आज़ाद हो गए हैं
कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’
✍️ चिराग़ जैन
कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं
सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं
आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है
कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’
✍️ चिराग़ जैन
होता तो यही है जी हर बार इलेक्शन में
पब्लिक को मनाती है, सरकार इलेक्शन में
जनता का ही पैसा है, जनता पे ही शासन है
जनता का ही होता है, व्यापार इलेक्शन में
कुछ झंडे उठाकर के, कुछ बिल्ले लगाकर के
बिन बात ही करते हैं, बेगार इलेक्शन में
कुछ रंगे सियारों ने, कुछ नंगे गरीबों के
बच्चों को लिया कैसे पुचकार इलेक्शन में
लीडर के कदम चूमें, ये लीपी हुई सड़कें
इनका तो हुआ ही है, उद्धार इलेक्शन में
हर दिल है महज दलदल, दिल्ली के दलालों की
कूदे तो भला कैसे, ख़ुद्दार इलेक्शन में
✍️ चिराग़ जैन
क्रूर काल ने गुरुग्राम की एक दम्पत्ति की गोद सूनी कर दी और अस्पताल ने उनकी जेब काट ली। इस देश में कुछ बुनियादी आवश्यकताएं जनता की लूट का माध्यम बन गई हैं। चिकित्सा में सरकारी तंत्र की नाकामी का लाभ अस्पताल उठाते हैं और कई कई दिन तक शव को वेंटिलेटर पर रख कर बिल बढ़ाते पाए जाते हैं। बीमारी से परेशान रोगी और किसी अपने से बिछड़ जाने के शोक से ग्रस्त परिजन कसाई की तरह निष्ठुर बने अस्पताल प्रशासन के हाथों लुटने को विवश हैं।
यदि चिकित्सा एक सेवाकार्य है तो यह कहाँ तक उचित है कि एक सेवक मानवीय संवेदनाओं को धता बता कर लाश तक सौंपने से पूर्व मोलभाव पर उतर आए? और यदि यह व्यवसाय है तो फिर कोई व्यापारी जिस काम को करने की कीमत ले रहा है, जब वह काम ही न हुआ तो ग्राहक से उसकी कीमत कैसे मांग सकता है। एक डॉक्टर किसी मरीज का डेंगू का इलाज कर रहा है और इस इलाज के एवज में दस लाख का मूल्य मांगता है यदि वह मरीज इलाज के दौरान मर जाए तो इसका अर्थ है कि डॉक्टर इलाज नहीं कर पाया और यदि इलाज नहीं कर पाया तो ग्राहक से पैसे लेने का उसका अधिकार समाप्त हो जाना चाहिए।
पूरा विश्व मानव जीवन की बेहतरी के लिए चिकित्सा जगत पर निर्भर है, विश्व भर में अलग अलग पद्धतियों के शोधकर्ता जटिल रोगों के निदान खोजने में जीवन होम कर रहे हैं। लेकिन इन शोधकार्यों से निकल कर नुस्खे का अमृत कलश पेटेंट के अंधकूप में समा जाता है फिर उस संजीवनी को महंगे दामों पर कोई व्यवसायी ख़रीद लेता है और मूर्छित लक्ष्मण के परिजनों से मुंहमांगी रकम वसूलता है।
व्यवसाय बन चुके चिकित्सा के पेशे में स्वास्थ्य और इलाज वरीयता नहीं रह गए हैं। फाइव स्टार में तब्दील हो चुकी वैद्यशालाएँ अब लाचार परिवारों से पैसा लूटने की जुगत में व्यस्त हैं। दवाई कम्पनियों से मिलने वाली कमीशन के आधार पर डॉक्टर्स की प्रिस्क्रिप्शन निर्धारित होने लगी है। महंगे महंगे टेस्ट (वो भी डॉक्टर साहब द्वारा सुझाई गई लैब से) करवाने में ही डॉक्टर साहब की सबसे ज़्यादा रुचि होती है।
