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परिधि

जो लोग
चोरी किये जाने के ख़िलाफ़ हैं
वे लोग
सिर्फ दूसरों के द्वारा चोरी किये जाने के खिलाफ हैं

जो लोग
झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
वे लोग सिर्फ दूसरों का झूठ बर्दाश्त नहीं कर पाते
और जो लोग
स्त्रियों को सुरक्षित देखना चाहते हैं
वे लोग
स्त्रियों को सिर्फ दूसरों से सुरक्षित देखना चाहते हैं

ये बात
समझ तो नहीं आती
लेकिन समझ रहा हूँ

कि वे लोग
जब चोरी करते पकड़े जाएँ
तो उसको इत्तफ़ाक़ समझना चाहिए
वे लोग
जब झूठ बोलते पकड़े जाएँ
तो उस परिस्थिति को समझना चाहिए
और वे लोग
जब किसी स्त्री को दबोचे हुए
नंगे होने लगें
तो उसको
ब्राॅड माइंडेड होकर देखना चाहिए

क्योंकि वे लोग
सभ्य समाज की परिधि हैं
और सभ्य होने के नाते
मुझे परिधि लांघने का
कोई हक़ नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

लालकिला कवि-सम्मेलन

प्यारे देशवासियो!
आपको यह सूचित करते हुए ख़ुशी हो रही है कि हम पंजाबी, हम सिंधी, हम ये, हम वो सब कुछ हैं लेकिन सुरक्षा कारणों से हम हिंदी नहीं हो पा रहे हैं। यह बताते हुए मैं फूला नहीं समा रहा हूँ कि हिंदी कवि-सम्मेलन जगत् का शीर्ष कहा जाने वाला लालकिला कवि-सम्मेलन इस बार सुरक्षा कारणों से “स्थगित” कर दिया गया है। उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस के अवसर पर दिल्ली सरकार केअधीनस्थ सभी भाषा अकादमियां कवि-सम्मेलन का आयोजन करती हैं। इस श्रृंखला में हिंदी, उर्दू, पंजाबी, सिंधी और संस्कृत भाषा के कवि-सम्मेलन होते रहे हैं। इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय कवि-सम्मेलन था “हिंदी भाषा” का गणतंत्र दिवस कवि-सम्मेलन।
उक्त कार्यक्रम हर साल लालकिले के भीतर फुटबॉल मैदान में होता था। बीच में कुछ वर्ष यह आयोजन सुरक्षा कारणों से तालकटोरा स्टेडियम में भी हुआ। लेकिन इसके रद्द अथवा स्थगित होने की कोई घटना याद नहीं आती।
वैसे इस कार्यक्रम का रद्द होना देशहित में ही है। इसकी लोकप्रियता और गरिमा को देखते हुए जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक अनेक प्रधानमंत्रियों ने इसमें उपस्थित रहकर अपना समय नष्ट किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री और राज्यपालों को तो इसका आकर्षण कभी छोड़ ही न सका। ऐसे में इसके न होने से कितने सारे महत्वपूर्ण लोगों का कितना सारा कीमती समय बचा; यह गणतंत्र के लिए शुभ है।
