Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
अब उनका इंतज़ार छोड़ भी दो शानो तुम
ख़ुदकुशी कर लो कहीं अब मिरे अरमानो तुम
जुबां से कुछ न कहूँगा कभी, ये जानो तुम
जो हो सके तो मेरी ख़ामुशी पहचानो तुम
अब अपने बीच नहीं है वो मरासिम क़ायम
कि ख़ुद को मेरी उदासी की वजह मानो तुम
कभी तो दुनिया से मतलबपरस्ती भी सीखो
सदा दीवाने ही रहोगे क्या दीवानो तुम
किसी ‘चिराग़’ को जलने नहीं देना हरगिज़
नहीं तो जान गँवा बैठोगे परवानो तुम
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
बचपन में हमें सुनाई गई दादी-नानी की कहानियों में दोस्ती को कभी अच्छी नज़र से देखने की परम्परा नहीं रही। यदि कभी किसी कहानी ने बन्दर और मगरमच्छ में दोस्ती करवाई भी तो उसके सद्भाव को अंततः मगरमच्छ की धूर्तता के हलक़ में उतर जाना पड़ा। एकाध बार शेर और चूहे की असंभव दोस्ती की कहानियाँ सुनाई गईं तो उसको भी स्वार्थ के जाल में बांधकर भौंथरा कर दिया गया। सारस और लोमड़ी की दोस्ती हुई तो सारस की बुद्धिमत्ता का ढोल पीटने के लिए दोस्ती की खीर में नींबू निचुड़वा दिया। हंस और केकड़े की दोस्ती केकड़े की प्रवृत्तियों की भेंट चढ़ गई। कुल मिलाकर बचपन से ही हमारे अवचेतन में ‘दोस्ती-वोस्ती कुछ नहीं होती’ जैसे वाक्य रोंप दिए जाते हैं।
इसके बावजूद हमने ‘कोई जब राह न पाए, तो हरदम साथ निभाए, तेरी दोस्ती तेरा प्यार’ जैसे फ़िल्मी झाँसों में फँसकर कुछ दोस्त बना लिए और उनके साथ धरम-वीर जैसा रिश्ता भी क़ायम कर लिया। लेकिन अवचेतन में पड़े बचपन के बीजों ने जय-बीरू की दोस्ती को राजेश्वर और वीरसिंह की दुश्मनी में तब्दील करके एक-दूसरे की जान का सौदागर बना डाला।
किस्से-कहानियों और फिल्मों से विरक्त होकर धर्मग्रन्थ उठाए तो पता चला कि मनसुखा और कृष्ण जैसे निश्छल सम्बन्ध बचपन में बन जाते हैं जो ‘भाई नी है’ जैसे अजेय मन्त्रों के सहारे निस्पृहता का यज्ञ संपन्न कर लेते हैं। लेकिन किशोरावस्था आते-आते व्यक्तिगत हित इतनी वरीयता तो पा ही लेते हैं कि दाँत किटकिटाने का बहाना बनाकर दोस्त के हिस्से के चने खा जाने में लज्जा आनी बंद हो जाती है। बचपन की इन्हीं ग़लतियों के परिणामस्वरूप गृहस्थी की विपन्नता के बावजूद संपन्न मित्र से सहायता मांगने में संकोच उत्पन्न होने लगता है।
कर्ण और दुर्याेधन की दोस्ती में कुछ गहराई दिखी तो उनका रिश्ता समर्पण की इस सीमा तक चला गया कि एक-दूसरे को सत्पथ पर लाने की बजाय एक-दूसरे के निर्णय का सम्मान करते हुए विनाश के चौबारे तक चले आए। अश्वत्थामा ने अपने प्रतिशोध को दुर्याेधन की मित्रता के रथ पर चढ़ाकर शिशुघात तक का महापाप कर डाला।
मानस् के महानायक ने निषादराज, सुग्रीव, विभीषण जैसे अनेक मित्र बनाए; लेकिन कूटनीति के झरोखे से झाँकने पर ज्ञात होता है कि ये सभी मित्र बनाए हुए मित्र थे, बने हुए नहीं। यह सोद्देश्य मित्रता थी, निस्पृहता का भाव यहाँ आया भी, तो सशंक।
कुल मिलाकर, दोस्ती के नाम पर हमें जो भी रिश्ते मिलते हैं, उन सबके आधार को हमारे अवचेतन में पड़ी कहानियों, पौराणिक सन्दर्भों और सिनेमा की प्रतिच्छाया ने जर्जर किया हुआ है।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
साहब जी, बिहार में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
गाय का मुद्दा खड़ा करो।
ओके साहब।
साहब जी, दिल्ली में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
फ्री वाई-फाई बांटने का प्रचार करो।
ओके साहब।
साहब जी, पंजाब में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
ड्रग्स की समस्या को भड़का दो।
ओके साहब।
साहब जी, यूपी में चुनाव होने वाला है, क्या करें?
