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ओ विकलता!

ओ विकलता!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

नींद का तुझसे पुराना वैर है री!
श्वास ने लय खोई तेरे साथ चलकर
धड़कनों की ताल द्रुत होती अचानक
रह गई है शांति अपने हाथ मलकर
मान भी जा!
एक क्षण भीषण प्रतिज्ञा तोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

अनवरत मस्तिष्क में हलचल मची है
मौन के क्षण को कभी सम्मान तो दे!
तू समूची बुद्धि से मन तक बसी है
धैर्य टिक पाए कहीं पर स्थान तो दे!
या चली जा!
या हृदय को इक दफा झखझोर दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

दृष्टि को भीतर उतरने की गरज है
भंगिमा को सरल होने का समय दे!
मुस्कुराहट खिल उठे व्याकुल अधर पर
त्यौरियों को तरल होने का समय दे!
घूम-फिर आ!
भृकुटियों को सहजता से जोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

✍️ चिराग़ जैन

घर कैसे बचेगा?

देहरी ने झूठ बोला है कपाटों से
सांकलों ने सी लिए हैं होंठ
घर कैसे बचेगा?

धूल आंगन की छतों के सिर चढ़ी है
और चैखट मूकदर्शक बन खड़ी है
नींव तक हर रोज़ पानी रिस रहा है
फर्श बेचारा निरंतर घिस रहा है
रोज़ टलता जा रहा विस्फोट
घर कैसे बचेगा?

नींव का बिसरा चुकी है प्यार देखो
दूसरों पर लद गई दीवार देखो
खिड़कियां घर से अभी रूठी हुई हैं
दूसरों की दृष्टि से जूठी हुई हैं
भा रहा मन को पराया खोट
घर कैसे बचेगा?

बिस्तरों पर सिलवटें संदेह की अब
एड़ियां फटने लगी हैं स्नेह की अब
दूर ले जाती सड़क को तक रहे हैं
साथ चलने में सभी अब थक रहे हैं
आन पर हर रोज होती चोट
घर कैसे बचेगा?

इक अहम का भाव घर में तन चुका है
अन्तरंगता में झरोखा बन चुका है
आपसी विश्वास भी जर्जर हुआ अब
चाय की चर्चा हमारा घर हुआ अब
उफ़! उघड़ती जा रही हर ओट
घर कैसे बचेगा?

✍️ चिराग़ जैन

एक गीत मस्ती का

आकलन नहीं करना आप मेरी हस्ती का
कुछ अलग कलेवर है मेरे दिल की बस्ती का
एक ही ज़मीं पर मैं एक संग उगाता हूँ
एक गीत करुणा का, एक गीत मस्ती का

अश्क़ की कहानी भी शब्द में पिरोता हूँ
दर्द देखता हूँ तो ज़ार-ज़ार रोता हूँ
ख़ूब खिलखिलाता हूँ ग़लतियों पे मैं अपनी
व्यंग्य-बाण ख़ुद को मैं आप ही चुभोता हूँ
साज़िशें दिखें तो ये मन उदास होता है
लुत्फ़ भी उठाता हूँ साज़िशों की पस्ती का
एक गीत करुणा का, एक गीत मस्ती का

जिस क़लम से लिखता हूँ इक ग़्ाुलाब का खिलना
मैं उसी से कहता हूँ, तार-तार का छिलना
मंच पर चहकता हूँ, डायरी में रोता हूँ
आप जिस जगह चाहें मुझसे उस जगह मिलना
मानता हूँ लोहा भी चप्पुओं की हिम्मत का
गर्व भी है नौका की मौन सरपरस्ती का
एक गीत करुणा का, एक गीत मस्ती का

✍️ चिराग़ जैन

छल का पल

आँखें पलकों की सीमा से बाहर आने को आतुर थीं
कंधे ढूंढ रहे थे कोई एक हथेली धीर बँधाए
रक्त शिराओं के तटबंधों की मर्यादा लांघ रहा था
अपनेपन के छल से आहत दिल ख़ुद को कैसे समझाए

मुट्ठी भींच नहीं सकता था, संबंधों का दम घुँट जाता
और हथेली के खुलते ही भाग्य मुझे उपहास बनाता
किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा मैं सोच रहा था कैसा क्षण है
मेरे तन पर मेरे मन का क्यों कुछ ज़ोर नहीं चल पाता
शब्द गले में मौन पड़े थे, वक़्त थमा-सा था मुँह बाये
अपनेपन के छल से आहत दिल ख़ुद को कैसे समझाए

अपना सुख ईंधन कर डाला, जिसका पथ उज्ज्वल करने में
उसने पल भर भी न विचारा, संबंधों से छल करने में
मैं इस पल भी चाह रहा हूँ, यह कोई झूठा सपना हो
उसके हाथ नहीं काँपे थे, अपनों को घायल करने में
दिल धक से बैठा जाता था, पलकों तक आँसू भी आए
अपनेपन के छल से आहत दिल खुद को कैसे समझाए

इस पल में समझा चेहरे का रंग बदलना क्या होता है
इस पल जाना पाँव तले से ज़मीं खिसकना क्या होता है
विश्वासों की परत चढ़ाकर विष देना किसको कहते हैं
इस पल ही जाना जीते जी, प्राण निकलना क्या होता है
दुनियादारी क्या होती है, इस पल ने सब पाठ पढ़ाए
अपनेपन के छल से आहत दिल खुद को कैसे समझाए

✍️ चिराग़ जैन

दिन निकलेगा

रात कटेगी, दिन निकलेगा
यह क्रम तो निर्धारित ही है
दिन इक दिन मुझ बिन निकलेगा
यह अनुमोदन पारित ही है

मैं इस भ्रम में जूझ रहा हूँ
मुझसे ही सब काज सधेंगे
पर दुनिया के लोग मुझे भी
दो ही दिन में बिसरा देंगे
विस्मृतियों के वरदानों पर
यह दुनिया आधारित ही है

चाहत, सपना, डर, उम्मीदें
प्रेम, प्रयास, प्रथा, यश-वैभव,
गर्व, विनय, संबंध, सृजन, सुख
हर्ष, विजय, सम्मान, पराभव
इन सब आभासी शब्दों पर
सृष्टि कथा विस्तारित ही है

✍️ चिराग़ जैन

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