Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
हम घटनाओं का सामान्यीकरण करने के अभ्यस्त हैं। किसी एक घटना से पूरे व्यक्ति का, किसी एक व्यक्ति से पूरे समुदाय का, किसी एक समुदाय से पूर समाज का और किसी एक समाज से पूरे राष्ट्र का चरित्र आकलन करना हमारा अभ्यास है। इस अभ्यास में हम तर्कहीन हो जाते हैं। प्रत्येक बहस में हम अपनी बुद्धिमत्ता प्रदर्शित करने के उद्देश्य से कूदते हैं और जब बुद्धिमत्ता बहस से पहले समाप्त हो जाती है तो ऐसे तर्क करने लगते हैं जिनसे सबको पता चल जाए कि हम केवल बुद्धिमत्ता के भरोसे बहस में नहीं आए हैं, देर तक टिके रहने के लिए हमारे पास मूर्खता भी है। संत कबीर नगर में भाजपा के एक सांसद ने भाजपा के ही एक विधायक का अभिनन्दन कर दिया। विवाद का कारण वही था – “तेरी कमीज़ मेरी कमीज़ से ज़्यादा सफेद कैसे!” इस सम्मान समारोह में बाकायदा मंत्रोच्चार के बीच अनुशासन की आहुति दी गई। इस घटना को सोशल मीडिया पर ट्रोल करते समय लोग पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगा रहे हैं। यह ग़लत बात है। किसी भी एक व्यक्ति के आचरण से पूरी पार्टी का आचरण तय नहीं किया जा सकता। कोई भी एक व्यक्ति पूरी विचारधारा का चरित्र नहीं हो सकता। ऐसा करना अपने आकलन के साथ बेईमानी करना है। यह हम पूर्व में भी करते रहे हैं। एक मणिशंकर अय्यर के बयान से पूरी कांग्रेस को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं। एक साध्वी के बयान से पूरी भाजपा पर प्रश्नचिन्ह लगाते रहे हैं। इस आचरण के कारण लोकतंत्र का जनमत भीड़ के उन्माद में परिवर्तित हो जाता है। यह हमने जातियों में भी किया है। एक गांधी महात्मा हो गए तो सारे गांधी ख़ुद को संत बताने पर उतारू हो गए। एक मोदी प्रधानमंत्री बन गए तो सारे मोदी देश का पैसा लेकर घूमने निकल लिए। ऐसा करना ग़लत है। एक राहुल गांधी पूरी कांग्रेस का चरित्र नहीं हैं। एक नरेंद्र मोदी पूरी भाजपा का चरित्र नहीं हैं। एक लोहिया के वैचारिक कुनबे में सारे लोहिया जन्म नहीं लेते। अम्बेडकर के बैनर तले इकट्ठा होकर लोग अम्बेडकर के बनाए कानूनों की धज्जियाँ उड़ाते हैं। लोहिया की विरासत को बपौती मानने वाले सत्ता की वसीयत को लेकर सिर फुटव्वल करते मिले। भगवा पहनने से कोई हिन्दू नहीं हो जाता और चरखा चलाने से कोई गांधी नहीं हो जाता। इस बाह्य ढोंग के सहारे ही सियासत की गाड़ी चलती है। हम सब जानते हैं कि मुसलमानों के मंच पर टोपी पहनकर चढ़ने वाले लीडर हिंदुओं के मंच पर पहुँचते ही रामनामी ओढ़ लेते हैं। हम सबको मालूम है कि राहुल गांधी केवल वोट पाने के लिए दलितों के घर खाना खाने गए। हम सबको पता है कि सफाई कर्मियों के पैर धोकर मोदी जी ने चुनावी चाल चली है। हम सबको सब पता है। हम सब कुछ जानकर भी इस अभिनय को चरित्र के झरोखे से निहारते रहते हैं। राहुल गांधी बैंगकॉक जाते हैं, नरेंद्र मोदी मिसेज अम्बानी से हाथ मिलाते