सरकारी अस्पतालों में नम्बर नहीं आता और निजी अस्पताल आपका नम्बर लगा देते हैं। सरकारी अस्पतालों में बदतमीज़ी और बेहूदगी की ज़िल्लत झेलनी पड़ती है तो निजी अस्पताल में सीने पर स्टेथोस्कोप रखकर लूटा जाता है। सरकारी अस्पताल में इलाज के अभाव में मरीज़ मर जाता है तो निजी अस्पताल में इतना इलाज मिलता है कि उसका मोल चुकाने में मरीज़ और उसके परिजन सब मर जाते हैं।
अस्पताल में कोई मरीज़ इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं हो पाता कि उसे जो मिल रहा है वह इलाज ही है या उसे कुछ दिन तक अस्पताल में टिकाए रखने का नुस्खा दिया जा रहा है।
अस्पताल प्रशासन ने डॉक्टर्स की नौकरी को बंदी बना रखा है कि यदि अमुक राशि हर महीने अस्पताल के खजाने में नहीं जमा करवाई तो आपकी नौकरी चली जाएगी। अपनी नौकरी की इज़्ज़त बचाने के लिए बेचारा डॉक्टर मरीज़ को एटीएम समझ कर उसमें दहशत का कार्ड डालता है और पैसे निकाल कर अस्पताल को फिरौती देता रहता है।
सरकार को यूरोप की तर्ज़ पर टैक्स लेने की सुध आ गई है लेकिन सरकार को यह याद नहीं आया कि ज़्यादा कर चुकाने वाले यूरोपवासियों को चिकित्सा पर एक भी पैसा ख़र्च नहीं करना पड़ता। वृद्धों के लिए हर सप्ताह डॉक्टर घर आता है और बच्चों के लिए हर महीने। दवाई से लेकर इलाज तक सब कुछ सरकार मुहैया करवाती है।
राजनीति की रोटियाँ सेंकने के लिए सरकारें बेशक देश को विकास के पोस्टरों से पाट दें लेकिन उससे पहले कृपया सही और पूर्ण इलाज के वरदान की सुविधा मुहैया करवा दें।
✍️ चिराग़ जैन
ओलंपिक हो या आस्कर, क्रिकेट हो या हाॅकी और विज्ञान हो या तकनीक; हमारा देश हमेशा ‘नम्बर वन’ बनने से चूक जाता है। पिछले दिनों एक उम्मीद तब बंधी जब एक अंतरराष्ट्रीय संस्था ने विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्र का चयन करने का निश्चय किया।
भ्रष्टाचार हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। न जाने कितने ही मीर ज़ाफरों और जयचंदों ने अपने-अपने समय में ईमानदारी और कर्तव्यपरायणता की सत्ता को ललकारते हुए विपरीत परिस्थितियों में भी इस कला को जीवित रखने के लिए जान की बाज़ी लगाई थी। मंथरा, शकुनि, वीरभद्र और कंस जैसे अनेक भ्रष्ट शिरोमणियों से हमारे देश की धरती सदैव धन्य होती रही है। इसलिए मुझे विश्वास था कि भ्रष्ट राष्ट्रों की फेहरिस्त में तो हमारा देश अव्वल रहेगा ही। लेकिन हाय रे दुर्भाग्य! 158 देशों के इस सर्वेक्षण में भारत सत्तरवें स्थान पर रहा। हालांकि जापान, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े राष्ट्रों को हमने धता बता दिया लेकिन पाकिस्तान, बांग्लादेश, वियतनाम, फिलीपिन और नेपाल जैसे मुट्ठी भर देश हमें पछाड़ कर आगे बढ़ गए।
