Chirag Jain Writings, Ghazal, Lapete Mein Netaji, Poetry
ज़िद पर आ जाएं तो क्या से क्या कर डालें साहिब जी
नाले के बहते पानी से आग जला लें साहिब जी
दर्द तुम्हारा सुन भी लेंगे, कर भी देंगे ठीक इलाज
लेकिन पहले ख़ुद तो अपने होश संभालें साहिब जी
मातम का माहौल न जाने कितना लम्बा चलना है
पहले अपना बढ़िया से फोटू खिंचवा लें साहिब जी
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
किरणों के बूते गहरा अंधियार मिटाना नामुमकिन है
दिनकर अब तुमको ख़ुद ही अंधियारे बीच उतरना होगा
युग-युग से तुम जिन घोड़ों के रथ पर थे असवार दिवाकर!
उनका चाल-चलन भी जाँचो अब फिर से इक बार दिवाकर!
इनके चारे की थैली पर अंधियारे के चिन्ह मिले हैं
इनकी हर हरक़त पर तुमको पूरा अंकुश धरना होगा
ओ दिनकर! कानाफूसी में ये बातें उड़ने लगती हैं
इक निश्चित पथ पर कुछ किरणें इधर-उधर मुड़ने लगती हैं
कोष तुम्हारे श्वेत पसीने का यदि उलझा तंत्र-भँवर में
तुमको लाँछन की पीड़ा से आहत होकर मरना होगा
तुम बरसों से धधक रहे हो, फिर भी अंधियारा जीवित है
कुछ अंधी गलियों में शायद उजियारे का रथ कीलित है
पूरब से पश्चिम तक की निगरानी की मर्यादा छोड़ो
अब नभ से धरती तक तुमको आँखे खोल विचरना होगा
तुम तक आने की हर कोशिश की पाँखें घायल होती हैं
उजियारे की ओर निहारें तो आँखें घायल होती हैं
ख़ूब भरा है तुम पर उठने वाली आंखों में अंधियारा
पर अंधियारे की आँखों में आज उजाला भरना होगा
तुम ही तो इस अंधियारे की रक्षा हेतु नियुक्त नहीं हो
तुम ही ख़ुद काले वैभव के वेतन से तो युक्त नहीं हो
इन सब प्रश्नों के उत्तर दे-देकर अपमानित हो जाओ
इससे पहले तुमको जग का हर अंधियारा हरना होगा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
साहब ने शतरंज की चाल चली। चार-पाँच चाल चलने के बाद, साहब हारने लगे। आँख बचाकर शतरंज की टेबल से उठकर, वे लूडो खेलने लगे। देश शतरंज को भूल गया और लूडो देखने लगा। थोड़ी देर बाद लूडो में भी साहब की सारी गोटियाँ पिट गईं। देश साहब की बुद्धिमत्ता पर लगाने के लिए प्रश्नचिन्ह लेने दौड़ा और जब तक वापस लौटकर आया तो साहब कैरम खेलते पाए गए। किसी जिज्ञासु ने पूछा कि लूडो और शतरंज का क्या हुआ तो साहब उसे बताने लगे कि शतरंज में मेरी गोटी लाल होने लगी तो लूडो के वज़ीर को कैरम की रानी ने शह दे दी। अभी-अभी बेसबॉल के रैकेट से दो सफेद गोटियाँ बाहर पहुँचाई हैं।
‘लेकिन आप तो कह रहे थे कि सफेद गोटियाँ विपक्षियों ने बाहर भेजी हैं!’ -जिज्ञासु आश्चर्यचकित होकर बोला।
प्रश्न सुनकर साहब के चेहरे पर महानता के चिन्ह उभर आए, लेकिन वे विनम्र होते हुए बोले- ‘यही तो हमारा बड़ा दिल है रे। हम काम करके क्रेडिट नहीं बटोरते।’
‘लेकिन आधार, मनरेगा, मंगल यान, एफडीआई के क्रेडिट लेने के लिए तो आपने सारी सीमाएँ लांघ दी थीं।’ -जिज्ञासु, साहब की विनम्रता को सत्य समझकर पूछने की हिम्मत कर बैठा।
सहब ने विनम्रता का कुर्ता उतार फेंका और राष्ट्रभक्ति की कमीज़ चढ़ाते हुए चिल्लाए- ‘अब ऊँची कूद में भी सीमा नहीं पार करूंगा तो विरोधी खिलाड़ी मुझे हरा देंगे। और मैं नहीं चाहता कि मैं हार जाऊँ और भारत की जनता को नज़रें झुकानी पड़ें।’
जिज्ञासु ने नहले पर दहला फेंकते हुए पूछा- ‘पर अपने कट्टर विरोधियों को अपनी पार्टी जॉइन करवाने के कार्य से आपने समर्थकों को नज़रें झुकाने पर विवश किया है।’
अब साहब का धैर्य डोल गया। वे अपनी फुलप्रूफ प्लानिंग का वर्णन करते हुए बोले- ‘मिस्टर जिज्ञासु! समर्थक हमारी पेड ऑडियन्स हैं। उनको स्पॉन्सर्स की उंगलियों पर तालियाँ बजानी होंगी। अभी किसी नेता के पाला बदलने पर थोड़ी ज़िल्लत उठानी होगी लेकिन कुछ दिन बाद इनके ज़ख़्मों पर नारंगी ब्रांड का मरहम लगाकर इन्हें मैनेज कर लेंगे। फिर भी स्थिति न संभली, तो आस्था की एस्टरॉयड डोज़ से फ़ास्ट रिलीफ़ की व्यवस्था कराई जाएगी।’
