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आओ नया धर्म बनाएँ

आने वाली पीढ़ियों को
मेहनत करने से बचाएं
आओ, एक नया धर्म रचाएं!

धर्म रचने के लिए चाहिए
एक अदद इंसान
जो किसी भी सूरत में इंसान न हो।
जिसे भगवान बनाया जा सके
जिसके हर काम को
महान बताया जा सके
और जिसकी हर मूर्खता को
उसकी लीला कहकर भुनाया जा सके।

धर्म रचने के लिए चाहिए
ठाली लोगों का एक कोर ग्रुप
जो उस आम इंसान के चमत्कारों की
माउथ टू माउथ मार्केटिंग करे
पहली बार आने वाले हर शिकार को
स्पेशल फील कराने की सेटिंग करे
और सोशल मीडिया पर
नवजात भगवान की
सस्पेक्टिंग शिष्याओं से चैटिंग करे।

ये कोर ग्रुप तिनके को भी
बांस की तरह तना देता है
और पड़ोसी के झगड़े को भी
देवासुर-संग्राम बना देता है।

ये ठाली कोर ग्रुप
मार्किट में खड़ा होके
’आइए भैनजी’ की आवाज़ लगाता है
और कोई साड़ी मांगे या सूट
उसे धर्म के शोरूम तक ले आता है
शोरूम तक लाने का जिम्मा क़द्रदान का है
और आगे का काम भगवान का है।

ख़ुद पर यक़ीन न करने वाले लोग
ऐसे भगवानों पर
आसानी से यक़ीन कर लेते हैं
और आश्रमों को धनवान बनाने के लिए
ख़ुद को दीन-हीन कर लेते हैं।

जैसे जैसे बढ़ने लगता है ग्रेड
वैसे वैसे मिलने लगती है एड
जैसे जैसे चमकने लगता है धंधा
वैसे वैसे बरसने लगता है चंदा
जब मंत्री से लेकर संतरी तक
आश्रम में पैर फेरने लगते हैं
तब भगवान धर्मोत्थान के लिए
सरकारी ज़मीनें घेरने लगते हैं

जब ठीक से बजने लगता है
भगवान का डंका
पूरी तरह सेटल हो जाती है
रावण की लंका
तब भक्तों को बना लिया जाता है हथियार
चुनाव से लेकर
घेराव तक का किया जाता है व्यापार

भक्तों के पास दो ही काम होते हैं
भगवान की रक्षा के लिए लड़ना
और भगवान की भक्ति करना

जो भक्त भगवान की शरण में आए थे
वे ही भगवान की रक्षा करने लगते हैं
मादा भक्त भगवान पर मरती फिरती हैं
और नर भक्त भगवान के लिए मरने लगते हैं

और भगवान के मर जाने के बाद
आश्रम में रह जाते हैं भगवान के आदमक़द चित्र
अब धर्म धारण करता है अपना असली चरित्र
शरीर मिट गया रह गई छाया
जैसे काजू के फल से काजू निकल आया
अब भगवान वह सब कुछ कर सकता है
जो जीते जी नहीं कर पाया

जो भक्त अब भी भगवान पर विश्वास करता है
भगवान उन भक्तों के बच्चों को पास करता है
ऑफिस में प्रमोशन दिलाता है
कन्याओं की शादी कराता है
भक्ति में डूबने वालों को मज़ा देता है
धर्म के विरोधियों को सज़ा देता है
भक्तों के सारे काम करता है
और रात रात भर सपनों में विचरता है

बुद्धि के तर्क बेकार जाते हैं
नियम-क़ानून हार जाते हैं
आस्था जीत जाती है
और भगवान की भक्ति में
कई पीढ़ियों की ज़िंदगी बीत जाती है।

✍️ चिराग़ जैन

निर्बल से प्रतिशोध

जब दिवाकर की तपिश के दाह से भयभीत होंगे
तब अंधेरे तिलमिलाकर रश्मियों से वैर लेंगे
जो भरी बरसात में भीगे हुए ठिठुरे फिरेंगे
वे अधम भोली बया की बस्तियों से वैर लेंगे

मंत्र-जप की साधना का सत्व जब संभव न होगा
तब करेंगे ढोंग इक पाखण्ड का चोगा पहन कर
जो जला बैठे स्वयं के हाथ समिधा चोरने में
प्रश्न लेकर वे खड़े हैं भक्ति के पावन हवन पर
मृत्यु के प्रख्यात सच को जब नहीं झुठला सकेंगे
तब अघोरी बेसहारा अरथियों से वैर लेंगे