अकादमी की ओर से आधिकारिक सूचना यह है कि स्थान उपलब्ध न होने के कारण कवि-सम्मेलन स्थगित किया जा रहा है। यह अच्छी बात है। गणतंत्र के अवसर पर लालकिले को सुरक्षा एजेंसियों ने किसी गुप्त स्थान पर छुपा दिया है ताकि आतंक की काली नज़र लालकिले की आभा को धूमिल न करदे। यदि लालकिले को कुछ हो जाता तो गणतंत्र परेड की झाँकियाँ कहाँ जाकर अपने पैर दबवातीं।
मेरे एक मित्र हैं जिनको अब मैं शत्रु मानने लगा हूँ। उन्होंने मुझसे इतना घटिया सवाल पूछा कि जब स्थान बदल कर बाकी भाषाओं का कवि-सम्मेलन हो सकता है तो हिंदी का क्यों नहीं। अब बोलो, कौन समझाए इनको! अरे यार, हिंदी की सुरक्षा ज़्यादा ज़रूरी है। हिंदी घुट-घुट कर मर जाए, तो हम स्वीकार कर सकते हैं लेकिन हिंदी आतंकियों की गोली से मरे इसे हमारी सरकार किसी सूरत बर्दाश्त नहीं कर सकती। वैसे भी, जिस प्रकार अन्य खेलों के उत्थान के लिए क्रिकेट पर प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक है; जिस प्रकार पिछड़ों के विकास के लिए अगड़ों का शोषण ज़रूरी है उसी प्रकार अन्य भाषाओं के कवि-सम्मेलन की सफलता के लिए हिंदी के कवि-सम्मेलन को ठण्डे बस्ते में डालना अनिवार्य है।
अब ये मत पूछना कि विश्व पुस्तक मेला हज़ारों कीअव्यवस्थित भीड़ के साथ प्रगति मैदान में सुरक्षित रह सकता है तो कवि-सम्मेलन एक व्यवस्थित श्रोता समूह के साथ बंद इमारत में असुरक्षित क्यों है? ये भी मत पूछना कि छत्रसाल स्टेडियम में ऑड-इवन की क़ामयाबी का जश्न मनाने के लिए स्थान उपलब्ध हो सकता है तो कवि-सम्मेलन के लिए इतने बड़े शहर में स्थान का अभाव क्यों है?
इस प्रकार के प्रश्न बेमानी हैं। सरकार ने जनता की सुरक्षा के लिए ख़ुद को संकट में डाला। छत्रसाल स्टेडियम में मुख्यमंत्री जी ने सारे संकटों के सम्मुख अपनी छाती अड़ा दी और जनता के मुँह को काला होने से बचा लिया। इसको कहते हैं नेतृत्व। ऐसे लोगों की भावनाओं पर प्रश्न उठाना आपकी राष्ट्रभक्ति को संदेह के घेरे में खड़ा कर देगा।
इसलिये एक टुच्चे से कवि-सम्मेलन के न होने का शोक न मनाओ रे बंधु बल्कि अपने भाग्य को सराहो कि हमारा देश किन महान विभूतियों के हाथ में है।