रिपोर्ट पढ़कर मेरा सिर शर्म से गड़ गया। एक क्षण में ही हमारे राजनेताओं, म्युनिसिपल कमेटियों, लालफीताशाहों, पुलिस, इंजीनियरों, डाॅक्टरों, सरकारी कर्मचारियांे और अध्यापकों के अथक प्रयासों पर पानी फेर दिया गया। अपने देश की महान विभूतियों का ऐसा अपमान देखकर जिस्म के रोमानी प्रदेशों में भयंकर अग्नि धधकने लगी। यह तो गनीमत है कि हमारे समाचार पत्रों का सर्कुलेशन अभी नर्क तक नहीं पहुंच सका है अन्यथा हमारे पूर्वज इस रिपोर्ट को पढ़कर हमें धिक्कारते। इस घटना ने हमें अपने पूर्वजों को मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा। एक रिपोर्ट ने हमारे सारे काले कारनामों पर पानी फेरकर हमें धवल तिलक लगा दिया। हमें इस सफेद धब्बे को अपनी काली चादर पर से मिटाना होगा।
मैं अक़्सर कल्पना करता हूँ एक ऐसे भारत की जिसे ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में सर्वाधिक भ्रष्ट राष्ट्र होने का गौरव प्राप्त होगा। चारों ओर भ्रष्टतंत्र का बोलबाला होगा। देश में शांति, सत्य, न्याय, सौहार्द, अहिंसा और सद्भाव जैसे बेकार पड़े मूल्यों के स्थान पर छल-कपट, धोखाधड़ी, ठगी, लूट, रिश्वतखोरी, जालसाजी, कालाबाज़ारी और मिलावट जैसे आदर्श तथा समसामयिक मूल्यों की स्थापना होगी।
बातें करने से क्रांति नहीं आती। इसलिए इस सपने को सच करने के लिए हमें मिलजुल कर देश का नक्शा बदलने के प्रयास करने होंगे। बाज़ार, घर, परिवार, शिक्षण संस्थान और मंदिरों से लेकर गांव, शहर, महानगर, प्रशासन, शासन और संसद आदि में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन करने होंगे ताकि परम आदरणीय, प्रातः स्मरणीय, लोकहितकारी श्री भ्रष्टाचार महोदय देश मंे अपने विराट रूप में अवतार ले सकें।
संसद भवन के भीतरी स्वरूप में कोई विशेष परिवर्तन करने की आवश्यकता नहीं है लेकिन बाह्य परिसर में जो स्वतंत्रता सेनानियों और संविधान निर्माताओं की ‘ऊबसूरत’ मूर्तियाँ ‘अशोभायमान’ हो रही हैं; वहाँ हर्षद मेहता जी, रोमेश शर्मा जी, बंगारू लक्ष्मण जी, दिलेर मेहंदी जी, सलमान खुर्शीद जी, ए राजा जी, सुरेश कलमाड़ी जी, राबर्ट वाड्रा जी, ओमप्रकाश चैटाला जी और सलमान खान जी जैसे महान लोगों की ‘खूबसूरत’ मूर्तियां सुशोभित होंगी। जहाँ अम्बेडकर संविधान लेकर संसद की ओर उंगली किए खड़े हैं वहां तेलगी जी हाथ में अपने हाथ से छापे हुए स्टाॅम्प पेपर के सेम्पल लिए मोबाइल पर बात करते दिखाई देंगे। उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीश की कुर्सी के पीछे महात्मा गांधी की जगह नटवर लाल का चित्र होगा जिसके नीचे ‘सत्यमेव जयते’ जैसे अव्यवहारिक वाक्य के स्थान पर लिखा होगा ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। इस प्रकार की व्यवस्था में लोग आत्मनिर्भर बनेंगे तथा अपने दम पर जीवन जीना सीखेंगे।
