+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

फिर आया सूरज

दिन भर आग बबूला होकर
दम्भ दहक का बोझा ढोकर
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने
नदिया की कलकल धारा से शीतलता पाने

मरना देखा, जीना देखा
सबका दामन झीना देखा
दौलत के सिर छाया देखी
श्रम के माथ पसीना देखा
रूप गया क़िस्मत के द्वारे, दो रोटी खाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

भोर भये मैं सबको भाया
सांझ ढले जग ने बिसराया
दोपहरी में कोई मुझको
आँख उठा कर देख न पाया
जिसने इस जग को गरियाया, जग उसको जाने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

चंदा डूबा दूर हुआ था
मैं अम्बर का नूर हुआ था
शाम हुई फिर चाँद उगा तो
मान तड़क कर चूर हुआ था
ढलते की सुधि छोड़ चले सब, उगते को माने
सांझ ढले फिर आया सूरज दो पल बतियाने

✍️ चिराग़ जैन

गुनगुनाते रहो

जो मिले बस उसे ही निभाते रहो
वक़्त के साज पर गुनगुनाते रहो
सुख मिले तो ख़ुशी के तराने रचो
दुख मिले दर्द के गीत गाते रहो

दर्द हद से गुज़रने लगे जिस घड़ी
उस घड़ी लेखनी से शरण मांग लो
और टूटे हुए स्वप्न को बीनकर
शब्द से काव्य की सीपियाँ टाँक लो
भाग्य जब दर्द से आज़माए तुम्हें
तुम सृजन कर उसे जगमगाते रहो

क्या मिला, क्या अचानक पराया हुआ
इन सवालों का दामन नहीं थामना
जब कभी धड़कनों में विकलता बढ़े
ताल की चाल जैसा उसे साधना
अश्रुओं को रसों में अनूदित करो
और फिर देर तक मुस्कुराते रहो

एक दिन जब कथा मौन हो जाएगी
गीत ही ये कहानी पुनः गाएगा
तुम समर्पित हुए प्रीति की राह पर
पीढ़ियों को यही बात बतलाएगा
तुम सदा स्वार्थ के लोभ से हीन थे
इस अकथ की गवाही बनाते रहो

तुम अगर चाह लो पीर से टूटकर
जीवनी शक्तियों का अनादर करो
तुम अगर चाह लो दर्द की भेंट का
बाँह फैलाए सत्कार सादर करो
तुम अगर चाह लो छटपटाते रहो
तुम अगर चाह लो जग सजाते रहो

✍️ चिराग़ जैन

शोर शराबा क्यों है

रे सागर! सच-सच बतला दे
इतना शोर शराबा क्यों है
भीतर तो चुप-चुप रहता है
तट पर मार दिखावा क्यों है

मीठी नदिया के पानी को, तू है इतना प्यारा सागर
वो तो तुझमें डूब गई पर, तू ख़ारा का ख़ारा सागर
इन लहरों में इक नदिया की कलकल का परछावा क्यों है

दिन भर सूरज की गर्मी का चुप-चुप तूने भार उठाया
चंदा शीतल था तो तूने कितना भीषण ज्वार उठाया
उद्दण्डों से भय कैसा है, भद्रजनों पर धावा क्यों है

तू जग में सर्वाधिक विस्तृत, तू जग में सर्वाधिक गहरा
तू ही दुनिया भर के मोती-मूंगों का भी स्वामी ठहरा
इतना सब वैभव पाकर भी, सबसे अधिक अभागा क्यों है

✍️ चिराग़ जैन

कुछ ग़लत भी नहीं

कुछ सही भी नहीं, कुछ ग़लत भी नहीं
प्रेम फंसता नहीं ज्ञान-अज्ञान में
प्राण तो सृष्टि भर से अधर हो गए
देह उलझी रही मान-अपमान में

प्रेम ने जब हृदय को सहज कर दिया
कोई सीमा बची ही नहीं लाज की
श्याम के बालपन पर सलोनी लगी
नग्नता और निर्लज्जता आज की
लाज दो हालतों में सताती नहीं
एक अपनत्व में एक अज्ञान में

जब कभी भी समर्पण की नौका चढ़ा
प्यार बैकुंठ की देहरी पा गया
फँस गया जब कभी स्वार्थ के जाल में
बस तभी वासना का धुआं छा गया
कुछ समस्याओं में ही फँसे रह गए
कुछ मगन हो रहे हैं समाधान में

✍️ चिराग़ जैन

प्रीत का अवतरण

जब किसी राधिका ने सुरों को छुआ
लोक बस बाँसुरी में मगन हो गया
प्रेम ने फुसफुसा कर कहा जो कभी
अनहदी राग वह इक कथन हो गया

द्वार पर एक जोगी खड़ा भरतरी
एक पल में पराया किया प्रीत को
था कठिन द्वार पर भूल कर प्रेम को
पीठ पर लाद लाना किसी जीत को
पींगला की व्यथा आंख से बह चली
गोरखों को लगा आचमन हो गया

एक अनजान पथ पर बढ़ा जब कदम
दिल धड़कता रहा, पाँव कँपते रहे
अपशगुन इस घड़ी दिख न जाए हमें
आँख मूंदे हुए मन्त्र जपते रहे
प्रीत ने मुस्कुरा कर कहा- ‘बढ़ चलो!’
यूँ लगा ज्यों घटित इक शगन हो गया

था अनैतिक किसी ब्याहता के लिए
पर पुरुष से हृदय नेह को जोड़ना
नीतियाँ एक निर्णय पे सहमत हुईं
इस दिवानी को जीवित नहीं छोड़ना
हो गया जिससे मीरा का नैतिक पतन
अनुकरण योग्य वह आचरण हो गया

पीर अपनी सुनें और कविता लिखें
वक़्त इतना किसे मिल सका प्यार में
मन स्वयम् को अभी सुन नहीं पाएगा
व्यस्त है आज प्रियतम के सत्कार में
एक मन की ख़ुशी छंद में बंध गई
गीत में प्रीत अवतरण हो गया

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!