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पीर के गाँव

प्रेम की राह में पीर के गाँव हैं
प्रेम फिर भी हमेशा लुभावन हुआ
एक सावन बिना प्रेम पतझर बना
पतझरों ने छुआ प्रेम; सावन हुआ

जब नदी ने समुन्दर छुआ झूम कर
तब नदी की सुधा को निचोड़ा गया
अपहरण कर लिया सूर्य ने देह का
और बादल उसे ओढ़ बौरा गया
हिमशिखर में ढली, आँसुओं-सी गली
छू सकूँ फिर समुन्दर -यही मन हुआ

एक अनमोल पल की पिपासा लिए
मौन साधक जगत् में विचरता रहा
घोर तप में तपी देह जर्जर हुई
श्वास से आस का स्रोत झरता रहा
चल पड़े प्राण आनन्द के मार्ग पर
जग कहे- ‘साधना का समापन हुआ’

एक राधा कथा से नदारद हुई
एक मीरा अचानक हवा हो गई
सिसकियाँ उर्मिला की घुटीं मन ही मन
मंथरा इक अमर बद्दुआ हो गई
बस कथा ने सभी को अमर कर दिया
फिर न राघव हुए ना दशानन हुआ

✍️ चिराग़ जैन

सुजानगढ़ से जयपुर

सुजानगढ़ से जयपुर के लिए निकला हूँ। रेगिस्तानी वीराने के बीच दूर तक पसरी हुई सड़कपर फर्राटे से दौड़ती गाड़ी में घूमर बज रहा है। घूमर की धुन पर मन भी झूमरहा है और वीराना भी। प्रकृति रात में जितनी खूबसूरत हो उठती है उतनी हीभयावह भी। अँधेरा बढ़ता जा रहा है और सड़क के दूसरे छोर पर व्याप्त शून्य औरसघन होता जा रहा है। यत्र-तत्र टिमटिमाते बल्ब “उम्मीद की किरण” के मुहावरेकी गवाही दे रहे हैं या “तिनके के सहारे” की… कहना कठिन है। सड़क केकिनारे खड़े खेझड़ी के पेड़ों पर जब गाड़ी की लाइट पड़तीहै तो ऐसा लगता है जैसे रेगिस्तान के बीच कोई नाडकटी देह लम्बे लम्बे हाथफैला कर आलिंगन का निमंत्रण दे रही हो। इस बीच सड़क पर किसी जीव की आँखेंचमक उट्ठी हैं… गाड़ी जब तक उसके समीप पहुंची तब तक वे आँखें दौड़ कर अपनीदेह के पास पहुँच कर गम हो चुकी थी।अज्ञातजन्य भय अपने पूरे सौष्ठव केसाथ व्याप्त है। हर मोड़ पर किसी कौतूहल से मन ठहरने लगता है। शून्य औरप्रकाश के समागम से निर्मित हर आकृति कल्पना की छैनी से नया अनुवाद पा रहीहै। गाड़ी दौड़े जा रही है, शून्य सड़क के उस पार तनाहुआ है, घूमर गूँज रहाहै, सौन्दर्य श्यामल होता जा रहा है, भय रुचिकर होता जा रहा है, जयपुरआकांक्षाओं के निकट है और देह से दूर…. आनंद आ रहा है।
✍️ चिराग़ जैन

जलवे सुनहरे बुझ गए

रौशनी की बेतहाशा बेरुख़ी को देखकर
झूमते-गाते दरख़्तों तक के चेहरे बुझ गए
तीरगी ने इस क़दर बाँहों में आलम भर लिया
धूप के जितने भी थे जलवे सुनहरे बुझ गए

✍️ चिराग़ जैन

प्रेम की तकनीकी चुनौतियां

यूरिया का ज़ोर, हर डाल कमज़ोर, अब
चंपा की टहनिया पे लूम नहीं सकते
एमएमएस बनने का डर लगा रहता है
प्यार के नशे में अब झूम नहीं सकते
प्यार के हज़ार दुश्मन हर मोड़ पे हैं
एक-दूसरे के साथ घूम नहीं सकते
और अब मुआ हैलमेट गले पड़ गया
बाइक पे बैठ के भी चूम नहीं सकते

✍️ चिराग़ जैन

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