Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
कहते हैं इतिहास स्वयं को दोहराता है, लेकिन पिछले दिनों विद्वानों की इस चिर-परिचित सूक्ति को ताक पर रखकर, आध्यात्म ने स्वयं को दोहरा दिया। आध्यात्म की इस उद्दण्डता पर सारा साहित्य-जगत सकते में है।
हुआ यूं कि जम्बूद्वीपे भारतखण्डे दिल्लीनाम्निनगरे पीएमहाउसे (वाल्मिकी रामायण से साभार) दो पवनपुत्रियां संध्याकाल के अंतिम क्षणों में प्रधानमंत्री निवास में घुसकर उसी प्रकार ‘बिना कुछ बांका करवाए’ वापस निकल आईं ज्यों त्रेतायुग में पवनपुत्र हनुमान अपनी विलक्षण प्रतिभा के दम पर सुरसा महामाई के मुख में प्रवेश कर ‘बाल बांका करवाए बगैर’ ससम्मान बाहर निकल आए थे।
बजरंग बली के इस करतब से प्रसन्न होकर सुरसा ने न केवल उनकी पीठ थपथपाई बल्कि उन्हें लंका जाने का शाॅर्टकट भी बताया। (स्थानाभाव के कारण मैं इस घटना को एक पंक्ति में निपटा रहा हूँ, लेकिन तुलसीदास जी ने हनुमान जी के सूक्ष्मरूप की विशाल पीठ की इस थपथपाहट को 10-12 चैपाइयों में अभिव्यक्त किया है।)
कलयुग वाली स्टोरी लाइन भी ठीक-ठाक चल रही थी। सौंदर्य के विमान पर सवार हो, आकाशीय चुंबन उछालतीं हुईं, पवनपुत्रियां सुरक्षा एजंसियों के जबड़े में घुसकर बिना किसी दांत या जीभ के स्पर्श हुए रेसकोर्स रोड पर उतर आई थीं। सुरक्षा एजंसियों के सामने धर्मसंकट था कि वे चुंबन संभालें या सुरक्षा। लेकिन ज्यों ही इस दुविधा को त्याग तुलसीदास जी के कथनानुसार सुरसा…. मेरा मतलब है सुरक्षा एजंसियां इस कौतुक से इम्प्रेस होने को तैयार हुईं तभी उनकी नज़र सागर के जल में पड़ रही ‘सत्यानाश खड्ग’ की परछाई पर पड़ी। मुड़कर देखा तो मीडियासुर हाथ में खड्ग थामे ‘कैमरा दृष्टि’ से पूरे घटनाक्रम पर पैनी नज़र गड़ाए खड़ा था।
यह मीडियासुर त्रेता-युग का वही परमवीर असुर कुम्भकर्ण है, जिसने उस युग में सो-सोकर अपनी नींद का कोटा पूरा कर लिया था। अब वह मीडिया के रूप में पैदा हुआ है और सबकी नींदें हराम करने पर तुला है। इसको ब्रह्मा जी ने ‘टी.आर.पी.अस्त्र’ और ‘स्टिंग चक्र’ वरदान में दिए थे, लेकिन इस दुष्ट ने इनको गलाकर इनकी धातु से ‘सत्यानाश खड्ग’ बना ली।
इस दैत्य के भय से बहुत से फिल्म अभिनेताओं-अभिनेत्रियांे, सुरक्षा कर्मियों, घूसप्रेमियों, रघुवंशियों, दुकानदारों, सेल्समैनों, प्रेमियों, सोर्सलैस अफसरों और ऋषि मुनियों को अनिद्रा का महारोग हो गया है। इस रोग से मुक्ति पाने के लिए ये सब दुखी जन ‘सतर्कता’ की टैबलेट खा रहे हैं और ‘भरोसे’ से परहेज कर रहे हैं। राजनीति को इस दैत्य से कोई भय नहीं है। उसने बचपन में ही कानून देवता की तपस्या करके ‘जुगाड़ास्त्र’ प्राप्त कर लिया था।
बहरहाल, इस असुर के आतंक से कलयुग की इस महान रामायण के उक्त एपिसोड की स्टोरी लाइन में काफी परिवर्तन करना पड़ा। इस बार सुरसा स्वयं पवनपुत्रियों को ब्रह्मपाश में बांधकर लाई और लंकेश के सामने पेश किया। उनके इस उपद्रव से कुपित होकर उनके धर्मपिता पवनदेव ने उनकी पवनवेग से उड़ने की शक्तियां छीन लीं। आजकल पवन पुत्रियां ‘बेसहारा’ हैं, लेकिन अपनी प्रतिभा और आधारभूत शक्तियों के दम पर वे लंकेश के चंगुल से निकलकर मीडियासुर के महल में आ पहुंचीं।
