+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सैनिक का दावा

ये शेरों की दहाड़ें झूठ हैं, कोरा दिखावा है
हमें अपनों से ख़तरा है, ये हर सैनिक का दावा है
बहुत लाचार हैं; पैरों में बेड़ी है सियासत की
वगरना हाथ में बंदूक है, सीने में लावा है

✍️ चिराग़ जैन

रोमियो स्क्वैड

दहशत का आलम हो रा है, अब तो नैन लड़ाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में

कपड़ों पे ख़ुश्बू लगा के निकले हुजूर
बाल-वाल काढ़-कूढ़ के चहकने लगे
छोरियों के काॅलेज के बाहर लगा के घात
खड़े-खड़े बड़ी-बड़ी बात करने लगे
काॅलेज की कोई लड़की वहाँ से गुज़री तो
घूर-घूर कर टोंट पास करने लगे
तभी एक पुलिसिया जीप आती दीख पड़ी
गधो के सिरों से सींग से सरकने लगे

बापू घबराता है इनको चश्मा नया दिलाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में

लैला ने बुलाया मजनू को डेट पे चलेंगे
मजनू ने कहा मुझे माफ़ कर दो बहन
हीर ने कहा कि रांझे लांग ड्राइव पे चलूंगी
रांझा बोला मेरा इन्साफ कर दो बहन
रोमियो को जूलियट ने कहा कि प्यार करो
बोला पहले मेरा इंतज़ाम कर दो बहन
माहीवाल सोहनी के घर जा के फैल गया
ऐसा करो ज़िन्दगी हराम कर दो बहन

छोरों की आवाज़ खो गई, दिल का हाल बताने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में

जिन ज़ुल्फों को लहरा के सुख मिलता था
उनमें भी तेल वाला हाथ फिरने लगा
जिस लड़के को थी लफंडरी की आदत वो
हर घड़ी दादाजी के साथ फिरने लगा
जिसे चाऊमीन और पिज़्ज़ा अच्छा लगता था
घर पे ही खा के दाल-भात फिरने लगा
आशिक़ी की चैसर पे नीतियों ने दांव चला
आशिकों का राजा खा के मात फिरने लगा

डर सा बैठ गया छोरों में दाढ़ी-मूछ बढ़ाने मे
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में

धूप से बचाव को जो चश्मा लगाया काला
देखा थानेदार जी ने और काण्ड हो गया
ट्रैफिक के जाम से निकलने को ज़रा तेज
कट मारा कार जी ने और काण्ड हो गया
नर्स सामने थी पर दर्द से कराह के ली
सिसकी बीमार जी ने और काण्ड हो गया
जींस ट्रैक्टर में अटक के फटी थी पर
पूछा सरकार जी ने और काण्ड हो गया

दर्जी के घर लाइन लगी है, चिथड़ी जींस सिलाने में
खाकी वर्दी वाले मिल गए, कुट गए छोरे थाने में