जिज्ञासु दुःखी होकर बोला कि यह तो चीटिंग है। पेड ऑडियन्स और डोपिंग दोनों ही खेल के नियम के खि़लाफ़ है।
अब साहब ने जिज्ञासु को कोई जवाब नहीं दिया। बल्कि अपने राइट हैंड को एसएमएस किया- ‘नेक्स्ट टारगेट जिज्ञासु भाई।’
दस मिनिट में राइट हैंड का रिप्लाई आया- ‘टारगेट अचीव्ड।’
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सुनो, झरोखा खोलो लोगो
जितना चाहो बोलो लोगो
लेकिन शर्त यही है केवल
पूछ पूछकर लखना होगा
पूछ पूछकर बकना होगा
बाहर कोई सत्य नहीं है
एक घिनौना चेहरा सा है
जिसको तुम बंधन कहते हो
वो तुम पर एक पहरा सा है
खूब खिलो, जी भर इतराओ
सारे आलम को महकाओ
जब तक कहें खिलो गुलशन में
जब हम कह दें तब झर जाओ
हर सुंदरता के प्रेमी को
इतना संयम रखना होगा
पूछ पूछकर तकना होगा
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
आज सुबह टेलीविज़न बुलेटिन ने बताया कि एक जज साहब जनता के आक्रोश के शिकार हुए और भीड़ ने उन्हें सड़क पर दौड़ा-दौड़ा कर मारा। मुआमला सिर्फ इतना था कि जज साहब की इगो को इस बात से ठेस पहुंची कि एक ट्रक ड्राईवर ने उनको ओवरटेक करने के लिए साइड नहीं दी। ट्रक ड्राईवर जैसे तुच्छ प्राणी की इस बदतमीज़ी से हिज़ हाइनेस क्रोधित हो गए और उन्होंने उसे सबक सिखाने के लिए कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए अपनी गाडी फ़िल्मी स्टाइल में ट्रक के आगे अड़ा दी। सड़क पर अचानक लगी इस अदालत का ट्रक वाला अंदाज़ा नहीं लगा सका और उसका फुटपाथी ट्रक जज साहब की आलिशान गाड़ी से जा टकराया। टक्कर से उत्पन्न हुए मोमेंटम ने गाड़ी को डिवाइडर की ओर धकेल दिया जहाँ एक बच्चा जज साहब की इगो के नीचे कुचला गया।
यह घटना अनेक प्रश्न खड़े करती है। चूँकि प्रश्न हमारी न्याय प्रणाली को कठघरे में खड़ा करते हैं, इसलिए मैं उनके उठने से पूर्व ही बिना शर्त मुआफ़ी मांग रहा हूँ। हमारे न्याय के मंदिरों में जिन लोगों को न्यायाधीश बनाकर अनेकानेक विशेषाधिकार दिए गए हैं; उनके व्यक्तिगत अहंकार, सर्वोपरि होने की उनकी भावना, अवमानना जैसा अस्त्र क्या वास्तव में आवश्यक हैं?
प्रश्न यह भी है कि उन्हीं गवाहों, उन्हीं सबूतों और उन्हीं कानूनों के तहत निचली अदालत में किसी को दोषी ठहराया जाता है, जिनके आधार पर ऊंची अदालत उसे निर्दोष साबित कर देती है; तब क्या निचली अदालत ने न्यायाधीश के विरुद्ध गलत फैसला देने के अपराध में कोई कार्रवाई होती है?
क्या इस न्याय प्रणाली ने कुछ हम-तुम जैसे सामान्य मानवों को नियामक बनाकर स्वयं को भगवान मान लेने की ग़लतफ़हमी के बीज नहीं बोए हैं? क्या अहम् और आत्ममुग्धता की ज़मीन पर उगने वाली वल्लरियों के पर्णों को संविधान की ऊँगली थाम कर न्याय के कंगूरों तक पहुँचना स्वीकार होता होगा? जो जज साहब ट्रक वाले के साइड न देने पर आपा खो सकते हैं, वे मुजरिम या मुलाजिम द्वारा सलाम न किये जाने पर क्या कुछ नहीं कर सकते!
प्रश्न यह भी है कि एक आम आदमी न्याय प्रक्रिया और अदालती माहौल पर विमर्श करने की सोचे तो इसमें अदालत की अवमानना कैसे हो सकती है? हिंदी फिल्मों ने कई दशकों तक अदालती प्रक्रियाओं को पैसे के कोठे पर मुजरा करते दिखाया है। दामिनी, इंसाफ का तराजू, आखिरी रास्ता, अदालत, जॉली एलएलबी, मेहंदी, मेरा साया और मेरी जंग जैसी तमाम फिल्मों ने वकीलों और जजों की लापरवाही व भ्रष्टाचार के अनगिनत उदाहरण पेश किये हैं। फिर किसी लेखक द्वारा इस प्रक्रिया की समालोचना को अपराध कैसे ठहराया जा सकता है।
पहली बार किसी लेख में पाठकों से जानना चाहता हूँ कि क्या आपको अदालत और अदालती लोगों पर एक स्वतन्त्र विमर्श की आवश्यकता महसूस नहीं होती?
✍️ चिराग़ जैन