मीडियासुर के विनम्र अनुमोदन पर उन्होंने कुछ समय तक वहां रहना स्वीकार कर लिया है। अब वे ग्लैमर-महल की तमाम वाटिकाओं में घूम-फिर रहीं हैं। महाकवि तुलसीदास जी जीवित होते तो इस सिचुएशन पर लिखते-
पीएम के घर कार घुसाई, निसदिन हर चैनल पर छाई।
तुम उपकार मीडियाहिं कीन्हा, कौतुक करके स्टोरी दीन्हा।
दुर्गम काज ‘लश्कर’ के जेते, सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम धनवान काहू को डर ना।
पुलिस-वुलिस निकट नहीं आवै, सोनाटा जब कार दिखावै।
दाईं आंख से प्रेस रिझाई, बाईं आंख से पुलिस छकाई।
जो निसदिन तव न्यूज़ दिखाई, सो अच्छी टी.आर.पी.पाई।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
सच के मंतर से सियासत का ज़हर काट दिया
हाँ, ज़रा रास्ता मुश्क़िल था, मगर काट दिया
वक्ते-रुख़सत तिरी ऑंखों की तरफ़ देखा था
फिर तो बस तेरे तख़य्युल में सफ़र काट दिया
फिर से कल रात मिरी मुफ़लिसी के ख़ंज़र ने
मिरे बच्चों की तमन्नाओं का पर काट दिया
सिर्फ़ शोपीस से कमरे को सजाने के लिए
हाय ख़ुदगर्ज़ ने खरगोश का सर काट दिया
एक छोटा-सा दिठौना मिरे माथे पे लगा
बद्दुआओं का मिरी माँ ने असर काट दिया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
हर नई रुत के साथ पलटेगी
ख़ुश्बू-ए-क़ायनात पलटेगी
ये सियासत है इस सियासत में
एक प्यादे से मात पलटेगी
किसकी बातों का क्या यक़ीन करें
पीठ पलटेगी, बात पलटेगी
रंग परछाई तक का बदलेगा
सुब्ह होगी तो रात पलटेगी
तुम सँभलकर बस अपनी चाल चलो
इक न इक दिन बिसात पलटेगी
वक़्त जब-जब भी करवटें लेगा
ज़िन्दगी साथ-साथ पलटेगी
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Hasya Kavita, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जंगल के सभागार में
बहुत बड़ा आयोजन हुआ
जिसमें सर्वप्रथम
भारत माँ के चित्र के सम्मुख
दीप-प्रज्वलन
और फिर
मेंढ़क जी का स्वागत भाषण हुआ।
भाषण में
अजीव ‘प्वाइंट ऑफ व्यू’ था
भाषण का सार कुछ यूँ था-
“भैंसा दल के अध्यक्ष
श्री कालूूप्रसाद जी!
टबासीन मछलियो!
रंग-बिरंगी तितलियो!
खूँटों से बंधी गायो!
और अन्य देशभक्त चौपायो!
हम लोग
लम्बे समय से
देश की ख़ातिर
प्राण न्योछावर करते रहे हैं
विदेशियों की थालियों में सजने के लिये
मरते रहे हैं।
जितना अधिक हमारा मांस
विदेशी भट्ठियों में चढ़ता है
उतना ही हमारे वित्तभण्डार में
विदेशी धन बढ़ता है।
इस तरह
हम अपने देश के वित्त का
पोषण कर रहे हैं
देश की प्रगति की राह पर
सूखे पत्तों की तरह
झर रहे हैं।
लेकिन पिछले दिनों
‘बाज तक’ चैनल का
एक संवाददाता बता रहा था
कि देश के वित्तमंत्री ने
संसद में गहरी चिंता जतायी है
क्योंकि विदेशों से आनेवाली
भारतीय पशुओं की मांग में
भारी कमी आयी है।
भाइयो,
इस समस्या को लेकर
सभी देशभक्त पशु चिंतित हैं
आज सदन में
इस समस्या के निदानार्थ
आपके विचार आमंत्रित हैं।”
अब महान वैज्ञानिक
मुर्गा जी ने बताया,
“सभी पशुओं के मांस का
क्वालिटी टेस्ट
हमारी लेबोरेट्री में करवाया गया है
लेकिन हमारी