✍️ चिराग़ जैन

द ग्रेट तीतरबाज़ डेमोक्रेसी

काफी समय पहले तीतरों के समाज में एक नालायक तीतर ने लड़ाई-भिड़ाई से समय निकाल कर कुछ पढ़ने-लिखने की ठानी। युवा तीतर की इस इच्छा से तीतर समाज बहुत दुखी हुआ। कई बुज़ुर्ग तीतरों ने उसे समझाया कि बेटा, इस पढाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा है। लड़ाई-झगड़ा करोगे तो कुछ बन जाओगे। आज का फसाद कल तुम्हें मुहल्ले में सम्मान दिलाएगा। पढ़-लिख गए तो कोई तुम्हारे साथ नहीं बैठेगा। सारे में थू-थू होगी। तुम्हारी भलाई इसी में है कि झगड़ा-झमेला करो और अपना आराम से रहो।
इतना समझाने पर भी जब वह तीतर ज़िद्द छोड़ने को तैयार न हुआ तो पूरे तीतर समाज ने यह निर्णय लिया कि यह युवा तीतर जो लड़ना नहीं चाहता इसकी इस हरक़त से बाक़ी तीतरों के बच्चों पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए समाज के हित में और अपनी परम्पराओं की रक्षा हेतु इस उद्दण्ड युवा को यह दण्ड दिया जाता है कि तीतर समाज के किसी झगड़े में इस अधम को नहीं बुलवाया जाएगा और पूरे गाँव में इसका लड़ाई-झगड़ा बंद करके इसे बिरादरी से बाहर निकाला जाता है।
मौक़ा अच्छा था, युवा तीतर ने बिरादरी छोड़ कर इतनी पढाई की कि धीरे-धीरे वह समाज सुधारक बन गया। उसने सब तीतरों को यह ज्ञान दिया कि तीतर लड़ाने वाले ये उस्ताद लोग बड़े उस्ताद होते हैं। चार-चार आने में हम तीतरों की जान आफत में डाल कर मज़े लेते हैं। जिसे तुम जीवन-मृत्यु का प्रश्न बना लेते हो, वह इनके लिए सिर्फ एक खेल है। इन लोगों की आपस में कोई शत्रुता नहीं होती, ये सिर्फ हमें उकसाने के लिए झगड़ने का अभिनय करते हैं।
समाज सुधारक की ये बातें सुनकर बड़े-बूढ़े तीतरों को चिंता हुई कि यह कुलक्षण ऐसी बातों से हमारी परम्पराओं को आघात पहुँचा सकता है। चिंता के कारण सभी बूढ़े तीतर चिंतित रहने लगे। वे युवा तीतरों को तीतरबाज़ी की महान परम्परा क़ायम रखने का मार्गदर्शन देते और चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अपनी जवानी की लड़ाइयाँ याद कर-करके शेख़ी बघारते। उधर कुछ युवा तीतरों को समाज सुधारक की बातें अच्छी लगने लगीं। वे छुप-छुप कर समाज सुधारक से मिलने लगे। और निरंतर चिंतन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया कि अब वे उस्तादों के साथ वही व्यवहार करेंगे, जो उस्तादों ने उनके पुरखों के साथ किया है।
अब युवा तीतर उस्तादों से मोलभाव करने लगे। एक तीतर ने उस्तादों के बीच जुमला उछाला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे एक साल का वाई-फाई मुफ़्त मिलेगा। सारे उस्ताद तीतरबाज़ी छोड़ कर वाई-फाई के ख्यालों में डूब गए। तभी दूसरा तीतर बोला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे मुफ़्त लेपटॉप मिलेगा। उस्तादों में हड़कंप मच गया। वे एक-दूसरे की लुंगियां फाड़ने लगे। उस्तादों में लट्ठ बजने लगे। कोई उस्ताद फटे हुए सर को पकड़े वाईफाई वाले तीतर के गुण गया रहा था तो कोई पैर पर प्लास्टर बांधे लेपटॉप वाले तीतर के दांव-पेंच बखान रहा था। जैसे ही हंगामा थमता दिखाई देता, कोई न कोई तीतर प्रेशर कुकर, सिलाई मशीन या बिजली बिल माफ़ जैसी घोषणा करके आराम से बैठ जाता और उस्तादों को लड़ते देख कर मज़ा लेता।
आजकल तीतरों की नई पीढ़ी और भी स्मार्ट हो गई है। घोषणाओं के ओल्ड फैशन्ड तरीके छोड़कर वे उस्तादों को इमोशनल ब्लैकमेल करने लगे हैं। पिछले दिनों एक ओवरस्मार्ट तीतर ने उस्तादों को बताया कि उसके कुनबे के बुज़ुर्ग खुल कर लड़ने नहीं दे रहे हैं। यह बात सुनकर उस्ताद लोग भावुक हो गए। उन्होंने बुज़ुर्ग तीतरों को कोसना शुरू कर दिया। उस्तादों के मन में उत्पन्न घृणा का लाभ उठाकर ओवरस्मार्ट तीतर ने सारे बुज़ुर्ग तीतरों के पर काट दिए और पूरे तीतर समाज का सरपंच बन बैठा। फॉर्मूले की सफलता देख कर आजकल कोई उस ओवरस्मार्ट तीतर की शिकायत उस्तादों से करके सिम्पेथी बटोरता है तो कोई अपनी दादी और पापा की क़ुर्बानी पर टसवे बहा कर उस्तादों को भावुक कर देता है।
हाल ही में एक चतुर तीतर ने अपने चाचा और अंकलों के अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उस्तादों की लड़ाई का माहौल ही बदल डाला। उस्ताद आपस में लड़ रहे हैं, तीतर अपने अपने दड़बों में भीतर ही भीतर जश्न मना रहे हैं। समाज सुधारक तीतर उन्हें आश्वस्त कर रहा है कि अब तुम आराम से दाना-पानी खाते रहो और मौज उड़ाते रहो। क्योंकि अब कभी यह निश्चय नहीं हो सकेगा कि किस तीतर पर दांव लगाना उचित है। सो, न लगेगा दांव, न होगी तीतरबाज़ी।

