Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
आज जोधपुर कोर्ट ने दो दो मुजरिम एक साथ बरी किये। पहला, जनाब सलमान खान साहब, जिन्होंने दो चिंकारा मार दिए थे। दूसरा इंसाफ़, जो दशकों से अदालतों की चौखट पर उम्मीद का दीया जलाए बैठा था।
सलमान की रिहाई से यह सबक मिलता है कि क़ानून की आँखों पर बंधी काली पट्टी एक्चुअली काले धन की कोटिंग है।
कुछ भी हो, लेकिन हमारे न्यायलय ने ‘समानता के अधिकार’ का सम्मान करते हुए फुटपाथ पर मरने वालों और काले हिरणों को समान दृष्टिकोण से देखा है।
बड़ा उछल रहा था रजनीकांत कि उसकी फ़िल्म जब रिलीज़ होती है तो छुट्टी घोषित हो जाती है। ज़्यादा मत उछल बे, कहीं सलमान ने देख लिया तो काला हिरण समझ कर मार देगा।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
आज सुबह टेलीविज़न बुलेटिन ने बताया कि एक जज साहब जनता के आक्रोश के शिकार हुए और भीड़ ने उन्हें सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर मारा। मुआमला सिर्फ इतना था कि जज साहब की इगो को इस बात से ठेस पहुंची कि एक ट्रक ड्राईवर ने उनको ओवरटेक करने के लिए साइड नहीं दी। ट्रक ड्राईवर जैसे तुच्छ प्राणी की इस बदतमीज़ी से हिज़ हाइनेस क्रोधित हो गए और उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी गाडी फ़िल्मी स्टाइल में ट्रक के आगे अड़ा दी। सड़क पर अचानक लगी इस अदालत का ट्रक वाला अंदाज़ा नहीं लगा सका और उसका फुटपाथी ट्रक जज साहब की आलिशान गाड़ी से जा टकराया। टक्कर से उत्पन्न हुए मोमेंटम ने गाड़ी को डिवाइडर की ओर धकेल दिया जहाँ एक बच्चा जज साहब की इगो के नीचे कुचला गया।
यह घटना अनेक प्रश्न खड़े करती है। चूँकि प्रश्न हमारी न्याय प्रणाली को कठघरे में खड़ा करते हैं, इसलिए मैं उनके उठने से पूर्व ही बिना शर्त मुआफ़ी मांग रहा हूँ। हमारे न्याय के मंदिरों में जिन लोगों को न्यायाधीश बनाकर अनेकानेक विशेषाधिकार दिए गए हैं; उनके व्यक्तिगत अहंकार, सर्वोपरि होने की उनकी भावना, अवमानना जैसा अस्त्र क्या वास्तव में आवश्यक हैं?
प्रश्न यह भी है कि उन्हीं गवाहों, उन्हीं सबूतों और उन्हीं कानूनों के तहत निचली अदालत में किसी को दोषी ठहराया जाता है, जिनके आधार पर ऊंची अदालत उसे निर्दोष साबित कर देती है; तब क्या निचली अदालत ने न्यायाधीश के विरुद्ध गलत फैसला देने के अपराध में कोई कार्रवाई होती है?
क्या इस न्याय प्रणाली ने कुछ हम-तुम जैसे सामान्य मानवों को नियामक बनाकर स्वयं को भगवान मान लेने की ग़लतफ़हमी के बीज नहीं बोए हैं? क्या अहम् और आत्ममुग्धता की ज़मीन पर उगने वाली वल्लरियों के पर्णों को संविधान की ऊँगली थाम कर न्याय के कंगूरों तक पहुँचना स्वीकार होता होगा? जो जज साहब ट्रक वाले के साइड न देने पर आपा खो सकते हैं, वे मुजरिम या मुलाजिम द्वारा सलाम न किये जाने पर क्या कुछ नहीं कर सकते!
