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बेताल पचीसी

पत्रकारिता, सम्राट विक्रम की तरह राजनीति के बेताल को अपनी पीठ पर लादकर, जनमत की यज्ञशाला तक ले आने में समर्थ थी।
जब भी पत्रकारिता, राजनीति को वश में करके यज्ञशाला की ओर चलती, तो बेताल किसी अनावश्यक कहानी में उसे उलझा देता था। भ्रमित विक्रम, यज्ञशाला का लक्ष्य भूलकर कहानी के समाधान में भटक जाता। ज़रा-सी चूक होते ही बेताल हाथ से निकल जाता था और विक्रम देखता रह जाता था।
एक दिन विक्रम ने साधु के हाथ-पैर बांधकर उसे ही पीठ पर लाद लिया। थोड़ी दूर चलते ही बेताल ने दूर बैठकर एक कहानी शुरू की और फिर कहानी बीच में छोड़कर भाग गया।
विक्रम ने साधु को रास्ते में पटका और कहानी पूरी करने निकल गया। इससे पहले कि कहानी पूरी हो, बेताल फिर से कोई नई कहानी उसके हाथ में थमाकर भाग निकला।
अब, साधु बीच रास्ते में बंधा हुआ कराह रहा है। यज्ञशाला पर बेताल ने कब्ज़ा कर लिया है। और विक्रम बेचारा, रोज़ एक कहानी को अधूरा छोड़कर, नई कहानी को पूरा करने में व्यस्त है।

✍️ चिराग़ जैन

भीड़ हैं हम

हमने ऐसी हर कोशिश को नाकाम कर दिया, जिसने हमें ‘भीड़’ से ‘जनता’ बनाना चाहा। हमें भीड़ बने रहना पसंद है। हम भीड़ बनकर जीते हैं और भीड़ बनकर मर भी जाते हैं। इसीलिए हमारे अख़बारों की सुखिऱ्याँ हमारा नाम नहीं जानतीं। कभी यात्री, कभी श्रद्धालु, कभी किसान, कभी तीर्थयात्री, कभी विद्यार्थी, कभी मज़दूर, कभी आदिवासी और कभी पुलिसवाले बनकर हम मर जाते हैं; हमारा कोई नाम नहीं होता। हमें एक ‘भीड़’ के नाम से जाना जाता है।
अपराधियों के नाम होते हैं, लेकिन निरपराध का कोई नाम नहीं होता। अपराध तो छोड़िए साहब, हम शहर में गाड़ी लेकर निकलते हैं, कहीं किसी कारणवश गाड़ी सड़क के किनारे रोकते हैं तो पुलिसवाला हमें भीड़ की तरह यह कहकर खदेड़ देता है, ‘यहाँ गाड़ी खड़ी करना मना है’। हम पूछते हैं, ‘तो फिर कहाँ खड़ी करें?’
इस प्रश्न का उत्तर उसके पास नहीं होता। वह डाँट देता है, ‘यहाँ से आगे ले बे!’ हम आगे ले लेते हैं।
हमारे तंत्र ने जिन देशों की सड़कों के किनारे से ‘नो पार्किंग’ का डिज़ाइन टीपा है, उन देशों से हम व्यवस्थित पार्किंग सिस्टम की कॉपी करना भूल गए।
विश्व समुदाय भी हमें कोई विश्वगुरु नहीं मानता, उनके लिए भी हम केवल एक भीड़ हैं। एक भीड़, जिसे अपना माल बेचा जा सकता है। एक भीड़ जिसे सपने बेचे जा सकते हैं।
शुरुआत में राजनीति भी हमें ‘जनता’ कहकर ही संबोधित करती है लेकिन अंततः वह हमें ‘भीड़’ की तरह इस्तेमाल करती है। जिस मंच से वह हमें जनता कहकर हमसे वोट मांग रहे होते हैं, उसी मंच की रिपोर्टिंग में हमें भीड़ कहा जा रहा होता है और हम तालियाँ पीट रहे होते हैं।
अगर कहीं जनता के लिए राजनीति के हाथों कुछ हितकर्म हो भी जाए, तो हम भीड़ बनकर उस विकास की ऐसी धज्जियाँ उड़ाते हैं कि राजनीति को अपने किए पर क्रोध आने लगता है। फिर वह हमें साम्प्रदायिक भीड़ में बदल देती है, फिर वह हमें जातियों की भीड़ में बदल देती है। हम ख़ुशी-खुशी भीड़ बन जाते हैं और दूसरी भीड़ के विरुद्ध गालियाँ तलाशने लगते हैं।
हमें भीड़ बनकर लड़ने की आदत हो गई है। हमें जैसे ही कोई साइनबोर्ड मिलता है, हम तुरंत उसके नीचे भीड़ बनकर जुटने लगते हैं। ‘गांधी’; ‘लोहिया’; ‘अम्बेडकर’; ‘हेडगेवार’; ‘कांशीराम’; ‘जयप्रकाश’; ‘मोरारजी’; ‘वीपी सिंह’; ‘मुलायम’; ‘माया’; ‘जयललिता’; ‘करुणानिधि’; ‘ठाकरे’; ‘अन्ना’; ‘केजरीवाल’; ‘मोदी’; ‘राहुल’; ‘ओवैसी’… ये सब हमारे लिए साइनबोर्ड बन गए और हम इनके नीचे भीड़ बनकर जुटते रहे।
इन सबने हमें मनुष्य बनाना चाहा तो हमने इनको पूरी ताकत से यह एहसास कराया कि हमें इंसान समझने की ग़लती मत करना। हमें भीड़ समझो, वर्ना हम तुम्हारे खिलाफ़ खड़े होकर तुम्हें औंधे मुँह गिरा देंगे।

