Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
फिर से द्यूत सजा बैठा है
फिर बदले शकुनि ने पासे
फिर से चूक हुई विदुरों से
फिर हैं पाण्डव मौन-रुआंसे
मानवता की मर्यादा का फिर से आज क्षरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
प्रलय-समर फिर द्वार खड़ा है, पूरी है तैयारी रण की
फिर पांचाली चीख रही है, भीष्म निभाते निष्ठा प्रण की
गुरुओं की गर्दन नीची है, कुल की लज्जा अर्द्धनग्न है
दुर्योधन की जय सुन-सुनकर इक अंधा आनंदमग्न हैं
नीति-नियम की हर परिपाटी का अनवरत मरण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
पौरुष दास हुआ बैठा है, अवसरवादी ढीठ रहा है
अपमानित कुण्ठित हठधर्मी अपनी जंघा पीट रहा है
हर पापी ने इस घटना को क्रीड़ा की मदहोशी समझा
जिसने प्रश्न उठाया उसको राष्ट्रद्रोह का दोषी समझा
मातम के बादल घिर आए, यम का आमंत्रण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
यह इक पल ही समरांगण में प्रलयंकर भूचाल बनेगा
यह अपमानित भीम अधम का ध्वंस करेगा काल बनेगा
अब नीचे झुक जाने वाली हर गर्दन कटनी है रण में
केश पकड़ने वाले हाथों की छाती फटनी है रण में
ज्वार रुधिर का आज धमनियों के भीतर हर क्षण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
दुर्योधन की शठता की अनदेखी के परिणाम मिलेंगे
सौ पुत्रों के शव पर रोना, आँसू आठों याम मिलेंगे
आँखों पर पट्टी बांधी है, मधुसूदन को दोष न देना
ममता के आँचल में युग के अभिशापों को पोस न देना
अनुचित हठ के इस पोषण में अपनों का तर्पण जारी है
मूकदर्शकों के प्रांगण में फिर से चीरहरण जारी है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
भाग जाने दो कन्हैया
युद्ध भू से अर्जुनों को
यह पलायन ध्वंस के जयघोष से कितना बड़ा है
मत मनाओ
यूँ समझ लो शांति का अवसर खड़ा है
मोहवश कोई धनंजय कीर्ति को तजने लगे तो
छोड़कर गाण्डीव जो हरिनाम ही भजने लगे तो
उस समय उस त्याग की अनुगूंज का सम्मान कर लो
इस पराभव से बचेगा क्या तनिक अनुमान कर लो
उत्तरा का तेज कुछ दिन और जीवित रह सकेगा
भीष्म को कुरुकुल कई दिन तक पितामह कह सकेगा
कर्ण की जननी के सारे पुत्र जीवित रह सकेंगे
गर्भ में पलते सहस्रों भ्रूण विकसित रह सकेंगे
अग्नि का उपयोग भोजन हेतु ही होता रहेगा
अन्यथा श्मशान युग की अस्थियाँ ढोता रहेगा
मृत्यु का विकराल वैभव चैन से सोता रहे तो
मत उठाओ,
यूँ समझ लो काल पर पर्दा पड़ा है
द्रौपदी के केश तो इक दिन समय भी बांध देगा
पर सुभद्रा की उजड़ती गोद का रक्षक न कोई
सैंकड़ों अक्षौहिणी सेना सुसज्जित हैं प्रतीक्षित
डस सके इनको निजी प्रतिशोध का तक्षक न कोई
तर्क की सारी हवाएँ शांति पथ की ओर मोड़ो
हो सके तो कृष्ण पल भर के लिए हठमार्ग छोड़ो
हो सके तो यह समर प्रारम्भ होने से बचा लो
हो सके तो एक पूरा कल्प रोने से बचा लो
हो सके तो बाँसुरी की तान से झखझोर डालो
युद्ध के हर पात्र की हर इक प्रतिज्ञा तोड़ डालो
हैं सभी योद्धा किसी अपमान से आहत यहाँ; पर
मत लड़ाओ,
जो लड़ा है वो स्वयं से ही लड़ा है
इस समर से भी बड़ा इक युद्ध अर्जुन लड़ रहा है
मोह के वश आज उसका शौर्य फीका पड़ रहा है
छोड़ देना चाहता है वह सुयोधन से लड़ाई
वह न चाहेगा शवों को रौंदकर हासिल कमाई
वह न अनदेखा करेगा जननियों के आँसुओं को
वह न शोणित से भरेगा लोभ के अंधे कुओं को
ओट ले कर्तव्य की इस बार वह निर्मम न होगा
उठ चुका है ज्वार जो वैराग्य का अब कम न होगा
इस समर से प्राप्त जय का भ्रम न पालेगा धनंजय
त्याग पथ पर यश-पिपासा तोड़ डालेगा धनंजय
तर्क के मत बाण छोड़ो, और इस-उस रूप से अब
मत डराओ,
इस पलायन में समय का सुख गड़ा है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose
