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पूरे देश का मज़ाक़ बनाकर रख दिया है। बेशर्मी से झूठ बोलनेवाले राजनेता, एक साथ मिलकर सब कुछ बर्बाद कर रहे हैं और देश की जनता ख़ामोश होकर तमाशा देख रही है।
प्रश्न समूची राजनीति की उस ढिठाई का है जो जनता के जीवन से खिलवाड़ करने में हिचकती नहीं है। प्रश्न जनता की उस मानसिकता का है जो किसी भी राजनैतिक निर्णय की चर्चा शुरू होने से पूर्व किसी दल या विचारधारा का चश्मा पहनना नहीं भूलते।
अरे भाई, सही हर स्थिति में सही होता है और ग़लत हर हाल में ग़लत? इतनी सी बात हम समझना नहीं चाहते। कांग्रेस के शासन में कम किसानों ने आत्महत्या की थी, भाजपा के शासन में ज़्यादा किसान मर रहे हैं। इस बात को कहकर कांग्रेसी भला कैसे इतरा सकते हैं? राजनीति ने जनता को विवेकशून्य बनाया है या फिर विवेकशून्य जनता ने राजनीति को इतना मक्कार और बेशर्म कर दिया है इस पर ढंग से विचार करना ज़रूरी हो गया है।
उन्हें पता है कि चुनाव के समय उनका कोई एक पैंतरा देखते ही तुम उनकी बदतमीज़ियों के पोथे भूल जाओगे। उन्हें पता है कि पैदल चलकर घर जाती जनता को कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने के लिए छोड़ा जा सकता है क्योंकि बिहार में चुनाव आते ही राजनीति इन सब कीड़े-मकोड़ों को वोट में तब्दील कर लेगी। उन्हें पता है कि न्यायपालिका की पेचीदा भूल-भुलैया में फँसा नागरिक कभी इतनी फ़ुरसत ही न पाएगा कि व्यवस्था के सुधार की मांग कर सके।
उन्हें पता है कि लाखों-करोड़ रुपये के पैकेज की घोषणा करने से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि इस देश की जनता की इतनी हिम्मत ही नहीं है जो उस पैकेज के अस्तित्व पर प्रश्न पूछ लेवे। और अगर इतने वर्ष की मेहनत के बाद भी कोई विवेकशील व्यक्ति इस जनता के बीच बचा रह गया है तो उसको धराशायी करने के लिए इसी जनता के बीच अपने-अपने लीडर पर अटूट श्रद्धा रखनेवाले लोगों की कोई कमी थोड़े ही है।
राजनीति बीस लाख करोड़ के पैकेज की घोषणा करेगी और हम दो पाटों में बँट जाएंगे। राजनीति मजदूरों के लिए बसों की लिस्ट लेकर आएगी, उसमें बसों के नाम पर बसें न हों तो भी हम भाजपा-कांग्रेस करने में व्यस्त हो जाएंगे।
हमारे लिए सवाल यह है ही नहीं कि तपती दुपहरी में जानवरों की तरह घिसटने को मजबूर इंसान तक सहायता पहुँची या नहीं पहुँची, हम तो इस तमाशे में व्यस्त हैं कि इसमें कांग्रेस ने बीजेपी को धूल चटाई या बीजेपी ने कांग्रेस को। इससे आगे हमारी संवेदनात्मक सोच का इंजन चल ही नहीं पाता।
हम यह समझ ही नहीं पाते कि शिवसेना और कांग्रेस के गठबंधन में भी वही लालचमण्डी है जो अन्य किसी प्रदेश में है। लेकिन हम इससे खुश हो जाते हैं कि अमित शाह की चाल फेल हो गयी।
कोई अमित शाह को फेल करके खुश है, कोई राहुल गांधी को, कोई केजरीवाल को तो कोई मोदी या दीदी को। लोकतंत्र के आखिरी पायदान पर खड़े आदमी पर किसी का ध्यान नहीं है।
राजनीति ने सिद्ध कर दिया है कि इस देश की जनता रिमोट से चलती है। जब तक राजनीति किसानों को अन्नदाता कहती रहती है तब तक कोई खेतों में पड़ रहे जानलेवा कैमिकल्स पर सवाल नहीं कर सकता। जब राजनीति ने किसानों को आतंकवादी कहना शुरू कर दिया तो कोई टीवी चैनल उनके विरोध की आवाज़ प्रसारित नहीं कर सका।