स्कूलों में बच्चों को जो किताबें पढ़ाई जाएंगी वे होंगी- ‘चाल भारती’, ‘आओ जुगाड़ सीखें’, ‘केस और उनकी निकासी’ तथा ‘हमारे घोटाले’ इत्यादि। राजनीति, चिकित्सा, अध्यापन, आध्यात्म, सुरक्षा, बीमा, परिवहन और यहाँ तक कि केन्द्रीय जाँच ब्यूरो जैसे नास्तिक सम्प्रदायों के लोेग भी एक मत से विराट भ्रष्ट पुरुष के अपावन चरणों में स्वयं को अर्पित कर ‘धननीय’ हो जाएंगे।
जैसे भला करने वालों को हमेशा बुराई ही मिलती है, ठीक इसी प्रकार हमें विश्व में एक गरिमामय पहचान दिलाने वाले आदरणीय भ्रष्टाचार जी को देश के विकास में सबसे बड़ी बाधा बताया जा रहा है। कितने निकृष्ट हैं हम; अहसान-फरामोश। जब भी कोई हमारे देश की पहचान विश्व में स्थापित करने के लिए आगे बढ़ता है तो हम उसकी टांग खींचने लगते हैं। लेकिन ‘जा को राखे साइयां, मार सके न कोय’। यही कारण है कि सारे विरोध और तिरस्कार के बावजूद महान भ्रष्टाचार जी को कोई उनके पथ से डिगाने में कामयाब न हो सका। तमाम आलोचनाओं को अनदेखा करते हुए एक सच्चे साधक की तरह भ्रष्टाचार महोदय अपने कर्तव्य पथ पर बढ़ते जा रहे हैं। डाॅ.कुंअर बेचैन का एक शेर है- ‘चलने को एक पांव से भी चल रहे हैं लोग, पर दूसरा भी साथ दे तो और बात है।’ यही स्थिति भ्रष्टाचार जी के साथ भी है।
भ्रष्टाचार जी लोकतंत्रात्मक शासन पद्धति के घोर समर्थक हैं। जनमत को अपने पक्ष में करने के लिए हमारे उन्होंने भाषण, जलसे और रैलियों जैसे चालू माध्यमों का सहारा न लेकर एक महान शिक्षक की तरह अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि उनके साथ रहकर मानव कैसे महान बन सकता है। उन्होंने राजनीति, प्रशासन, खेल, बाज़ार और मंदिरों में ऐसे उदाहरण पेश किए जो उनके बताए पथ पर चलकर रातों रात धनवान तथा मीडियावान बन गए। कहते हैं कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब जनता जनार्दन ने बंगारू लक्ष्मण जी, तेलगी जी और रोमेश शर्मा जी की कथा मीडिया रूपी व्यास से सुुनी तो अपने घर में भी भ्रष्टाचार भगवान की कथा कराने का निर्णय किया।
धीरे-धीरे मनुष्यों को समझ आने लगा कि कर्तव्य, नैतिकता, भाईचारा, इमानदारी, सच्चाई और मर्यादा जैसे घिसे-पिटे नियमों का पालन तो तुच्छ प्राणी करते हैं, या यूं कहें कि इनका पालन करके मनुष्य तुच्छ हो जाता है। लेकिन जो प्राणी अपना तन-मन-जीवन भ्रष्ट देवता को समर्पित कर देता है उसके गद्दे, कमरे, दीवान, कनस्तर और यहां तक कि सोफे तक भी धन के स्पर्श से पवित्र हो जाते हैं। लक्ष्मी उनकी दासी हो जाती है। घर स्वर्ग बन जाता है, और प्राणी अपने परिवार के साथ अपनी निजि इन्द्रसभा में बैठकर ब्रांडेड सुरा का पान करता है तथा अंतरा, धूपिया, लियोने और बिपाशा जैसी मल्लिकाओं का पावन नृत्य देखता है।
कहते हैं जिस समस्या का कोई समाधान न हो उस समस्या को ही समाधान समझ लेना चाहिए। यूँ तो भ्रष्टाचार स्वयं में कोई समस्या नहीं है लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों की बात मान कर यदि एक क्षण के लिए इसे समस्या मान भी लिया जाए तो पिछले छः दशकों से हम अपनी ऊर्जा इस महान कला का विरोध करने में खर्च करते रहे हैं, लेकिन अब समय आ गया है कि इसकी अनुमोदना की जाए तथा इस जुगाड़ यज्ञ में अपने भ्रष्ट कार्यों की आहुति दें।
