Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
सारी जिम्मेदारी मेरी, सब सहना लाचारी मेरी
प्राण लुटाकर गाली खाना, बस इतनी सी पारी मेरी
फिर भी जब अवसर होगा सब गाँवों का गुणगान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे
जब सुविधा का प्रसव कराने, गाँवो ने इनकार किया था
तब मैंने ही आगे बढ़कर ये दुखड़ा स्वीकार किया था
शुद्ध हवा ने धमकी दी जब मुझको छोड़ चले जाने की
तब भी मैंने बस लोगों की सुविधा का सत्कार किया था
सुख से दूरी जारी मेरी, सुविधाओं से यारी मेरी
मुझको लगता था होएगी, मानवता आभारी मेरी
पर गाँवों की बिछड़ी यादों का निशदिन सम्मान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे
बरसातों में घर की पक्की छत के नीचे जीने वाले
गर्मी में एसी कमरों में ठंडे शर्बत पीने वाले
सर्दी में ब्लोअर की ऊष्मा से सुख की चाहत करते हैं
तब क्यों याद नहीं आते हैं कच्चे छप्पर झीने वाले
नदिया कर दी खारी मेरी, धरती कर दी भारी मेरी
मेरा शोषण करने वालों को चुभती अय्यारी मेरी
पक्की सड़कों पर दौड़ेंगे, पगडंडी पर मान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे
मेरी निंदा के चर्चे हैं मानवता के अखबारों में
मुझको माना है खलनायक वक्तव्यों के व्यापारों में
पैसे की व्यवहारिकता को कविताओं में जी भर कोसा
गाँव सुखों का मोल लगाता, रोज़ाना इन बाजारों में
किसने शक्ल सुधारी मेरी, कब समझी दुश्वारी मेरी
भोलेपन की चालाकी को, खलती है हुशियारी मेरी
अंगूरों को खट्टा कहकर कुंठा का रसपान करेंगे
मैं तो ठहरा शहर मुझे अपनाकर सब अहसान करेंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
विकास के स्वप्न का साकार रूप है- अभियांत्रिकी। किसी राष्ट्र के निर्माण में अभियंताओं की सर्वाधिक प्रत्यक्ष भूमिका होती है। भारत के वे योग्य सपूत जिन्होंने अनवरत साधना से हमें पगडंडी के स्थान पर पक्की सड़कें दीं; बैलगाड़ी से उतार कर गाड़ियों की सवारी कराई; चिट्ठियों पर आधारित संचार को मोबाइल की तकनीक दी और अंगीठी को इंडक्शन से रिप्लेस किया …उन सभी को बहुत-बहुत धन्यवाद!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
सच समझते आदमी की बेक़ली से पूछ लो
नेकियाँ ख़ामोश क्योंकर हैं, बदी से पूछ लो
मैं कहाँ कह पाऊँगा अपनी हकीक़त मंच से
यूँ करो तुम जा के मेरी डायरी से पूछ लो
एक गिरते आदमी पर हँस पड़ी तो क्या हुआ
पुत्र के शव पर बिलखती द्रौपदी से पूछ लो
दूसरों की बेहतरी का मोल क्या होगा जनाब
फैक्टरी के पास से गुज़री नदी से पूछ लो
इल्म का कोरा दिखावा हो चुका हो तो हुज़ूर
मसअले का हल चलो अब सादगी से पूछ लो
ज़िन्दगी जीने का सबसे ख़ूबसूरत क्या है ढंग
जिस सदी में हम हुए हैं, उस सदी से पूछ लो
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
पगडण्डी को छूकर निकला राजमार्ग कुछ देर
त्यौरी पिघलीं, आँखें चमकीं, चिंता हो गई ढेर
तेज़ दौड़ते वीराने को भाया दृश्य सुहाना
चैपालों को हंसी-ठहाका, पनिहारिन का गाना
बूढ़ा बरगद, मीठी पोखर और पशुओं का घेर
मन में कितनी ठंडक उतरी, कैसे मैं बतलाऊँ
जब सूखी आंखों ने देखी, मटके वाली प्याऊ
होंठ नहीं गीले कर पाते फ्रिज से सेठ-कुबेर
पगडण्डी से चलकर आती हैं जब मस्त हवाएँ
राजमार्ग का मन करता है, यहीं कहीं बस जाएं
अमराई में खाट डाल कर सुस्ता लें कुछ देर
यूं तो कितनी शहरी सड़कें आगे-पीछे घूमें
हर आगे बढ़ने वाले को आगे बढ़कर चूमें
पगडण्डी चखकर लाई है मीठे-मीठे बेर
सड़क कभी इस राजमार्ग से मिले कभी उस मग से
पगडण्डी इक बार परस ले जिसको भी निज पग से
फिर मुश्किल है पैदा होना उसके मन में फेर
सड़क लांघ जाती है अक्सर राजमार्ग का सीना
पगडण्डी ने मर्यादा की सीमा कभी तजी ना
रोज़ सबेरे ले आती है पत्ते-फूल सकेर
सड़क विदा के समय अकड़ कर दूर चली जाती है
पगडण्डी सहमी-ठिठकी सी खड़ी नज़र आती है
राजमार्ग को ही जाना पड़ता है नज़रे फेर
मिला हाँफते राजमार्ग को ज्ञान यहाँ अलबेला
बहुत तेज़ जो दौड़ा इक दिन वो रह गया अकेला
काम सभी पूरे हो जाते थोड़ी देर-सबेर
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
विकासवादियो!
पर्यावरण के नाम पर
मुट्ठी न भींचो,
तुमसे किसने कहा है
कि दुनिया के भले के लिए
कोई पेड़ सींचो?
तुम तो अपनी बालकनी में
तुलसी का इक पौधा लगा लो
और अपने परिवार के लिए
थोड़ी सी सांसें उगा लो।
मत सोचो
कि किस तरह बचाई जाए
दादी नानी की कहानी,
पर ये तो विचार करो
कि तुम्हारे नौनिहाल
कहाँ से पिएंगे
साफ-शुद्ध पानी।
माना
कि तुम्हारी विकास उगलती फैक्ट्रियां
नहीं रोक सकती
काला जहरीला धुआँ,
लेकिन बचाई तो जा सकती है नदी
सहेजा तो जा सकता है कुआँ।
हमारी पढ़ी लिखी सोसाइटी से
ज्यादा समझ थी
पिछले जमाने के असभ्य-अनपढ़ों में
जो जानते थे
कि स्वस्थ भविष्य के बीज छुपे हैं
पीपल और बरगद की जड़ों में।
आओ
विकास और विनाश के बीच
एक स्पष्ट रेखा खींच आएं
आओ
स्मार्ट सिटी की ग्रीन बेल्ट पर लगे
गुलमोहर को सींच आएं।
✍️ चिराग़ जैन