Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम खोखले आदर्शों और तन्त्रीय विफलताओं के एक ऐसे शिकंजे में जकड़े जा चुके हैं, जिसमें से निकलने के लिए शिकंजे को जड़ समेत उखाड़ देने की शक्ति से कम बात न बनेगी।
संविधान एक ऐसी किताब है, जिसको किसी लोकतंत्र की रीढ़ कहा जा सकता है। किन्तु इस रीढ़ में स्लिपडिस्क कैसे किया जाता है, यह कला हमारी विधायिका को बख़ूबी मालूम है। विधायिका इसे हारमोनियम की तरह प्रयोग करती है। सुर इसमें सारे हैं, लेकिन किस खटके को कब दबाकर अपने मतलब का राग अलापा जाए, यह ज्ञान राजनीति के ककहरे में सिखा दिया जाता है। सत्ता संभालने से पूर्व इसी किताब की शपथ उठाई जाती है। जब शपथ-ग्रहण चल रहा होता है, तब शपथ लेनेवाले को भी ज्ञात होता है कि इस शपथ से बड़ा झूठ दुनिया में कोई नहीं है। शपथ दिलानेवाला भी जानता है कि शपथ की शब्दावली पूर्ण होने तक भी यह शपथ नहीं टिकेगी। लेकिन शपथ-ग्रहण की औपचारिकताओं का अभिनय चलता रहता है और विनम्रता की भूमिका अदा करता ‘जनप्रतिनिधि’ बिना पैसा ख़र्च किये एक मिनिट से भी कम समय में पूरे देश को यह बता देता है कि ‘मैं (नया मसीहा) अब तुम्हारा देश चूसने के लिए अधिकृत हो गया हूँ।’
ये शब्द सुनते ही पूरी ब्यूरोक्रेसी उसके जूते के नम्बर के मुताबिक अपनी खोपड़ी सेट कर लेती है। वह जिस क्षेत्र पर पिकनिक मनाने निकलता है, वहाँ तहलका मच जाता है। इससे अधिक क्या तबाही होगी कि उस क्षेत्र के सरकारी कर्मचारियों की नींद उड़ जाती है। अधिकारी रात-दिन दफ़्तर में रहकर चप्पे-चप्पे पर अपनी और अपने कर्मचारियों की खोपड़ियाँ बिछाते हैं कि पता नहीं किस चप्पे पर साहब का मन जूता मारने को मचल उठे, वह चप्पा ख़ाली रहा तो साहेब को कितनी निराशा होगी। ध्यान रहे कि हमारी संवेदनशील ब्यूरोक्रेसी यह सब श्रम साहेब को ख़ुश करने के लिए करती है, जनता को ख़ुश करने के लिए नहीं। साहेब भी यह बात अच्छी तरह जानते हैं, इसलिए ब्यूरोक्रेसी का दिल दुखाये बिना, वे ख़ुश होकर लौट आते हैं। दोनों के बीच का यह समर्पण देखकर जनता की आँखों में ख़ुशी के आँसू आ जाते हैं।
सब कुछ अभिनय मात्र है। औपचारिकताओं की इतनी लंबी फेहरिस्त है कि जीवन और औपचारिकताओं की होड़ में जीवन हमेशा छोटा रह जाता है।
संविधान में एक मज़ेदार बात और लिखी है कि संविधान का अपमान करनेवाले को बख़्शा नहीं जाएगा। इस बात ने संविधान को धर्मग्रन्थ बना दिया है। अब अगर किसी को इस किताब को जलाते, पटकते, गिराते, फाड़ते देखा गया या इस किताब पर प्रश्नचिन्ह लगाते देखा गया तो वह राष्ट्रद्रोही माना जाएगा लेकिन अगर कोई विधिवत इसको पढ़कर इसके साथ खिलवाड़ करे तो उसे पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है।
हमारा संविधान इतना लचीला है कि अगर मेरा इस तंत्र के किसी रेशे से पंगा हो जाए तो इस लेख में संविधान को महज एक किताब कहने के अपराध में मुझ पर कार्रवाई हो जाएगी और मुझे तंत्र के रेशों को ख़ुश करना आ जाए तो फिर पूरी किताब मेरे पक्ष में काम करने लगेगी।
