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कैराना उपचुनाव

लल्ला का है गो कैराने में
जल गई काठ की हांडी
वोटर नाय आयो बहकाने में
जल गई काठ की हांडी

रोड बनाकर जाल बिछायो
ख़ूब सड़क को शोर मचायो
योगी ने भी ज्ञान पिलायो
सबने पूरा जोर लगायो
साबुन गिर गी बीच नहाने में
जल गई काठ की हांडी

फिर कीकर पे आम न आए
वोट दिलाने राम न आए
क्यों जुमलों के दाम न आए
जिन्ना भी कछु काम न आए
जमकर वोट पड़ी धौलाने में
जल गई काठ की हांडी

गन्ना सूखा आशा टूटी
कब तक चाटें सूखी बूटी
भरे कुएँ में डोरी छूटी
याय लिए जे जनता रूठी
कछु नाय रखौ खलिश इतराने में
जल गई काठ की हांडी

✍️ चिराग़ जैन

चुनाव

“अगला चुनाव कब है?”
“नवंबर में होगा शायद।”
“कब से जुटना है?”
“जुलाई-अगस्त से शुरू करते हैं।”
“ठीक है, तब तक रूस घूम आता हूँ।”
“लेकिन पैसा कहां से आएगा।”
“ह्म्म्म….
पैट्रोल के दाम बढ़ा दो ना यार। ”

✍️ चिराग़ जैन

राज करेगी भाजप्पा

दक्षिण में कर्नाटक के रीयल नाटक का शोर रहा
उत्तर में सेना को देखा तो मंज़र कुछ और रहा
काशी में इक पुल टूटा जो पूरा आदमखोर रहा
नेताजी का केवल सत्ता हथियाने पर ज़ोर रहा
जब विधायकों की मंडी लगा ली, नियम की सुध ना ली
लीडर हुए मलंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

महबूबा की मांग नहीं ये कैकयी के वरदान हैं जी
जिन पर बंदिश ठोकी है वे अपने वीर जवान हैं जी
आतंकवादी को मत पकड़ो क्योंकि अब रमज़ान है जी
लकड़बग्घे ईद मनाएँ और बकरे कुर्बान हैं जी
अरे किस किस से दोस्ती बना ली, ये सत्ता की दलाली
बड़ी है बदरंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

ईद मनाने देना उनको सैनिक सारे चुप रहना
वो तुमको पत्थर मारे या थप्पड़ मारे चुप रहना
महबूबा मुफ्ती मैडम ने किए इशारे चुप रहना
56 इंची वाले फूट गए गुब्बारे चुप रहना
तुमने वीरों के बेड़ियां क्यों डाली, शोषण ही किया ख़ाली
कैसे जीतेंगे जंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

क्या सोचा था कानूनों की लाज करेगी भाजप्पा
नैतिकता की पारी का आग़ाज़ करेगी भाजप्पा
गोवा, मणिपुर भूल गए जो आज करेगी भाजप्पा
कितनी भी सीटें ले आओ राज करेगी भाजप्पा
राज्यपाल पे भी उंगली उठा ली, अदालत खुलवा ली
चला न कोई रंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

अमित शाह घर से निकले तो ख़ौफ़ खा गए कांग्रेसी
अपने जीते हुए विधायक लुका छुपा गए कांग्रेसी
जेडीएस का सीएम बन जाए, इस पर आ गए कांग्रेसी
येदुरप्पा कुर्सी ले भागे गच्चा खा गए कांग्रेसी
हाय आगे से थाली उठा ली, छू भी न सके प्याली
सपना सा हुआ भंग भाइयो
पूरी राजनीति हो गई मवाली, सभी के सब ठाली
ये ठीक नहीं ढंग भाइयो

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली महापुराण

कलयुग में आपिये और भाजपाइयों के दो समूह थे। दिल्ली नगरी में संसदपुरी और विधानसभापुरी पर शासन करने हेतु दोनों परस्पर दूसरे को असुर और स्वयं को सुर सिद्ध करने में निमग्न रहते थे। मीडिया माइलेज के संघर्ष में वे जनहित तथा राष्ट्रहित के अस्त्र एक-दूसरे पर चलाते रहते थे। इन अस्त्रों के आघात से इनके सरकारी सिक्योरिटी गार्ड इन्हें बचा लेते थे और अपनी विशेष सिद्धि के बल पर इनकी दिशा आम आदमी की ओर मोड़ देते थे। एक दिन दोनों दल मीडिया नामक त्रिदेव के पास गए। मीडिया ने उन्हें राजनीति के सागर का मंथन करने का उपाय सुझाया। दिल्ली की राजनीति के सागर में मुद्दों का सुमेरु स्थापित किया गया जिसे मीडिया ने कश्यपावतार लेकर अपनी पीठ पर धारण किया। भाजपाइयों ने ज़ी न्यूज़, इण्डिया टीवी और दूरदर्शन जैसे चैनल्स की पूँछ पकड़ी। आपियों के हिस्से एबीपी, एनडीटीवी और आईबीएन 7 जैसे फन आए इस कारन मंथन के दौरान बेचारे आपियों को ज़हरीले डंक का भी सामना करना पड़ता था।
मंथन प्रारम्भ हुआ तो सबसे पहले उसमें से एक एलजी निकले। मीडिया ने वे एलजी टाइम पास के लिए दिल्ली में नियुक्त करवा दिए। उसके बाद दिल्ली पुलिस का अवतरण हुआ। उसे भाजपाइयों को दे दिया गया। फिर डीडीए निकली। उसे भी भाजपाई ले उड़े। आपियों के सरदार ने मीडिया प्रभु से शिकायत की कि मंथन से निकलने वाले सभी रत्न भाजपाई हड़प रहे हैं। यह अन्याय है।
मीडिया प्रभु ने उन्हें आश्वस्त किया कि अब जो भी कुछ निकलेगा उसे आपियों को सौंपा जाएगा। पुनः मंथन आरम्भ हुआ। अबकी बार सागर में से एक सीडी निकली। मीडिया प्रभु ने अपने हाथों से वह सीडी आपिये दल के एक मंत्री के नाम लिख दी।
मंथन आगे बढ़ा। सागर में से अचानक हालाहल निकलने लगा। पूरी दिल्ली ज़हरीले धुंए से घिर गई। प्राणिमात्र का श्वास लेना दूभर हो गया। न्यायालय, NGT और प्रशासन; तीनों से इस धुएँ को ग्रहण करने की अनुनय की गई किन्तु तीनों ने “I DONT SMOKE” बोलकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
सभी आपिये और भाजपाई अपनी-अपनी वातानुकूलित गाड़ियों में जा घुसे। शेषनाग का दम घुँटने लगा। उधर सागर विष उगल रहा था, इधर आपिये और भाजपाई परस्पर विषवमन कर रहे थे।
धुएँ से मीडिया की आँखें लाल होने लगी। खाँसी कर-कर के पूरी जनता स्वयं को मुख्यमंत्री समझने लगी थी। चुनाव् आयोग के महादेव ने धूम्रपान करने की बजाय पंजाब चुनाव का बिगुल बजाने का निर्णय लिया। इससे मीडिया प्रभु का ध्यान दिल्ली के धूम्रपान से पंजाब के विषपान की ओर मोड़ दिया। और दिल्ली की जनता को धुएँ के साथ अपनेहाल पर छोड़ दिया।

✍️ चिराग़ जैन

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