प्रश्न यह भी है कि एक आम आदमी न्याय प्रक्रिया और अदालती माहौल पर विमर्श करने की सोचे तो इसमें अदालत की अवमानना कैसे हो सकती है? हिंदी फिल्मों ने कई दशकों तक अदालती प्रक्रियाओं को पैसे के कोठे पर मुजरा करते दिखाया है। दामिनी, इंसाफ का तराजू, आखिरी रास्ता, अदालत, जॉली एलएलबी, मेहंदी, मेरा साया और मेरी जंग जैसी तमाम फिल्मों ने वकीलों और जजों की लापरवाही व भ्रष्टाचार के अनगिनत उदाहरण पेश किये हैं। फिर किसी लेखक द्वारा इस प्रक्रिया की समालोचना को अपराध कैसे ठहराया जा सकता है।
पहली बार किसी लेख में पाठकों से जानना चाहता हूँ कि क्या आपको अदालत और अदालती लोगों पर एक स्वतन्त्र विमर्श की आवश्यकता महसूस नहीं होती?
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
हर बार इन्हें मुफ्त के सपने न दिखा तू
इक बाद बदल डाल ये किस्मत का लिखा तू
ये मुफ्तख़ोरी देश को बर्बाद न कर दे
ऐ राजनीति इनको कमाना भी सिखा तू
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
कल NDTV पर दिल्ली के मुख्यमंत्री जी का साक्षत्कार सुना। “आनंद आ गया” नही कह सकता क्योंकि भाजपाई नाराज़ हो जाएंगे; “सन्न रह गया” भी नहीं कह सकता क्योंकि आपिये नाराज़ हो जाएंगे। थोड़ी देर के लिये कांग्रेसी हो जाता हूँ और माथे पर त्यौरियाँ लिये मद्धम मुस्कान के साथ कहता हूँ – “ये क्या था?”
मुख्यमंत्री जी की भाषा सुनकर क्षोभ ने सिर उठाया, लेकिन मेरे भीतर के आम आदमी ने उसे दबा दिया। जब उन्होंने देश के वित्तमंत्री के लिये भीख मांगने जैसा मुहावरा प्रयोग किया तो भीतर का राष्ट्रवादी उग्र हुआ, लेकिन कॉमन मैन उस पर हावी रहा। जब मुख्यमंत्री जी ने सीबीआई को चैलेंज किया तो न्याय व्यवस्था में विश्वास रखने वाला भारतीय उठ खड़ा हुआ, लेकिन सीबीआई को तोता कहे जाने वाले उद्धरणों की याद दिलाकर मेरे भीतर के तार्किक ने उसे वापस बैठा दिया। उन्होंने एलजी के लिये तू-तड़ाक की भाषा प्रयोग की। मेरा संवैधानिक भारतीय आहत हुआ, लेकिन तुरंत उस शाश्वत वाक्य ने मुझे पेन किलर दी कि- ये बड़े लोगों के चोंचले हैं, मैं इसमें कर भी क्या सकता हूँ।” मुख्यमंत्री जी ने मीडिया को पक्षपाती कहा, मुझे बुरा लगा लेकिन ये सोच कर चुप रह गया कि जब बरखा दत्त कुछ नहीं बोल रहीं तो मुझे क्या।
बरखा जी ने उनसे लालू-नीतिश के समर्थन पर प्रश्न किया, बरखा जी ने उनसे मानहानि के मुक़द्दमे पर प्रश्न किया, वे बात को गोल कर गए। बरखा जी ने कहा भी कि अब आप जवाब नहीं दे रहे हैं, वे मुस्कुराते रहे। बीच-बीच में खांसकर भी उन्होंने महत्वपूर्ण प्रश्नों से ध्यान हटाया। उन्होंने अज्ञात सूत्रों के हवाले से कई ग़ैर-ज़िम्मेदाराना आरोप कई ज़िम्मेदार लोगों पर लगाए। उन्होंने यहाँ तक कहा कि एक पत्रकार के बेटे का लिस्ट में नाम डालने के लिये पत्रकार की बीवी को एक रात बुलाने का एसएमएस भेजा गया। इतने संगीन आयोग पर तो मैं मानो तमतमा उठा, लेकिन आक्रोश के इस अंगारे को जब देश भर के नपुंसक मौन की बर्फ़ ने घेर लिया तो वह भी राख के एक ढेर में तब्दील होकर रह गया।
उन्होंने ढीठताई से ख़ुद को पाक-साफ़ और बाक़ी सबको चोर कहा। मुझे शर्म आई। लेकिन सालों से मीडिया में चलते आ रहे प्राइम टाइम बुलेटिन मेरे सामने आकर खड़े हो गए और शर्म से झुकी मेरी पलकें वापस बेशर्मी के साथ टीवी की ओर देखने लगीं।