हैं, राहुल गांधी ने शादी नहीं की, नरेंद्र मोदी ने पत्नी को छोड़ दिया, राहुल गांधी को भाषण देना नहीं आता, नरेंद्र मोदी ने अमरीका के प्रेजिडेंट को झूला झुलाया, राहुल गांधी के कुर्ते की जेब फटी है, नरेंद्र मोदी का सूट बहुत महंगा है …इन मुद्दों पर हम वोट देते हैं। एक दरवाज़े से निकलता हुआ हर शख़्स एक जैसा हो, यह सम्भव नहीं है। एक बगीचे में उगने वाले सारे फूल एक जैसे नहीं होते। कई बार चमेली भी केवल झाड़ बनकर रह जाती है और कई बार नागफनियों पर भी खूबसूरत फूल खिल जाते हैं। एक ही व्यक्ति एक विषय पर सही और दूसरे विषय पर ग़लत हो सकता है। लेकिन हम इतने जिद्दी हैं कि या तो किसी को शत प्रतिशत सही मानेंगे या शत प्रतिशत ग़लत। हर शख़्स में, हर समुदाय में, हर पंथ में, हर दल में, हर विचारधारा में, हर आंगन में, हर देश में, हर घटना में कुछ सही और कुछ ग़लत ज़रूर होता है। इन दोनों को अलग-अलग न किया जाए तो अंधभक्ति और अंधविरोध जन्म लेता है, सुचारु व्यवस्थाएं नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
आशंका से जीत गई आशा की रेखा
धीरज ने बदला अपनी क़िस्मत का लेखा
दहशत के अंधियारे ने दम तोड़ दिया है
दुनिया ने पश्चिम से सूरज उगता देखा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Lapete Mein Netaji, Poetry
ज़िद पर आ जाएं तो क्या से क्या कर डालें साहिब जी
नाले के बहते पानी से आग जला लें साहिब जी
दर्द तुम्हारा सुन भी लेंगे, कर भी देंगे ठीक इलाज
लेकिन पहले ख़ुद तो अपने होश संभालें साहिब जी
मातम का माहौल न जाने कितना लम्बा चलना है
पहले अपना बढ़िया से फोटू खिंचवा लें साहिब जी
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
आवेग बीत चुका है। भारतीय मानस में सुलग रहे शोलों पर रोज़मर्रा की ज़रूरतों के छींटें पड़ चुके हैं। मीडिया अगली बड़ी ख़बर आने तक पुलवामा को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाए रखने के लिए विवश है। इसी कारण भारतीय गाली-गलौज से निचुड़ने वाली सारी टीआरपी बटोरने के बाद अब हमें पाकिस्तानी गालियाँ सुनवाई जा रही हैं। इमरान खान के बयान पर हर चैनल चर्चा कर रहा है। और हर चर्चा के अंत में एंकर भारतीय शौर्य की कोटिंग करके इमरान का प्रचार करने के पाप से मुक्ति पा रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने स्वभाव के अनुसार पुनः आरोप-प्रत्यारोप, छीछालेदर, गठबंधन, चरित्र हत्या, जोड़-तोड़, दल-बदल, रैली, भाषण और वोट-मैनेजमेंट जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की ओर उन्मुख हो चुकी हैं। इन सबसे फ़ुर्सत पाकर बीच-बीच में “बदला लिया जाएगा” जैसे जुमले बोलकर यह भी जताया जा रहा है कि “न भूलेंगे न मुआफ़ करेंगे” हमें याद है। इससे भावुक देशभक्तों की वोट पक्की होती है। अनिल अंबानी से सुप्रीम कोर्ट ने कुछ करने को कहा है। और बात न मानने पर कारावास की चेतावनी भी दी है। किंतु हमारी मीडिया