इससे अनेक लाभ हैं। एक तो देश का नाम पूरे विश्व में रोशन हो सकेगा साथ ही जितना धन जाँच ब्यूरो, न्याय प्रक्रिया, प्राशासनिक कार्यवाहियों तथा आलोचनाओं पर खर्च होता है उसकी बचत होगी। संसद का समय किसी की निजि संपत्ति तथा व्यक्तिगत ज़िंदगी में बर्बाद होने से बच जाएगा और साथ ही साथ उस व्यक्ति विशेष की ज़िंदगी भी बर्बाद होने से बच जाएगी। रिश्वत जैसे हमारी शास्त्रीय परंपरा; जिसे एक प्रोपेगेंडा के तहत बुरा सिद्ध कर दिया गया है; उसका सम्मान बढ़ेगा। लोग एक दूसरे की सहायता के लिए अपने रेट फिक्स कर लेंगे। इससे सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली में सुधार होगा तथा कोई भी बेहिचक अपना काम करवाने के लिए वास्तविक तरीके से अवगत हो सकेगा। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक रिश्वत से हमारी वार्षिक आय केवल 210 अरब रुपये है। इस रकम में बढ़ावा होगा।
जाली नोट बनाना, ड्रग्स बेचना, कालाबाज़ारी, चोरबाज़ारी, लूटपाट, हफ़्ता वसूली आदि मजबूत स्तंभों पर एक नया इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा होगा और बेरोज़गारी की समस्या से निजात मिलेगा। नकली स्टाॅम्प पेपर और सिक्के गलाने जैसे कुटिर उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा।
एक भ्रष्टाचार को स्वीकार करने से कितने सारे लाभ हैं और हमारे समाज के असामाजिक तत्व इस विराट पुरुष को धक्के मार कर बाहर निकालना चाहते हैं। हमारी तरक्की से जलने वाली विदेशी ताकतों के इशारों पर ये लोग जब परम श्रद्धेय भ्रष्टाचार महोदय को गाली देते हैं तो इससे हमारी आत्मा को बहुत ठेस पहुँचती है। ऐसे लोगों ने हमारी भावनाओं को आहत किया है और हमें इस अपराध के लिए उन्हें मुंह तोड़ जवाब देना होगा। आओ देश के होनहार नागरिकों आज यह शपथ लें कि- ‘हम भारत के लोग भारत को एक भ्रष्टसत्ता सम्पन्न, सम्पूर्ण जुगाड़वादी, लूटतंत्रात्मक राज्य बनाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे……’
✍️ चिराग़ जैन
ट्यूशन हमारी सांस्कृतिक तथा पौराणिक परम्पराओं का महत्वपूर्ण अंग है। यदि कुछ क्षण के लिए अपना दृष्टिकोण व्यापक करने के लिए पाश्चात्य विद्वानों की तरह सोचा जाए (क्योंकि हमारे यहां वेद-पुराणों की बातें तब तक समझ नहीं आतीं जब तक पश्चिम उसकी व्याख्या न करे) तो हम देखेंगे कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के युग से ही यह महान परम्परा हमारे समाज का अभिन्न अंग रही है।
