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शब्द नहीं चुके, हम चूके हैं

हिंदी की वर्तनी में कई बार हम ऐसी चूक कर देते हैं, जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लापरवाही के कारण कोई-कोई भूल परंपरा भी बन जाती है और फिर शब्दकोष पलटने के आलस्य के कारण समाचार पत्रों में विद्यमान “विद्वान” उसे प्रचलित प्रयोग का नाम देकर स्वीकार्य मान लेते हैं। उसके बाद कर्मठ सरकारी कर्मचारियों की कृपा से सरकारी दस्तावेज़ और सार्वजनिक सूचना पट्ट तक इस संक्रमण के प्रभाव में आ जाते हैं। आज मैं कुछ ऐसे ही “प्रचलित प्रयोगों” की वास्तविकता का स्मरण करूँगा।

(1)
अंतरराष्ट्रीय = अंतर + राष्ट्रीय = INTERnational (involving two or more countries)
अन्तर्राष्ट्रीय = अंतः + राष्ट्रीय = INTRA-national (within one nation)

(2)
ग्रह, गृह, ग्रहण, गृहिणी
ग् + र + ह = ग्रह = बुध, शुक्र, मंगल आदि आकाशस्थ पिण्ड
ग् + ऋ + ह = गृह = घर
ठीक यही चूक हम ग्रहण और गृहिणी की वर्तनी में भी करते हैं।
ग्रहण शब्द का अर्थ “पकड़ने की क्रिया” से जुड़ा है। अंग्रेजी में इसको Assumption और Eclipse के रूप में समझा जा सकता है। गृहिणी का अर्थ है “घर की स्वामिनी”। अंग्रेजी में इसे Mistress या Housewife कहते हैं।

सूर्य पर ग्रहण लगता है तो गृहिणियाँ पूजन-पाठ करने लगती हैं। पाणिग्रहण के बाद कन्या गृहिणी बन गई। कुण्डली में द्वादश गृह (घर) और नव ग्रह होते हैं।

(3)
‘न’ और ‘ना’
ये दोनों देखने में एक जैसे लगते हैं किन्तु अर्थ की दृष्टि से लगभग विलोम हैं।
“न” निषेधात्मक अर्थ देता है और सामान्यतया वाक्य के अंत में नहीं आता। जैसे – “न जाइये”, “आप न कर सकेंगे”, “अब न रहे” इत्यादि।
“ना” अनुरोधात्मक होता है और वाक्य के अंत में ही आता है।
यथा, “जाइये ना!”; “सुधारिये ना!”;
“न जाइये ना!” -इस वाक्य में यदि “ना” न लगता तो यह आदेशात्मक वाक्य होता किन्तु “ना” ने इसे अनुरोधात्मक बना दिया। है ना!

(4)
जूठा और झूठा
जूठा (जूठन) = खाने-पीने से बचा हुआ।
झूठा = असत्य बोलने वाला।
बोली में झूठ और थाली में जूठ बुरी होती है।

(5)
कई बार अच्छी हिंदी लिखने के चक्कर में हम हास्यास्पद हो जाते हैं। विवाह का निमंत्रण देते समय घर के मुखिया का नाम लिखकर साथ में ‘सपरिवार’ लिखा जाता है। यहाँ तक ठीक है।
सपरिवार = परिवार सहित
किन्तु आजकल कुछ लोगों ने कुछ अलग करने के चक्कर में “सहपरिवार” लिखना शुरू कर दिया है। इस सहपरिवार को सहन करना बहुत मुश्किल है। कुछ लोग इससे भी आगे बढ़कर ज़्यादा ज़ोर डालने के लिए “सपरिवार सहित” लिखने लगे हैं। उपसर्ग लगाने के बाद अलग से सहित लिखकर आप हिंदी का अहित कर रहे हैं।
‘स’ उपसर्ग लगाने से शब्द में सहित का अर्थ सम्मिलित हो जाता है, अलग से भाव स्पष्ट करके सामने वाले की अर्थग्राह्यता पर प्रश्नचिन्ह न लगाएँ।

(6)
“फ” और “फ़” में हम अक्सर भूल करते हैं। फ = PH फ़ = F देवनागरी की मूल वर्णमाला में “F” की ध्वनि के लिए कोई वर्ण नहीं है, किन्तु फ़ारसी और अंग्रेजी के शब्दों का जब हमारी शब्दावली में सम्मिलन हुआ तो इस ध्वनि की आवश्यकता पड़ी। इसलिए “फ़” चिन्ह को इस ध्वनि के लिए सुनिश्चित किया गया। अब हम लगभग एक जैसा चिन्ह देखकर भ्रमित हो जाते हैं और फिर (PHIR) को फ़िर (FIR) बोलते फिरते हैं। यही चूक हम अन्य शब्दों में भी करते हैं। लिखते हैं फोन (PHONE) और बोलते हैं फ़ोन (FONE) थोड़ा ध्यान रखें, आगे से ये हेराफेरी करने से बचें।

(7)
नमस्कार! यह शब्द ‘नमस्कार’ मूलतः संस्कृत का शब्द है। इसमें नमः + कार होने से विसर्ग संधि के नियमानुसार नमस्कार बनता है। ठीक वैसे ही ज्यों नमः + ते = नमस्ते हो जाता है। “नमस्ते” का सौभाग्य यह है कि उसे सब लोग “नमस्ते” ही बोलते हैं, किन्तु ‘नमस्कार’ बेचारा ‘नमश्कार’ बोला जाने लगा। सज्जनो! हमने इस नमश्कार से बहुत से अभिवादन दूषित किए हैं। कृपया आज से अपने “नमस्कार” को सुधार लें।

(8)
राज़ की बात यह है कि राज किसी का भी हमेशा नहीं रहता
राज (हिंदी) = शासन = Rule
राज़ (उर्दू) = रहस्य = Secret

(9)
गढ़ना और गड़ना
स्वर्णकार ने ख़ूबसूरत आभूषण “गढ़े” और उन्हें चोरों से बचाने के लिए ज़मीन में “गाड़” दिया।
नोट : गढ़ का एक अर्थ दुर्ग भी होता है।

(10)
ड़ और ड चिह्न का आकार तथा उच्चारण ध्वनि के कारण ‘ड’ और ‘ड़’ में लोग चूक करते हैं। जबकि इनका बिल्कुल सही प्रयोग करना बेहद आसान है। इसके लिए निम्न बिंदुओं का ध्यान रखना होगा :- .
1) ‘ड़’ कभी भी शब्द के प्रारंभ में नहीं आ सकता। इसलिये यदि यह शब्द के प्रारंभ में है तो निश्चित रूप से ‘ड’ ही होगा। जैसे डगर, डायन, डेरा, डाकिया।
2) हिंदी के शब्द के बीच में या अंत में सामान्यतया ‘ड़’ ही होगा। जैसे कड़क, धड़कन, भाड़, झाड़ी, ताड़ना।

अपवाद : 1) संयुक्ताक्षर या अर्द्धाक्षर के साथ कभी भी ‘ड़’ नहीं लगेगा। चाहे वह शब्द के बीच में या अंत में ही क्यों न हो। जैसे काण्ड, आडम्बर, ठण्ड, हाण्डी, खड्डा, गड्ढा, गुड्डा।
2) अंग्रेजी की वर्णमाला में ‘ड़’ के लिए कोई चिन्ह ही नहीं है। अतः इस भाषा से हिंदी में आए शब्दों में ‘ड़’ की ध्वनि की संभावना ही नहीं है। सो, अंग्रेजी के शब्दों में हमेशा ‘ड’ ही प्रयुक्त होगा। जैसे :- गुड, लीडर, राडार।
3) ‘ड’ से प्रारम्भ होने वाले किसी शब्द से पूर्व यदि उपसर्ग, संधि अथवा समास के कारण कोई अक्षर या शब्द जुड़ता है तो उसमें मूल शब्द का सिद्धांत ही बना रहता है। जैसे ‘निडर’ शब्द में डर से पहले नि उपसर्ग जुड़ने के कारण ‘ड’ बीच में आ गया है, लेकिन इसमें ‘ड’ ही बना रहेगा। उसे बदलकर ‘निड़र’ नहीं किया जाएगा।
नोट : ये सभी नियम ‘ढ’ तथा ‘ढ़’ के प्रयोग में भी समान रूप से लागू होते हैं।

(11)
हँसी और हसीं
हँसी = खिलखिलाहट
हसीं = हसीन, ख़ूबसूरत
उर्दू में जो शब्द ‘न’ पर समाप्त होते हैं उनमें ‘न’ को अनुस्वार से रूपांतरित करने की परंपरा है। (संस्कृत में भी ‘म्’ पर समाप्त होने वाले शब्दों में अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है जैसे ‘देवम्’ को ‘देवं’ लिखा जा सकता है।) ‘हसीन’ का ‘हसीं’; ‘आसमान’ को ‘आसमां’; ‘जुनून’ को ‘जुनूं’ इसी नियम के तहत लिखा जाता है। इसलिए जब किसी की ख़ूबसूरती की बात करनी हो तो उसे ‘हसीं’ कहना, वरना लोग आपकी ‘हँसी’ उड़ाएंगे।

