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आज़ाद हो गए हैं

कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’
✍️ चिराग़ जैन

शरद पूर्णिमा

शरद रात्रि का चंद्रमा, किसे सुनावे पीर
ना जमना में नीर है, ना अंगना में खीर

सखी! शरद की पूर्णिमा, मन हो गया अधीर
मैं तरसूं निज श्याम को, दुनिया खाए खीर
✍️ चिराग़ जैन

देश को महान कौन करता

यदि इतिहास वाले लोग हम जैसे होते
बोलो दुविधाओं का निदान कौन करता
झाँसी वाली रानी कर लेती समझौता गर
राष्ट्र के निमित्त बलिदान कौन करता
भगत भी चाटुकारों वाली भाषा सीख लेते
भारतीयता पे अभिमान कौन करता
नेताजी सुभाष औ पटेल होते स्वार्थी तो
फिर मेरे देश को महान कौन करता
✍️ चिराग़ जैन

नया साल

नये घटनाक्रम की पोटली
समय के कंधे पर लटकाये
एक और नया साल
आ खड़ा हुआ है
जीवन की पगडंडी पर।

बिछाते हुए शुभकामनाओं के फूल
इस बार भी स्वागत करेंगे
सभी लोग
इस अजनबी का
अपने-अपने घर में।

खोल-खोलकर
पोटली में बन्द घटनाओं को
शुभ-अशुभ
अच्छे-बुरे
सुख-दुःख
तथा ऐच्छिक-अनैच्छिक का
अनजना ख़ज़ाना बिखेरता हुआ
समय के घोडों की लगाम
एक नये सारथी को थमाकर
यह वर्ष भी बस जायेगा
यादों के विराट भवन में

आओ! प्रार्थना करें
कि इस बार रीती हो
इस मुसाफ़िर की पोटली
दुर्भाग्य से
ताकि नम न हों
अगले वर्ष के स्वागत में बिछी आँखें।

✍️ चिराग़ जैन

होली

सबके जीवन में भरें पावनता के रंग
ऐसी रंगत लाए अब, होरी अपने संग

अब ऐसे मनने लगा, होली का त्यौहार
चेहरे स्याह-सफेद हैं, रंगे हुए अख़बार

भूले से भी मत करो, पॉवर का मिस-यूज़
भस्म हो गई होलिका, उड़ा पाप का फ्यूज़

✍️ चिराग़ जैन

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