हमारे यहाँ वक़ालत में न्याय दिलाने की पढ़ाई नहीं कराई जाती, बल्कि यह सिखाया जाता है कि इस किताब को किस कब किस एंगल पर रखकर न्याय को और जटिल बनाया जा सकता है। जो जितना जटिल बना दे, वह उतना बड़ा वक़ील। न्यायाधीश अपने कोर्ट में अधिवक्ताओं के इस कौशल को देखकर प्रसन्न होते रहते हैं। न्यायाधीश जानते हैं कि वक़ील अपने लाभ के लिए केस को लंबा किये जा रहे हैं। अदालतें न्याय नहीं देतीं, वे वैराग्य देती हैं। जो दो लोग विवाद के चरम तक पहुँचकर अदालत में आए हों, उन्हें यह ज्ञान कराया जाता है कि ‘जो लोग आपस में लड़ते हैं उन्हें अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।’ यह ज्ञान होते ही वे दोनों लड़ाके कोर्ट की कैंटीन में बैठकर हँसी-ख़ुशी आपस का विवाद सुलझा लेते हैं। दोनों पक्ष थोड़ा-थोड़ा झुक जाते हैं और विवाद सुलझ जाता है। इससे समाज में आपसी सौहार्द, विनम्रता, मेलमिलाप और भाईचारा बढ़ता है। एक पंथ, दो काज हो जाते हैं। अदालतों का मनोरंजन भी हो जाता है और विवाद भी स्वतः सुलझ जाते हैं। लेकिन ध्यान रखना कि इन अदालतों के विरोध में कुछ भी कहा तो कहीं के नहीं रहोगे।
कार्यपालिका का तो कहना ही क्या। वे इस तंत्र के सबसे सरल सोपान हैं। कोई छिपाव नहीं। कोई हिप्पोक्रेसी नहीं। कोई ड्रामेबाज़ी नहीं। सीधी बात, पैसा है तो ठीक, वरना रगड़ दिए जाओगे। अब यह मत सोचने लगना कि कैसे रगड़ दिए जाओगे। शुरू से यही बात समझा रहा हूँ। पुलिसवाला नाराज़ हो गया तो किसी को भी, किसी भी समय चार-पाँच धाराएँ लगाकर धर लेगा। वे धाराएँ सही हैं या ग़लत -इसे सिद्ध करने के लिए अदालत जाना पड़ेगा। वहाँ चल रहे मनोरंजन कार्यक्रम में बीच-बीच में एकाध सीन आपका भी जुड़ जाएगा। उसमें न्याय तलाशने के लिए संविधान टटोलोगे तो अंत में यही ज्ञान होगा कि तंत्र से पंगा नहीं लेने का, वरना धरे जाओगे!
यही बात तो मैं समझा रहा हूँ। लेकिन किसको समझा रहा हूँ। उस जनता को, जो दस-पाँच हज़ार करोड़ के घोटाले को भ्रष्टाचार मानना बंद कर चुकी है। उस जनता को, जो तंत्र के किसी तिनके से पहचान निकलते ही ख़ुद भ्रष्टाचारी होने को तैयार बैठी है। उस जनता को, जो एप्रोच और रिश्वत की सरल राह पर चलने को धर्म मान बैठी है। उस जनता को, जो दो-चार मर्डर और एकाध बलात्कार करनेवाले को वोट दे आती है। उस जनता को, जो अपनी ख़ामोशी से राजनीति को शोषक, न्यायपालिका को अकर्मण्य और कार्यपालिका को भ्रष्ट होने के अवसर उपलब्ध कराती है।
और कौन समझा रहा है? मैं, जो इस कालखण्ड में अपनी समझ के अनुसार परत-दर-परत आकलन करने के बावजूद सम्पूर्ण क्रांति के एकमात्र उपाय की ओर इंगित करने से इसलिए बचता हूँ कि इस तंत्र से पंगा कौन ले!
हम निराशा के उस छोर को छू रहे हैं, जहाँ उम्मीदों की लाशें सड़ांध मारने लगी हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, दफ़्तर, चुनाव, कला, मीडिया, कृषि सब जगह माफ़िया काम कर रहा है। देश की जड़ों में जो घुन लगा है, वह भी अब भूखा मर रहा है। चीख़ने की ज़रूरत है और हम बोलने में भी हिचक रहे हैं।
इस तंत्र के कुछ ऐसे अंग हैं, जो गुप्त रूप से तंत्र में विद्यमान हैं। तंत्र के विविध रेशे अपनी सुविधा के अनुसार इन अंगों का उपभोग करते रहते हैं।
युवा इस बात से ख़ुश हैं कि ‘यूट्यूब पर फलाने बंदे की वीडियो देखकर मज़ा आता है, क्योंकि वो सबकी जमकर लेता है।’ जो जितना अश्लील, वह उतना हिट। और हम शालीनता के लबादे में अश्लील होने का अवसर तलाशते किंपुरुष।
युवा अबोध हैं, इसलिए बिना झिझके अश्लीलता को लाइक करते हैं। हम समझदार हैं इसलिए चोरी-छिपे मन ही मन लाइक करते हैं, पर बाहर से शालीन बने रहते हैं।
इस दोहरे चरित्र के साथ तन्त्रीय विफलताओं के इस शिकंजे को उखाड़ना असम्भव है। हम रोज़ ख़ुद से झूठ बोलते हैं कि सब सही हो जाएगा। क्योंकि ज्ञान हमें झूठ बोलना सिखाता है और व्यवहारिक ज्ञान हमें ख़ुद से झूठ बोलना सिखाता है।
✍️ चिराग़ जैन
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‘हुज़ूर पैदल चलते मजदूरों के लिए सरकारें क्या कर रही हैं?’