इतनी संवेदनशील है कि इस ख़बर को कुछ सेकेण्ड के लिए ही चलाया गया। क्योंकि मीडिया जानती है कि किसी मुआमले में फैसला आने से पहले आरोपी को अपराधी नहीं माना जा सकता। मीडिया यह भी जानती है कि न्यायालय अम्बानी जी को सज़ा बाद में देगा लेकिन अम्बानी सर की नेगेटिव न्यूज़ चलाने की सज़ा मीडिया को ज़रूर मिल जाएगी। सरकारी दफ्तर, बसें, नुक्कड़ और चौपालें अभी भी दो गुटों में बँटे हुए विश्वयुद्ध लड़ रहे हैं। एक गुट का मानना है कि मोदी जी कोई भगवान टाइप की आइटम हैं जो नोटबंदी की तरह एक दिन अचानक टीवी पर आकर बताएंगे कि हमारा पड़ोसी पाकिस्तान अब हमारे बीच नहीं रहा। दूसरे गुट की विचारधारा अधिक ड्यूरेबल है। उनकी हमेशा यही मान्यता रही है कि सब साले चोर हैं, सबको अपनी कुर्सी की चिंता है, देश की किसी को कोई फिक्र नहीं है। एक तीसरा पक्ष भी है, जिसे हम निर्गुट मानते हैं। उसका मानना है कि भैया हमें तो हड्डे कटाकर पेट भरना है, न कांग्रेस कुछ देगी न भाजपा। स्कूलों में लड़के रात के बुलेटिन और व्हाट्सएप्प से प्राप्त ज्ञान को इस आत्मविश्वास के साथ बाकी जमघट को सुनाते हैं जैसे रात भर मोदी जी के साथ भारतीय सेना के शस्त्रागार का मुआयना करके लौटे हों। राजनैतिक दलों की “वानर सेनाएँ” किसी कश्मीरी को पीट कर, किसी जगह पुतले जलाकर, किसी जगह देशभक्ति का अभिनय करके अपने ऊपर होने वाले ख़र्चे को जस्टिफाई कर रही हैं। सोशल मीडिया पर अफवाहें अभी भी फैलाई जा रही हैं। फोटोशॉप सेना अभी भी सक्रिय है। पुलवामा के सैनिकों की चिताओं से फूल चुने जा चुके हैं, अब राजनीति उस राख में से वोट चुनने का प्रयास कर रही है। जिन परिवारों के बेटे वीरगति को प्राप्त हो गए अब राजनैतिक अनदेखी के कारण वे परिवार भी दुर्गति को प्राप्त होने जा रहे हैं। भारत सरकार ने “सदा-ए-सरहद” (दिल्ली-लाहौर बस सेवा) को बंद कर दिया है ताकि सरहद के जवानों की चीख़-पुकार देश को विह्वल न करे। लेकिन “समझौता एक्सप्रेस” (अटारी-लाहौर रेल सेवा) को जारी रखा है ताकि आवश्यक कामकाज होता रहे। 1947 से अब तक ऐसे तनावग्रस्त अवसर कई बार आए हैं जब दोनों ही मुल्कों की आम जनता का खून खौला है। यही सब गाली-गलौज, प्रतिबंध, आक्रोश, बयानबाज़ी हर बार होती है और फिर कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। दोनों ही देशों की जनता को यह नहीं मालूम कि जब भी तनाव बढ़ता है तब सिर्फ क्रिकेट का खेल बन्द किया जाता है, सियासत का नहीं।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
भारत देशभक्तों का देश है। किसी भी आपदा की स्थिति में हम आपदा के निवारण करने की बजाय अपनी देशभक्ति साबित करने में व्यस्त हो जाते हैं। हमारे पास देशभक्ति की कसौटी पर कसने के लिए राजनीति है और देशभक्ति के रास्ते पर मिटने के लिए सेना। इसलिए हम अपने हिस्से की देशभक्ति निभाना आवश्यक नहीं समझते।