(12)
कृपा और कृपया
1) ‘कृपया’ शब्द में आधा प प्रयोग करके ‘कृप्या’ लिखने से कृपा रुक जाती है।
2) एक वाक्य में एक बार से अधिक कृपा मांगी जाए तो भद्दा लगता है। इसलिए यदि वाक्य के प्रारंभ में ‘कृपया’ प्रयोग किया गया है तो उसमें दोबारा कृपा करने के लिए न कहें। नीचे कुछ उदाहरण देखें :-
“कृपया अपनी थाली स्वयं उठाएँ!” – यद्यपि इस वाक्य में आदेश दिया गया है किन्तु ‘कृपया’ लगने से यह अनुरोधात्मक बन गया है। यदि हम यह लिखें कि ‘अपनी थाली स्वयं उठाने की कृपा करें।’ तो भी इसका स्वरूप समान रहेगा। चूँकि वाक्य के प्रारंभ में ‘कृपया’ लगाने से ‘कृपापूर्वक’ का आशय प्राप्त होता है, इसलिए पुनः ‘कृपा’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती।
सामान्यतया कार्यालयी पत्र व्यवहार में अधिकारी को लिखे गए पत्रों में यह चूक अधिक दिखाई देती है। यथा, ‘कृपया दो दिन का अवकाश देने की कृपा करें।’ या ‘कृपया मुझे स्टेशन छोड़ने की अनुमति दें, आपकी अति कृपा होगी।’ – इन वाक्यों में अनुरोध गिड़गिड़ाहट से भी ज़्यादा लिजलिजा हो जाता है।

(13)
कार्यवाही (हिंदी) = Proceedings
कार्रवाई (फ़ारसी)= Action
अदालत में कार्यवाही के दौरान पूछा गया कि शिक़ायत मिलने पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की। .
किसी समाधान तक पहुँचने के लिए सभा आदि में चलने वाली प्रक्रिया को कार्यवाही कहते हैं। किसी कार्यवाही से प्राप्त आदेशों के आधार पर समस्या का समाधान करने हेतु किया जाने वाला कार्य कार्रवाई कहलाता है।

(14)
रु और रू
अन्य किसी भी वर्ण पर ‘उ’ अथवा ‘ऊ’ की मात्रा लगाने में हम चूक नहीं करते किन्तु ‘र’ के साथ अक़्सर यह लापरवाही हो जाती है। थोड़ा ध्यान से देखें। इन दोनों पर लगने वाली मात्रा का आकार भिन्न है। याद करें कि आप र वर्ण पर उ/ऊ की मात्रा लगाते समय लघु अथवा दीर्घ का अंतर करते हैं या नहीं। ‘रुक’ कर सोचें, नहीं तो शब्द ‘रूठ’ जाएंगे।

(15)
जगत् और जगत
जगत् = संसार, दुनिया, शिव
जगत = कुएँ की मेढ़, कुएँ के चारों ओर का चबूतरा
‘जगत्’ संस्कृत का शब्द है और ‘जगत’ हिंदी का। हम सामान्यतया हिंदी में ‘जगत’ लिखकर समझ लेते हैं कि हमने सारा संसार लिख दिया, लेकिन वास्तव में हम तब अपनी दुनिया को कुएँ तक सीमित कर रहे होते हैं।

(16)
जब हम किसी शब्द को संबोधन के लिए प्रयोग करते हैं तो उसमें बहुवचन होने पर भी अनुस्वार नहीं लगता। जैसे :-
बच्चो! स्कूल जाओ।
मित्रो! एक-दूसरे का सहयोग करो।
भाइयो और बहनो! देश का विकास करो।
दिल्लीवालो! दिल्ली को साफ़ रखो।

ये ही शब्द जब संबोधन से इतर कहीं प्रयुक्त हों तो इनमें अनुस्वार लगेगा। जैसे :-
बच्चों ने पाठ पढ़ा।
मित्रों के साथ आनंद आया।
भाइयों की सहायता करो।
बहनों ने अपने-अपने भाइयों को राखी बांधी।
दिल्लीवालों की बात ही कुछ और है।

बच्चो! अपने मित्रों की सहायता करो।
भाइयो और बहनो! मैं सभी दिल्लीवालों को आश्वस्त करता हूँ कि उनके बच्चों के स्कूलों के हालात सुधरेंगे।

(17)
दिया और दीया
दिया : यह एक सकर्मक क्रिया है जो कुछ देने के अर्थ में प्रयोग की जाती है। किसी कार्य के सम्पन्न कर देने के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए भी इस शब्द का प्रयोग किया जाता है।
दीया : दीपक
गृहिणी ने आँगन में ‘दीया’ रख ‘दिया’। ईश्वर ने सबको उसकी क्षमता के अनुसार दुःख ‘दिया’ है।

(18)
दादा और दद्दा
दादा (हिंदी) : पितामह (पिता का पिता)
दद्दा (बांग्ला) : अग्रज (बड़ा भाई) .
कला के क्षेत्र में जब कोई कनिष्ठ कलाकार किसी वरिष्ठ से मिलता है तो सामान्यतया ‘दद्दा’ कहकर संबोधित करता है। यह चलन तब से चला जब कला की गलियों में बंगाली लोगों का वर्चस्व हुआ। ‘दद्दा’ संबोधन ऐसे ही है जैसे हम सामान्य व्यवहार में किसी को भाईसाहब कहते हैं। कुछ लोग अनजाने में ‘दादा’ कह बैठते हैं। जब अपनी आयु से छह-सात वर्ष अधिक के व्यक्ति को कोई ‘दादा’ कहता है तो हास्यास्पद लगता है।

(19)
अर्थी और अरथी
अर्थी : अपेक्षा रखने वाला
अरथी : बाँस और फूस से तैयार वाहन, जिस पर बांधकर शव को मरघट ले जाया जाता है।
आजकल विद्यार्थी (विद्या+अर्थी) ही विद्या की अरथी निकालने पर तुले हैं।

(20)
कढ़ाई, कड़ाही और कड़ाई
कढ़ाई : क़सीदे निकालने का काम
कड़ाही : एक चौड़ा पात्र जो आँच पर रखकर पकाने के काम आता है
कड़ाई : सख़्ती
इन तीनों शब्दों का उच्चारण बहुत निकट का है अतः इनमें हम अक्सर चूक कर देते हैं। बस, ज़रा सी सावधानी से इस चूक से बचा जा सकता है। लड़की कढ़ाई करके सपनों का नाम लिखती है, लेकिन सौतेली माँ कड़ाई करती है कि लड़कियों को चूल्हे-चौके में ही ध्यान लगाना चाहिए। बेचारी लड़की, चुपचाप अपने सपनों को कड़ाही के नीचे भभकती आग में झोंक देती है।

(21)
‘र’ अक्षर पैरों में पड़ा हो तो पूरा होता है और सिर पर चढ़ जाए तो आधा हो जाता है। ‘कर्म’ में ‘र’ आधा है, जबकि ‘क्रम’ में ‘र’ पूरा है। जिसके सिर पर चढ़ता है उससे पहले बोलता है और जिसके पैरों में पड़ता है उसके बाद बोलता है। इस सिद्धांत को आप ध्यान रखेंगे तो कभी भी ‘आशीर्वाद’ लिखने में चूक नहीं होगी।

(22)
अनुस्वार (ं)
क ख ग घ ङ
च छ ज झ ञ
ट ठ ड ढ ण
त थ द ध न
प फ ब भ म

इन पाँच वर्गों में क्रमशः ङ, ञ, ण, न और म पंचम अक्षर हैं
1) पंचमाक्षर के बाद यदि उसी वर्ग का कोई व्यंजन हो तो वहाँ ‘हिंदी’ में अनुस्वार से रूपांतरित किया जा सकता है। जैसे दण्ड में ड से पूर्व ण् की ध्वनि है इसलिए इसको ‘दंड’ लिखा जा सकता है। इसी प्रकार चंचल, चंद्रमा, झंझा, पंथ, गंगा, कंपन आदि भी हिंदी में मान्य हैं। किन्तु संस्कृत लिखते समय पञ्चमाक्षर को अनुस्वार रूप में लिखना मान्य नहीं है।
2) पंचमाक्षर के उपरांत यदि किसी अन्य वर्ग का व्यंजन हो तो अनिवार्य रूप से पंचमाक्षर ही लिखना होगा। जैसे : अन्य, उन्मत्त, उन्मुख। यहाँ अनुस्वार से रूपांतरण मान्य नहीं होगा।
3) यदि कहीं पर पंचमाक्षर की पुनरावृत्ति हो तो भी अनुस्वार से रूपांतरण नहीं होगा। जैसे : विभिन्न, सम्मोहन, सम्मत, सम्मान।
4) संस्कृत के शब्दों में यदि अंत में अनुस्वार है तो वह ‘म्’ का द्योतक है। यथा : अहं (अहम्), एवं (एवम्)।