✍️ चिराग़ जैन

अपराधी कौन

महाभारत के महाविनाश की दोषी न तो दुर्योधन की हठधर्मिता है, और न ही धृतराष्ट्र की नेत्रहीन महत्वाकांक्षा! महाभारत के युद्ध में जो रक्तपात हुआ उसका गोमुख उस पट्टी से निसृत है जो सनेत्रा गांधारी ने अपने विवेक की आँखों पर बांध ली थी।
ठीक इसी तरह वर्तमान दुर्घटनाओं के लिए न कुम्भ दोषी है, न धर्म और न ही सरकार। इन सब हादसों की अपराधी है अपना विवेक गंवा चुकी जनता।
राजनीति तो हमेशा ही विवेक की आंखें फोड़कर सत्ता पर अधिकार करती रही है। राजनीति की तो यह प्रवृत्ति ही है। किन्तु राजनीति के गलियारों से चलनेवाली उन्माद की आँधी में अपनी व्यवस्था की धज्जियाँ देखकर ताली पीटना आश्चर्यजनक है।
महाभारत इसलिए वीभत्स नहीं था कि उसमें शव गिरे थे, महाभारत इसलिए भयानक था कि उस युद्ध में मृतक के संबंधी शोकाकुल कम और उन्मादी अधिक हो रहे थे।
उन्माद किसी का हित नहीं कर सकता। उन्माद किसी की रक्षा नहीं कर सकता। श्रद्धा की भी एक मर्यादा होती है। नदी में बहता नीर अमृत कहलाता है, किन्तु यही अमृत जब तटबंध तोड़कर जीवन को लीलने लगता है तो इसे माथे नहीं चढ़ाया जाता। मर्यादाहीन नदी भी निंद्य हो जाती है। ऐसे में मर्यादाहीन आस्था कैसे हितकर हो सकती है।
जो लोग परस्पर कुम्भस्नान की याद दिला रहे हैं, वे ही शासन को व्यवस्थित संसाधनों की याद दिलाते रहेंगे तो कुंभकर्ण की नींद सोने वाले जाग सकते हैं। नई दिल्ली स्टेशन पर मरनेवालों के मन में अंतिम समय कुम्भ के प्रति आस्था अधिक रही होगी या व्यवस्था के प्रति क्रोध अधिक रहा होगा या फिर असभ्य नागरिकता के प्रति निराशा… यह तो कोई नहीं जानता, लेकिन यह सत्य है कि धर्म की ओट में खड़ी नाकारा व्यवस्था ने जिस कपड़े में अपना मुँह चुराया है, उसका रेशा-रेशा जनता के अविवेक से बना है।

किसी का कद नहीं ऊँचा हुआ है
मेरी आवाज़ छोटी हो गई है

✍️ चिराग़ जैन

सरकार क्या-क्या करे?