संत कवि तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में इस परम धर्म की उतनी ही ‘कड़ी अनुमोदना’ की है जितनी कि आज के तथाकथित विद्वान इसकी आलोचना कर रहे हैं। ये और बात है कि अपने पूर्वजों को सम्मान देने के लिए ये आधुनिक विद्वान अपने घरों में इस परम्परा को बन्द करने के लिए कोई विशेष प्रयास नहीं कर पा रहे हैं। ख़ैर छोड़िये इनके घरों को; हम चर्चा कर रहे थे संतकवि तुलसीदास जी की। वे इस महान कर्म से इस हद तक प्रभावित थे, कि इसकी अनुमोदना करते समय वे चैपाई पूरी होने का भी सब्र न रख सके और एक अद्र्धाली मात्र में इस विचार को इन शब्दों में प्रतिपादित कर दिया- ‘गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्पकाल विद्या सब आई।’
महाकवि ने यह स्पष्ट किया है कि गुरु के घर जाने से रघुराई जी ने अल्पकाल में ही सारी शिक्षा प्राप्त कर ली थी। अब जब रामायण की बात चली है तो महाभारत का ज़िक्र न करने से बात अधूरी ही रह जाएगी। हालांकि इस देश में बहुत सी बातें महाभारत के ज़िक्र के बावजूद अधूरी ही पड़ी हैं। लेकिन फिर भी, इस सत्य को दरकिनार कर, लेखन की परम्पराओं का निर्वाह करते हुए मैं रामायण के पश्चात महाभारत का ज़िक्र अवश्य करूंगा।
महाभारत में केवल अर्जुन ही एकमात्र ऐसे होनहार विद्यार्थी थे, जो अपने होनहार गुरु से ‘अल्पकाल में शिक्षा पाने के लिए’ नाइट ट्यूशन का सहारा लेते थे। इसी कारण केवल वही ऐसे शिष्य रहे जिन्हें चक्रव्यूह भेदना आता था। यूं सीखा तो एकलव्य ने भी था, लेकिन उसने छिपकर सीखा था, और गुरु द्रोण कोई टटपूंजिये तो थे नहीं जो मुफ़्त शिक्षा दे देते। न ही उन्हें सरकार अनुसूचित जनजातियों के लिए कोई अनुदान दे रही थी, जो वे अपने आश्रम में पिछड़े वर्गोंं के लिए कुछ सीट्स रिज़र्व करते। एकलव्य ने उन्हें धोखा दिया था इसलिए उन्होंने एकलव्य के माध्यम से अपने शिष्यों को ‘जैसे को तैसा’ की अंतिम शिक्षा दे डाली।
गुरुद्रोण के इस ‘अंगूठा काटन कार्यक्रम’ को हम आज भी पूरे ज़ोर-शोर से चला रहे हैं। कुछ इंस्टिट्यूट्स ने तो इस परंपरा का बाक़ायदा विकास भी किया है। ये विकासवादी परंपरा के समर्थक इंस्टिट्यूट्स, शिष्यों का अंगूठा काटने की घटना के बाद हुई गुरु द्रोण की आलोचनाआंे से सबक लेते हुए, इस निश्चय पर पहुंचे हैं कि शिष्यों को सही-सलामत रहने दिया जाए और परम्परा के निर्वाह हेतु उनके अभिभावकों के हाथ-पैर कटवा लिए जाएं। इससे सामाजिक आलोचना भी नहीं होगी और परंपराओं की रक्षा भी हो सकेगी।
हाथ-पैर कटवा चुकने के बाद जब अभिभावकगण अपनी संतानों के शैक्षणिक विकास की भ्रामक आस लिए ट्यूशन वाली या वाले के पास पहुंचते हैं तो ये ट्यूशनधर्मी गुरुजी पहले तो पौराणिक परंपराओं का सम्मान करते हुए शिष्य से उसकी जाति पूछते हैं, फिर बातों-बातों में यह पता लगाते हैं कि इस राधेय/एकलव्य/अर्जुन/दुर्योधन/अश्वत्थामा या कृष्ण के पिता का व्यवसाय तथा सामाजिक कद कैसा है।