✍️ चिराग़ जैन

लोकतंत्र के चार स्तम्भ

भारतीय लोकतंत्र के चार स्तम्भ हैं। इनमें से किसी भी स्तम्भ से चिपक कर खड़े हो जाओ, कोई न कोई दूसरा स्तम्भ उसके साथ मिलकर तुम्हें पीस कर रख देगा।
विधायिका की स्थिति ऐसी है जैसे किसी युवती को झीनी पोशाक में झरने के नीचे बैठा कर निकाला गया हो और बाहर आते ही वह दूसरी युवतियों को ढँक-ओढ़ कर रहना सिखाने लगे। एक दल का नेता हमें बताता है कि उसकी जेब में राजीव गांधी के ख़िलाफ़ सबूत हैं। हम उसकी बात मानकर उसे प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह काग़ज़ देश के भविष्य की तरह कोरा निकलता है। फिर कोई आता है और हमें कहता है कि वह राम मंदिर का निर्माण कराएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। बाद में वह बस में बैठकर लाहौर की यात्रा पर निकल जाता है। राम जीऔर देश के रामलाल उसकी लीलाएं देखकर ताली पीटते रह जाते हैं। फिर एक व्यक्ति आता है और हमको कहता है कि देश को आर्थिक सम्पन्नता मिलेगी। देश का ग़रीब से ग़रीब शख्स भरपेट खाना खाएगा। हम उसके कहने पर किसी को भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। कोयले से लेकर तकनीक तक की दलाली में घोटाले होने लगते हैं। रोज़ एक नया घोटाला सामने आता है। ग़रीब के हाथ का आख़िरी निवाला भी भ्रष्टाचारियों के गले से नीचे उतर जाता है। ग़रीब विकास करके भुखमरा बन जाता है। सरकारी ईमानदारी का डंका पीटते हुए कलमाड़ी जेल जाते हैं और सरकारी बेईमानी की सुरंग से चुप्पी साध कर छूट जाते हैं। जनता देखती रह जाती है। फिर कोई आता है और हमें बताता है कि वह काला धन हर भारतीय के खाते में डलवा देगा। वह जमाई बाबू को जेल भिजवा देगा। वह स्विस बैंकों में जमा भारत का पैसा वापस लाएगा। वह अच्छे दिन लाएगा। हम उसको भी प्रधानमंत्री बना देते हैं। वह प्रधानमंत्री बनते ही कुर्सी की जगह हवाई जहाज में बैठता है। स्विस बैंकों का पैसा छोड़ कर छोटे-छोटे बच्चों के पिगी बैंक तुड़वा देता है। जमाई बाबू को गिरफ्तार नहीं कर पाता। जनता उससे पूछती है कि हमारे बैंक खाते में पैसा कब आएगा तो वह कह देता है कि वो तो चुनावी जुमला था। हम ठगे से खड़े रह जाते हैं। वह बोलता हैकि आज से लाइन में खड़े होना है। हम लाइन में खड़े हो जाते हैं। वह कहता है भूखे मरो ताकि विदेशों में देश का नाम हो सके। हम भूखे मरने को तैयार हो जाते हैं।
