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एक प्यादे से मात पलटेगी

हर नई रुत के साथ पलटेगी
ख़ुश्बू-ए-क़ायनात पलटेगी

ये सियासत है इस सियासत में
एक प्यादे से मात पलटेगी

किसकी बातों का क्या यक़ीन करें
पीठ पलटेगी, बात पलटेगी

रंग परछाई तक का बदलेगा
सुब्ह होगी तो रात पलटेगी

तुम सँभलकर बस अपनी चाल चलो
इक न इक दिन बिसात पलटेगी

वक़्त जब-जब भी करवटें लेगा
ज़िन्दगी साथ-साथ पलटेगी

✍️ चिराग़ जैन

मैं जी उठा

सूर्य जब-जब ले के अंगड़ाई उठा
पूजने सब चल पड़े थाली उठा

मुस्कुराकर आपने देखा मुझे
और कुछ ऐसा हुआ मैं जी उठा

क्या पता किस चांद के दीदार को
कब लहर की शक्ल में पानी उठा

सांझ ढलते ही हुआ सूरज निढाल
चांद पीकर रोशनी उसकी उठा

सोच अपनी सोच को कुछ इस तरह
लफ़्ज़ से हटकर नए मानी उठा

या तो तू सबकी तरह से बात कर
या फिर अपनी बात से आंधी उठा

✍️ चिराग़ जैन

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