रामदेव के आंदोलन पर रात में लाठीचार्ज करवानेवाली कांग्रेस, भाजपा को आन्दोलन से निपटने की नैतिकता सिखाती है और कुल दो लोगों की तानाशाही पर चल रही भाजपा, कांग्रेस को पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक मूल्य स्थापित करने का ज्ञान देती है।
कितनी आदर्श स्थिति है, इस देश के महान राजनेता यकायक चुनाव से ठीक पहले अपनी आत्मा की आवाज़ सुनकर ‘नये दल’ में चले जाते हैं। जो चुनाव से पहले आत्मा की आवाज़ न सुन पाए वो चुनाव जीतने के बाद उस आवाज़ को सुन लेते हैं। सब कुछ खुल्लमखुल्ला चल रहा है लेकिन अपना-अपना चश्मा पहने जनता इस बात पर ख़ुश है कि अमित शाह ने ममता बनर्जी की पार्टी का दिवाला निकाल दिया।
सब अपनी-अपनी कांग्रेस और अपनी-अपनी भाजपा में इतने लिसड़े हुए हैं कि देश की बर्बादी उन्हें दिखाई ही नहीं देती। जिन्हें यह बर्बादी दिख रही है, जिन्होंने अपने चश्मे हटाकर देश को देखने की कोशिश की है उन्हें उनकी नौकरियों से हाथ धोना पड़ा है। उनको गद्दार, राष्ट्रद्रोही, हिन्दू विरोधी और ऐसे ही तमाम अलंकरणों से सँवारने के लिए पूरी टोली सक्रिय है।
लोकतंत्र में सत्ताधारी पक्ष की निरंकुशता पर लगाम लगानेवाला विपक्ष भी इस पूरी स्थिति में बराबर का हिस्सेदार है क्योंकि जिसे इस निरंकुशता के विरुद्ध खुलकर बोलने से डर लगता है समझ लो कि उसने अपने होंठों में अपना ख़ुद का कच्चा चिट्ठा भींच रखा है।
भारत की महानता के ढोल पीटते हुए सदियाँ बीत गईं, लेकिन आज भी दिल्ली से लेकर दार्जिलिंग तक कोई कस्बा, कोई शहर, कोई गाँव, कोई मुहल्ला ऐसा न मिलेगा जहाँ इस महान देश का कोई नागरिक जानवरों से बदतर ज़िन्दगी जीने को मजबूर होगा।
विचारधाराओं के नाम पर देश को टुकड़े-टुकड़े करनेवाले इन सियासतदानों से पूछो कि प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनाकर भी ‘अंत्योदय’ की अवधारणा अहल्या की भाँति पत्थरों में ही क्यों सुबक रही है? इतने लम्बे समय तक शासन करने के बावजूद गांधी का ‘रामराज’ कोरी कल्पना ही क्यों बनकर रह गया? न लोहिया का समाजवाद आया, न अंबेडकर का संविधान ही शत प्रतिशत लागू हो सका!
फिर क्यों चल रहा है ये ढोंग? यह प्रश्न न पूछ लिया जावे इसीलिए राजनीति आपको चुटकुलों, जुमलों और सोशल मीडिया के प्रोपेगैंडा में उलझाए रखेगी। इस उलझन से आपको स्वयं बाहर आना होगा अन्यथा ये उलझन एक दिन आपकी आगामी पीढ़ियों के लिए फाँसी बन जाएगी।
चिराग़ जैन
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एक प्रश्न देश के लगभग प्रत्येक मस्तिष्क को परेशान किये हुए है कि चुनावी रैलियों में कोरोना क्यों नहीं फैल रहा। और जैसा कि हमारे समाज का चलन हो गया है, इस प्रश्न में भी प्रश्न से पहले मोदी विरोधी या मोदी समर्थक की तलाश की जाने लगी है। जबकि हक़ीक़त यह है कि आमूल-चूल राजनीति इस विषय पर एक साथ है। जनता मरती है तो मरे, हमें रैलियों में भीड़ जुटाकर न्यूट्रल वोट डायवर्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़नी है।
लोककल्याणकारी गणराज्य के इस भौंडे नाटक में चरित्रहीन अभिनेता की भूमिका निभानेवाला चुनाव आयोग भी चुनावी रैलियों के लिये बनाए गए कोविड नियमों को बिसराकर देश के गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तक के हठयोग का लुत्फ़ उठा रहा है।
