Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
बिना मांगे मुझे सब कुछ मिरा दातार देता है
वो दरिया है जो पत्थर को नया आकार देता है
सरे-महफ़िल मुझे जो बेवज़ह दुत्कार देता है
अकेले में वो मिलता है तो मुझको प्यार देता है
बताओ कौन है मुज़रिम, ग़रीबी या कि वो बापू
जो बच्चों की तमन्नाओं को हर दिन मार देता है
मिरे भीतर के शाइर को कोई व्यापार सिखलाए
ज़माना दर्द देता है तो ये अशआर देता है
फ़साना एक ही होता है शाइर और वीणा का
जो छेड़ो तो तड़पकर इक नई झनकार देता है
कोई कितना भी दुनिया में भटक ले, पर यही सच है
हमेशा आसरा अपना ही घर-परिवार देता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Doha, Poetry
जब से आंगन में हुए, दीवारों के ठाठ
तब से महंगे हो गए, छोटे-छोटे बाट
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
कितना आसान है
रिश्तों को फ़ना कर देना
ज़रा-सी बात को दिल से लगा के रख लेना
ग़ैर लोगों को, रक़ीबों को तवज़्ज़ो देना
शक़ की तलवार से विश्वास को कर देना हलाल
अपने लहजे को तल्ख़ियों के हवाले करना
अपने मनसूबों में कर लेना सियासत को शुमार
सामने वाले की हर बात ग़लत ठहराना
उस की हर एक तमन्ना को नाजायज़ कहना
उसको बिन बात हर इक बात पे रुसवा करना
उसकी हर बात में खुदगर्ज़ियों की करना तलाश
उस से रख लेना बिना बोले समझने की उम्मीद
उसके आगे सदा हँसने का दिखावा करना
अपने हर दर्द की वजह उसे समझ लेना
प्यार को अनकही रंजिश की शक़्ल दे देना
अपनी झूठी अना की दे के दुहाई हर दम
अपने अहसास के अमृत को ज़हर कर लेना
या कि इक पल में ही अपनों को ग़ैर कर देना…….
कितना मुश्क़िल है मगर
रिश्तों को ज़िंदा रखना!
✍️ चिराग़ जैन