कुछ लोग पिस-पिस कर मीडिया के पास त्राहिमाम करते हुए जाते हैं। मीडिया उनकी मार्केट वैल्यू के अनुसार उनकी बात सुनता है। फिर अचानक चीखने लगता है। हम खुश हो जाते हैं। मीडिया हमें बोलता है कि सुभाष चंद्र बोस की फ़ाइल मांगो, उससे खुशहाली आएगी। हम फ़ाइल का हल्ला मचा देते हैं। फ़ाइल खुल जाती है। न किसी को जेल होती न खुशहाली आती। हम फिर पूछते हैं, अब क्या करें। मीडिया बोलता है कि राम वाले बयान पर माफ़ी मांगने को बोलो। हम धरने पर बैठ जाते हैं। कुछ दिन तक बैठे रहने के बाद मीडिया हमसे बोर हो जाता है। वह प्रधानमंत्री जी के साथ बेल्जियम जाकर आइसक्रीम खाने लगता है और हम वहीं बैठे रह जाते हैं।
फिर हम सिविल सोसाइटी के पास जाते हैं। एक बूढ़ा बाबा जंतर-मंतर पर बैठ जाता है। हम “जनलोकपाल” के गीत गाने लगते हैं। बूढ़ा फेमस हो जाता है। उसके गुर्गे उसके कन्धों पर खड़े होकर वोट मांगते हैं। वे हमें बताते हैं कि जनलोकपाल बिल पास कराने के लिए चुनाव लड़ना ज़रूरी है। वे कहते हैं कि वे VIP संस्कृति ख़त्म करेंगे। वे सरकारी कोठी नहीं लेंगे। वे सबकी पोल खोलेंगे। वे फ्री वाई फाई देंगे। वे आम आदमी की गुहार सुनेंगे। हम उन्हें मुख्यमंत्री बना देते हैं। अगले ही दिन वे सायरन बजाती गाड़ियों के काफिले में बैठ नई कोठी से निकलकर विधानसभा जाते हैं और जनलोकपाल के साथ अन्ना बाबा को विदाई देते हैं। हम उसकी खाँसी पर चुटकुले सुन-सुनाकर सन्तोष कर लेते हैं।
कई साल तक सुनवाई के बाद निचली अदालत एक सेलिब्रिटी को अपराधी कहती है। उसके दो घंटे के भीतर ऊँची अदालत केस फ़ाइल करने से लेकर जाँच करने तक और गवाहों की गवाही से लेकर सबूतों की प्रमाणिकता तक सब संपन्न करके उसे रिहा कर देती है। हम बिंधे हुए हिरन से चकित रह जाते हैं।
हम धृतराष्ट्र की तरह संजय रूपी मीडिया कीआँखों से देश का कुरुक्षेत्र देख रहे हैं। संजय बोलता है कोसी में बाढ़ आ रही है। हम भागने लगते हैं। संजय बोलता है नदियां सूख रही हैं, हम प्यासे मरने लगते हैं। संजय बोलता है पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो रहा है। हम इन्वर्टर चार्जिंग करने लगते हैं। संजय बोलता है राहुल गांधी पप्पू है, हम उस पर लतीफ़े गढ़ने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी घुमंतू हो रहे हैं, हम उनकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। संजय बोलता है मोदी जी शेर हैं, हम उनसे डरने लगते हैं।
सवा सौ करोड़ लोगों की जनता नेतृत्व और सुदृढ़ व्यवस्था के अभाव में अपनी सूझ-बूझ को भौंथरा कर बैठी है। ख़बर तो दूर की बात है, हम सोशल मिडिया की अफवाहों को प्रमाणिक मानने से पूर्व बुद्धि का प्रयोग करना भूल चुके हैं। ऐसे में कतारों में खड़ा वर्तमान अपने भविष्य की आशंकाओं के लिए राजसत्ता या मीडिया की ओर निहारते समय यह क्यों भूल जाता है कि राजनीति की शतरंज पर कोई प्यादा यदि अनवरत विकास करते हुए विपक्षी हाथी के घर तक पहुँच जाता है तो वह स्वयं भी हाथी बन जाता है और फिर वह प्यादे की सीमाएं भूलकर हाथी जैसा आचरण करने लगता है।