सिचुएशन 1 : राधा कृष्ण से प्रेम करती थीं। कृष्ण भी उनसे प्रेम करते थे। दोनों अविवाहित थे किंतु इस प्रेम पर किसी को कोई आपत्ति नहीं। निष्कर्ष : परस्पर सहमति पर आधारित संबंध स्वीकार्य है।
सिचुएशन 2 : कर्ण को द्रौपदी के स्वयंवर में भाग नहीं लेने दिया गया। रावण सीता स्वयंवर में भाग नहीं ले पाए। कर्ण ने सुयोधन के बल पर स्वयंवर के अपमान का प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। रावण ने सीता का अपहरण करके अपनी आसक्ति की तुष्टि का प्रयास किया। रावण, कर्ण, सुयोधन, सुशासन आदि सभी लोकनिंद्य होकर युद्ध में खेत हुए। निष्कर्ष : स्त्री को प्रतिशोध की अग्नि शांत करने का “सामान” समझना भयावह भूल है।
सिचुएशन 3 : शूर्पनखा लक्ष्मण पर आसक्त हुई और लक्ष्मण की असहमति के बावजूद उस पर दबाव बनाने का प्रयास किया। लक्ष्मण ने शूर्पनखा की नाक काट दी। निष्कर्ष : पुरुष की सहमति को महत्वहीन समझना स्त्री के अपमान का कारण हो सकता है।
सिचुएशन 4 : अहिल्या पर आसक्ति इंद्र का अपराध था। गौतम ऋषि को भ्रमित कर अहिल्या का बलात्कार करने की घटना में अहिल्या निर्दोष थी फिर भी गौतम ऋषि ने अहिल्या का परित्याग किया। राम ने स्वयं अहिल्या के साथ हुए अन्याय का निदान किया। निष्कर्ष : स्त्री के साथ हुए दुर्व्यवहार की उत्तरदायी स्त्री नहीं है। इस पोस्ट से हमें यह शिक्षा मिलती है कि शास्त्र पूजने की नहीं, पढ़ने की चीज़ हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Naavik ke teer, Poetry
धृतराष्ट्रों को विदुरों की हर बात कसैली लगती है
दर्पण मैला हो तो सारी शक्लें मैली लगती हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chintan ke Swar, Chirag Jain Writings, Poetry
जब-जब आयुध पर अहंकार की परत चढ़ी इतिहासों में
तब चंद्रहास को रावण-ग्रीवा भेंट मिली है ग्रासों में
जब शास्त्रनीति की अनदेखी कर, तीर चलाए जाते हैं
तब अर्द्धरात्रि में सोते बच्चे मार गिराए जाते हैं
अविवेक शक्त हो जाए तो, हर रेख लांघता रण तय है
नि:शस्त्रो की हिंसा तय है, गर्भस्थों का तर्पण तय है
जब धर्म विफल हो जाता है, आवेशों को समझाने में
तब द्रोणपुत्र को देर नहीं लगती पिशाच बन जाने में
ऋषिकुल से जब भी ग्रहण किये दुर्द्धर्ष शस्त्र रघुबीरों ने
मंत्रों से मन को शुद्ध किया ऋषियों ने और फकीरों ने
यह शस्त्रशुद्धि का उपक्रम केवल ढोंग नहीं, आवश्यक है
यह शक्ति-शौर्य को इंगित है कि दुरुपयोग निजघातक है
रण में जब क्रोध चढ़े सिर पर, रणचण्डी तांडव करती हो
जब काल खड़ा गुर्राता हो, जब भू पर मौत विचरती हो
जब युद्ध चरम पर आ पहुँचे, जब तप्त शिराएँ दहती हों
जब शव पर चलना पड़ता हो, जब रक्त तटीना बहती हो
जब भले बुरे का भान न हो, जब नेत्र बड़े हो जाते हों
जब जबड़े भिंचने लगते हों, जब रोम खड़े हो जाते हों
जब अपने घावों की पीड़ा का ध्यान न हो, आभास न हो
जब महासमर में ध्वंस मचाने में कोई संत्रास न हो
जब हृदय शून्य हो जाता हो, मस्तिष्क गौण हो जाता हो
जब देह शेष रह जाती हो, कारुण्य मौन हो जाता हो
जब क्रोध धधकता हो भीषण, सारा विवेक खो जाता हो
वैरी का लोहू पी-पीकर, जब नर, पिशाच हो जाता हो
ऐसे आवेगुद्वेगों में संयत रहने का ध्यान रहे
विध्वंस मचाने से पहले मानवता का कुछ भान रहे
शर का संधान करे उस क्षण, दो नयन निमीलित हो जाएँ
आक्रोश, क्रोध, आवेश, ध्वंस इक क्षण को कीलित हो जाएँ
गाण्डीव उठाए जब अर्जुन, उस पल उसको यह भास रहे
छूटा शर लौट न पाएगा, बस इतना भर अहसास रहे
दिव्यास्त्र साधने से पहले, योधा पल भर यह ध्यान धरे
क्या यह क्षण टल भी सकता है, इसका उत्तर अनुमान करे
झंझा के तेज झखोरे में, अंतर दीपक को आड़ मिले
हिंसा से घिरते चेतन को, सत्पथ का एक किवाड़ मिले
इस हेतु दहकते शोलों पर, थोड़ी बौछार ज़रूरी है
इस हेतु शस्त्र संधान समय में मंत्रोच्चार ज़रूरी है
✍️ चिराग़ जैन