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इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

कुर्सी के लिए क़ौम की परवाह उड़ा दो
नारों की आंधियों में हर इक आह उड़ा दो
लफ़्ज़ों की आग से भी न गर मुल्क जले तो
इंसानियत के क़त्ल की अफ़वाह उड़ा दो

✍️ चिराग़ जैन

सद्भाव की ख़ुशबू

भारत का भविष्य न तो उन अराजकों से प्रश्न पूछेगा, जो बंदूकें लहराते हुए ‘हीरो’ बनने का सपना पाल रहे हैं; न ही उन छुटभैये लीडरों से सवाल करने जाएगा, जो दंगे भड़काकर राष्ट्रीय टेलिविज़न की सुखिऱ्यों में दर्ज होने का ख़्वाब देख रहे हैं। आनेवाली पीढ़ियों के सामने यदि सामाजिक विद्वेष की कहानी का कोई भी पन्ना फड़फड़ाया तो वह काग़ज़ का एक टुकड़ा उस महान संस्कृति के लिए कठघरा बन जाएगा, जो स्वयं के विश्वगुरु होने का दम भरती है।
जो लोग इन दंगों में मारे गए हैं, उनके वंशजों को जब भारतीय संस्कृति की महानता की कहानी पढ़ाई जाएगी तब उनकी आँखों में घृणा मिश्रित आश्चर्य दहक उठेगा। फिर उसी घृणा को आधार बनाकर तब के राजनैतिक मनसूबे साधे जाएंगे। जब कोई हमें वर्तमान की स्थितियों पर उकसाने में सफल नहीं हो पाता तब वह इतिहास का ही कोई पन्ना फाड़कर हवाओं में उस पर दर्ज नफ़रतों का धुआँ घोलने लगता है।
जातीय विद्वेष की वर्तमान स्थिति इस अभ्यास का प्रमाण है। पीढ़ियों पहले किसी वर्ग विशेष द्वारा किसी व्यक्ति विशेष पर किया गया अन्याय आज जातीय घृणा की प्राणवायु बन गया है। शम्बूक के वंशजों को यह बताया जाता है कि देखो तुम्हारे पुरखे के साथ कितना अन्याय किया गया। और राम के वंशजों को यह बताया जाता है कि तुम्हारे पुरखों ने शबरी और निषाद को गले लगाया फिर भी इन लोगों को संतोष नहीं मिलता। ये पन्ने लहरानेवाले उनसे ज़्यादा ख़तरनाक़ हैं, जो सड़क पर बंदूक लहरा रहे हैं।
इसीलिए भविष्य बंदूकों से नहीं, पन्नों से पृष्ठ पूछेगा। जिन्होंने बंदूक उठा ली, जिन्होंने पत्थर फेंके, जिन्होंने आग लगाई और जिन्होंने लूटपाट की वे सब आज नहीं तो कल पकड़े जाएंगे, आज नहीं तो कल मर जाएंगे। उनके प्रति किसी के मन में कोई दया भी नहीं होगी। उनके पक्ष में भी कोई खड़ा न होगा। लेकिन जिन्होंने बंदूक उठवाई, जिन्होंने घृणा से भरे लेख लिखे, जिन्होंने आग में घी डाला, जिन्होंने नफ़रत के पन्ने लहराए उन सबकी बातें कभी नहीं मरेंगी। उन सबके शब्द हमेशा वातावरण में मंडराते रहेंगे।
भूखे से रोटी छीनना तो अपराध है लेकिन भूखे के सामने रोटी का गुणगान करना पाप है। क़ानून केवल अपराध का दंड देता है लेकिन पाप का दंड पीढ़ियों को भुगतना पड़ता है। जब समुंदर उफ़ान पर हो तब उसमें और पानी डालनेवालों को भी उतना ही ख़तरा होता है, जितना उसमें से पानी निकालने वालों को। जब कोई मुद्दा गर्म हो तब उसके पक्ष में बोलना भी उतना ही नुकसानदायी है जितना उसके विरोध में बोलना। कई बार मौन से स्थितियाँ आसान हो जाती हैं। अराजकता का उद्देश्य होता है कि वह ध्यान आकर्षण करे। यदि उस पर ध्यान दिया जाए या उस पर चर्चा की जाए तो वह प्रोत्साहित होती है।
हमें सोशल मीडिया और न्यूज़ मीडिया को सकारात्मकता की ख़बरों से पाटने की ज़रूरत है। हमें अपनी हर पोस्ट से यह संदेश देना होगा कि चर्चाओं में रहना है तो बुराई का रास्ता छोड़ना होगा। मांग कोई भी हो, अगर उसको कहने का सलीका विधि-सम्मत नहीं होगा तो उसे अखबारों में नहीं छापा जाएगा। उपद्रव के समाधान हेतु सरकारी तंत्र तो सक्रिय होगा लेकिन मीडिया उसके समाचारों की पल-पल रिपोर्टिंग करके उसे प्रोत्साहित नहीं करेगा। हमारे व्हाट्सएप्प से कोई भी ऐसा समाचार प्रसारित नहीं होगा जो किसी उपद्रव का प्रचार करता हो। ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा’ – यह डायलॉग उनकी सोच को संचालित करता है, तो हम उनका ज़िक्र करना छोड़ दें। जिसकी चर्चा करना छोड़ दो वह हमारे मस्तिष्क से बाहर हो जाता है।
हमें इन नकारात्मकताओं को इतिहास से बाहर करना है तो इसके लिए पहला क़दम यही होगा कि इन्हें चर्चाओं से बाहर किया जाए। यदि इनकी चर्चा बन्द हो गई तो वे मनसूबे भी मर जाएंगे जो इन लपटों पर अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकना चाहते हैं, और वे कुंठाएँ भी मर जाएंगी जो पीढ़ियों पहले हुई किसी घटना की टीस से वर्तमान को सड़कों पर नंगा करने में जुटी हैं। फिर भविष्य के पास इतिहास को कोई सफ़हा उड़ता हुआ पहुँचेगा तो उससे सद्भाव की ख़ुशबू आएगी, पथराव की दुर्गंध नहीं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Delhi Riots

