Blank Verse, Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
फट गया कलेजा धरती का
आकाश हिला दिग्गज डोले
ममता की कोरें बिलख उठीं
पत्थर पिघले, पर्वत बोले
फिर क्यों ऐसा कुछ नहीं हुआ
जो हवस की तंद्रा तोड़ सके
ऐसी आंधी क्यों नहीं उठी
जो वहशत को झखझोर सके
मजबूर पिता की चीखों से
अम्बर तक चोट हुई होगी
लाचार बिलखती बेटी जब
बर्बर ने हाय छुई होगी
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
भीषण हुंकार हुआ होता
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
कैसा संहार हुआ होता
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
वहशत की लाश पड़ी होती
उस क्षण रस्सी खुल जाती तो
ताण्डव की एक घड़ी होती
वह क्रुद्ध पिता उस इक पल में
उन सबकी बलि चढ़ा देता
वह क्रुद्ध पिता उस इक क्षण में
सारा ब्रह्माण्ड हिला देता
उसने अरदास लगाई थी
पर हाय विधाता सोता था
और वो रस्सी से बंधा हुआ
बस फूट फूट कर रोता था
उसकी पत्नी, उसकी बेटी
वहशत से रौंदी जाती थी
उसकी रग-रग में ज्वाला की
बिजली सी कौंधी आती थी
उस माँ की पीड़ा कौन कहे
जो ख़ुद वहशत की ज़द में थी
और उसकी छोटी सी बेटी
बर्बरता की सरहद में थी
उसकी पीड़ा लिखना चाहूँ
तो शब्द गौण हो जाते हैं
भाषा हिचकी भर रोती है
व्याकरण मौन हो जाते हैं
यह वह क्षण था जिसको सहना
मानव के वश का रोग नहीं
यह वह क्षण था जिसका जग की
सारी पीड़ा से जोग नहीं
यह वह क्षण था जिसको लखकर
खुद काल आत्महत्या करता
यह वह क्षण था जिसको सुनकर
ईश्वर भी लज्जा से मरता
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ
धरती अब तक जस की तस है
अख़बार टीस से रंगे मगर
मजबूरी अब तक बेबस है
इस घटना से ज़्यादा बर्बर
इस पर हो रही सियासत है
इस घटना से ज़्यादा बर्बर
सब सह लेने की आदत है
जिनने मानवता जर्जर की
वे तो समाज की व्याधि हैं
लेकिन जो अब ख़ामोश रहे
वे भी समान अपराधी हैं
इतनी दहशत आवश्यक है
वहशत इज़्ज़त से दूर रहे
बेटी-बहनें घर से निकलें
तो हिम्मत से भरपूर रहें
वहशी ने आँख उठाई तो
गर्दनें छाँट दी जाएंगी
इज़्ज़त को हाथ लगाया तो
बोटियाँ काट दी जाएंगी
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
रे बुलंदशहर!
इतनी बुलंदी तैने कहाँ से पाई कि अपनी बेटी के बलात्कार को अपनी आँखों से देखने वाले बाप की चीत्कार से तेरा कलेजा नहीं काँपा। उस माँ की चीख तुझे सुनाई नहीं दी जिसे समझ नहीं आ रहा था कि अपनी देह पर लिपटे दरिंदों की आँखें पहले फोडूं या अपनी 13 साल की बेटी के जिस्म पर टूटते दुःशासनों की छाती पहले फाडूँ।
इस घटना को पढ़ने के बाद सिहर कर अपनी बिटिया को गले लगा लेने वाले हर पिता को सड़क पर उतर कर व्यवस्था से प्रश्न करना चाहिए कि सिर्फ स्वार्थी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले इस तंत्र ने हमें क्या दिया है। हर माँ को व्यवस्था की गिरेबान पकड़ कर पूछना चाहिए कि जनता को सिर्फ वोट समझने वाले इस सिस्टम ने हमारी मेहनत की कमाई किन अय्याशियों पर खर्च की है? हर बेटी को मंत्रियो के कुर्ते खींच कर पूछना चाहिए कि अंकल बलात्कार किसे कहते हैं?
थाने में जाते हुए हम डरते हैं, अदालत के नाम से हमारी रूह कांपती है। ये कौन सा लोकतंत्र है भाई? ये किस व्यवस्था की जकड ने हमें नपुंसक बना दिया है। ऐसे तंत्र के खिलाफ सड़क पर उतरना यदि अराजकता है तो एक बार इस मुल्क की जनता को अराजक होकर भी देख लेना चाहिए।
ये अराजक लोग, कम से कम उस 13 साल की बच्ची से आँख तो मिला सकेंगे जिसे रौंदकर हवस मिटाने वाले लोग हमारी ही टेक्स की दौलत से चल रहे सिस्टम से डरना भूल गए हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Free Verse, Poetry
साफ़-साफ़ बात सुन लो जी
ये दुनिया
हम मर्दों की बपौती है
इसमें रहना है
तो रहना ही होगा
हमारी शर्तों पर।
हमने कई तरह से चाहा
तुम्हें कहना
लेकिन तुम हो
कि सुनती ही नहीं हो
हमने नियम बनाए
ताकि तुम समझ सको
अपनी सीमाएँ!
हमने बातें बनाईं
ताकि तुम डर सको
बदनामी से!
हमने प्रथाएँ बनाईं
ताकि तुम
व्यस्त रह सको
उनके निर्वाह में!
हमें अच्छी नहीं लगती
मर्दाना कामकाज में
तुम्हारी दखलंदाज़ी।
तुम हो ही क्या
पुरुष की
मजबूरी और कमज़ोरी के सिवाय!
बेचारा अभिमन्यु
मारा गया
सिर्फ़ तुम्हारे कारण
तुम्हें मालूम होना चाहिए था
कि औरत का काम है
जागते रहना
पुरुष की सुविधा के लिए।
महाभारत के
महाविनाश की वजह
तुम
तुम्हें जानना चाहिए था
कि औरत बनी ही भोग के लिए है
उसको पचा लेना चाहिए
बड़े से बड़ा अभिमान
अपने भीतर।
लंका जैसी नगरी के
रक्तरंजन का कारण तुम।
तुम्हें पता होना चाहिए था
कि औरत के लिए
सर्वथा अनुचित है
किसी लक्ष्मण द्वारा खींची
मर्यादा रेखा का उल्लंघन।
बड़ी विदुषि बनी फिरती हो
पहचान नहीं सकती थी
साधु के वेश में खड़े रावण को
और गौतम के वेश में खड़े इन्द्र को
…थोड़ा ढँक-ओढ़ के नहीं रह सकती
ज़रूरी है अपने सौंदर्य का ढिंढोरा पीटना
आग को देखेगा
तो घी तो पिघलेगा ही
फिर दोष मंढ़ोगी पुरुष के सिर
उल्टा चोर कोतवाल को डाँटे।
समझ लो साफ-साफ
ये दुनिया हमारी है
इसमें रहना है
तो हमारे मुताबिक़ रहो
वरना
तुम्हारे लिए
दुनिया में एंट्री बैन!
✍️ चिराग़ जैन