अनुनासिकता चिह्‍न / चंद्रबिंदु (ँ) चंद्रबिंदु वर्ण नहीं है। यह स्वर का नासिक्य विकार है। इसमें स्वरों के उच्चारण में नाक से भी व्युस्राव होता है। जैसे : गाँठ, पराँठा, जहाँ, हँसना, गाँव, गँवार। सामान्यतया, इस ध्वनि के लिए चंद्रबिंदु लगाने का ही प्रावधान है किंतु जहाँ पर शिरोरेखा से ऊपर मात्रा लगती हो वहाँ यदि अनुनासिक ध्वनि है तो मुद्रण की भ्रांति से बचने के लिए चंद्रबिंदु की जगह केवल बिंदी (अनुस्वार) लगाया जाता है, जैसे : नहीं, में, भैंस, मैं आदि।

विशेष : मात्रा गणना के समय अनुस्वार की मात्रा गिनी जाती है किंतु अनुनासिकता की मात्रा नहीं गिनी जाती। कंठ 2 l संतान 2 2 l चंचल 2 l l हंस 2 l हँस l l चँवर l l l धँसी l 2

(23)
आकलन
आकलन हिंदी भाषा का शब्द है, जिसे सामान्यतया पूर्वानुमान द्वारा गणना करने के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। कुछ जगह लोग इसको आंकलन लिखने लगे हैं। किन्तु इस शब्द में अनुस्वार या चंद्रबिंदु नहीं लगता। अंक से बनने वाला शब्द आँकड़ा उन्हें भ्रमित करता होगा किन्तु हर आकलन का संबंध आँकड़ों से नहीं होता।

(24)
सफल और विफल
सफल = स + फल (फल से युक्त) विफल = वि + फल (फल से रहित) ‘सफल’ में फल ‘धातु’ पर ‘स’ उपसर्ग लगा हुआ है। जो लोग इसका विलोम ‘असफल’ लिखते या बोलते हैं वे एक ही धातु पर दो उपसर्ग जड़ देते हैं। सफल का विलोम विफल होता है।

(25)
उद् + ज्वल् + अच् = उज्ज्वल
प्र + ज्वल् + अच् = प्रज्वल
इन शब्दों में किसी भी तरह ‘ज्वल’ को ‘जवल’ बना देने की नौबत नहीं आती। इसलिए जो संधि करनी हो, वह ‘ज्वल’ से पहले ही कर लें। भविष्य में अपने कार्यक्रमों में दीप ‘प्रज्वलन’ ही करवाएँ ताकि कार्यक्रम का भविष्य ‘उज्ज्वल’ हो सके।

(26)
दुनिया
‘दुनिया’ की हालत हमने पहले ही बहुत ख़राब कर रखी है। इसे ‘दुनियां’ लिखकर कृपया इसे और बर्बाद न करें।

(27)
बदतमीज़
बदतमीज़ शब्द हमने बचपन से सुना है। इतना सुना है कि इसे कभी लिखकर देखने की ज़रूरत नहीं समझी, और श्रुत परम्परा से इसे ‘बत्तमीज़’ बोलते रहे हैं। जब आप स्वयं को सभ्य भी बनाए रखना चाहें और गाली बकने का भी मन हो तब यह शब्द बहुत काम आता है। इसे मुस्कुराते हुए बोला जाए तो यह लाड़ की प्रतिध्वनि तक दे देता है। इतने काम के शब्द के साथ बदतमीज़ी की जाए, यह अच्छी बात नहीं है।

(28)
ख़ुदकशी = आत्महत्या
यह शब्द सामान्यतया ग़लत बोला जाता है। कुछ लोग इसे खुदखुशी बोलते हैं तो कुछ खुदकुशी। जबकि इसका अर्थ है ख़ुद को नष्ट कर लेना। ख़ुद के प्राण खींच लेना।

(29)
स्वागतम् = सु + आगतम्
स्वागतम् में अलग से सु जोड़कर सुस्वागतम् लिखना ऐसे ही है जैसे किसी ने पगड़ी के ऊपर मुकुट लगा लिया हो।

(30)
बंद : (फ़ारसी) रुका हुआ, छंद, क़ैद, अवरुद्ध
बंध : (संस्कृत) बन्धन, गाँठ, बांधने की वस्तु
इन दोनों शब्दों की प्रवृत्ति लगभग समान है, इसलिए इनके प्रयोग में छोटी सी चूक होती है। कुछ उदाहरण देखें : मेरे गीत में तीन बंद हैं। समान तो बंध गया लेकिन रास्ता बंद है। शादी की गाँठ बंध जाए तो तो बंदे का दोस्तों से मिलना बंद हो जाता है।

(31)
कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके बहुवचन बनाने की ज़रूरत नहीं होती। लेकिन हम अनजाने में बहुधा ऐसा करते हैं। जैसे, ‘अनेक’ स्वयं में बहुवचन है, इसे अनेकों करके कोई लाभ नहीं है। अंग्रेजी का ‘लेडीज़’ तो इस पीड़ा से सर्वाधिक पीड़ित है। ‘एक लेडीज़ आई’ और ‘लेडीज़ों में न बैठें’ जैसे वाक्य बहुत अखरते हैं।

(32)
शल्वार = पैरों में पहनने का ढीला परिधान
शल्वार फ़ारसी भाषा का शब्द है। अनेक लोग इसे ‘सलवार’ लिखते-बोलते हैं। यह सामान्य प्रचलन में है किंतु सही शब्द ‘शल्वार’ ही है।

(33)
सर (संस्कृत) : जलाशय, तालाब, झील
सर (फ़ारसी) : सिर, सिरा
सर (अंग्रेजी) : एक संबोधन जो सम्मानित पुरुष के लिए प्रयुक्त होता है।
सिर (हिंदी) : कपाल, खोपड़ी, सिरा, चोटी, ऊपर का छोर
संस्कृत के ‘शिर’ को हिंदी में ‘सिर’ कहा गया। इसीलिए हिंदी में भी सिर पर पहनने के आभूषण को ‘शिरफूल’ कहा जाता है। हिंदी में पहुँच कर भी इस शब्द ने अनेक शब्द गढ़े, जैसे सिराहना, सिरमौर, सिरखपी, सिरचढ़ा, सिरताज। उधर फ़ारसी में ‘सिर’ का अर्थ मर्म, गूढ़, राज़ जैसे अर्थों के लिए होता रहा और हिंदी के ‘सिर’ को ‘सर’ कहा जाने लगा। इसीलिए वहाँ जो शब्द गढ़े गए उनमें छोटी इ की मात्रा नदारद रही। जैसे सरफ़रोश, सरमाया, सरफ़राज़, सरमस्ती।
इस स्थिति में कुछ शब्दों के सही रूप की पहचान पूरी तरह मिट चुकी है। जैसे हिंदी में जिसे ‘सिरदार’ कहते हैं उसे फ़ारसी ने ‘सरदार’ कहा और चूँकि ‘दार’ फ़ारसी का प्रत्यय है इसलिए ‘सरदार’ ज़्यादा समीचीन भी है। इस शब्द ने हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी की खिचड़ी से काम चला रही पीढ़ी के सिर में दर्द कर रखा है। कुछ वाक्य लिखते हुए तो मज़ा आ जाता है :- सर भी तो सरदार हैं। सर के सर में दर्द है। सरफ़राज़ सर ने उसे बहुत सर चढ़ा रखा है।
भाषा गड्ड-मड्ड हो चुकी है, इसलिए ग़लत दोनों ही नहीं हैं, लेकिन यदि हिंदी वाले ‘सिर’ का प्रयोग करना शुरू करेंगे तो अनेक जगह भ्रम की स्थिति से बच सकेंगे।

(34)
सर्वश्री
संस्कृत में ‘आदिदीपक’ का प्रचलन है। जब कोई शब्द इस तरह लगाया जाए कि उसका प्रभाव उसके बाद आने वाले उस समूह के सभी शब्दों पर पड़े, तो उसे आदिदीपक कहते हैं। जब बहुत से नाम क्रम से पढ़ने अथवा लिखने हों तो सभी के नाम से पूर्व बार-बार ‘श्री’, ‘सुश्री’ अथवा ‘श्रीमती’ लिखने के स्थान पर प्रारम्भ में ‘सर्वश्री’ लिखना पर्याप्त है।
मैंने कुछ लोगों को बार-बार ‘श्री’ के स्थान पर बार-बार ‘सर्वश्री’ प्रयोग करते देखा है। उनको लगता है कि ‘सर्वश्री’ कोई ऐसी डिग्री है जो ‘श्री’ से ज़्यादा ऊँची है। जबकि वास्तव में इसकी व्यवस्था पुनरावृत्ति विकार से बचने के लिए की गई है।

(35)
विद्या, विद्यालय, विद्यार्थी
इन शब्दों के उच्चारण में अक्सर हम चूक करते हैं। विद्या शब्द में ‘द्य’ का प्रयोग है जो कि द् + य के योग से बनता है। चूँकि इस संयुक्ताक्षर की बनावट ‘ध’ से मिलती-जुलती है इस भ्रम में इसे ध और य का योग समझ लिया जाता है। इसका रोमन रूपांतरण करें तो इसकी वर्तनी ‘VIDYA’ होगी, न कि ‘VIDHYA’ । भविष्य में अपने बच्चों को ‘विद्यालय’ भेजें विध्यालय नहीं।