कृष्ण जब षड्यंत्र के आमंत्रणों को भाँप लेंगे
तब विदुर के साग में कमियाँ निकालेगा सुयोधन
जब समर में जीतने की शक्ति पर संदेह होगा
रात में सोते हुओं को फूँक डालेगा सुयोधन
जो सुदर्शन से पराजित हो गए हर एक रण में
वे मधुर सरगम सुनाती वंशियों से वैर लेंगे

वृक्ष के तन पर नहीं चल पाएगा वश कोई जिसका
वो हवा सूखे हुए पत्ते हिलाकर ख़ुश रहेगी
योग्यता जिसमें न हो अट्टालिकाओं के परस की
वो लपट कुछ फूस के छप्पर जलाकर ख़ुश रहेगी
जो झखोरे सामधेनी को नहीं धमका सकेंगे
वे किन्हीं जलदीपकों की बातियों से वैर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

उचक्कों की भाभी

छोरे उचक्कों से दिन-रात घर की रखवाली करते थे। घर का बूढ़ा उचक्कों के मुहल्ले से होकर गुज़रता था।
उचक्कों की भाभी बूढ़े को देखकर स्माइल पास करती थी। स्त्री की मुस्कुराहट से बूढ़े को थोड़ी-थोड़ी गुदगुदी होती लेकिन उचक्कों की हरकतें ध्यान आते ही वह तेज़ी से आगे बढ़ जाता। गर्मी का मौसम आया तो बूढ़ा कभी-कभी थकान मिटाने के लिए उचक्कों की भाभी के चबूतरे पर बैठ जाता। भाभी ने भी मौक़ा देखकर बूढ़े को बैठते ही ठंडा पानी पिलाना शुरू कर दिया। एक दिन शर्बत पिलाते हुए भाभी ने बूढ़े से कहा- “ए जी, आपके घर के बाहर जवान लौंडे पहरा देते हैं तो मेरे देवर घर में सेंध नहीं लगा पाते। आप उन्हें रोकते क्यों नहीं। कम से कम अगली दिवाली तक अपने छोरों को पहरेदारी से हटा लो ताकि बेचारे सेंधमार उचक्के आपके घर से कुछ बर्तन-भांडे चुरा कर दिवाली का जुआ खेल सकें।”
भाभी की बात सुनकर बूढ़े को अपने छोरों पर क्रोध आया और उचक्कों पर दया आई। घर लौटते ही तमतमाकर छोरों की क्लास लगाई, और बोला- “एक महीने बाद दिवाली है, अगर किसी उचक्के की धरपकड़ की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। जाओ कुछ हिल्ला करो, आज से ये लठैती बंद!”

नोट : इस कहानी को कश्मीर से जोड़ कर मुझे शर्मिंदा न करें।

Ref : Military restrictions in Kashmir on Eid

✍️ चिराग़ जैन

ईद के अवसर पर कश्मीर में सेना पर प्रतिबंध

सुना है एक मदमस्त हाथी ने
बिल्ली के कहने पर
शेरों के हाथ बांध दिए
ताकि भेड़िये मेमनों की दावत उड़ा कर
ईद मना सकें।

शेरों को आदेश है
कि लकड़बग्घे उन्हें अपमानित करें तो हो लें
क्योंकि बेचारे लकड़बग्घों का रमज़ान है
उनसे अपमानित हो लोगे तो बेचारे ख़ुश हो जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

ईश्वर बढ़िया सेल्समेन है।

इतना सारा सुख!
वह भी सस्ते दामों पर
कहीं यह सुख के पैकेट में
दुख का कच्चा माल न निकले!

बाज़ारों में
दुख का ग्राहक मिलता कम है
इसीलिए भगवान बेचारा
सुख के बीच मिलावट करके
दुख का मोल जुटा लेता है।

“ले लो बाबूजी,
ले जाओ
सुख से इक्कीस ही निकलेगा
सुख से ज़्यादा ड्यूरेबल है
सुख से ज़्यादा दिन चलता है
और जब ये एक्सपायर होगा
तब पछतावा दे जाएगा।

सुख की मेंटेनेंस महंगी है
दुःख ताउम्र नया रहता है
एक ख़रीदो एक मुफ्त है
न भाए वापिस दे जाना!”

-सुनकर सुख का हर इक ग्राहक
दुख से झोला भर लाता है
रोटी लेने घर से निकले
भूख उठाकर घर लाता है।

जो सस्ते के पीछे भागा
उसके हिस्से सिर्फ़ पेन है
सुबह-शाम दुख बेच रहा है
ईश्वर बढ़िया सेल्समेन है।

✍️ चिराग़ जैन

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