✍️ चिराग़ जैन

रेतीली पगडण्डी पर बड़े निर्णय की मोटर

कविता अपने युग की अकथ कथाओं का जनहितकारी वर्णन है। कवि जब जन पीड़ा से विह्वल होकर शासन के विरुद्ध लेखनी चलाता है उस समय उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए कि सत्ता और तंत्र का गठजोड़ उसे किस सीमा तक व्यक्तिगत हानि पहुँचा सकता है।
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कविता ने पूरा एक आंदोलन खड़ा किया। उस समय वही लेखनी लच्छेदार भाषा में वायसराय और ब्रिटिश राजसत्ता की चरण-वंदना लिख कर व्यक्तिगत लाभ अर्जित कर सकती थी किन्तु उन बूढ़ी हड्डियों ने जनहित को सर्वोपरि रखकर “तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिंदुस्तान की” और “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” जैसे तराने रचे।
आज़ादी के जश्न में ग़ाफ़िल होते समाज की कलाई पकड़ कर उत्सव को सावधान करते हुए गिरिजाकुमार माथुर ने डिठौना लगाते हुए कहा-

आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना
शत्रु हट गया लेकिन उसकी छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है

बाबा नागार्जुन, जो कि स्वयं को वामपंथ का समर्थक कहते थे उन्होंने भी 1962 की लड़ाई के बाद अपनी आजन्म समर्थित विचारधारा को ताक़ पर रखकर स्पष्ट लिखा-

वो माओ कहाँ है वो माओ मर गया
ये माओ कौन है बेगाना है ये माओ
आओ इसको नफ़रत की थूकों में नहलाओ
आओ इसके खूनी दाँत उखाड़ दें
आओ इसको ज़िंदा ही ज़मीन में गाड़ दें

यह काव्यांश इस बात का प्रमाण है कि “आह से उपजता गान” क्रमशः प्रकृति, मानवता, मातृभूमि, जनहित, शासनतंत्र और अंत में स्वयं को प्राथमिकता देता है। हर अच्छी कविता की क़ीमत रचनाकार को व्यक्तिगत बलिदान से चुकानी पड़ती है। कभी कल्पना करें तो सिहरन उठती है कि अपनी 19 वर्षीया बिटिया की मृत्यु की टीस को शब्दों में पिरोकर “सरोज-स्मृति” लिखने वाला निराला कितनी बार बिंधा होगा!
कभी अपने मुहल्ले से गिरफ़्तार होकर निकलने की कल्पना करेंगे तो शायद फ़ैज़ की ये एक पंक्ति पढ़कर दिल बैठ जाएगा- “आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो”। फ़ैज़ इस स्थिति में भी जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सत्ता को आईना दिखाने के एवज़ में अपने संभावित हश्र को लिखने से नहीं बाज़ आए कि –

हाकिम-ए-शहर भी, मज़मा-ए-आम भी
तीर-ए-इलज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी
रख़्त-ए-दिल बांध लो दिलफिगारो चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारो चलो