एक समय वह था, जब भारतीय राजनीति, ट्रेन की जनरल बोगी को कैटल क्लास कहती थी। राजनीति के इस स्टेटमेंट से हम आम भारतीयों को बहुत दुःख हुआ। हमने राजनीति को भरपूर गालियाँ दीं। हमने उन गंदे ट्रेन कोच को और सड़ांध मारते सिस्टम को सुधारने की जगह, उनमें यात्रा करनेवालों को बताया कि देखो तुम्हें मवेशी समझा जा रहा है।
यह जानकर तथाकथित मवेशी बहुत क्रुद्ध हुए। उन्होंने सींग मार-मारकर राजनीति का सिंहासन तोड़ दिया। सत्ता बदल गई। अब आरक्षित बोगी तक ‘ठुँसने’ की सुविधा मिल गई। नई राजनीति ने मवेशियों का धन्यवाद करते हुए उन्हें थ्री टियर एसी तक घुसने की सुविधा दे दी। आरक्षण करवानेवालों के अत्याचारों का बदला लेने के लिए आरक्षण करवाने पर तरह-तरह के कर लगा दिए गए। आरक्षित वरिष्ठ नागरिकों के लिए दी जानेवाली छूट समाप्त कर दी। वेटिंग की टिकट रद्द करवाने पर भी जुर्माना लगा दिया।
आरक्षण करवानेवालों से बदला लेने के लिए उनकी बोगी में नियुक्त अटेंडेंट की भर्ती को निजी कंपनियों को सौंप दिया। अब ये आरक्षित लोग फर्स्ट एसी में सारी रात अलार्म बजाये जाते हैं और ‘नौकरी जाने के भय से मुक्त’ अटेंडेंट कोच की कूलिंग बढ़ाकर सोता रहता है।
अब धीरे-धीरे स्थिति सुधर रही है। अमीर-ग़रीब के बीच की खाई पटने लगी है। व्यवस्था जानती है कि स्लीपर क्लास के शौचालयों को वातानुकूलित जैसा नहीं रखा जा सकता, इसलिए उन्होंने वातानुकूलित कम्पार्टमेंट के शौचालयों को जनरल क्लास जैसा रखना शुरू कर दिया। इसे कहते हैं, ‘समानता का अधिकार’।
निजी ट्रैवल पोर्टल पर रेल की टिकट कन्फर्म न होने पर दोगुने पैसे देने का दावा किया जा रहा है। मैंने एक सरकारी अधिकारी से पूछा, रेल्वे में सेटिंग किए बिना ऐसा दावा कैसे किया जा सकता है। अधिकारी बोले, ‘ऊपरवाला जाने’!
मैं ठहरा मूढ़बुद्धि, ईश्वर को ही ऊपरवाला समझता था, इसलिए सोचा कि उस कोर्पाेरेट कम्पनी के अधिकारी वेटिंग की टिकट को सामने रखकर ईश्वर से प्रार्थना करते होंगे, पाँच वक़्त दुआ मांगते होंगे, मोमबत्ती वगैरा जलाकर प्रेयर करते होंगे और टिकट कन्फर्म हो जाती होगी।
लोग हर समस्या को लेकर सरकार के पास पहुँच जाते हैं। अरे भई, सरकार देश चलाएगी या रेल की टिकटें बेचेगी? सरकार का काम व्यापार करना नहीं है। सरकार तो झंडी दिखाकर ट्रेनें चलाती है, व्यापार तो यार लोग करते हैं। सरकार जिन्हें स्टेशन बेचती है, वे भी कृतघ्न नहीं हैं। वे सरकार से ख़रीदे हुए प्लेटफॉर्म पर विज्ञापन, उद्घोषणा और अन्य तमाम माध्यमों से सत्ताधारी पार्टी के प्रचार करती है। प्लेटफ़ॉर्म पर वेटिंग रूम बंद होने लगे हैं। लेकिन इसमें सरकार क्या करे, सरकार व्यापार नहीं करती, सरकार तो प्रचार करती है। शिकायतों का पूरा तंत्र है, जिसमें शिकायतकर्ता बुरी तरह उलझकर अपना माथा पीटता है, लेकिन सरकार क्या करे, सरकार चुनाव लड़ेगी या गंदे बेडरोल्स और ख़राब खाने की शिकायतें सुनते रहेगी।
कुछ तो शर्म करो, जो अच्छा हुआ है वो नहीं दिखता। रेल्वे स्टेशनों के नाम बदल दिए गए हैं। इसकी तारीफ़ नहीं होती तुमसे! एक आदमी क्या-क्या करे।
जब देखो सरकार पर कीचड़ उछालते रहते हो, जानवर कहीं के! साइड हटो, सरकार को नहाने जाना है!

✍️ चिराग़ जैन

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