अवसरवादी देशभक्ति

राजधानी दिल्ली का एक क्षेत्र विशेष दंगों की चपेट में है और मीडिया ट्रम्प की यात्रा का इंच-इंच कवर कर रहा है। सरकार मेहमाननवाज़ी में व्यस्त है और घर में भाण्डे बज रहे हैं। सीएए का विरोध या समर्थन दो दिन बाद भी किया जा सकता है यार! हद्द हो गई। क्या हम इतने भी सभ्य नहीं रह गए हैं कि किसी मेहमान के सामने ‘झूठा ही सही’ लेकिन सद्भाव का परिचय दे सकें।
कभी-कभी आश्चर्य होता है। आखि़र किस समाज के लिए यह राजनेता अपना जीवन न्यौछावर करने पर अड़े हैं! हम सुरक्षा में लगे पुलिसवालों को गोली मारेंगे, फिर यह भी चाहेंगे कि कोई हमें नक्सली न कहे। हम धर्म की टोपी पहनकर पत्थरबाज़ी करेंगे और फिर यह चाहेंगे कि हमारे धर्म को आतंकवादी न कहा जाए। शर्म आनी चाहिए। जहालत की भी कोई सीमा होती है।
मोदी जी को यह चिंता है कि दिल्ली के स्कूलों की प्रदर्शनी हो तो दिल्ली के मुख्यमंत्री वहाँ न हों। दिल्ली के मुख्यमंत्री इस बात से ख़ुश हैं कि अमरीकी दूतावास ने यह घोषणा कर दी है कि मुख्यमंत्री की उपस्थिति पर अमरीकी प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं थी, यह आपकी आंतरिक राजनीति के कारण हुआ है। क्या कर रहे हो भाई! हम हर पल गिरते जा रहे हैं। मोदी विरोधी इस बात पर चुटकुले बना रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री के मुँह से डोनाल्ड की जगह ‘दोलाण्ड’ निकल गया। भाजपाई यह बता रहे हैं कि ट्रम्प भारत इसलिए आए हैं क्योंकि मोदी की तूती बोल रही है। कोई इस बात पर जुमलेबाज़ी कर रहा है कि ट्रम्प ने पाकिस्तान को दोस्त बताकर भारत की डिप्लोमेसी के मुँह पर तमाचा मार दिया। कोई यह सिद्ध करने पर उतारू है कि ट्रम्प ने आतंकवाद ख़त्म करने की बात करके पाकिस्तान की इज़्ज़त उतार दी। …क्या है यह सब।
भारतीय समाज भयंकर संकटों से जूझ रहा है। एक वर्ग विशेष सरकारी राजहठ से लोहा लिए बैठा है। राजा बालहठ को झुकाने पर अड़ा हुआ है। जनता में साम्प्रदायिक विद्वेष बढ़ता जा रहा है। राजनैतिक चर्चाएँ दुश्मनी का सबब बनती जा रही हैं।
समाज भक्तों और चमचों में बँटा जा रहा है। ‘भारत माता की जय’ का सर्वग्राह्य उद्घोष एक राजनैतिक दल की बपौती हो चला है। समाज का सौहार्द बिगाड़ने के लिए धर्म, सम्प्रदाय और जातियाँ पहले से ही विद्यमान थीं; अब पार्टी भी आग में घी का काम कर रही है। कांग्रेसी लोग, मोदी समर्थकों को मूढ़ मान चुके हैं और मोदी समर्थकों ने मोदी विरोधियों को ग़द्दार मान लिया है।