‘सरकारें मजदूरों की सहायता के लिए योजना बना रही हैं।’
‘लेकिन जब तक योजना बनेगी तब तक मजदूर कई योजन चल चुके होंगे।’
‘यह सब जनहित में किया जा रहा है। सरकारें जानती हैं कि मजदूरों का स्वस्थ रहना आवश्यक है। स्वस्थ रहने के लिए उचित पोषण की आवश्यकता होती है। मजदूर ड्राईफ्रूट खाएँ, दूध पीयें, फल-फ्रूट खाएँ, देसी घी के पराठें खाएँ ताकि उन्हें पोषण मिले। डॉक्टर कहते हैं कि इतना सब खाने के बाद उसे पचाने के लिए पैदल चलना चाहिए। इसलिए मजदूरों का पैदल चलना उनके हित में है।’
‘लेकिन हुजूर, मजदूरों को तो दो वक़्त की सूखी रोटी भी नसीब नहीं हो रही!’
‘ओफ्फो! यही समस्या है इस देश की। सब कुछ सरकार से चाहते हैं। अरे भाई, भोजन जुटाना जनता का काम है और उसे पचाना सरकारों का। सरकारें सिर्फ पचाना जानती हैं। जिसका जो काम है, उसे वही करने दो।’
‘हुज़ूर, लोग कह रहे हैं कि सरकार ने मजदूरों की सहायतार्थ बसें भेजने की प्रक्रिया में अड़ंगा लगाया है।’
‘यह सरासर ग़लत है। विपक्ष राजनीति करना चाहता है। वह ऑटो को बस बताकर जनता की आँखों में धूल झोंकना चाहता है। जब देश में एक चुनी हुई सरकार है, तो इस काम के लिए विपक्ष को मेहनत करने की क्या ज़रूरत है।’
‘लेकिन इन बसों से पैदल चलते मजदूरों को कुछ सहायता मिल सकती थी।’
‘देखो साहब! हमारा धर्म है कि सौ अपराधी छूट जाएँ लेकिन एक निर्दाेष को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए। इसी प्रकार हज़ार बसें खड़ी रह जाएँ तो स्वीकार कर सकते हैं लेकिन बसों के नाम पर ऑटो रिक्शा भेजकर भोले-भाले मजदूरों को छलने के विपक्षी मनसूबों को हम कभी सफल नहीं होने देंगे।’
‘लेकिन हुज़ूर…’
‘अब बस करो यार, सवाल पर सवाल ही पूछे जा रहे हो। सवाल न हुए कोरोना हो गया, रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। जिन मजदूरों को कोई नहीं पूछता था, आज वे टीवी पर दिख रहे हैं, यह विकास दिखता ही नहीं आपको। और फिर लोग घर बैठकर बोर हो रहे हैं, ऐसे में इन मजदूरों को खुले आसमान के नीचे साँस लेने का अवसर मिल रहा है… और क्या चाहिए। जाइये, चुपचाप इंटरव्यू छापिए, और हाँ छपवाने से पहले हमें दिखा लेना, कहीं अपनी मर्ज़ी से कुछ सच वगैरा लिखकर जनता को गुमराह न कर दो।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
एक राजा, एक रानी
कुछ वज़ीरों की कहानी
चंद घोड़े, चंद हाथी
बस यही है राजधानी
ऊँट रस्ता तक रहे, चुपचाप भादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
कोई मजबूरी जताकर मार डालोगे हमें तुम
कल बिसातों पर मगर फिर से सजा लोगे हमें तुम
दाँव पहला, हर दफ़ा हम ही चलेंगे खेल में पर
हम घिरे तो खेल से बाहर निकलोगे हमें तुम
जानते हैं रंग हम सबके लबादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
हाँ, ज़माने के लिए तुम हर तरह हम से बड़े हो
पर हक़ीक़त में हमारी ओट में दुबके पड़े हो
जंग के मैदान में दोनों तरफ़ से घिर गए हम
सामने दुश्मन खड़ा है, और पीछे तुम खड़े हो
वार सहना है हमें सबके इरादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
भूलना मत, हम नहीं हैं अब तुम अपने आसरे हो
भूलना मत, जिस जगह हम थे, वहाँ अब तुम धरे हो
भूलना मत ढाल तुमको, बोझ लगने लग गई थी
हम तुम्हारे मोहरे थे, तुम किसी के मोहरे हो
अब दिखेगा नूर सारे शाहज़ादों का
कौन पूछे हाल प्यादों का
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