(36)
वैद्य = चिकित्सक, जो वैद्यक शास्त्र के अनुसार चिकित्सा करता हो। (विशेषण) वेद से सम्बंधित।
वैध = विधि के अनुसार, विधान द्वारा स्वीकृत
वैदिक = वेद से संबंधित (मूल स्रोत वेद)
वैद्य जी वैदिक परंपरा के समर्थक हैं। आयुर्वेद की दवाइयाँ अनेक पश्चिमी देशों में भी वैध हैं। मोबाइल कंपनियों को बताइये कि जब हम रीचार्ज करवाते हैं तो उसकी ‘वैधता’ होती है। और चेरिटेबल चिकित्सालयों को बताइये कि अपने दवाख़ाने में ‘वैद्य’ जी को ही नियुक्त करें।

(37)
स्रोत : उत्पत्ति, मूल कारण, बीज
स्तोत्र : स्तुति
इन दोनों शब्दों के उच्चारण में सामंजस्य होने के कारण चूक होती है। कई बार तो ‘स्रोत्र’, ‘स्त्रोत’ और ‘स्त्रोत्र’ जैसी वर्तनी भी पढ़ने को मिलती है। हम यदि शब्दों की प्रवृत्ति और अर्थ का थोड़ा सा ध्यान रखें तो इन स्थितियों से बचा जा सकता है।

(38)
‘वीणापाणि’
यह माँ सरस्वती का एक नाम है। हाथों में वीणा धारण करने के गुण स्वरूप यह समासरूप निर्मित हुआ। इसमें वीणा और पाणि (कर, हाथ) का योग है। कुछ लोग सरस्वती वंदना और सामान्य प्रयोग में ‘वीणापाणी’ लिखते/बोलते हैं। यह ऐसा ही है जैसे किसी एप्लिकेशन में अफ़सर का नाम ग़लत लिखा जाए। रिजेक्ट होने की गारंटी।

(39)
वृत : चुना गया, घेरा गया, लपेटा गया
वृत्त : गोल घेरा, वर्णन
व्रत : नियम
वृत्त शब्द से ‘आवृत्त’ शब्द की सर्जना हुई है, जिसका अर्थ है : मुड़ा हुआ, चक्कर खाया हुआ, दोहराया हुआ, अध्ययन किया हुआ। ‘प्रवृत्त’ शब्द भी इसी से निर्मित है जो सामान्यतया संलग्न या कटिबद्ध होने का अर्थ देता है। वृत शब्द का उपयोग हिंदी में कम होता है अतः बहुत से लोग ‘वृत्त’ को मुखसुख के आधार पर ‘वृत’ लिखते/बोलते हैं। जबकि दोनों शब्दों के लिए अलग-अलग अर्थ निर्धारित हैं। ‘व्रत’ इन दोनों से बिल्कुल अलग शब्द है, किन्तु अनजाने में हम इन सबमें घालमेल कर देते हैं।

(40)
‘हस्’ से हास्य, हास, उपहास, परिहास और अट्टहास जैसे शब्द बने हैं। इन सबमें थोड़ा-थोड़ा अंतर है। यद्यपि संस्कृत शब्दकोश में उपहास और परिहास का अर्थ लगभग समान है तथापि प्रयोग के आकलन अनुसार
परिहास : मज़ाक़, हँसी-ठट्ठा
उपहास : मज़ाक़ उड़ाना, व्यंग्यपूर्ण हँसी उड़ाना
इस दृष्टि से उपहास नकारात्मक है और परिहास स्वस्थ हास्य।
‘अट्टहास’ अर्थात् ऊँचे स्वर का हास। कुछ लोग इसको ‘अट्टाहस’ लिखते-बोलते हैं। जबकि सही शब्द अट्टहास है। हास : हँसी
हास्य : हँसने योग्य (जैसे प्रणम्य, पूज्य आदि)
चौपाल पर बैठे चार छोकरे ‘परिहास’ कर रहे थे। तभी वहाँ से एक लंगड़ा साधु निकला। एक लड़के को शरारत सूझी और उसने साधु के साथ-साथ लंगड़ाते हुए चलना शुरू कर दिया। दूसरे लड़के ने ‘उपहास’ करते हुए कहा- “क्या बात है महाराज!आज तो लहरा रहे हो।” अन्य छोकरे ‘अट्टहास’ करने लगे। साधु कुपित होकर बोला – “उद्दंड बालको! हर विषय ‘हास्य’ नहीं होता। व्याधि में ‘हास’ तलाशोगे तो व्यथित हो जाओगे।”

(41)
आशंका
संभावना
दोनों ही शब्द किसी अनिश्चित के घटित होने का अर्थ देते हैं, लेकिन दोनों के अर्थ में आकाश-पाताल का अंतर है। जो हम चाहते हैं, उसके होने की ‘संभावना’ होती है। और जो हम नहीं चाहते उसके होने की ‘आशंका’ होती है। यथा
1) विदर्भ में इस वर्ष अच्छी बारिश होने की संभावना है।
2) जमुना उफान पर है और शाम तक बारिश होने की ‘आशंका’ है।

(42)
शाप, अभिशाप
यह शब्द ‘शाप’ ही है। न जाने किस विद्वान ने इस शाप में एक छड़ी जोड़ कर इसे ‘श्राप’ बनाने का कुकृत्य किया है। जिसने भी इस शब्द की सूरत बिगाड़ी है उसे पाणिनि का ‘शाप’ लगेगा।

(43)
विमोचन : छुड़ाना, मुक्त करना
लोकार्पण : लोक को अर्पित करना
सामान्य व्यवहार में हम लोकार्पण के ही अर्थ में विमोचन शब्द का प्रयोग कर लेते हैं, किन्तु यदि इसके सही अर्थ पर ध्यान देंगे तो समझ आएगा कि जब मंत्री जी हमारी पुस्तक का ‘विमोचन’ करते हैं तो इसका अर्थ होता है कि पुस्तक को किसी ने क़ैद कर रखा था जिसे छुड़ाने मंत्री जी आए हैं। इसलिए भविष्य में यदि कोई पुस्तक लिखें, तो उसका लोकार्पण कराएँ, विमोचन नहीं।

(44)
मुहब्बत
इस लफ़्ज़ को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से लिखते हैं। ‘मोहब्बत’ या ‘मौहब्बत’ लिखा देखता हूँ तो मुझे ‘मुहब्बत’ के अंजाम पर रोना आता है।

(45)
सम् + न्यास
व्यंजन संधि के नियमानुसार यदि ‘म्’ के बाद ‘क्’ से ‘भ्’ तक कोई भी स्पर्श व्यंजन हो तो ‘म्’ का अनुस्वार हो जाता है या उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर बन जाता है। इस हेतु उक्त संधि के बाद जो शब्द बनेगा वह ‘संन्यास’ होगा। अधिकतम स्थानों पर इस शब्द का अनुस्वार ग़ायब रहता है।

(46)
वेला (संस्कृत) : काल, समय
बेला (हिंदी) : चमेली जैसा एक फूल
वेल्ला (पंजाबी) : निठल्ला
लोक प्रयोग में हिंदी की कुछ बोलियों में ‘बेला’ को ‘वेला’ के अर्थ में प्रयोग किया जाता है। एक फ़िल्म आई थी – ‘आई मिलन की बेला’। इस फ़िल्म में ‘बेला’ शब्द को मुखसुख के आधार पर निर्मित अपभ्रंश के रूप में ‘समय’ के अर्थ में ही प्रयोग किया गया है। यह ग़लत भी नहीं है। लेकिन यदि हमें कभी लिखना पड़ा कि【 ‘बेला’ के महकने की ‘वेला’ बहुत सुहानी होती है।】 तब अवश्य चुनौती खड़ी हो जाएगी।

(47)
धन्यवाद और साधुवाद
‘धन्यवाद’ आभार ज्ञापन के लिए प्रयोग होता है जबकि ‘साधुवाद’ प्रशंसा के लिए प्रयोग होता है। इसलिए जब आपको किसी को THANKS बोलना हो तो ‘धन्यवाद’ कहें, लेकिन जब किसी की सराहना करनी हो तो ‘साधुवाद’ कहें। ‘साधु’ शब्द का संस्कृत में अर्थ है, ‘अच्छा’। इसका संन्यासी से कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है। उत्तम मनुष्य होने के कारण संन्यासी को साधु कह दिया जाता है।

(48)
उपर्युक्त = उपरि + उक्त = ऊपर कहा गया \
यह शब्द संस्कृत के उपरि में उक्त जोड़ने से बना है। जो लोग इसे ‘उपरोक्त’ लिखते हैं वे ग़लत लिखते हैं। क्योंकि संस्कृत का मूल शब्द ‘उपरि’ है और हिंदी का शब्द ‘ऊपर’। यदि हिंदी वाले ऊपर में उक्त जोड़ेंगे तो ‘ऊपरोक्त’ बनेगा। लेकिन ‘उपरोक्त’ तो किसी तरह से नहीं बनेगा। ‘उपर्युक्त’ विवेचना को ध्यान रखें और ‘उपरोक्त’ लिखने से बचें।

(49)
व्रज : मथुरा और वृंदावन के आसपास का क्षेत्र जो श्रीकृष्ण की लीलाभूमि थी।
‘व्रज’ संस्कृत भाषा का शब्द है। जिस क्षेत्र को इस संज्ञा से जाना जाता है वहाँ के लोकप्रभाव के कारण इसे ब्रज, बृज और बिरज बोल दिया जाता है। इसी प्रभाव के कारण इस क्षेत्र की बोली को हम बृजभाषा कहने लगे। लोक लालित्य के कारण यह सुंदर भी लगता है। किंतु वास्तविक शब्द ‘व्रज’ ही है। फिर भी जब होली का त्यौहार हो तो मन यही गाता है कि – “आज बिरज में होरी रे रसिया!”

