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नोटबंदी

नोटबंदी की आठवें दिन मैं अपने मकान मालिक को किराया देने पहुँचा तो मकान मालिक अड़ गया, बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा।’ मैंने कहा कि बैंक से पैसे निकल नहीं पा रहे हैं और वैसे भी अब प्रधानमंत्री जी ने नक़द लेनदेन से बचने की अपील की है।
मकान मालिक नहीं माना और बोला ‘मैं तो कैश ही लूंगा, कैश न दे सको तो मकान खाली कर दो।’
मुझे इस ज़िद्दी रवैये पर बहुत क्रोध आया और मैंने पुलिस को फोन मिलाया।
पुलिसवाला आया और दोनों को सामने बैठा कर बोला- “मैं भी कैश ही लूंगा।”

✍️ चिराग़ जैन

रेतीली पगडण्डी पर बड़े निर्णय की मोटर

कविता अपने युग की अकथ कथाओं का जनहितकारी वर्णन है। कवि जब जन पीड़ा से विह्वल होकर शासन के विरुद्ध लेखनी चलाता है उस समय उसे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करनी चाहिए कि सत्ता और तंत्र का गठजोड़ उसे किस सीमा तक व्यक्तिगत हानि पहुँचा सकता है।
ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध कविता ने पूरा एक आंदोलन खड़ा किया। उस समय वही लेखनी लच्छेदार भाषा में वायसराय और ब्रिटिश राजसत्ता की चरण-वंदना लिख कर व्यक्तिगत लाभ अर्जित कर सकती थी किन्तु उन बूढ़ी हड्डियों ने जनहित को सर्वोपरि रखकर “तख़्त-ए-लन्दन तक चलेगी तेग़ हिंदुस्तान की” और “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” जैसे तराने रचे।
आज़ादी के जश्न में ग़ाफ़िल होते समाज की कलाई पकड़ कर उत्सव को सावधान करते हुए गिरिजाकुमार माथुर ने डिठौना लगाते हुए कहा-

आज जीत की रात पहरुए सावधान रहना
शत्रु हट गया लेकिन उसकी छायाओं का डर है
शोषण से है मृत समाज कमज़ोर हमारा घर है

बाबा नागार्जुन, जो कि स्वयं को वामपंथ का समर्थक कहते थे उन्होंने भी 1962 की लड़ाई के बाद अपनी आजन्म समर्थित विचारधारा को ताक़ पर रखकर स्पष्ट लिखा-

वो माओ कहाँ है वो माओ मर गया
ये माओ कौन है बेगाना है ये माओ
आओ इसको नफ़रत की थूकों में नहलाओ
आओ इसके खूनी दाँत उखाड़ दें
आओ इसको ज़िंदा ही ज़मीन में गाड़ दें

यह काव्यांश इस बात का प्रमाण है कि “आह से उपजता गान” क्रमशः प्रकृति, मानवता, मातृभूमि, जनहित, शासनतंत्र और अंत में स्वयं को प्राथमिकता देता है। हर अच्छी कविता की क़ीमत रचनाकार को व्यक्तिगत बलिदान से चुकानी पड़ती है। कभी कल्पना करें तो सिहरन उठती है कि अपनी 19 वर्षीया बिटिया की मृत्यु की टीस को शब्दों में पिरोकर “सरोज-स्मृति” लिखने वाला निराला कितनी बार बिंधा होगा!
कभी अपने मुहल्ले से गिरफ़्तार होकर निकलने की कल्पना करेंगे तो शायद फ़ैज़ की ये एक पंक्ति पढ़कर दिल बैठ जाएगा- “आज बाज़ार में पा-ब-जौला चलो”। फ़ैज़ इस स्थिति में भी जनहित को सर्वोपरि रखते हुए सत्ता को आईना दिखाने के एवज़ में अपने संभावित हश्र को लिखने से नहीं बाज़ आए कि –

हाकिम-ए-शहर भी, मज़मा-ए-आम भी
तीर-ए-इलज़ाम भी, संग-ए-दुश्नाम भी
रख़्त-ए-दिल बांध लो दिलफिगारो चलो
फिर हमीं क़त्ल हो आएँ यारो चलो