अश्रुओं से सिक्त कृति ही श्रोता के अधरों और नायन-कोर को एक साथ स्पंदित करने में सक्षम होती है। सत्ता के विरुद्ध लेखनी कवि का धर्म नहीं है लेकिन जनहित के हित को स्वर देते समय शासक के पक्ष अथवा विपक्ष का गणित लगाना रचनाकार के लिए अधर्म अवश्य है।
कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद जब दिनकर ने नेहरू जी की नीतियों के विरुद्ध “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” गाया तब उनके स्वर में किसी भय का कम्पन सुनाई नहीं दिया।
यूँ आपातकाल भुगतने वाली पीढ़ी बताती है कि उस समय सरकारी कर्मचारी समय पर दफ़्तर पहुँचने लगे थे। लोग अनर्गल आलस्य को त्यागकर अनुशासित हो चले थे। कानून तोड़ने से लोग घबराने लगे थे, आदि। लेकिन यह अनुशासन जनता को किसी नैतिक प्रेरणा की बजाय बलपूर्वक सिखाया गया था। लोकतंत्र की आत्मा को मसोस कर तानाशाही के बीज रोपने का क्रूर प्रयास किया गया था। यही कारण था कि दुष्यन्त के अशआर आपातकाल के विरुद्ध जनता की आवाज़ बन गए, यथा-

मत कहो आकाश में कोहरा घना है
ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
—–
एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर ये तमाशा देखकर हैरान है
—–
जाने कैसी उँगलियाँ हैं जाने क्या अंदाज़ है
तुमने पत्तों को छुआ था जड़ हिला कर फेंक दी

शासन की आत्ममुग्धता पर चोट करते हुए शायर कह उठा कि
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा

जेपी के समर्थन में दुष्यंत ने बेबाक़ कहा कि
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यूँ कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

यहाँ तक कि जनक्रांति को पुनर्जीवित करने के प्रयासों से भी दुष्यंत पीछे नहीं हटे-

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
—-
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आहत हुई तो भवानी प्रसाद मिश्र लिख बैठे-

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़नेवाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें, सब उसे मनायें
कभी-कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया-भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये
हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बाँधकर खड़े हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें, कौए-कौए गायें
बीस तरह के काम दे दिये गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पाँचों घी में
बड़े-बड़े मंसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदलकर ऐसे ढाले
उड़नेवाले सिर्फ़ रह गये बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ, सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं, चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा क़िस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ?

नागार्जुन ने तो काव्य के माधुर्य को विस्मृत कर तत्कालीन प्रधानमंत्री के विरुद्ध यहाँ तक लिख डाला-

इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको
रानी-महारानी आप
नवाबों की नानी आप
सुन रही सुन रही गिन रही गिन रही
हिटलर के घोड़े की एक एक टाप को
छात्रों के खून का नशा चढ़ा आपको

और भी अधिक कड़वे होकर बाबा लिखते हैं-
देखो यह बदरंग पहाड़ी गुफ़ा सरीखा
किस चुड़ैल का मुँह फैला है
देखो तानाशाही का पूर्णावतार है
महाकुबेरों की रखैल है
यह चुड़ैल है।

अटल बिहारी वाजपेयी जी जनहित के पाले में खड़े हुए तो नैराश्य को चुनौती देते हुए चिंघाड़ उठे थे- हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूंगा।
इन्हीं अटल जी की शिखर वार्ता के विरोध में ओम् प्रकाश आदित्य जी ने लालकिले से कविता पढ़ी –

तूने ये क्या किया अटल बिहारी मुशर्रफ़ को महान कर दिया
उसपे मेहरबान हुए इतने भारी, गधे को पहलवान कर दिया

हर युग में कविता ने सत्ता की आँखों में आँखें डालने की ज़ुर्रत की है। वागीश दिनकर जी ने इस सन्दर्भ में साफ़ साफ़ लिखा है कि-

युग की सुप्त शिराओं में कविता शोणित भरती है
वह समाज मर जाता है, जिसकी कविता डरती है

शिवओम अम्बर जी ने तुलसी के वंशजों की सत्यभाषी परम्परा को सम्बल देते हुए कहा कि-

या बदचलन हवाओं का रुख़ मोड़ देंगे हम
या ख़ुद को वाणीपुत्र कहना छोड़ देंगे हम
जब हिचकिचएगी क़लम लिखने से हक़ीक़त
काग़ज़ को फाड़ देंगे, क़लम तोड़ देंगे हम

