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अंतर्मुखी

ख़ुशी की लाश उठती है ख़ुशी की चाह के नीचे
बहुत से ज़ख्म होते हैं ज़रा-सी आह के नीचे
हमारे दिल की बातें दिल में ऐसे दब के रहती हैं
कि जैसे पीर सोता हो कोई दरगाह के नीचे

✍️ चिराग़ जैन

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी

चांदनी से रात बतियाने सहेली आ गयी
कुछ मुंडेरों के मुक़द्दर में चमेली आ गयी

पैर भी सुस्ता लिये, आँखों ने भी दम ले लिया
ज़िंदगी की राह में, दिल की हवेली आ गई

झाँकता है हर कोई ऐसे दिल-ए-नाशाद में
जैसे आंगन में कोई दुल्हन नवेली आ गई

बोझ कंधों का उतर कर गिर गया जाने कहाँ
जब मेरे सिर पे बुज़ुर्गों की हथेली आ गई

तीरगी का ख़ौफ़, सन्नाटे की दहशत थी मगर
इक किरण सूरज की धरती पर अकेली आ गयी

✍️ चिराग़ जैन

सीधे प्रसारण की तरह

जीत आए जब हर इक मुश्क़िल इलेक्शन की तरह
तब मिले हैं आप भी बाहरी समर्थन की तरह

अब तो फ़रमाइश भी बतलाते हैं ज्ञापन की तरह
हो गए बच्चे सभी धरने-प्रदर्शन की तरह

पहले हर रिश्ते पे मर्यादा का सेंसर बोर्ड था
आज सब कुछ चल रहा सीधे प्रसारण की तरह

झूठ ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बनकर छा रहा है हर तरफ़
और सच ग़ायब हुआ है दूरदर्शन की तरह

अब तो बातों का न कोई आदि है ना अंत है
लोग बातें कर रहे हैं कालचिंतन की तरह

✍️ चिराग़ जैन

रोटी

पेट को जब भूख लगती है
तो अक्सर पाँव सबके
घर से बाहर आ निकलते हैं
भूख के कारण सभी
प्राणी, परिन्दे, जानवर
सब कीट और इन्सान तक
संघर्ष करते हैं

तितलियाँ लड़ती हैं अक्सर आंधियों से
चींटियाँ चलतीं कतारों में
निकलकर बांबियों से
साँप, बिल को छोड़कर फुफकारते हैं
शेर, तजकर मांद को
भीषण दहाड़ें मारते हैं

भेड़िये, चीते, बघेरे
मृग, मगर और मीन
सब भोजन कमाने को
घरों का त्याग करते हैं
परिन्दे, दानों की ख़ातिर
खोलते हैं पर
फुदककर नीड़ से बाहर निकलते हैं

और इन सबकी तरह
इंसान भी
दो वक़्त की रोटी कमाना चाहता है

हाँ,
कमाने के तरीक़े भी
सभी के एक से हैं।
छीनना, लड़ना, झपटना, मांगना
या सोखना और चाटना
जूठन उठाना
या किसी की हसरतों का क़त्ल करके
पेट की ज्वाला बुझाना

फ़र्क़ है तो सिर्फ़ इतना
और सब
सुब्ह निकलकर
शाम तक घर लौट आते हैं
फिर से सूनी बांबियों में
घोसलों में
प्यार की दुनिया बसाते हैं

आदमी, पर इक दफ़ा
जब रोटियाँ लाने निकलता है
तो फिर घर लौट कर
वापिस नहीं आता!

✍️ चिराग़ जैन

सच के नाम पे

दुनिया की बदसलूक़ी का तोहफ़ा लिये जिया
फिर भी मैं अपने सच का असासा लिये जिया

कोई महज ईमान का जज्बा लिये जिया
कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिये जिया

टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ
इक शख़्स सच के नाम पे क्या-क्या लिये जिया

जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब
तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिये जिया

हर एक शख़्स अपनी नज़र में था बेलिबास
दुनिया के दिखावे को लबादा लिये जिया

रोशन रहे चराग़ उसी की मज़ार पर
ताज़िन्दगी जो दिल में उजाला लिये जिया

इक वो है जिसे दौलतो-शोहरत मिली सदा
इक मैं हूँ ज़मीरी का असासा लिये जिया

तुम पास थे या दूर थे, इसका मलाल क्या
मैं तो लबों पे नाम तुम्हारा लिये जिया

✍️ चिराग़ जैन

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