लंका, इसलिए नष्ट हुई क्योंकि वहाँ लंकेश की आलोचना को अपराध माना गया और रामराज्य इसलिए ख्यात हुआ क्योंकि वहाँ आम धोबी को भी राजा के आचरण पर प्रश्न पूछने का अभय था।
पुराण साक्षी है, कि जब भी कोई विभीषण शत्रु का सहयोगी बना है तो इसके मूल में किसी रावण द्वारा किया गया तिरस्कार ही उत्तरदायी रहा है। पुराण साक्षी है, कि जब भी किसी बाली ने सुग्रीव को ऋष्यमूक पर्वत पर छिपने के लिए विवश किया है, तब बाली के भय से थरथराने वाला सुग्रीव ही बाली के विनाश का कारण बना है।
राजनीति को द्रोह और आलोचना के मध्य अंतर करने का विवेक होना चाहिए। आलोचना को सुनना और द्रोह को युक्तिपूर्वक अशक्त कर देना राजा का कर्तव्य है। साकेत में भी मंथरा थी, जिसका द्रोह सिद्ध भी था, तथापि रघुकुलवंशियों ने अपनी मर्यादा में रहते हुए उसको कथा से लुप्त कर दिया।
जब आपका आचरण मर्यादित होता है तो शत्रु का आत्मबल ध्वस्त हो जाता है। नैतिक बल से बड़ा कोई अस्त्र नहीं होता। पाण्डव युद्ध जीतकर भी श्रद्धेय न हो पाए, किन्तु राम को, उनके आचरण ने पूज्य बना दिया।
राम और रावण में मूल अंतर यही था कि रावण के शिविर में चाटुकारिता को साधुवाद मिलता था जबकि राम के शिविर में मन्त्रणा को सम्मान मिलता था। राम ने शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए शत्रु जैसा आचरण करना स्वीकार नहीं किया।
महाभारत में भी राजनीति की पाठशाला के ऐसे ही सहज अध्याय पढ़ने को मिलते हैं। पाण्डवों के दल में सबसे कटुवक्ता श्रीकृष्ण थे। वे पाण्डवों की नीतियों और योजनाओं की उन्मुक्त आलोचना करते थे, तथापि पाण्डवों के लिए वे सर्वदा स्तुत्य रहे। उधर कुरुसभा में कटुभाषण करनेवाले महात्मा विदुर सदैव हेय दृष्टि से देखे गए।
पुराण साक्षी है, जिस सभा में भीष्म और द्रोण, विदुर का हश्र देखकर मौन रह गए उस सभा का कोई महारथी जीता न रहा, जिस सभा में माल्यवान रावण के स्वर से ऊँची आवाज़ उठाने में चूक गए, उस सभा का कुलनाश हुआ है।
विभीषण के लिए यह कदापि शोभनीय नहीं है कि वह अपने राजा और कुनबे को विपत्ति में छोड़कर शत्रु से जा मिले, किन्तु रावण को भी यह समझना होगा कि विपत्ति के समय विभीषण सरीखे सत्यवक्ताओं के कटुभाषण की सर्वाधिक आवश्यता होती है।
सबसे सफल राजा वही है, जो राज्य को किसी और कि धरोहर मानकर राजकाज करे। यदि धृतराष्ट्र और पाण्डु दोनों ही राम और भरत से प्रेरणा लेकर हस्तिनापुर को किसी की धरोहर मान लेते तो कुरुवंश का नाश न हुआ होता।
पुराण साक्षी है कि जब धृतराष्ट्र नेत्रहीन हो तो उसे विदुर से विमुख नहीं होना चाहिए क्योंकि राजसभा में अपमानित होने की क़ीमत पर भी सत्य बोलनेवाले हितैषी बहुत भाग्य से मिलते हैं। यदि सत्य की परतें खोलकर प्रत्यक्ष की वास्तविकता दिखानेवाले विदुर का सम्मान करने से चूक जाएँ तो भी घटनाओं का यथावत वर्णन करनेवाले संजय का सम्मान करना तो सीख ही लें क्योंकि यदि संजय ने धृतराष्ट्र के मन-मुताबिक़ घटनाओं का वर्णन किया, तो हस्तिनापुर कभी न जान पाएगा कि कब उसकी महारानी नपूती हो गई है, और कैसे उसकी मेधा उसकी राजहठ के कारण शरशैया पर जा लेटी है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Lapete Mein Netaji, Prose, Quotation
एक वर्ग है जो दीवार के पीछे बनी झुग्गियों पर प्रश्न पूछना चाहता है। दूसरा वर्ग है, जो झुग्गियों के आगे बनी दीवार को विकास समझ कर झुग्गी के प्रश्न पूछने वालों को राष्ट्रद्रोही कह रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Donald Trump’s India Visit