न्यायपालिका ने अपने लिए कॉमेडियन की भूमिका चयन की है। वह ऐसे-ऐसे नियम बना रही है कि उनमें लॉजिक तलाशने की गरज से निकलो तो अपने सिर के बाल नोचने से पहले हाथ नहीं रुकेंगे।
बहरहाल, राजनीति और व्यवस्था के इस आचरण ने जनता का केवल एक नुकसान किया है कि जनता कोविड की गम्भीरता को लेकर संशय में आ गयी है। लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि यदि कोविड इतना ख़तरनाक है तो राजनेता जैसी डरपोक स्पीशीज़ को इससे डर क्यों नहीं लग रहा।
संशय जायज़ है, किन्तु चुनाव एक ऐसा नशा है जिसमें जनहित तो क्या आत्महित की भी बलि चढ़ाने से राजनेता नहीं चूक सकते। इसलिए राजनीति के आचरण को देखकर कोविड के इस काल में अपने आप को ख़तरे में न डाले।
कोरोना वायरस एक बार शरीर को जकड़ ले तो पोर-पोर दुःखता है। जीवन का संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। घर-परिवार में अजीब सी दहशत व्याप्त हो जाती है। इसलिए अपनी प्रतिरोधक क्षमता का ध्यान रखिये और अपने आप को कोविड तथा राजनीति दोनों से बचाए रखें।
स्थितियाँ इतनी विकट हैं कि रैलियाँ लिखो तो भी ‘रंगरलियाँ’ टाइप हो रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
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उनकी अदालतें आपकी ज़िन्दगी घिस देंगी
फिर भी वे सामाजिक न्याय पर इतराएँगे
उनके थाने आपको नोच डालेंगे
फिर भी वे आंतरिक सुरक्षा पर फ़ख़्र करेंगे
देश के कुछ हिस्सों में संविधान लागू नहीं होगा
फिर भी वे प्रभुसत्ता सम्पन्न होने का दम्भ भरेंगे
वे अतिक्रमण करने वालों के हाथ जोड़ेंगे
वे समय पर टैक्स देने वालों की कमर तोड़ेंगे
पर हम यह सब चुपचाप देखते रहेंगे
क्योंकि हमें दिन-रात पिस-पिसकर
वो टैक्स का पैसा जुटाना है
जिसका हिसाब मांगने का अधिकार
हमें नहीं दिया जाएगा
लोकतंत्रात्मक गणराज्य के
इस फूहड़ नाटक से
पर्दा या प्रश्न उठाने वाले को
राष्ट्रद्रोह, न्यायालय की अवमानना और
संसद के विशेषाधिकार उल्लंघन का
दोषी मान लिया जाएगा।
राष्ट्रवादियों की सरकार हो
और मैंने आवाज़ उठाई
तो मुझे वामपंथी कहकर
नकार दिया जाएगा।
सेक्युलरों की सरकार हो
और मैंने बोलना चाहा
तो मुझे साम्प्रदायिक कहकर
मेरा तिरस्कार किया जाएगा!
वामपंथी सरकार हो और मैं बोला
तो मुझे पूंजीपति मान लिया जाएगा।
हर दल ने
अपने ऊपर उठने वाले प्रश्नों से
बचने के लिए
कोई न कोई शब्द गढ़ रखा है
ताकि जनता के सवालों से
उलझे बिना
आगे बढ़ा जा सके
ताकि जब कोई ‘नागरिक’
सवाल पूछे ‘अपनी सरकार से’
तो उसकी ज़ुबान पर
उस एक शब्द का ताला जड़ा जा सके।
✍️ चिराग़ जैन
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कोरोना की वर्तमान स्थिति भयावह है। जनता को चाहिए कि अपनी सुरक्षा के लिए सरकारी नियमों का पालन करे। बाज़ारों में भीड़ देखकर सरकार को घबराहट होती है। जनता होली जैसे अनावश्यक त्योहारों की आड़ लेकर समारोह करने की सोच रही है। लोग, होली मंगल मिलन जैसे बेहूदे कामों के लिये इकट्ठा हो रहे हैं। शर्म आनी चाहिए इस देश की जनता को। घर पर नहीं रह सकते?
सरकार को मजबूर होकर जनहित में सख्ती करनी पड़ती है। विवश होकर पुलिसवालों को कहना पड़ता है कि जो भी बिना मास्क दिखे उसको धर लो। और भी कुछ नहीं तो रिश्तेदारों के साथ ही होली खेलने चल दोगे! लज्जा नहीं आती? कोरोना से डर नहीं लगता? अरे मूर्खाे, अपनी नहीं तो औरों की जान की ही परवाह कर लो!
