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कुछ देर मिलन के बाद

दो पल को प्यास मिटाकर तुम घंटों तड़पाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है
सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है
जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है
बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती है
ज्यों छोटी-छोटी सी बदली सूरज पर हावी हो जाएँ
ख़ुशियाँ भी जाते-जाते ज्यों यादों के काँटे बो जाएँ
बस ऐसा ही लगता है जब तुम घड़ी दिखाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

जैसे कटने से पहले ही फ़सलों पर पाला पड़ जाए
जैसे किसान के आंगन में मौसम का मूड बिगड़ जाए
जैसे सुन्दर सपने से जग जाना दिल को दुख देता है
जैसे घर के आंगन का बँट जाना आँखें भर देता है
जैसे मासूम परिंदों को सैयादों से डर लगता है
जैसे सजनी को साजन के बिन सूना-सा घर लगता है
बस ऐसा ही लगता है जब तुम पर्स उठाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

जैसे चकवे के बिन चकवी का जीना दूभर होता है
जैसे सीता का हृदय राम बिन सुबक-सुबक कर रोता है
जैसे रस-रंग-गंध के बिन हर पुष्प वृथा-सा लगता है
जैसे कन्हा का मुख राधा की करुण व्यथा-सा लगता है
जैसे लक्ष्मण की पत्नी के रोने पर भी पाबन्दी हों
जैसे सुग्रीवों की मुस्कानें बाली के घर बन्दी हों
बस ऐसा ही लगता है जब तुम हाथ हिलाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो

✍️ चिराग़ जैन

भाग्यवाद

यहाँ प्रारब्ध का लेखा सिकन्दर तक ने भोगा है
पड़ोसी की ख़ताओं को समन्दर तक ने भोगा है
बहुत चाहा बचाना राम ने रावण को मरने से
मग़र जो लिख गया वो तो कलन्दर तक ने भोगा है

✍️ चिराग़ जैन

हमने देखे हैं कई साथ निभानेवाले

हमने देखे हैं कई साथ निभानेवाले
बरगला लेंगे तुझे भी ये ज़मानेवाले

बारिशों में ये नदी कैसा कहर ढाती है
ये बताएंगे तुझे इसके मुहानेवाले

धूप जिस पल मिरे आंगन में उतर आएगी
और जल जाएंगे दीवार उठानेवाले

मौत ने ईसा को शोहरत की बुलंदी बख्शी
ख़ाक़ में मिल गए सूली पे चढ़ानेवाले

रास्ते सच के बहुत तंग, बहुत मुश्क़िल हैं
सोच ले ये भी ज़रा जोश में आनेवाले

अपनी ऑंखों को भी सिखला ले हुनर धोखे का
झूठी बातों से हक़ीक़त को छिपानेवाले

✍️ चिराग़ जैन

चंदनबाला

गर्भ में आने से पूर्व कुबेर नगर भर में बहुरत्न लुटावे
जन्म समय धर नेत्र हज़ार निहारे तउ सुर पार न पावे
जा की उठाने को पालकी देव मनुष्य न होने का सोग मनावे
ताहि सती इक बेड़िन में बंधी कारा में सूखा आहार करावे
✍️ चिराग़ जैन

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