अश्रुओं से सिक्त कृति ही श्रोता के अधरों और नायन-कोर को एक साथ स्पंदित करने में सक्षम होती है। सत्ता के विरुद्ध लेखनी कवि का धर्म नहीं है लेकिन जनहित के हित को स्वर देते समय शासक के पक्ष अथवा विपक्ष का गणित लगाना रचनाकार के लिए अधर्म अवश्य है।
कांग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सदस्य होने के बावजूद जब दिनकर ने नेहरू जी की नीतियों के विरुद्ध “सिंहासन खाली करो कि जनता आती है” गाया तब उनके स्वर में किसी भय का कम्पन सुनाई नहीं दिया।
यूँ आपातकाल भुगतने वाली पीढ़ी बताती है कि उस समय सरकारी कर्मचारी समय पर दफ़्तर पहुँचने लगे थे। लोग अनर्गल आलस्य को त्यागकर अनुशासित हो चले थे। कानून तोड़ने से लोग घबराने लगे थे, आदि। लेकिन यह अनुशासन जनता को किसी नैतिक प्रेरणा की बजाय बलपूर्वक सिखाया गया था। लोकतंत्र की आत्मा को मसोस कर तानाशाही के बीज रोपने का क्रूर प्रयास किया गया था। यही कारण था कि दुष्यन्त के अशआर आपातकाल के विरुद्ध जनता की आवाज़ बन गए, यथा-

मत कहो आकाश में कोहरा घना है
ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
—–
एक गुड़िया की कई कठपुतलियों में जान है
आज शायर ये तमाशा देखकर हैरान है
—–
जाने कैसी उँगलियाँ हैं जाने क्या अंदाज़ है
तुमने पत्तों को छुआ था जड़ हिला कर फेंक दी

शासन की आत्ममुग्धता पर चोट करते हुए शायर कह उठा कि
ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सजदे में नहीं था, आपको धोखा हुआ होगा

जेपी के समर्थन में दुष्यंत ने बेबाक़ कहा कि
एक बूढ़ा आदमी है मुल्क़ में या यूँ कहो
इस अँधेरी कोठरी में एक रौशनदान है

यहाँ तक कि जनक्रांति को पुनर्जीवित करने के प्रयासों से भी दुष्यंत पीछे नहीं हटे-

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो
—-
एक चिंगारी कहीं से ढूंढ लाओ दोस्तो
इस दीये में तेल से भीगी हुई बाती तो है

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आहत हुई तो भवानी प्रसाद मिश्र लिख बैठे-

बहुत नहीं सिर्फ़ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़नेवाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गायें
वे जिसको त्यौहार कहें, सब उसे मनायें
कभी-कभी जादू हो जाता दुनिया में
दुनिया-भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गये
हंस मोर चातक गौरैये किस गिनती में
हाथ बाँधकर खड़े हो गये सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगायें
पिऊ-पिऊ को छोड़ें, कौए-कौए गायें
बीस तरह के काम दे दिये गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को
कौओं की ऐसी बन आयी पाँचों घी में
बड़े-बड़े मंसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदलकर ऐसे ढाले
उड़नेवाले सिर्फ़ रह गये बैठे ठाले
आगे क्या कुछ हुआ, सुनाना बहुत कठिन है
यह दिन कवि का नहीं, चार कौओं का दिन है
उत्सुकता जग जाये तो मेरे घर आ जाना
लंबा क़िस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना ?

नागार्जुन ने तो काव्य के माधुर्य को विस्मृत कर तत्कालीन प्रधानमंत्री के विरुद्ध यहाँ तक लिख डाला-

इंदु जी इंदु जी क्या हुआ आपको
रानी-महारानी आप
नवाबों की नानी आप
सुन रही सुन रही गिन रही गिन रही
हिटलर के घोड़े की एक एक टाप को
छात्रों के खून का नशा चढ़ा आपको

और भी अधिक कड़वे होकर बाबा लिखते हैं-
देखो यह बदरंग पहाड़ी गुफ़ा सरीखा
किस चुड़ैल का मुँह फैला है
देखो तानाशाही का पूर्णावतार है
महाकुबेरों की रखैल है
यह चुड़ैल है।

अटल बिहारी वाजपेयी जी जनहित के पाले में खड़े हुए तो नैराश्य को चुनौती देते हुए चिंघाड़ उठे थे- हार नहीं मानूँगा, रार नई ठानूंगा।
इन्हीं अटल जी की शिखर वार्ता के विरोध में ओम् प्रकाश आदित्य जी ने लालकिले से कविता पढ़ी –

तूने ये क्या किया अटल बिहारी मुशर्रफ़ को महान कर दिया
उसपे मेहरबान हुए इतने भारी, गधे को पहलवान कर दिया