इस देश के महान राजनेता अपनी जान पर खेलकर लाखों लोगों की रैलियाँ कर रहे हैं ताकि लोकतंत्र बचा रह सके। कभी सोचा है कि कैसा लगता होगा जब दिल्ली में सोशल डिस्टेंस की सख्त नियमावली लागू करके बंगाल में लाखों लोगों की भीड़ के सामने मास्क हटाकर भाषण झाड़ना पड़ता है। कभी कल्पना की है कि अपनी आत्मा को क्या मुँह दिखाते होंगे बेचारे राजनेता!
महाराष्ट्र में लाखों केस आ गये, लेकिन हमारे राजनेता प्रदेश में गहराए राजनैतिक संकट से जूझने के लिए मंत्रालय, राजभवन, दिल्ली और प्रेस वार्ताओं में भागे फिर रहे हैं। कोरोना की जानलेवा दहशत को ताक पर रखकर, सरकारी गाइडलाइंस को धता बताकर भी कुर्सी की क़वायद में लगे हुए हैं। और तुम बस दो वक़्त की रोटी के लालच में धंधे-पानी पर निकल रहे हो। चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए ऐसी नाकारा जनता को।
क्या हो जाएगा अगर स्कूल नहीं खुलेंगे? क्या हो जाएगा अगर दफ़्तरों में काम नहीं होगा? क्या आफ़त आ जाएगी अगर लोग त्योहारों पर एक-दूसरे से नहीं मिलेंगे? कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा अगर होली पर बिटिया के घर गुंजिया लेकर नहीं जा सकोगे? …इन सब टुच्ची बातों की तुलना चुनाव की महत्ता से करते हो?
उधर किसान आफ़त मचाए हुए हैं। इतने साल से अपने खेतों से कमा रहे थे ना! तब कौन से ताजमहल बना लिए तुमने। तब भी तुम फाँसी लगा-लगाकर मर रहे थे। अब सरकार जो कर रही है, उसे करने दो। इतनी हाय-तौबा क्यों? आकर बैठ गए हो दिल्ली बॉर्डर पर। …पड़े रहो। सरकार के पास क्या यही काम है कि तुम्हारा रोना सुनती रहे।
कभी बैठे हो सरकार में? कभी जाना है राजनीति किस चिड़िया का नाम है। सरकार के पास इन सब फालतू बातों के लिए वक़्त नहीं है, उसे चुनाव लड़ना है। चुनाव कोई हँसी-मज़ाक़ नहीं है। यह लोकतंत्र की आत्मा है। अब लोक के रोने-पीटने में लोकतंत्र को तो नहीं इग्नोर कर सकते ना! इसलिए ख़बरदार, अगर होली-वोली जैसे फालतू बहाने लेकर घर से बाहर क़दम निकाला तो!
✍️ चिराग़ जैन
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न्यूज़ बुलेटिन देखो तो दिमाग़ भन्ना जाता है। एक ख़बर बताती है कि कोरोना के डर के चलते मध्यप्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र में सरकारी नियमों में सख्ती। कोरोना के डर के कारण पंजाब सरकार ने बच्चों की परीक्षाएँ रद्द की। महाराष्ट्र के कुछ शहरों में नाइट कर्फ्यू। दिल्ली में 200 लोगों से ज़्यादा की सभा की मनाही। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ने कुम्भ पर लगाए प्रतिबंध हटाने को बताया जोखि़म भरा काम।
हम इन ख़बरों से डरने लगते हैं। जनहित के प्रति सरकार की गम्भीरता देखकर मन सरकार के प्रति श्रद्धा से भर जाता है। तभी ख़बर आती है कि खड़गपुर में केन्द्रीय गृहमंत्री की रैली में उमड़ी भारी भीड़। यह ख़बर देखते ही हमारी श्रद्धा की गति की दुर्गति हो जाती है। फिर एंकर बताती है कि ममता बनर्जी ने रैली में किया शक्ति प्रदर्शन। …हमारी श्रद्धा मुँह बाये हमारा थोबड़ा देखने लगती है। फिर पता चलता है कि तमिलनाडु, असम, पुदुच्चेरी, पश्चिम बंगाल और केरल में जमकर चुनावी रैलियाँ हो रही हैं, जहाँ ज़्यादा से ज़्यादा भीड़ दिखाना राजनेताओं की सफलता का मापदण्ड है। इसलिए सरकारों ने कोरोना को समझा दिया है कि तुम्हें कब किस रूट पर रहना है।