(50)
त्योहार : पर्व, उत्सव
इस शब्द को कल तक मैं स्वयं ‘त्यौहार’ लिखता था, लेकिन कल एक सज्जन श्री आशीष शर्मा जी ने मेरी इस चूक की ओर इंगित किया। मैंने शब्दकोष के पृष्ठ पलटे तो ज्ञात हुआ कि मैं ग़लत था। भविष्य में अपने त्योहार मनाते समय अतिरिक्त मात्रा नहीं लगाऊंगा ताकि त्योहारों की शुद्धता का संतुलन बना रहे।

(51)
शम्अ, मआनी, मुआमला, मुआफ़
उर्दू के कुछ लफ़्ज़ हिंदी में आकर अपना रूप इसलिए बदल लेते हैं क्योंकि हिन्दी में सामान्यतया शब्द के बीच मे स्वर हो तो वह पूर्ववर्ती व्यंजन में समाहित हो जाता है, किन्तु उर्दू में इसे अलग से ही लिखा व बोला जाता है। जैसे ‘शम्अ’ को हिंदी में ‘शमा’ लिखने का प्रचलन है। ‘मआनी’ को ‘मानी’ लिखते बोलते हुए हम कब ‘मायने’ बोलने लगे, यह पता ही न चला। चूँकि उर्दू वाले प्रथम अक्षर पर लगी लघु मात्रा को बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते इसलिए उनके ‘मुआमला’ का भी ‘मामला’ बिगड़ गया और ‘मुआफ़’ तक को ‘माफ़’ करने लगे।

(52)
वापस : प्रत्यागत, लौटा हुआ
वापसी : प्रत्यागमन, लौटना, वापस आना
वापस शब्द की सही वर्तनी में कहीं भी ‘इ’ की मात्रा नहीं आती। अनजाने में जो लोग इसे ‘वापिस’ बोलते या लिखते रहे हैं वे भविष्य में शुद्ध प्रयोग की ओर वापस आएंगे।

(53)
चुकना और चूकना
शीर्षक में प्रयुक्त इन दो शब्दों के विषय में अनेक जिज्ञासाएं प्राप्त होती हैं। अनेक मित्रों का मत है कि मुझसे भूलवश ऐसा हो गया है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि मैंने सोच-समझ कर शीर्षक में इन दोनों शब्दों को प्रयोग किया है।
चुकना : सम्पन्न हो जाना, समाप्त हो जाना। यह शब्द भूतकाल में सम्पन्न हुए किसी कार्य अथवा घटना का द्योतक है। जैसे खा चुका, रह चुका, सो चुका।
चूकना : किसी लक्ष्य का छूट जाना। यह शब्द भूल, ग़लती आदि के लिए प्रयोग होता है। जैसे भूल चूक लेनी देनी, मैं मौक़ा चूक गया। ‘शब्द नहीं चुके’ का अर्थ यह है कि शब्द समाप्त नहीं हुए हैं। शब्द कभी नहीं चुकते। हम ही उनका उचित प्रयोग करने में चूक गए हैं। हम ही अनजाने में भूल करते जा रहे हैं।

(54)
छिपना
यह शब्द ‘छिपना’ ही है। जो लोग इसे ‘छुपना’ लिखते या बोलते हैं, वे अशुध्द प्रयोग करते हैं। इस शब्द की विकृति में बॉलीवुड का बड़ा योगदान है। फ़िल्म का नाम ही ‘छुपा रुस्तम’ रख दिया। गाना गाया तो भी ‘छुप गए सारे नज़ारे…’। इनसे प्रेरणा लेकर हम भी अपनी ‘छिपम-छिपाई’ को छुपम-छुपाई’ बोलने लगे। लेकिन शब्दों की इस ‘लुका-छिपी’ में भी शब्दकोश ने कभी कुछ ‘छिपाव’ न रहने दिया।

(55)
अवधि और अवधी
अवधि : समयसीमा, Duration, Period, Term
अवधी : अवध क्षेत्र की बोली।
बाबा तुलसी ने अवधी में ऐसा काव्य रच दिया जिसकी लोकप्रियता की अवधि निरंतर बढ़ती जाती है।

(56)
विदुर : ज्ञाता, पंडित, पाण्डु के अनुज
विधुर : दुःखी, जिसकी पत्नी मर गई हो
अपने ज्ञान और चातुर्य के बल पर विदुर ने यह सिद्ध किया कि वे अपने नाम के अनुरूप ही गुणी भी हैं। किन्तु वे विधुर नहीं थे, क्योंकि उनकी पत्नी ‘पारसंवी’ पूर्णतया स्वस्थ थी और पारसंवी के हाथ से श्रीकृष्ण ने उल्टे पीढ़े पर बैठ कर वैसे ही केले के छिलके खाए थे, जैसे शबरी की भक्ति देख राम ने जूठे बेर खाए थे।

(57)
प्रसाद : अनुग्रह, कृपा, देवता को चढ़ाई गई वस्तु
प्रासाद : राजमहल, राजभवन, देवालय
प्रसाद शब्द को लोग जब किसी के नाम के साथ प्रयोग करते हैं तो सामान्यतया चूक नहीं करते। जैसे हरि प्रसाद, राम प्रसाद आदि। किन्तु इसी शब्द को लेकर जब हम मंदिर पहुँचते हैं तो न जाने क्यों इसे ‘परसाद’ या ‘परशाद’ बोलने लगते हैं। सम्भव है, इस अशुद्ध उच्चारण के कारण देवता हमारा प्रसाद ग्रहण न करते हों।

(58)
दिलासा, सांत्वना
हताशा, निराशा, शोक, दुःख अथवा क्षोभ के समय हिम्मत बंधाना हमारा मानवीय कर्त्तव्य है। किन्तु याद रहे कि दिलासा दिया जाता है और सांत्वना दी जाती है। जो शब्द प्रचलन विकृति के शिकार हुए हैं उनमें ‘दिलासा’ भी एक है। भ्रम की स्थिति में शब्दकोश से पूछा तो पता चला कि दिलासा पुल्लिंग है।

(59)
दुलहन और दूल्हा
हिंदी भाषा का शब्द है ‘दुलहन’ जिसे कुछ लोग ‘दुलहिन’ भी लिख बोल देते हैं। दुलहन शब्द ने जब आंचलिकता का सिंगार किया तो इसे दुल्हनिया कहा जाने लगा। गांव में खेलती इस दुल्हनिया को जब हम वापस शहर लाए तो बाद का ‘इया’ तो हटा दिया किन्तु ‘ल’ की बैसाखी लगाना भूल गए। किन्तु शब्दकोश कुछ नहीं भूलता। उसके पास आज भी ‘दुलहन’ सुरक्षित है। ‘दूल्हा’ इस सबसे इसलिए बच गया क्योंकि लोकबोली के घर प्रवेश करते हुए वह सतर्क था और उसने ‘ह’ की दीर्घ मात्रा को ‘ल’ में जोड़ कर स्वयं को ‘दूलह’ बनाया। इसलिए जैसे ही वह लोक लालित्य से बाहर निकला उसने अपनी आदत के अनुसार स्वयं को ठीक करके फिर से ‘दूल्हा’ बना लिया।

(60)
पूर्वग्रह : पूर्व + ग्रह (समास)
दुराग्रह : दु: + आग्रह (संधि)
पूर्वग्रह का अर्थ है पहले से ग्रहण करना। किसी के विषय में पहले से राय क़ायम करना पूर्वग्रह है। दुराग्रह का अर्थ है मूर्खतापूर्ण हठ या बुरा आग्रह। ‘दुराग्रह’ की वर्तनी देखकर ‘पूर्वग्रह’ को ‘पूर्वाग्रह’ लिखना हमारा ‘पूर्वग्रह’ है और किसी के समझाने पर भी उसमें सुधार न करना ‘दुराग्रह’ है।

(61)
चक्रवर्ती : एक समुद्र से दूसरे समुद्र पर राज्य करने वाला।
चक्र-वृद्धि : सूद दर सूद
कल कोई बता रहा था कि बैंक का ब्याज तो चक्रवर्ती ब्याज होता है। सुनकर मुझे लगा कि इतना ब्याज मिलता होगा जिससे मूलधन का स्वामी अकूत संपत्ति अर्जित कर लेता हो। फिर जब बैंक ब्याज की दर पता की तो लगा कि 4 से 6 प्रतिशत में तो यह सम्भव नहीं है। इसलिए भविष्य में ब्याज से साथ चक्र-वृद्धि शब्द ही जोड़ें। चक्रवर्ती ब्याज देना पड़ा तो बैंक कंगाल हो जाएगा।