यदि शिष्य दुर्योधन, अर्जुन या युधिष्ठिर की तरह राजपरिवार से संबंध रखता हो तो पूरे आश्रम की नीतियां शिष्य की रुचियोें के अनुसार परिवर्तित करना गुरुजी के लिए सहज हो जाता है। आवश्यकता पड़ने पर विदुर या पितामह के हाथों में ही यह निर्णय सौंपा जा सकता है कि आश्रम की आचार-संहिता में क्या-क्या परिवर्तन करने होंगे। हां, ऐसे शिष्यों के प्रवेश के समय गुरुजी इस बात का विशेष ध्यान रखते हंै, कि फीस की चर्चा नहीं करनी। इससे इम्प्रेशन खराब होने का ख़तरा रहता है।
कृष्ण और राम जैसे शिष्य यदि राजपरिवार से संबंध न भी रखते हों तो भी गुरुजी की यह परम इच्छा रहती है कि समाज के ये अनमोल रत्न उन्हीं के इंस्टिट्यूट में अध्ययन करें। इस श्रेणी के शिष्यों की लोकप्रियता गुरुदेव को इस हद तक प्रभावित करती है कि कुछ गुरुश्रेष्ठ तो इनको लेने इनके घर तक जा पहुंचते हैं। इनको पढ़ाने से एक तो गुरुदेव को साख का लाभ मिलता है साथ ही अपना बड़प्पन झाड़ने का सौभाग्य भी प्राप्त होता है। इसलिए पब्लिक पर्सनेलिटी के प्रति गुरुजी का विशेष स्नेह देखने को मिलता है।
अश्वत्थामा श्रेणी के शिष्यों के लिए आश्रम में स्टाॅफ कोटे की सीटें हमेशा रिजर्व होती हैं। इन शिष्यों से गुरुजी और आश्रम दोनों को ही कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष लाभ नहीं होता, लेकिन इन्हें पढ़ाना गुरुजी के लिए सामाजिक मर्यादा का प्रश्न होता है।
यदि शिष्य राधेय श्रेणी से संबद्ध हो तो गुरुदेव समझ जाते हैं कि इससे उन्हें कोई ख़ास लाभ होने वाला नहीं है। यदि इससे फीस ली जाती है तो निर्धन से धन लेने के आरोप में गुरुजी की बदनामी होगी; और फ्री में विद्यादान दिया गया तो अपनी दृष्टि में ही गुरुजी को मूर्ख बनना पड़ेगा। इसलिए गुरुजी ऐसी स्थिति में अपने आश्रम की आचार संहिता में तुरन्त परिवर्तन कर डालते हैं। इस परिवर्तन के वक़्त केवल इतना ध्यान रखा जाता है कि आश्रम में प्रवेश लेने के इच्छुक विद्यार्थियों की न्यूनतम योग्यता में कोई ऐसी मांग जोड़ दी जाए जिसे पूरा करना राधेय के लिए मुमकिन न हो। यही कारण है कि प्रवेश के नियम स्पष्ट करने से पूर्व प्रवेशार्थी का आर्थिक, बौद्धिक, सामाजिक तथा मानसिक स्तर अच्छी तरह देख लिया जाता है।
ऐसे शिष्यों को अपने आश्रम से रिक्त लौटा देना गुरुजी की सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए घातक हो सकता है, इसलिए चलते समय गुरुजी इन शिष्यों के एकाध गुणों की तारीफ़ करते हुए उसका नाम परिवर्तन अवश्य कर देते हैं। इससे एक तो गुरुदेव समाज की दृष्टि में महान बनते हैं साथ ही यह ख़तरा भी ख़त्म हो जाता है कि राधेय या इसका बाप बाहर जाकर आश्रम की बदनामी करे।
अंत में नम्बर आता है एकलव्य श्रेणी के शिष्यों का। इन शिष्यों के बाप से गुरुजी खाल या गर्दन उतरवाकर रख लेते हैं। यूं वे हाथ, पैर या अंगूठा आदि भी कटवा सकते थे लेकिन यह सब कुछ तो पहले ही इंस्टिट्यूट वाले कटवा लेते हैं इसलिए सत्यवादी हरिश्चंद्र के देश में पैदा होने के कारण मजबूरी में ट्यूशन वाले गुरुजी को अपना कर्तव्य पालन करते हुए ऐसा घिनौना कार्य करना पड़ता है।
✍️ चिराग़ जैन