हम चौकन्ने देशभक्त लोग हैं। देशभक्ति हो या न हो, परंतु देशभक्ति का शोर होता रहना चाहिए। इसीलिए हमारी रुचि स्वयं को देशभक्त बनाने में कम है और शेष लोगों को देशद्रोही साबित करने में अधिक हैं। किसी ने पुलवामा हमले पर श्रद्धांजलि नहीं दी तो वो देशद्रोही हो गया। किसी ने फेसबुक पर प्रोफ़ाइल फ़ोटो में तिरंगा नहीं लगाया तो वह भी देशद्रोही हो गया। हम दूसरों को कसमें दे-देकर देशभक्ति के फ़ॉर्वर्डेड संदेशों के प्रचार हेतु बाध्य करते हैं ताकि मनुष्यों में न सही, पर कम से कम मोबाइलों में तो देशभक्ति भर ही जाए।
हम लालबत्ती जम्प करते समय दिलेर हो जाते हैं और देश के नियमों की धज्जियाँ उड़ा देते हैं। पूरे देश में कुल तीन प्रतिशत लोग भी टैक्स नहीं भरते लेकिन शत प्रतिशत लोग सरकार की नीयत पर प्रश्नचिन्ह लगाने को तैयार रहते हैं। ट्रैफिक हवलदार को रिश्वत देने की पेशकश करते समय, देशभक्ति हमारी आत्मा को नहीं धिक्कारती। नक्शा पास कराए बिना चोरी से एक्स्ट्रा कमरा बनाकर हम पूरी सोसाइटी के सौंदर्य का सत्यानाश कर देते हैं। गाड़ी पार्क करते समय देश के अन्य नागरिकों को होने वाली असुविधा का ध्यान नहीं रखते, लेकिन हम देशभक्त हैं।
अफ़वाहों के प्रचार में हम अपने सोशल मीडिया एकाउंट्स को आगे करके देशभक्ति के शोर में योगदान देते हैं। सड़क पर खड़े होकर ट्रकों से वसूली करता हवलदार भी हर उच्छ्वास के साथ राजनीति को देश की बर्बादी का कारण बता देता है। दफ़्तरों में रिश्वत और कामचोरी को पोसने वाले बाबू भी जब शाम को घर लौटते हैं तो रास्ते भर सरकार को कोसते हुए घर पहुँचते हैं। टैक्सी-रिक्शावाले मीटर से चलने को राज़ी नहीं हैं, लेकिन सरकार से अपेक्षा करते हैं कि सरकार सवारी की जेब का सारा पैसा उनकी झोली में क्यों नहीं डाल देती!
अस्पतालों से इलाज की बजाय बीमारियाँ मिल रही हैं, डॉक्टर्स अंगों का कारोबार कर रहे हैं; दवाई कंपनियों और पैथलैब की कमीशन पर उनका पूरा ध्यान केंद्रित है लेकिन भारत को खोखला करने का आरोप सरकार पर लगता है। इंजीनियर्स और ठेकेदारों ने देश की मज़बूत बुनियाद पर चूना लगाया है। लेकिन देश की कमज़ोरी का जिम्मेदार सिस्टम को माना जाता है। परचूनिया मिलावट से पीछे नहीं हटता, अध्यापक ट्यूशन का धंधा कर रहा है, अधिवक्ता अपराध को अभयदान दे रहे हैं, न्यायालय सेटिंग और जुगाड़ की कार्यशाला बनते जा रहे हैं। पुलिस जनता को जानवर समझती है और जनता पुलिस को चौपाया।
एयरलाइंस जनता को लूटने का पूरा तंत्र विकसित कर चुकी हैं। बैंकर्स नोटबन्दी में कमाने लगे और नोटबन्दी फेल हो गई। सरकारी फ्लैट बनते हैं तो दलालों का नेटवर्क भी साथ-साथ तैयार हो जाता है। बस कंडक्टर टिकट दिए बिना पैसे ले लेता है। प्राइवेट ड्राइवर पैट्रोल चुरा रहे हैं। निगम के पार्कों में लगवाले गए बैंच, झुग्गियों में सोफ़े की भूमिका अदा कर रहे हैं। और उन्हीं बैंचों पर बैठ कर हम चर्चा कर रहे हैं कि- ‘सब साले चोर हैं, देश के लिए कोई नहीं सोचता।’
✍️ चिराग़ जैन