कोई शाहीन बाग़ जाकर ख़ुद को रामभक्त बताता है और बिना लाइसेंस की बंदूक से गोली दाग देता है। कोई महिला कॉलेज में घुसकर हस्तमैथुन करता मिलता है। कोई पत्थरबाज़ी के बीच पुलिस पर गोली चला देता है। आखि़र कर क्या रहे हैं हम? यह भयावह वर्तमान भविष्य के प्रति प्रश्नचिन्ह खड़े करने लगा है।
एक सरकार कार्यविहीन योजना में समय नष्ट करती रही, दूसरी सरकार योजनविहीन कार्यों में पूंजी लुटा रही है। मीडिया अमरीका के चिड़ियाघर में जन्मे भालू के बच्चे दिखाकर टीआरपी बटोर रहा है और न्यायपालिका तारीखें बढ़ाकर अपनी नौकरी बचाए रखने में दक्ष हो गई है। कार्यपालिका कभी पैसा खाने में व्यस्त है तो कभी गोली खाने को मजबूर।
समान नागरिक आचार संहिता की बात करो तो उनको आपत्ति है जो धर्म की आड़ में संविधान के नियमों का मज़ाक़ बनाए जा रहे हैं। समान नागरिक आचार संहिता की बात न करो तो वे बौखलाते हैं जो संविधान की आड़ में एक धर्म विशेष को अपना वोटर बनाए रखना चाहते हैं।
सरकार और तंत्र को गाली देनेवाले लोग ट्रैफिक नियमों को भी मानने को तैयार नहीं हैं। सब, ख़ुद को छोड़कर बाक़ी सबको अपराधी सिद्ध करने पर तुले हैं। हर दुर्भाग्यपूर्ण घटना में कवि अपने लिए तालियाँ बटोर रहा है, पत्रकार अपने लिए टीआरपी तलाश रहा है, राजनीति वोट तलाश रही है और कार्यपालिका अवसर!
कुछ लोग अराजकता के समर्थन में केवल इसलिए हैं क्योंकि वह अराजकता मोदी के खि़लाफ़ बढ़ रही है। कुछ लोग अराजकता के विरोध में केवल इसीलिए हैं कि इससे मोदी जी को चुनाव में फ़ायदा मिलेगा और हमें मोदीवादी होने का अवसर। संविधान, जनहित, नैतिकता, मनुष्यता और सभ्यता जैसे शब्द बेमआनी हो गए हैं और हम रवीश बनाम सुधीर चौधरी में बँटते-बँटते असभ्यता के शिखर की ओर अग्रसर हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Donald Trump’s India visit and Delhi Riots

सच और विकास के बीच दीवार

एक वर्ग है जो दीवार के पीछे बनी झुग्गियों पर प्रश्न पूछना चाहता है। दूसरा वर्ग है, जो झुग्गियों के आगे बनी दीवार को विकास समझ कर झुग्गी के प्रश्न पूछने वालों को राष्ट्रद्रोही कह रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Donald Trump’s India Visit

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