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अहिंसा

बारूदों के ढेर पर दुनिया खड़ी है देखो
ज़ख़्मों का एक ही इलाज है अहिंसा
धाँय-धाँय, धड़-धड़, धूम-धूम की ध्वनि में
वीणा के सुरों-सा एक साज है अहिंसा
तोप-टैंक-बम-परमाणुओं की कुण्डली में
साढ़ेसाती जैसी एक गाज है अहिंसा
ऐरों-गैरों-नत्थूखैरों-कायरों का काम नहीं
वीर-महावीरों की आवाज़ है अहिंसा
✍️ चिराग़ जैन

सरस्वती वंदना

हम सरिता सम बन जाएँ
कविता-सरगम-ताल-राग के सागर में खो जाएँ

सात सुरों के रंगमहल में साधक बनकर घूमंे
नयनों से मलहार बहे माँ, दादर पर मन झूमे
भोर भैरवी संग बिताएँ, सांझहु दीपक गाएँ
हम सरिता सम बन जाएँ

हे वीणा की धरिणी, हमको वीणामयी बना दो
ज्ञानरूपिणी मेरे मन में ज्ञान की ज्योत जगा दो
कण्ठासन पर आन विराजो इतना ही वर चाहें
हम सरिता सम बन जाएँ

✍️ चिराग़ जैन

महावीर वंदना

महावीर स्वामी बनें तेरे अनुगामी; सारी
दुनिया के प्र्राणी नाथ ऐसा वर दीजिए
बंद हो समर बहे प्रेम-निर्झर; मिटे
चेहरों से डर कुछ ऐसा कर दीजिए
आसुरी प्र्रयास पर बाँसुरी विजयी बने
अधरों पे मीठी मुस्कान धर दीजिए
पाँच अणुव्रत, दश धर्मों की गूँज उठे
भारत को फिर से महान कर दीजिए

त्रिशला के लाल तेरा कैसा है कमाल; नहीं
तन पे रुमाल फिर भी तू महाराज है
जीत लिया काल, काट कर्मों का जाल; नोच
दिए सब बाल तेरे वीरता के काज हैं
तप का धमाल तेरे त्याग का धमाल; तेरी
सधी हुई चाल तेरा दुनिया पे राज है
धरती निहाल तो पे आसमां निहाल; सारी
जगती निहाल तू त्रिलोक सरताज है
✍️ चिराग़ जैन

जैन

राष्ट्र के निमित्त बलिदान कैसे करते हैं
भामाशाह वाली वो कहानी मत भूलना
आस्था के बल से जो कर्मों से जीत गई
महासती मैना जैसी रानी मत भूलना
सत्य के लिए जिन्होंने प्राण तक त्याग दिए
अकलंक जैसे महादानी मत भूलना
राजुल ने जहाँ धोई मेहंदी सुहागवाली
गिरनार का वो लाल पानी मत भूलना

जियो और जीने दो की बात करते हैं हम
कहीं और ऐसा उपदेश नहीं मिलता
मृत्यु के क्षणों को भी महोत्सव-सा मानते हैं
धरती पे ऐसा परिवेश नहीं मिलता
सारा सुख-वैभव जो जीत के भी त्याग आये
ऐसा कोई और गोमटेश नहीं मिलता
तप-त्याग से यहाँ परमपद मिलते हैं
हाथी-घोड़े वालों को प्रवेश नहीं मिलता

पंथ हैं अनेक जिनमत में भले ही पर
मोक्षमार्ग वाला सुविचार बस एक है
सैंकड़ों हों वाद औ विवाद किंतु सत्य है कि
अहिंसा पे सबका विचार बस एक है
मान्यताएं सबकी भले हीं हों विभिन्न किन्तु
पाँच पदवाला नवकार बस एक है
कैसे नरकों से निर्वाण पहुँचेगा जीव
पूरे जिन-आगम का सार बस एक है

जैन वो नहीं कि बस नाम में लिखा हो जैन
जैन वो है जिसके विचार जैन हो गए
जाति भले कोई भी हो, आप जैन ही रहेंगे
आत्मा के यदि संस्कार जैन हो गए
जीवदया और शाकाहार के हैं प्रतिबिंब
सत्य औ अहिंसा के आधार जैन हो गए
किन्तु मातृभूमि पे पड़ा है कभी संकट तो
ख़ुशी-ख़ुशी राष्ट्र पे निसार जैन हो गए
✍️ चिराग़ जैन

सरस्वती वन्दना

वरदान दे दे मुझे छंद-गीत-कविता का,
वाग्देवी तेरा उपकार मांगता हूँ मैं
रंग-ओ-तरंग तेरे संग से मिलेगा मुझे,
जीवन में तेरे सुविचार मांगता हूँ मैं
मृदु-सौम्य-भावपूर्ण वाणी बोलने के लिए
वाणी तेरे सभ्य-संस्कार मांगता हूँ मैं
वाणी का वरद् सुत बन के जिऊँ मैं यहाँ,
हंसवाहिनी ये अधिकार मांगता हूँ मैं

शारदे, दे ऐसा वरदान कि मुखर करे
पीड़ितों के दिल की पुकार मेरी कविता
जहाँ सच मौन की घुटन में सिसकता हो,
वहाँ बन जाए ललकार मेरी कविता
यौवनों में डोले बन प्यार मेरी कविता; औ
पीढ़ियों में घोले संस्कार मेरी कविता
निराशा औ तेजहीनता की सूखी धरती पे
बने आशाओं की जलधार मेरी कविता

✍️ चिराग़ जैन

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