(62)
अलमबरदार : झंडा उठाने वाला
नम्बरदार : अंग्रेजों के ज़माने में कर वसूलने वाला ज़मींदार, गाँव का मुखिया।
इन दोनों शब्दों में भ्रम को स्थिति इसलिए उत्पन्न हो जाती है क्योंकि हमारे कुछ ग्रमीण क्षेत्रों में “नम्बरदार” को “लम्बरदार” बोला जाता है और “लम्बरदार” “अलमबरदार” से मिलती-जुलती ध्वनि देता है अंग्रेजों का शासन समाप्त होने के बाद बंगाल में नम्बरदारों के विरुद्ध सरकार ही अलमबरदार बन गई थी।

(63)
बहु : (उपसर्ग से रूप में प्रयुक्त) बहुत, अधिक, ज़्यादा। उदाहरण : बहुआयामी, बहुमान।
बहू : (वधू का अपभ्रंश) पत्नी, दुल्हन
उन्होंने गली-गली जाकर कहा कि राजीव की बहू को बहुमत मत देना।

(64)
अंत्य + अक्षरी = अंत्याक्षरी
इस शब्द को कुछ लोग अंताक्षरी लिखते बोलते हैं, जबकि यह वास्तव में अंत्याक्षरी है।
इसमें अंत्य शब्द ठीक वैसे ही प्रयोग किया गया है जैसे अंत्योदय शब्द में किया गया है।

(65)
प्लेट्स : रकबियाँ, थालियाँ, पत्तलें, पट्टियाँ, पट्ट,
प्लेटलेट्स : एक प्रकार की रक्त कोशिकाएँ
जब किसी को डेंगू होता है तब डॉक्टर प्लेटलेट्स काउंट करवाने को कहता है, लेकिन हमारे देश में अनेक लोग प्लेट्स गिनवाने निकल पड़ते हैं। “जब किसी के प्लेटलेट्स कम हो जाते हैं तब उसे प्लेट में रखी चीजें नहीं, बल्कि गिलास में भरी चीज़ों का सेवन करना चाहिए।”

(66)
शलजम (हिंदी)
शलगम (फ़ारसी)
ये दोनों शब्द समानार्थी हैं। यद्यपि इनमें कोई भी अशुद्ध नहीं है, फिर भी यदि हिन्दी के पास उसी अर्थ का, उसी मात्राभार का, उसी तुकांत का बिल्कुल वैसा ही शब्द है तो उसमें विदेशी शब्द प्रयोग करना उचित नहीं। मैं पुनः कह रहा हूँ कि दोनों ही शब्द सही हैं।

(67)
उपलक्ष्य
कोई ऐसा कारण अथवा विचार जिसको ध्यान में रखकर कोई बात कही जाए या कोई काम किया जाए, उपलक्ष्य कहलाता है। सामान्यतया सांस्कृतिक कार्यक्रमों के निमंत्रण पत्र पर यह शब्द दिखाई देता है। किंतु कुछ जगह इसे ‘उपलक्ष’ लिखा जाने लगा है। यह उचित प्रयोग नहीं है। लक्ष शब्द का अर्थ है ‘लाख की संख्या’। इसका उपलक्ष्य से कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु प्रचलन के संक्रामक रोग के कारण यह प्रयुक्त होने लगा है। जबकि सही शब्द ‘उपलक्ष्य’ ही है।

(68)
अंग्रेजी का मूड हिंदी का मुंड
इन दोनों शब्दों के अर्थभ्रम से एक अजीब सा शब्द निर्मित हुआ। मुंड का अर्थभ्रम हुआ तो लोग इसे सिर का समानार्थी मानने लगे। ‘सिर घूम जाना’ मुहावरा धीरे-धीरे ‘दिमाग़ घूम जाने’ और ‘दिमाग़ ख़राब होने’ में बदल गया। उधर अंग्रेजी का ‘MOOD OFF’ हौले से हिंदी में प्रविष्ट हुआ। धीरे धीरे यह ‘मूड ख़राब होने’ के रूप में रूपांतरित हो गया। हिंदी बोलचाल में रचा बसा ‘मूड’ हिंदी के ‘मुंड’ से रूपसाम्य रखने के कारण कुछ क्षेत्रों में ‘मूंड’ का रूप धारण करके घूमने लगा। यदि आपने कभी किसी को ‘मूंड ख़राब’ कहते सुना है तो उससे मूड ऑफ़ करने की जगह, इस शब्द की यात्रा का आनन्द लो।

(69)
तत्त्वावधान
इस शब्द की वर्तनी में दो चूक अक्सर दिखाई देती हैं। प्रथम, ‘तत्त्व’ शब्द को ‘तत्व’ लिखा जाता है। दूसरा ‘अवधान’ शब्द को ‘आधान’ लिखा जाता है। इन दोनों से बचें और भविष्य में जब कोई कार्यक्रम हो तो उसे किसी के ‘तत्त्वावधान’ में ही आयोजित करें।

(70)
दवाई / दवाइयाँ
हिंदी में यदि एकवचन से बहुवचन बनाने के लिए शब्द के अंत में ‘याँ’ या ‘यों’ जोड़ा जाता है तो मूल शब्द का अंतिम वर्ण ह्रस्व हो जाता है।
दवाई : दवाइयाँ
भाई : भाइयों
अधिकतर केमिस्ट अपनी दुकान पर “दवाईयां” लिखवाते हैं। इनकी दुकान से औषधि ख़रीदकर रोगी ठीक होगा या नहीं, यह तो ईश्वर जानता है; लेकिन भाषा के बचने की कोई संभावना नहीं है।

✍️ चिराग़ जैन

आँसू की आवाज़

सारे ही सुख थे बगिया में, फिर क्यों तुमने पीर चुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है

क्या तुमने भी महसूसा है, एकाकी हो जाना जग में
क्या तुमने जी भर भोगा है, सब अपने खो जाना जग में
क्या तुमने भी भावुकता को लुट कर मरते देख लिया है
क्या तुमने भी अपनेपन का रंग उतरते देख लिया है
क्या तुमने भी जान लिया है अपने ही घर में शकुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है

सच बतलाओ क्या तुमने भी चेहरा देखा है रिश्तों का
मुरझाने के बाद कभी क्या सेहरा देखा है रिश्तों का
क्या तुमने भी हर उत्सव के अगले पल सन्नाटा झेला
दिल के व्यापारों का दुनिया की मंडी में घाटा झेला
कोमलता की देह धुने बिन किन कंधों की शॉल बुनी है
क्या तुमने भी तन्हाई में, आँसू की आवाज़ सुनी है

✍️ चिराग़ जैन

तुलसी बाबा के वंशज

कविता को आसान बनाकर जन-जन तक पहुँचाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

मेले, गाँव, गली, चौबारे, संसद, देश, विदेश विचरते
चिंता की त्यौरी पिघलाकर, ओंठों पर मुस्कानें धरते
एक ठहाके के जादू से पीड़ा को ग़ायब कर देते
हर अंधियारे की झोली में आशा का सूरज धर देते
नयन भिगोकर लिखने वाले, हँसते-हँसते गाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

जब पापी ने दुःसाहस कर भारत माँ पर आँख उठाई
हमने शोणित में साहस का ज्वार उठाती कविता गाई
हमने आगे बढ़कर टोका शासन की हर मनमानी को
हमने सच का दर्पण सौंपा सत्ता की खींचातानी को
यौवन को सरसाने वाले, उत्सव रोज़ मनाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

जैसे श्रोता हों, कविता का वैसा रूप बना लेते हैं
नवरस की मथनी से मथकर, मन तक रस छलका देते हैं
कविता, गीत, लतीफ़े, जुमले, हम हर शस्त्र चला लेते हैं
जिस शैली में सुनना चाहो, उस शैली में गा लेते हैं
कानों के दरवाज़े घुसकर, सीधे मन पर छाने वाले
तुलसी बाबा के वंशज हैं, हम मंचों पर जाने वाले

✍️ चिराग़ जैन

काव्यपाठ के प्रारंभिक प्रमाण

चारों वेद काव्यरूप हैं और इनमें श्रुतियों का संकलन है अतः यह माना जा सकता है कि वेद का प्रत्येक ऋषि वाचिक परम्परा का कवि रहा होगा। तथापि इन श्रुतियों के पाठ का कोई प्रामाणिक संदर्भ ज्ञात नहीं है।
महर्षि वाल्मीकि ने क्रौंचवध की घटना से आहत होकर श्लोक उच्चारा था –

