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दुर्बुद्धि

दुर्योधन को समझाने वाले उस युग के सर्वाधिक प्रज्ञाशील लोग थे। स्वयम् श्रीकृष्ण, महात्मा विदुर, गंगापुत्र भीष्म, आचार्य द्रोण, कृपाचार्य और गांधारी जैसी मेधाओं का समवेत प्रयास भी उस एक युवक को हठ त्यागने के लिए राजी न कर सके। इसी प्रकार केकैयी को समझाने वालों में महाराज दशरथ, कौशल्या, आर्यसुमंत, महर्षि वशिष्ठ, धर्म प्रतीक भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न और श्रीराम जैसी प्रखर प्रतिभाएँ थीं। रावण को सद्बुद्धि देने के लिए विभीषण, सुमाली, कैकसी, कुम्भकर्ण, मेघनाद, अंगद, मंदोदरी, सीता, सुलोचना और हनुमान जैसे विद्वानों ने हर संभव प्रयास किया किन्तु निष्फल रहे।
एक शकुनि, एक मंथरा या एक शूर्पणखा की दुर्बुद्धि, दर्जनों सद्बुद्धियों से अधिक प्रभावी सिद्ध होती है। दुर्योधन को अपनी भूल तब समझ आई जब वह मरणासन्न था। केकैयी को अपनी ग़लती का एहसास जब हुआ तब तक उल्लास के रंगों को वैधव्य के श्वेत परिधानों से ढँका जा चुका था। रावण जब तक संभला तब तक वह अपने कुल का घात करवा कर धराशायी हो चुका था।
कुज्ञान कानों के मार्ग से बुद्धि में प्रवेश करता है किन्तु सद्ज्ञान को हासिल करने के लिए कई जीवन अर्पित करने पड़ते हैं।
यह भी सत्य है कि कोई शूर्पणखा, कोई केकैयी या कोई दुर्योधन यदि हठ पकड़ ले तो न केवल अपनी बल्कि अपने आभामंडल और आसपास के प्रत्येक व्यक्ति का जीवन नर्क बना देती है।
समझ तो नहीं आता, लेकिन यह सत्य है कि साफ़ सुथरा जीवन जीने के लिए अपने इर्द-गिर्द नकारात्मक ऊर्जा से संचालित होने वाला एक भी व्यक्ति चुनौती बन सकता है।

✍️ चिराग़ जैन

हर ख़ुशी वनवास में है

कोई तो मंथरा रनिवास में है
अवध की हर ख़ुशी वनवास में है

अवध वालो हृदय को वज्र कर लो
कोई पत्थर छुअन की आस में है

कोई हठ पर अड़ा कोई नियम पर
मगर दशरथ गहन संत्रास में है

विवादों में तो कठिनाई बहुत है
क्या उससे भी अधिक उल्लास में है

दिलों में राम बसते हैं हमारे
मगर रावण हमारी श्वास में है

✍️ चिराग़ जैन

वक़्त की सरहदें

प्यार ने लांघ दीं वक़्त की सरहदें
और सारे नियम देखते रह गए
इश्क़ हम पर ठहाके लगाता रहा
हम मुहब्बत के ग़म देखते रह गए

लोक-परलोक की धारणा से परे
शबरियों की प्रतीक्षा अटल ही रही
लोग कहते हैं राधा वियोगिन बनी
कृष्ण से पूछिये वो सफल ही रही
प्रेम से मृत्यु का भय पराजित हुआ
स्तब्ध से मौन यम देखते रह गए

एक कच्चे घड़े पर भरोसा किए
सोहनी तेज़ धारा में ग़ुम हो गई
कैस दर-दर भटकता रहा उम्र भर
और लैला सहारा में ग़ुम हो गई
रूह का आसमां में मिलन हो गया
जिस्म धरती पे हम देखते रह गए

कोई तो इस ज़माने को समझाइये
क़ायदे बावरों को सिखाता रहा
जो दीवाने हुए प्रेम के पान से
उनको विष के पियाले पिलाता रहा
प्रेम विषपान करके अमर हो गया
सारे ज़ुल्मो-सितम देखते रह गए

✍️ चिराग़ जैन

शिखरों का निर्माण

सिद्धांतों की बलिवेदी पर, अपनापन बलिदान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लंका हो या अवधपुरी हो, सब ही ने ली अग्निपरीक्षा
धोबी के आक्षेपों की भी, मन में कर ली स्वयं समीक्षा
नष्ट सभी ने सीताओं का, सारा सुख-सौभाग किया है
रावण ने अपहरण किया था, राघव ने परित्याग किया है
जो मर्यादित थे उनका भी, पल में अलग विधान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

मथुरा जाने के निर्णय में, राधा की स्वीकृति भी थी क्या
राजपथों पर बढ़ते पग ने, पगडण्डी की पीर सुनी क्या
कौरव, पाण्डव, शकुनी, गीता, नगरी स्वर्ग लजाने वाली
याद नहीं आई पल भर भी, वो पगली बरसाने वाली
उदय किसी का तब ही संभव, जब कोई अवसान हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

लक्ष्मण ने निजधर्म निभाया, उर्मिल भीतर-भीतर रोई
घिरा इधर अभिमन्यु अगर तो, उधर उत्तरा सिसकी कोई
गौतम की कुण्ठा को झेले एक अहिल्या पत्थर बनकर
रजवाड़ों की आन बचाई, पद्मिनियों ने जौहर रचकर
आधारों पर पैर टिकाकर, शिखरों का निर्माण हुआ है
पीड़ा भोगी और किसी ने, कोई और महान हुआ है

✍️ चिराग़ जैन

प्रतिशोध

ओ धोबी
सच बताना
क्या तुम्हारे पुरखे भी गए थे
राम के पीछे-पीछे
विह्वल होकर
वनवास की हठ लिए

या फिर
तुम ही चले आए थे
राम के पीछे-पीछे
लंका से
प्रतिशोध लेने

© चिराग़ जैन

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