इसके बाद कुछ विज्ञापन आए। विज्ञापनों ने बढ़ती हुई रक्तचाप को सामान्य किया। फिर साक्षात्कार जारी हुआ। फिर बीपी हाई होने लगा, लेकिन फिर विज्ञापन आ गए। पूरा साक्षात्कार देखने के बाद, ब्लड प्रेशर के मीटर में हाई और लो के बीच झूलते झूलते अंततः विज्ञापनों को धन्यवाद देते हुए मैं चादर तान कर सो गया। सुबह उठा तो दिन सामान्य था। बीपी नापा तो वह भी सामान्य था। उत्सुक होकर एनडीटीवी लगाया तो उस पर विज्ञापन चल रहे थे। सब कुछ सामान्य है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
विश्व योग दिवस की शुभकामनाएँ। योग पूरी दुनिया में नए आयामों को खोल रहा है किन्तु फिर भी योग के जितने आयामों से हमने पटाक्षेप किया है उसका कोई मुक़ाबला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर देश भर में अनेक कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं। एक बड़ा तबका इन कार्यक्रमों में योगाभ्यास ही करने जाता है। लेकिन उन लोगों के लिये भी इन कार्यक्रमों की उपयोगिता है जिन्हें योगाभ्यास से कोई सरोकार नहीं है।
विपक्ष इन कार्यक्रमों से दूर रहकर अपने हठयोग का प्रदर्शन करता है। अनेक छुटभैये इन कार्यक्रमों में अपना ‘राजयोग’ तलाशने जाते हैं। पार्क में जब कोई ख़ूबसूरत लड़की वज्रासन और पादहस्तासन करती है तो कई युवक वहाँ खड़े-खड़े ‘ताड़ासन’ करते पाए जाते हैं। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि कई एकड़ में फैले पार्क में योगिणियों के आसपास की वायु में ऐसा क्या विशेष होता है कि पूरे पार्क के साधक वहीं साधना करने को लालायित रहते हैं।
सवेरे पार्क में तो योगाभ्यास होता ही है, हम तो सामान्य जीवन में भी योग को छोड़ नहीं पाते। हमारी संसद में पूरे साल जिस मुद्दे पर सरकार अनुलोम करती है, विपक्ष उस पर विलोम कर रहा होता है। सरकारी दफ़्तरों में काम करने के नाम पर बाबू लोग योगनिद्रा में चले जाते हैं। थाने में रपट लिखाने जाओ तो पुलिसवाले ‘उष्ट्रासन’ करते मिलते हैं। आध्यात्मिक गुरुओं ने सिद्धासन लगाया और गहन साधना से कई एकड़ जमीनें हथिया लीं। बिल्डर्स ‘काकी मुद्रा’ और ‘शीतली प्राणायाम’ करके निवेशकों की गाढ़ी कमाई गड़प कर गए।
अफसर लोग टेबल के नीचे हाथ फैलाकर ‘भ्रष्टासन’ कर रहे हैं और ठेकेदार ये सन्देश दे रहे हैं कि यदि सही तरीके से अपने हाथों से दूसरों के पैर पकड़ लिए जाएँ तो पाचन शक्ति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि सीमेंट और लोहा भी पचाया जा सकता है। न्याय प्रक्रिया सात दशक से शिथिलासन का अभ्यास कर रही है। पत्रकारिता नॉन स्टॉप कपालभाति कर रही है। उनकी उच्छवास की गति इतनी तेज़ है कि लाख कोशिशों के बावजूद उनके कपाल में कुछ घुसता ही नहीं।
इस देश का सामान्य नागरिक भी अनवरत योगाभ्यास करता है। सुबह उठते ही वह उकड़ू बैठ कर योगाभ्यास करना शुरू करता है, उसके बाद दिन भर शीर्षासन, उत्तानपादासन, उपवास और वैवश्याभ्यास करते हुए उसका ‘ध्यान’ दो रोटियों पर केंद्रित हो जाता है। वह सरकार और व्यवस्था की ओर अपेक्षा की दृष्टि से ‘त्राटक’ करता है और तंत्र उससे नज़र बचाते हुए अपने कानों में अंगूठे घुसाता है और आँखों पर उँगलियाँ रखकर मुंह से घूँ-घूँ की ध्वनि निकालने लगता है।
✍️ चिराग़ जैन