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकमवधी काममोहितम्।।

यह श्लोक स्वरचित कविता के पाठ का प्रथम प्रामाणिक उदाहरण है। उत्तर रामायण में अयोध्या की राजसभा में लव-कुश द्वारा रामकथा का पाठ किया गया। इस घटना को भी काव्यपाठ का उदाहरण माना जा सकता है। यहाँ यह तथ्य विशेष ध्यातव्य है कि जब लव-कुश रामकथा सुनाते थे, तब वहाँ जन-सामान्य उपस्थित होता था।
कुरुक्षेत्र के युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण द्वारा गीता के अठारह अध्यायों का पाठ किया गया। यह भी काव्यपाठ का ही एक उदाहरण माना जा सकता है।
इस्लाम पूर्व मक्का में उकाज नामक स्थान पर अरब के कवि एकत्रित होते थे। इस सम्मेलन में भाग लेनेवाले कवियों के बीच काव्य-प्रतियोगिता होती थी और विजेता की कविता को स्वर्णपत्र पर अंकित कर जिस दीवार पर लगाया जाता था उसे ही आज हम काबा कहते हैं। इस्लाम पूर्व काव्य ग्रन्थ सेररूल-ओकुल के नाम से आज भी प्रतिष्ठित है।
भक्तिकाल में संत कवियों का परस्पर सम्मिलन अंततः काव्य-गोष्ठी की शक्ल ले लेता था। सूरदास प्रतिदिन एक भजन रचकर आरती के समय उसका पाठ करते थे। कुम्भलदास, रैदास, मीराबाई जैसे कवियों की भेंट के वृत्तांत भक्तिकालीन साहित्य में भरे पड़े हैं। रीतिकाल भी राजाओं के मनोरंजनार्थ कवियों के काव्यपाठ की घटनाओं के प्रमाण प्रस्तुत करता है।
राजपूत राजाओं के महल में विधिवत कवि नियुक्त किये जाते थे, जो राजा के कार्यों का गुणगान तथा युद्धकाल में मनोबल वृद्धि हेतु कविताएँ लिखते थे और सभा में उनका पाठ करते थे। मुग़ल काल में उर्दू के शायरों की महफ़िल बादशाहों के दरबार में जमती थी। मुग़ल बादशाह बहादुरशाह ज़फ़र ख़ुद एक बेहतरीन शायर थे, जो इस महफिलों में एक शायर की हैसियत से शिरक़त भी करते थे। मीर, ज़ौक़, ग़ालिब जैसे कितने ही नामचीन शायर इन मुशायरों की शान होते थे। उर्दू-मुशायरों का वर्तमान स्वरूप इन्हीं दरबारों से तैयार हो गया था, लेकिन हिंदी कवि सम्मेलनों ने जो शक़्ल आज अखि़्तयार की है उसकी मिट्टी बहुत बाद में गुंथनी शुरू हुई।
गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ के संयोजन में जो पहला कवि सम्मेलन हुआ, उसमें कुल 27 कवियों ने काव्यपाठ किया और उसके आयोजक थे- ‘सर जॉर्ज ग्रियर्सन’। उसके बाद साहित्यिक-सांस्कृतिक संस्थाओं में कवि-सम्मेलनों के आयोजन की परंपरा चल निकली। यहाँ तक कवि सम्मेलनों में अर्थ का संयोग नहीं हुआ था।
कविगण ससम्मान आमंत्रित किये जाते थे और बन्द मुट्ठी में जो पत्र-पुष्प आयोजक दे देता था, वह स्वीकार कर लेते थे। मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुभद्राकुमारी चौहान, गिरिजाकुमार माथुर, वियोगी हरि, सोहनलाल द्विवेदी, रामधारी सिंह दिनकर, रमई काका और हरिवंशराय बच्चन जैसी विभूतियाँ, इसी प्रकार कवि सम्मेलनों में काव्यपाठ करती रहीं।
ऐसा मेरा अनुमान है कि किसी कार्यक्रम में आयोजक के द्वारा प्रदत्त इस मानदेय पर या तो कोई विवाद हुआ होगा अथवा आलोचना हुई होगी, जिसके बाद कवियों को बंद मुट्ठी में मानदेय दिए जाने की परंपरा निमंत्रण के समय सुनिश्चित किये जाने वाले मानदेय में परिवर्तित हो गई होगी। यद्यपि यह राशि भी नाममात्र की ही होती थी। इसी दौरान बच्चन जी ने मधुशाला लिखी। मधुशाला इतनी लोकप्रिय हो गई कि बच्चन जी प्रत्येक कवि सम्मेलन की आवश्यकता बन गए। एक बार बच्चन जी अस्वस्थ हुए तो उन्होंने आयोजक को सूचित किया कि स्वास्थ्य ठीक न होने की वजह से वे कवि-सम्मेलन में उपस्थित नहीं हो सकेंगे। आयोजक ने अपनी प्रतिष्ठा का वास्ता देते हुए बच्चन जी पर कार्यक्रम में उपस्थित होने का दबाव बनाया तो बच्चन जी ने अपनी मनमर्ज़ी के मानदेय पर उपस्थित होना स्वीकार कर लिया।
यहाँ से कवि सम्मेलनों में मानदेय की राशि आयोजकों की मर्ज़ी से कवियों के अधिकार क्षेत्र में आ गई। इसी दौर में दिल्ली में पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास जी ने लालकिला कवि सम्मेलन की स्थापना की। यह आयोजन देश भर में कवि-सम्मेलनों की प्रतिष्ठा वृद्धि का कारण बना। वर्ष भर लोग इसकी प्रतीक्षा करने लगे। व्यास जी चुन-चुन कर श्रेष्ठतम कवियों को इस मंच पर बुलाने लगे। इसकी ख्याति में चार चांद तब लगे जब देश के प्रधानमंत्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू इस आयोजन में मुख्य अतिथि बनकर आए। बड़े-बड़े राजनेता, बड़े-बड़े सितारे, उद्योग, समाजसेवा और शिक्षा जगत् की श्रेष्ठ प्रतिभाएँ इस आयोजन की दर्शक दीर्घा में दिखाई देने लगी।
लालकिला कवि सम्मेलन किसी भी कवि की प्रतिष्ठा का नियामक बन गया। शिवमंगल सिंह सुमन, देवराज दिनेश, भवानीप्रसाद मिश्र, रामवतार त्यागी, रमानाथ अवस्थी, माया गोविंद, रामदरश मिश्र, बालस्वरूप राही, गोपाल सिंह नेपाली, बलबीर सिंह रंग, शिशुपाल सिंह निर्धन, कन्हैयालाल नन्दन, इंदिरा गौड़, बाबा नागार्जुन, मुकुट बिहारी सरोज जैसे रचनाकार लालकिले की शोभा के दैदीप्यमान नक्षत्र बन गए। किन्तु इस आयोजन का उत्तरदायित्व भी था, एक साहित्यिक संस्था के ही कंधों पर था। इसी दौरान श्री रामरिख मनहर ने कवि सम्मेलनों को मारवाड़ी सेठों के द्वार तक पहुँचाने के लिए अथक परिश्रम किया।
अब कवि सम्मेलन में अर्थ का मार्ग खुल गया। इलाहाबाद, कानपुर, लखनऊ, दिल्ली और वाराणसी की सीमाओं को तोड़कर कवि सम्मेलन राजस्थान, मुम्बई, कोलकाता और मद्रास (अब चेन्नई) तक भौगौलिक विस्तार पा गया। ज्यों ही साहित्यिक संस्थाओं से निकलकर कवि सम्मेलनों ने उन्मुक्त गगन में पंख पसारे ठीक उसी समय गोपालदास नीरज, बालकवि बैरागी और काका हाथरसी सरीखे लोकप्रिय कवि अस्तित्व में आए।
नीरज जी हिंदी कवि सम्मेलनों की जनप्रियता की आधारशिला बन गए। खरद की गुनगुनाहट में जब गीत लोकार्पित होता तो श्रोतादीर्घा सम्मोहित हो उठती। नीरज जी ने गीत को प्रेम के गुलाबी बगीचे से दर्शन के भव्य देवालय तक की यात्रा करवाई। नयन कोर पर अपनी पीड़ा का नीरानुवाद संजोकर लोग स्मित अधरों से नीरज को सुनते थे। उनकी सजीव आँखें और शरारती हँसी उनकी प्रस्तुति में मणिकांचन योग निर्मित करती थी।
नीरज के इस सम्मोहन में कवि सम्मेलनों का कारवां बहुत तेज़ी से लोकप्रियता की मंज़िलें तय करता हुआ बढ़ने लगा। संभवतः नीरज जी पहले ऐसे कवि थे जिन्होंने अपनी लेखनी के साथ-साथ अपनी अदाओं से भी लोगों के दिल पर राज किया। यह उनकी अदाओं का ही करिश्मा था कि यद्यपि उनके अधिकतर लोकप्रिय गीत दर्शन की धुरि पर केंद्रित थे, फिर भी उन्हें प्रेम और सौंदर्य के कवि के रूप में जाना गया।
‘कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है’; ‘अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए’; ‘आदमी को आदमी बनाने के लिए’ और ‘कारवां गुज़र गया’ जैसे गीतों की सरल शब्दावली और गूढ़ अर्थवत्ता ने गीत की धारा मोड़ दी। इस दौर में कविता साहित्यिक अभिरुचि से विहीन जन तक पहुँचने में क़ामयाब हुई।
यद्यपि वीर रस की भाषा अभी भी अपेक्षाकृत क्लिष्ट थी, लेकिन बालकवि बैरागी की कविता राष्ट्र पर मर मिटने के शौर्य के साथ-साथ जीवन की कठिन परिस्थितियों में स्वाभिमान के जीवट की वक़ालत करने लगी तो उसकी भावभूमि और भाषा स्वतः ही अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति से जुड़ती चली गई। शहीदों के प्रति करुणा और श्रद्धा उत्पन्न करती ओज कविता करुण रस, भक्ति रस, रौद्र रस और वीर रस का संगम स्थल बन गई।
लोगों का मन सीमा पर खड़े बेटों के प्रति वात्सल्य से भरने लगा। वीर रस की कविता शिराओं के रक्तप्रवाह को तीव्र करने के साथ-साथ आँखों को भी नम करने लगी। बैरागी जी की लोकप्रियता का आलम यह था कि देश के बड़े कवि सम्मेलनों में बैरागी जी की उपस्थिति न हो तो श्रोता कार्यक्रम शुरू नहीं होने देते थे। इस दौर तक कवि सम्मेलन मंच पर गीत का बोलबाला था। जीवन दर्शन के गीत, प्रेम के गीत और सामरिक माहौल में ओज के गीत।
हास्यरस को हेय दृष्टि से देखा जाता था। मंच पर जब हास्य का कवि काव्यपाठ करता था तो शेष कवि उसे अनदेखा करते थे। यद्यपि रमई काका जैसे कवियों ने जनता के तनाव को ठहाकों में बदलने की परंपरा को बख़ूबी निभाया, लेकिन हास्यरस को वह सम्मान नहीं मिल सका जिसका वह हक़दार था। जनता हास्य पसंद तो करती थी, किन्तु मंच पर बैठे अन्य कवियों की भंगिमा को देखकर यह हास्यप्रेम जता नहीं पाती थी।
ऐसे समय में मंच पर काका हाथरसी का प्रवेश हुआ। उनकी प्रस्तुति से मंचासीन कवियों की त्यौरियाँ पिघलने लगीं और दर्शक दीर्घा की स्मित ने ठहाके का रूप ले लिया। यहाँ से कवि सम्मेलनों का रंग-रूप बदल गया। काका की लोकप्रियता का सूरज गाँव-खेड़ों से लेकर सात समुंदर पार तक दमकने लगा। व्यंग्य के कवियों ने अपनी रचनाओं में हास्य का अनुपात बढ़ा दिया। अब व्यंग्य, व्यंग्य न रहकर ‘हास्य-व्यंग्य’ बन गया। कवि-सम्मेलन भी कवि-सम्मेलन से ‘हास्य कवि-सम्मेलन’ बन गए।
कवि सम्मेलनों के बैनर पर ‘हास्य’ शब्द लगाना आवश्यक हो गया। मंच पर हास्य कवियों का अनुपात बढ़ने लगा। काका की कुंडलियों ने समाचार पत्रों में स्थान बना लिया। पण्डित गोपाल प्रसाद व्यास और रामरिख मनहर जैसे मंच-संचालकों के संचालन में चुटीली टिप्पणियों, सहज जुमलों, व्यंग्योक्तियों और चुटकुलों ने जगह बनानी शुरू की।
नीरज, बैरागी और काका ने हिंदी कवि सम्मेलनों का चेहरा आमूल-चूल बदल दिया। बदलती तकनीक के साथ बनती बिगड़ती परंपराओं की कहानी अगली कड़ी में…
✍️ चिराग़ जैन