और हमारे पूर्वजों की गुणवत्ता में
कोई अन्तर नहीं पाया गया है।
महोदय,
मेंढ़कों के पैर के जालों में
फर पशुओं की खालों में
मछलियों के तेल में
मंकियों की टेल में
चिड़िया की जीभवाली ट्रीट में
और हम मुर्गों के मीट में
आज भी वही स्वाद है
श्रीमान्
मुझे तो लगता है
इस सारे षड्यंत्र में
पड़ोसी गधों का हाथ है।”
इतना सुनकर
श्रीमती मछली
टब में से उछली
टेबल पर रखे गिलास में डोली
और अन्दर की बात बोली-
“मान्यवर
हमारी गुप्तचर एजेंसियों ने
इस समस्या का
सही कारण ढूंढ़ निकाला है
दरअस्ल, विदेशियों ने
अपने जीने का ढंग बदल डाला है
ख़बर मिली है
कि कृष्ण की गायों का मांस खानेवाले विदेशी
अब कृष्ण के पुजारी बन गये हैं
और इस प्रकार
सभ्य संस्कारों के सच्चे अधिकारी बन गये हैं।
जब से उन्होंने
सूती धोती
और काठ-खड़ाऊ को अपनाया है
तब से चमड़े और फ़र को
हाथ भी नहीं लगाया है।
अब उन्हें केवल शाकाहारी व्यंजन भाते हैं
और तो और
अब वे पढ़े-लिखे लोग
इलाज भी
भारतीय चिकित्सा पद्धतियों से ही करवाते हैं।
श्रीमान्
आजकल पश्चिम के जंगल में
अजीब-सी ख़ुमारी है
यहाँ तक कि इराक़ का नाश्ता
और अफ़गानी लंच करनेवाले
अमरीकी भेड़िये भी शाकाहारी हैं।”
यह सब सुनकर
गौमाता ने प्रश्न उठाया-
“यदि सभी विदेशी लोग
भारतीय सभ्यता का अनुसरण कर रहे हैं
तो फिर हम पशुगण
थोड़ी संख्या में भी क्यों मर रहे हैं?”
अब भैंसादल के अध्यक्ष
कालूप्रसाद जी ने शंका-निवारण किया
और गाय के प्रश्न का
बेहद तर्कपूर्ण उत्तर दिया-
“ईका कारण
हमका एही समझ में आया है
कि भारतवासियों ने
पाश्चात्यता के संदर्भ में
अपना
अतिथिसत्कार-धर्म निभाया है
ए ही कारण
घर से बेघर हुई
पाश्चात्यता को
अपने घर में ला बसाया है
जब से ई संस्कृतिवा का
आयात-निर्यात हुआ है
तब से ही
ई देसवा की धरती पर
जुरदार कुठाराघात हुआ है
जब भारत की सड़कों पर
नंगेपन और हिंसा से भरी
पाश्चात्यता का
भद्दा रंग दिखने लगा है
और चाहिए तो
हमरे साथी दल से पूछ न लीजियेगा
कि ई विदेसवा का
रिजेक्टेड माल
भारत में धड़ल्ले से बिकने लगा है।”
यह सब सुनकर
पीछे रखी
भारत माँ की तस्वीर से
ख़ून के आँसू बहने लगे
और दबी आवाज़ में
चीख-चीखकर कहने लगे-
“ऐ भारत के लोगो,
मेरी संस्कृति का ऐसा विस्तार न करो
ग़ैरों को शरण देने के लिये
अपनों का तिरस्कार न करो।
यदि तुम अपनी सभ्यता से बिछड़ जाओगे
तो ध्यान रखना विकास की होड़ में
बुरी तरह पिछड़ जाओगे।
यदि अमर होना चाहते हो
सफलता की सेज पर सोना चाहते हो
तो अपनी ओर लौट आओ
क्योंकि सभी जानते हैं
कि संस्कृति का मानस
अपमान का तमाचा नहीं सह सकता है
ठीक ही तो है
जो बाप को बाप न कहे
वो पड़ोसी को चाचा कैसे कह सकता है।“
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
सूर्य जब-जब ले के अंगड़ाई उठा
पूजने सब चल पड़े थाली उठा
मुस्कुराकर आपने देखा मुझे
और कुछ ऐसा हुआ मैं जी उठा
क्या पता किस चांद के दीदार को
कब लहर की शक्ल में पानी उठा
सांझ ढलते ही हुआ सूरज निढाल
चांद पीकर रोशनी उसकी उठा
सोच अपनी सोच को कुछ इस तरह
लफ़्ज़ से हटकर नए मानी उठा
या तो तू सबकी तरह से बात कर
या फिर अपनी बात से आंधी उठा
✍️ चिराग़ जैन