दलितों के शोषण की घटनाओं को हवा दो।
ओके साहब।
सारे चुनाव हो गए साहब, अब क्या करें।
अब आराम से सो जाओ।
लेकिन साहब जनता की सेवा कब करेंगे?
नींद पूरी होने के बाद।
ओके साहब।
साहब वो बिहार वाली गाय रंभा रही है, नींद में खलल पड़ रहा है।
उसे वाई फाई की आदत डाल दो, इंटरनेट पर व्यस्त हो जाएगी।
लेकिन साहब वाई फाई तो मिला ही नहीं।
तो उसे ड्रग्स की लत लगा दो।
लेकिन साहब ड्रग्स तो हमने चुनाव में बाँट दी।
तो उसे दलितों के यहाँ बाँध आओ, लेकिन मुझे सोने दो।
ओके साहब।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
जो लोग इस देश में व्यवस्था की शिक़ायत करते नहीं थकते, मैं उन्हें साफ़-साफ़ कह देना चाहता हूँ कि इस देश की व्यवस्था पूरी तरह कला और साहित्य के पक्ष में है। यह व्यवस्था की ही मेहरबानी है कि हमारी हर फ़िल्म, हर उपन्यास, हर कहानी और हर व्यंग्य कविता कालजयी हो जाती है। सुधारवादी और विकासवादी व्यवस्थाओं में इसकी संभावना शून्यप्रायः होती है।
अंग्रेजी में कोई लेखक यदि अपने समाज में व्याप्त किसी समस्या पर कहानी लिख दे, तो सरकार तुरंत उस समस्या को ठीक करने में लग जाती है और समस्या के ठीक होते ही वह कहानी सन्दर्भविहीन होकर काल के गाल में समा जाती है। हमारे देश में साहित्य के साथ ऐसा दुर्व्यवहार न हो, इसीलिए हमने एक ऐसे सिस्टम को बढ़ावा दिया है जिसमें कोई भी लेखक किसी भी समस्या पर अपनी क़लम चलाए तो कम से कम अपने जीते जी वह उस कृति को मरते हुए न देखे।
पुलिसिया भ्रष्टाचार को समाप्त करना हमारे लिए बाएँ हाथ का काम है। सरकार आज चाहे तो अपने पुलिस महकमे को बोल सकती है कि अब हमारा पेट भर गया है और घर भी। हमारे पास रिश्वत की कमीशन का धन रखने को तिल भर भी स्थान शेष नहीं है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए कृपया सभी पुलिसवाले सुधर जाएँ और जनता को प्रताड़ित करना बंद करके जनता की सेवा हेतु समर्पित हो जाएँ। …कितना आसान तरीक़ा है। लेकिन सरकार ऐसा करती नहीं है। क्योंकि कुछ लाख रुपये की कमीशन के बोझ से अपना पीछा छुड़ाकर वह अमूल्य साहित्य की हत्या नहीं कर सकती। इसलिए हमारी ब्यूरोक्रेसी और राजनीति अपने घरों में, दीवारों में, नींव में, छतों पर और यहाँ तक कि टॉयलेट में भी धन भरे जा रहे हैं, लेकिन साहित्य की अविरल धारा पर आँच नहीं आने दे रहे।