कविता के चिन्ह

भारतीय संस्कृति के प्रसार तथा सर्वांगीण विकास में कवियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। हिंदी, संस्कृत, उर्दू, बांग्ला, उड़िया, तमिल, मराठी, भोजपुरी आदि तमाम भाषाओं, बोलियों और शैलियों के कवियों ने अपने-अपने समय के सामाजिक, राजनैतिक तथा सांस्कृतिक क्षितिज पर हस्ताक्षर किए हैं। यही कारण है कि देश भर में अनेक स्थानों पर कवियों के नाम पर सड़कों, उद्यानों, पुस्तकालयों, शिक्षण संस्थानों आदि का नामकरण किया गया है। कवि विशेष के जन्मस्थान पर उनकी प्रतिमा तथा संग्रहालय बनाने की प्रथा भी विद्यमान है। सिमरिया में राष्ट्रकवि दिनकर के निवास स्थान को संग्रहालय बना दिया गया है और उस संग्रहालय की ओर जाने वाली सड़क पर दिनकर की प्रतिमा भी स्थापित है। इसी प्रकार दरभंगा के निकट नागार्जुन के पैतृक निवास के समीप उनके नाम से पुस्तकालय बनाया गया है। सालासर में बालाजी मंदिर के बाहर मीराबाई की जीवंत प्रतिमा स्थापित है। चित्तौड़गढ़ में मीरा मन्दिर विद्यमान है जहाँ मीराबाई की भव्य प्रतिमा विदेह प्रेम का प्रतीक बनकर विराजित है। होशंगाबाद के पास बाबई नामक स्थान पर माखनलाल चतुर्वेदी जी की विराट प्रतिमा स्थापित है। भोपाल में पत्रकारिता का एक विश्वविद्यालय “माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय” के नाम से संचालित है। आगरा में एक भव्य प्रेक्षागृह को सूरसदन के नाम से जाना जाता है। कन्याकुमारी में संत कवि तिरुवल्लुवर का भव्य स्मारक विश्व भर में विख्यात है। तिरुवल्लुवर का ही एक भव्य पद्मासन बिम्ब महाबलीपुरम में समुद्र तट पर और चेन्नई के मरीना तट पर भी स्थापित है। अहमदाबाद शहर में गुजराती कवि दलपतराम की भव्य प्रतिमा, उनके नाम से शहर का एक प्रमुख चौराहा तथा एक अस्पताल भी मौजूद है। पुदुच्चेरी में सुब्रमण्य भारती की विशाल प्रतिमा स्थापित है। हैदराबाद में तेलुगु कवि क्षेत्रय्या की शानदार प्रतिमा विद्यमान है। कालिदास के नाम पर उज्जैन में “कालिदास संस्कृत अकादमी” संचालित है। मध्यप्रदेश सरकार महाकवि कालिदास की स्मृति में “कालिदास महोत्सव” का भी आयोजन करती है। अलवर में भृतहरि के नाम पर दस दिन का भव्य मेला आयोजित किया जाता है। भारत के संसद भवन की सौध में भी गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की विशाल प्रतिमा स्थापित है। कोलकाता में अनेक स्थानों पर टैगोर की प्रतिमाएँ मौजूद हैं। बल्लवपुर बीरभूम स्थित अमर कुटीर सोसाइटी में टैगोर का जापानी शैली में बनी आकर्षक प्रतिमा मौजूद है। नई दिल्ली में कोपर्निकस मार्ग स्थित ललित कला अकादमी के मुख्यालय को “रबीन्द्र भवन” के नाम से जाना जाता है। सम्भवतः देश भर में सर्वाधिक मूर्तियां जिस कवि की हैं उनमें बांग्ला भाषा के कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर और तमिल भाषा के कवि तिरुवल्लुवर का नाम अग्रणी है। राउरकेला में वेदव्यास का भव्य मंदिर है। ऐसी मान्यता है कि इसी स्थान पर महाभारत महाकाव्य की रचना हुई थी। दिल्ली में वज़ीराबाद के पास जमुना के एक बड़े घाट का नाम सूरदास जी के नाम पर “सूरघाट” रखा गया है। दिल्ली जंक्शन से प्रतापगढ़ के मध्य चलने वाली ‘पद्मावत एक्सप्रेस’ का नामकरण मलिक मुहम्मद जायसी की कृति “पद्मावत” के नाम पर किया गया है और यह गाड़ी जायसी के जन्मस्थान “जायस” पर रुकती है। चांदनी चौंक के बल्लीमारान में मिर्ज़ा असदुल्लाह खां ग़ालिब की हवेली आज भी मौजूद है। लखनऊ जंक्शन के प्लेटफॉर्म नम्बर 5 पर रेल की पटरियों के बीच एक बड़ी सी मज़ार है जिसे लोग पीर बाबा की मज़ार कहते है, यह दरअस्ल मशहूर शायर मीर तक़ी मीर की मज़ार है। ऐसे ही आगरे के ताजगंज में बस्ती के बीच नज़ीर अकबराबादी की मज़ार है। दिल्ली में बारापुल्लाह फ्लाईओवर से गुजरते हुए एक पुराना खंडहर दिखाई देता है। बहुत कम लोगों को पता है कि यह खंडहर अब्दुर्रहीम खानखाना का मक़बरा है। हाल ही में ओमप्रकाश आदित्य जी के जन्मस्थान पर उनकी प्रतिमा की स्थापना करवाई गई है। मुम्बई में श्याम ज्वालामुखी के नाम पर “श्याम ज्वालामुखी मार्ग” मौजूद है। दिल्ली के हिंदी भवन में पुरुषोत्तमदास टण्डन तथा गोपाल प्रसाद व्यास जी की प्रतिमाएं मौजूद हैं। ऐसे ही सैंकड़ों स्मारक और भग्नावशेष कविता के साधकों की अनकही कहानियां कहने के लिए देश के हर कोने में ज़िंदा हैं। निश्चित ही आपने भी यात्राओं में इन स्मारकों के दर्शन किये होंगे। आपसे अनुरोध है कि ऐसी जो भी जानकारी आपके पास उपलब्ध है कृपया मुझे उससे अवगत कराएं ताकि इन सब स्मारकों, सड़कों, घाटों, मंदिरों, मज़ारों, हवेलियों, संग्रहालयों, मूर्तियों, पुस्तकालयों तथा शिक्षण संस्थानों आदि का एक दस्तावेज तैयार किया जा सके और आने वाली पीढ़ियों को इन शब्द साधकों से परिचित कराना आसान हो सके।

✍️ चिराग़ जैन

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