँ निभाती है मिरा हर काम भूल जाती है मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है जैसे पाजेब छनछनाती है लफ़्ज़ मिल पाए तो...

कोशिश

मैं ‘मन’ लिखने की कोशिश करता हूँ ….सिर्फ़ कोशिश। कभी इसका मन कभी उसका मन कभी सबका मन …और कभी-कभी अपना भी मन। इतना ही समझ आता है मुझे कि ‘कोशिश’ और ‘कामयाबी’ उर्दू ज़ूबान के दो अलग-अलग अलफ़ाज़ हैं! ✍️ चिराग़...

अनदेखी

देर तक देखता रहा मैं एक बिन्दु को आशा भरी नज़रों से लगातार। उतनी ही देर तक तकती रहीं दो आँखें छलछलाती हुईं मुझे भी! ✍️ चिराग़...

इलेक्शन

होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों...

महत्व

तुमसे मिलना… …जैसे हाई-वे पर दौड़ती गाड़ी दो पल को ठहरे किसी पैट्रोल पम्प पर। …जैसे परवाज़ की ओर बढ़ता परिंदा यकायक उतर आए धरती पर पानी की चाह में। …जैसे बहुत लंबी मरुथली यात्रा के दौरान हरे पेड़ की छाँव! ✍️ चिराग़...
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