ज़रा सोचो, यदि पुलिस-वकील-अदालतें और सरकारी दफ्तर सुधरकर जनता की सेवा में जुट गए, तो मुंशी प्रेमचंद, सआदत अली मंटो, मोहन राकेश, महाश्वेता देवी और ऐसे ही हज़ारों लोगों को ऊपर जाकर क्या मुँह दिखाएंगे इस देश के कर्णधार? यदि भारत पुनः सोने की चिड़िया बन गया तो भारतेंदु की ‘भारत दुर्दशा’ की क्या दुर्गति होवेगी। यदि घरेलू हिंसा में लड़कियों का मारा जाना बंद हो गया तो निराला की ‘सरोज स्मृति’ पढ़कर किसे सिहरन होगी। यदि मुसलमानों का जीवन स्तर पूरी तरह से विकास के पथ पर बढ़ निकले तो राही मासूम रज़ा का ‘आधा गाँव’ किस मुहर्रम में जाकर अपना ताज़िया निकालेगा। यदि हिन्दू मान्यताओं में बढ़ते आडम्बर को समाप्त कर दिया गया तो गाय की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करता होरी, प्रेमचंद की खिल्ली नहीं उड़ाएगा!
साहित्य और कला के प्रति अनुराग ने हमारी व्यवस्था को न कभी बदलने के लिए प्रेरित होने दिया, और न ही कभी किसी प्रकार के भ्रष्टाचरण पर शर्म महसूस होने दी। इससे एक लाभ और है कि हमें अपनी बात में कविता और शेर उद्धृत करने के लिए हर दो साल बाद किताबें नहीं पलटनी पड़तीं। चार-पाँच शेर याद करके ख़ुद पर ‘हाज़िरजवाबी’ का तमगा लगवाने की सुविधा इसी व्यवस्था ने हमें दी है। कुछ लोग तो दुष्यंत के एक शेर के भरोसे पूरा जीवन बिता लेते हैं-
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो
सब जानते हैं कि अव्वल तो कोई पत्थर उछालनेवाला ही नहीं है और अगर कहीं उछल भी गया तो मुल्क़ की तबीयत इतनी ख़राब कर के छोड़ दी गई है कि कोई भी उछला हुआ पत्थर उछालनेवाले की ख़ुद की खोपड़ी में सूराख़ करने से अधिक कमाल नहीं दिखा सकता।
अंत में, दुष्यंत कुमार का एक ऐसा ही शेर मैं भी उद्धृत कर देता हूँ, जिससे इस देश के सत्तर प्रतिशत चिंतित लेख पिछले तीस साल से प्रारम्भ या अंत करते रहे हैं-
हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
आज जोधपुर कोर्ट ने दो दो मुजरिम एक साथ बरी किये। पहला, जनाब सलमान खान साहब, जिन्होंने दो चिंकारा मार दिए थे। दूसरा इंसाफ़, जो दशकों से अदालतों की चौखट पर उम्मीद का दीया जलाए बैठा था।
सलमान की रिहाई से यह सबक मिलता है कि क़ानून की आँखों पर बंधी काली पट्टी एक्चुअली काले धन की कोटिंग है।
कुछ भी हो, लेकिन हमारे न्यायलय ने ‘समानता के अधिकार’ का सम्मान करते हुए फुटपाथ पर मरने वालों और काले हिरणों को समान दृष्टिकोण से देखा है।
बड़ा उछल रहा था रजनीकांत कि उसकी फ़िल्म जब रिलीज़ होती है तो छुट्टी घोषित हो जाती है। ज़्यादा मत उछल बे, कहीं सलमान ने देख लिया तो काला हिरण समझ कर मार देगा।
✍️ चिराग़ जैन