इस निर्भीक स्वभाव का ही परिणाम था कि जब उत्तर प्रदेश में कला के कंगूरे यश भारती की आस में शासन के गलियारों में फानूस से कालीन तक बनने को तैयार थे तब लेखनी की कतार का सबसे छोटा बेटा प्रियांशु गजेन्द्र मुज्ज़फरनगर के दंगों में जनता की कराह सुनकर लिख रहा था कि-

भोर का प्यार जब दोपहर हो गया
भावना का भवन खंडहर हो गया
तुम संवरते-संवरते हुईं सैफ़ई
मैं उजड़कर मुज़फ्फरनगर हो गया

एक बार पुनः जनता की सहनशक्ति और शासन की इच्छाशक्ति का आमना-सामना हुआ है। कवियों-लेखकों-व्यंग्यकारों और व्यंग्यचित्रकारों ने एक बार पुनः देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री की किसी नीति से आहत जन की अकथ पीर को लेखनी और तूलिका पर साधने का प्रयास किया है। किन्तु प्रधानमंत्री जी के प्रशंसक उस सारे प्रयास को पूर्वाग्रह का नाम देकर सोशल मीडिया पर गाली-गलौज तक की भाषा से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। यह दुःखद भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी।
वर्तमान में प्रधानमंत्री जी ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसका भविष्य संभवतः सुखदायी है किन्तु उस निर्णय के क्रियान्वयन की तैयारी इतनी कमज़ोर थी कि जनता का एक बड़ा वर्ग आर्थिक विपन्नता के कूप में आ पड़ा है। इस कुएँ के भीतर इतना अँधेरा है कि इस बड़े निर्णय की कुक्षि से निकलती रौशनी दिखाई नहीं दे रही है। चाटुकारों से घिरा नेतृत्व जनता की समस्याओं को देखकर भी अनदेखा कर रहा है और आत्ममुग्धता के ज्वर के परिणामस्वरूप अपनी पीठ स्वयं थपथपा रहा है।
किसी नीति के क्रियान्वयन से यदि काम-धंधे ठप्प हो जाएं, अराजकता जैसा माहौल बनने लगे, लूटमारी, कालाबाज़ारी, जमाखोरी, आपसी विद्वेष, वर्ग-संघर्ष और मृत्यु तक की घटनाएँ अचानक बढ़ जाएं तो शासन का कर्त्तव्य बन जाता है कि वह अपनी दूरदर्शिता की विफलता स्वीकार करे। ऐसा करने की बजाय समस्याओं से घिरी जनता और परेशानी से चिल्लाने वालों को “बेईमान” और “देशद्रोही” कहा जाने लगा है।
स्वयं प्रधानमंत्री जी ने इन सब ख़बरों से पीठ फेरते हुए कह दिया कि- “बेईमान चिल्ला रहे हैं और ग़रीब आदमी चैन की नींद सो रहा है।” इस देश की स्थिति एक रेतीली पगडण्डी जैसी है। इस पगडण्डी पर बढ़ाया गया हर क़दम कुछ धूल ज़रूर उड़ाएगा। उस धूल से यदि आपके पीछे खड़े किसी व्यक्ति को धँसका लग जाए और वह खाँसने लगे तो उसे शुष्क कण्ठ को पानी का स्पर्श देनेकी बजाय उसे बेईमान कहा जाना न तो नैतिकता का द्योतक है न मानवता का।
नोटबंदी के विरुद्ध जो भी कुछ कहा जा रहा है उसका केवल इतना ही तात्पर्य है कि रेतीली पगडण्डी पर बड़े निर्णय की मोटर दौड़ाने से पूर्व यदि परिपक्व तैयारियों का छिड़काव कर लिया जाता तो आपकी मोटर के पीछे पुष्पवृष्टि करने वाली जनता का खाँस-खाँस कर बुरा हाल न होता।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!