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कलाम साहब नहीं रहे!

आह!
कलाम साहब नहीं रहे!
जीवन की अंतिम श्वास तक
सक्रिय और सकारात्मक रहकर
आप नहीं रहे!!
देह ही हारी होगी
मन तो जीवित ही था आपका
चिकित्सकों ने काश मन टटोला होता
तो कह न पाते कि “ही इज़ नो मोर…”
सुना है “लिवेबल प्लेनेट अर्थ” पर बोल रहे थे आप
महसूस हुआ होगा इस दौरान
कि ये प्लेनेट अब लिवेबल रहा नहीं।
आपने कभी जुड़ने ही नहीं दिया अपने साथ
कोई वाद, कोई धर्म, कोई विशेषण।
आप मानव थे
सिर्फ़ मानव…
भरपूर मानव।
आपने कभी कुछ नहीं लिया इस देश से
आपने कभी कुछ नहीं मांगा इस देश से
यहाँ तक कि
अंतिम समय इतना भी समय नहीं दिया
कि कोई कुछ दे सके आपको।
आपने कभी प्रवचन नहीं दिया
आपका हर आचरण एक संदेश देता था।
एक लम्बे समय बाद बच्चों को कोई ऐसा मिला था
जिसके जैसा बनने के सपने देखे गये।
बच्चों जैसी जो निश्छल खिलखिलाहट आपकी सखी थी
वह आपके अन्तर्मन की जीवंत एक्स-रे थी।
आप राष्ट्रपति ही नहीं थे कलाम साहब
आप तो हृदयाधिपति थे इस देश के
आप धड़कते रहोगे यौवन के सीने में
आप खिलते रहोगे बच्चों की मुस्कान में
आप पुलकते रहोगे उत्सवों में
आप दौड़ते रहोगे धमनियों में
बन्द गले का सूट पहने
जब कोई लम्बे सफ़ेद बालों वाला
खिलखिलायेगा हाथ हिलाकर
तब सब कहेंगे
ये तो कलाम साहब जैसा है यार!

✍️ चिराग़ जैन

नेपाल भूकंप त्रासदी

ईश्वर के एक इशारे पर
मानवता दहल गई सारी
लेकिन मानव की जिजीविषा
पल भर भी हिम्मत कब हारी
धरती डोली, हड़कंप मचा
ईश्वर ने यह भूकंप रचा
भय, शोक, करुण-चीखें, पुकार
मानव मन काँपा बार-बार
क्षण भर में भीषण वज्रपात
धन-जन हानि और प्राणघात
लेकिन अगले ही पल मानव
भरकर भीषण हुंकार उठा
जो चला गया उसको तजकर
कर जीवन का सत्कार उठा
दुनिया हर वर्गभेद भूली
मानवता की आशा फूली
हर दिशा सहायक हो आई
ज़ख़्मों का मरहम ले आई
मनुपुत्र मिलाकर ताल चले
अब कैसा भी भूचाल चले
हम फिर से गाँव बसा लेंगे
छप्पर से छाँव जुटा लेंगे
ईश्वर तेरे सुत दीन नहीं
भय से हारें वो हीन नहीं
कल फिर से सृजन करेंगे हम
फिर तेरा भजन करेंगे हम

✍️ चिराग़ जैन

एक काॅलम हादसा

कौन सोचे किन चनों के साथ कितना घुन पिसा
जी रही है दामिनी या मर रही महरुन्निसा
आज तो अख़बार की दरकार है केवल यही
सात काॅलम सनसनी और एक काॅलम हादसा

✍️ चिराग़ जैन

पेशावर की चीख़

ढेर सा है
स्कूल के इक रूम में
बच्चों के बस्तों का
और उन बस्तों के बच्चों का!

धूल में लथपथ
कोई आदिल कभी जब
स्कूल से घर लौटता था
तो वो अम्मी की ढेरों गालियों से
होके कमरे तक पहुँचता था
आज वो आँगन में है
और खून से लथपथ
मगर अम्मी के होंठों से
कोई अल्फाज़ गिरता ही नहीं है।
उसे कुछ बोल दे अम्मी
तो वो चुपचाप अपने कमरे में जाए
ज़रा आराम कर ले।

बहुत गुस्से में थे
अल्ताफ के अब्बू
मेरे बेटे के मातम में
मुहल्ले भर से कोई भी नहीं आया।
फिर अपने दोनों घुटनों पर
टिकाकर हाथ
गो उठते हुए बोले-
अरे वो भी सब भी तो
अपने घरों के
मातमों की फ़िक्र में मसरूफ़ होंगे।

अमां जेहादियों
तुमने तो अपनी गोलियों से
जिस्म छलनी कर दिया अल्लाह का भी।
तुम अपने मकसदों से अब बहुत आगे निकल आये
तुम्हारे नाम से अब खौफ़ क्या
नफरत पनपती है।

तुम्हारी प्यास का चारा
क्या केवल खून है
पानी नहीं है
ये हरक़त
नौनिहालों को ज़िबह करने की
बचकानी नहीं है।

ख़ुदा की रहमतों की बात छोड़ो
ख़ुदा तुमको कहर के भी नहीं लायक समझता है
तुम्हें जिस बाप ने पैदा किया
वो खुद को नालायक समझता है

✍️ चिराग़ जैन

साईं बाबा

पहले शंकराचार्य जी ने बताया की साईं बाबा हिन्दू नहीं थे
फिर उलेमा साहब ने बताया कि साईं बाबा मुसलमान भी नहीं थे
……तो क्या समझा जाए? क्या साईं बाबा इन्सान थे!

✍️ चिराग़ जैन

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