और हाँ
वो एन्ड में क्या बोलते हैं
जय हिन्द!

✍️ चिराग़ जैन

सब कुछ सामान्य है

कल NDTV पर दिल्ली के मुख्यमंत्री जी का साक्षत्कार सुना। “आनंद आ गया” नही कह सकता क्योंकि भाजपाई नाराज़ हो जाएंगे; “सन्न रह गया” भी नहीं कह सकता क्योंकि आपिये नाराज़ हो जाएंगे। थोड़ी देर के लिये कांग्रेसी हो जाता हूँ और माथे पर त्यौरियाँ लिये मद्धम मुस्कान के साथ कहता हूँ – “ये क्या था?”
मुख्यमंत्री जी की भाषा सुनकर क्षोभ ने सिर उठाया, लेकिन मेरे भीतर के आम आदमी ने उसे दबा दिया। जब उन्होंने देश के वित्तमंत्री के लिये भीख मांगने जैसा मुहावरा प्रयोग किया तो भीतर का राष्ट्रवादी उग्र हुआ, लेकिन कॉमन मैन उस पर हावी रहा। जब मुख्यमंत्री जी ने सीबीआई को चैलेंज किया तो न्याय व्यवस्था में विश्वास रखने वाला भारतीय उठ खड़ा हुआ, लेकिन सीबीआई को तोता कहे जाने वाले उद्धरणों की याद दिलाकर मेरे भीतर के तार्किक ने उसे वापस बैठा दिया। उन्होंने एलजी के लिये तू-तड़ाक की भाषा प्रयोग की। मेरा संवैधानिक भारतीय आहत हुआ, लेकिन तुरंत उस शाश्वत वाक्य ने मुझे पेन किलर दी कि- ये बड़े लोगों के चोंचले हैं, मैं इसमें कर भी क्या सकता हूँ।” मुख्यमंत्री जी ने मीडिया को पक्षपाती कहा, मुझे बुरा लगा लेकिन ये सोच कर चुप रह गया कि जब बरखा दत्त कुछ नहीं बोल रहीं तो मुझे क्या।
बरखा जी ने उनसे लालू-नीतिश के समर्थन पर प्रश्न किया, बरखा जी ने उनसे मानहानि के मुक़द्दमे पर प्रश्न किया, वे बात को गोल कर गए। बरखा जी ने कहा भी कि अब आप जवाब नहीं दे रहे हैं, वे मुस्कुराते रहे। बीच-बीच में खांसकर भी उन्होंने महत्वपूर्ण प्रश्नों से ध्यान हटाया। उन्होंने अज्ञात सूत्रों के हवाले से कई ग़ैर-ज़िम्मेदाराना आरोप कई ज़िम्मेदार लोगों पर लगाए। उन्होंने यहाँ तक कहा कि एक पत्रकार के बेटे का लिस्ट में नाम डालने के लिये पत्रकार की बीवी को एक रात बुलाने का एसएमएस भेजा गया। इतने संगीन आयोग पर तो मैं मानो तमतमा उठा, लेकिन आक्रोश के इस अंगारे को जब देश भर के नपुंसक मौन की बर्फ़ ने घेर लिया तो वह भी राख के एक ढेर में तब्दील होकर रह गया।
उन्होंने ढीठताई से ख़ुद को पाक-साफ़ और बाक़ी सबको चोर कहा। मुझे शर्म आई। लेकिन सालों से मीडिया में चलते आ रहे प्राइम टाइम बुलेटिन मेरे सामने आकर खड़े हो गए और शर्म से झुकी मेरी पलकें वापस बेशर्मी के साथ टीवी की ओर देखने लगीं।
इसके बाद कुछ विज्ञापन आए। विज्ञापनों ने बढ़ती हुई रक्तचाप को सामान्य किया। फिर साक्षात्कार जारी हुआ। फिर बीपी हाई होने लगा, लेकिन फिर विज्ञापन आ गए। पूरा साक्षात्कार देखने के बाद, ब्लड प्रेशर के मीटर में हाई और लो के बीच झूलते झूलते अंततः विज्ञापनों को धन्यवाद देते हुए मैं चादर तान कर सो गया। सुबह उठा तो दिन सामान्य था। बीपी नापा तो वह भी सामान्य था। उत्सुक होकर एनडीटीवी लगाया तो उस पर विज्ञापन चल रहे थे। सब कुछ सामान्य है।

✍️ चिराग़ जैन

या के कीड़े पड़ें

यही हाल रहा तो कुछ दिन बाद अरविन्द भैया अपने मफलर को साड़ी के पल्लू की तरह पतलून में खोंस कर हाथ हिला हिला कर बोलेंगे- “हाय या के कीड़े पड़ें…..याको नास जाय… मेरौ जीनौ हराम कार्राखो है। जाय आफत पररई है। जे ना मानैगा …छोरा दामोदर का। हाय लगेगी मेरी हाय… मेरी आत्मान तैं हाय निकलेगी रे….!”

✍️ चिराग़ जैन

उम्र मंदिर जाने की नहीं

राहुल भैया बिना बात ही नाराज़ हो गए। स्वयंसेवकों ने औरतें आगे कर केवल यह याद दिलाने की क़ोशिश की थी कि ये उम्र मंदिर जाने की नहीं, घर बसाने की है। लेकिन स्वयंसेवकों को भी समझना चाहिये था कि जो आदमी बैंकॉक से भी केवल योग कर के लौटा हो उसका संयोग भगवान भी नहीं करा सकता।

✍️ चिराग़ जैन

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