सरकार जानती है कि इस देश की जनता अनुशासित नहीं है। इसलिए सरकार ने जनता को अनुशासन में रखने के लिए कड़े कानून बनाए हैं। जैसे फ्लाइट में जाओ, तो एयरपोर्ट पर एक सीट छोड़कर बैठो लेकिन जहाज में एक-दूसरे से चिपककर बैठ सकते हो। क्योंकि सरकार ने कोरोना को समझा दिया है कि फ्लाइट में चिपकने पर मत फैलना।
ऐसे ही फ्लाइट में मास्क लगाकर बैठना ज़रूरी है क्योंकि एक-दूसरे की साँस से संक्रमण फैल सकता है। लेकिन जब एयर होस्टेस खाना बाँटती है, तब सभी यात्री अपना मास्क हटाकर एक-दूसरे से सटे हुए वातानुकूलित कम्पाउंड में बेझिझक खा सकते हैं, क्योंकि उतनी देर के लिए सरकार कोरोना का स्विच ऑफ कर देती है।
कोविड प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से बात करने के लिए शीर्ष नेता वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करके जनता को यह बताएंगे कि सोशल डिस्टेंसिंग का पालन कितना जरूरी है। लेकिन बंगाल में वही शीर्ष नेता उन्हीं मुख्यमंत्री के साथ हाथ से हाथ मिलाकर जनता को बताते हैं कि यहाँ कोरोना का स्विच ऑफ है।
स्टेडियम में लाखों लोग बिना मास्क के उछल-उछलकर मैच देखते हैं तो कोरोना नहीं फैलता, क्योंकि वहाँ सरकार ने कोरोना का स्विच ऑफ कर दिया है। लेकिन बिटिया की विदाई के समय यदि बारातियों की संख्या अधिक हुई तो कोरोना फैलने का डर रहता है, इसलिए सरकार वहाँ पुलिस भेज देती है। पुलिसवाला ऑफिशियली या अन-ऑफिशियली कुछ चार्ज लेता है और कोरोना का स्विच ऑफ करके चला जाता है।
अंतिम संस्कार में बीस से ज़्यादा लोग न हों क्योंकि वहाँ स्विच ऑफ नहीं किया गया है। यह स्विच ऑफ करवाने का उपाय सरकार जानती है, इसीलिए जिस प्रदेश में जिस सरकार को जो करना हो, वह कर लेती है। उसके पास कोरोना का स्विच है। लेकिन जनता को छूट दे दी गयी तो बेचारा कोरोना कहाँ जाएगा? और कोरोना चला गया तो न्यूज़ चैनल्स को बाक़ी ख़बरें दिखानी पड़ेंगी। और हमारे लोककल्याणकारी गणराज्य की सरकारें यह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगी कि न्यूज़ चैनल्स ख़बरों में पेट्रोल डालने का काम करें।
न्यूज़ एंकर बताती है कि बाज़ारों में लोग लापरवाही कर रहे हैं इसलिए सरकार को सख्त होना पड़ रहा है। और अगली ही ख़बर में किसी राजनेता का रोड शो या रैली दिखाई जाती है, जहाँ न कोई मास्क है, न कोई सेनेटाइजर, न कोई सोशल डिस्टेंसिंग… लेकिन यहाँ तो स्विच ऑफ है।
मध्यप्रदेश में उपचुनाव थे, तब वहाँ स्विच ऑफ था लेकिन अब वहाँ धारा 144 लागू है। पंजाब में हाल ही में चुनाव हुए और चुनाव ख़़त्म होते ही कोरोना का स्विच ऑन हो गया। गुजरात में हाल ही में चुनाव हुए और अब वहाँ कोरोना है। बंगाल में अभी चुनाव हो रहे हैं इसलिए कोरोना की हिम्मत नहीं है कि वहाँ एंट्री कर ले।
सरकार ने कोविड को अच्छे से समझा दिया है कि पश्चिम बंगाल में इन दिनों चुनाव का माहौल है। देश के महत्वपूर्ण जननायकों को जनता से संवाद करके वोट मांगने हैं। यह लोकतंत्र के लिए ज़रूरी है। लेकिन बच्चों की परीक्षा को टाल सकते हैं क्योंकि शिक्षा चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। बाज़ारों में धारा 144 लागू है क्योंकि जीना चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। कुम्भ और उर्स जैसे धार्मिक कार्यक्रमों में सावधानी बरतनी ज़रूरी है, क्योंकि धर्म भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है। अंतिम संस्कार में सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि मरना भी चुनाव से ज़्यादा ज़रूरी नहीं है।
✍️ चिराग़ जैन