हर युग में कविता ने सत्ता की आँखों में आँखें डालने की ज़ुर्रत की है। वागीश दिनकर जी ने इस सन्दर्भ में साफ़ साफ़ लिखा है कि-

युग की सुप्त शिराओं में कविता शोणित भरती है
वह समाज मर जाता है, जिसकी कविता डरती है

शिवओम अम्बर जी ने तुलसी के वंशजों की सत्यभाषी परम्परा को सम्बल देते हुए कहा कि-

या बदचलन हवाओं का रुख़ मोड़ देंगे हम
या ख़ुद को वाणीपुत्र कहना छोड़ देंगे हम
जब हिचकिचएगी क़लम लिखने से हक़ीक़त
काग़ज़ को फाड़ देंगे, क़लम तोड़ देंगे हम

इस निर्भीक स्वभाव का ही परिणाम था कि जब उत्तर प्रदेश में कला के कंगूरे यश भारती की आस में शासन के गलियारों में फानूस से कालीन तक बनने को तैयार थे तब लेखनी की कतार का सबसे छोटा बेटा प्रियांशु गजेन्द्र मुज्ज़फरनगर के दंगों में जनता की कराह सुनकर लिख रहा था कि-

भोर का प्यार जब दोपहर हो गया
भावना का भवन खंडहर हो गया
तुम संवरते-संवरते हुईं सैफ़ई
मैं उजड़कर मुज़फ्फरनगर हो गया

एक बार पुनः जनता की सहनशक्ति और शासन की इच्छाशक्ति का आमना-सामना हुआ है। कवियों-लेखकों-व्यंग्यकारों और व्यंग्यचित्रकारों ने एक बार पुनः देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री की किसी नीति से आहत जन की अकथ पीर को लेखनी और तूलिका पर साधने का प्रयास किया है। किन्तु प्रधानमंत्री जी के प्रशंसक उस सारे प्रयास को पूर्वाग्रह का नाम देकर सोशल मीडिया पर गाली-गलौज तक की भाषा से प्रतिक्रिया दे रहे हैं। यह दुःखद भी है और दुर्भाग्यपूर्ण भी।
वर्तमान में प्रधानमंत्री जी ने एक ऐसा निर्णय लिया है जिसका भविष्य संभवतः सुखदायी है किन्तु उस निर्णय के क्रियान्वयन की तैयारी इतनी कमज़ोर थी कि जनता का एक बड़ा वर्ग आर्थिक विपन्नता के कूप में आ पड़ा है। इस कुएँ के भीतर इतना अँधेरा है कि इस बड़े निर्णय की कुक्षि से निकलती रौशनी दिखाई नहीं दे रही है। चाटुकारों से घिरा नेतृत्व जनता की समस्याओं को देखकर भी अनदेखा कर रहा है और आत्ममुग्धता के ज्वर के परिणामस्वरूप अपनी पीठ स्वयं थपथपा रहा है।
किसी नीति के क्रियान्वयन से यदि काम-धंधे ठप्प हो जाएं, अराजकता जैसा माहौल बनने लगे, लूटमारी, कालाबाज़ारी, जमाखोरी, आपसी विद्वेष, वर्ग-संघर्ष और मृत्यु तक की घटनाएँ अचानक बढ़ जाएं तो शासन का कर्त्तव्य बन जाता है कि वह अपनी दूरदर्शिता की विफलता स्वीकार करे। ऐसा करने की बजाय समस्याओं से घिरी जनता और परेशानी से चिल्लाने वालों को “बेईमान” और “देशद्रोही” कहा जाने लगा है।
स्वयं प्रधानमंत्री जी ने इन सब ख़बरों से पीठ फेरते हुए कह दिया कि- “बेईमान चिल्ला रहे हैं और ग़रीब आदमी चैन की नींद सो रहा है।” इस देश की स्थिति एक रेतीली पगडण्डी जैसी है। इस पगडण्डी पर बढ़ाया गया हर क़दम कुछ धूल ज़रूर उड़ाएगा। उस धूल से यदि आपके पीछे खड़े किसी व्यक्ति को धँसका लग जाए और वह खाँसने लगे तो उसे शुष्क कण्ठ को पानी का स्पर्श देनेकी बजाय उसे बेईमान कहा जाना न तो नैतिकता का द्योतक है न मानवता का।
नोटबंदी के विरुद्ध जो भी कुछ कहा जा रहा है उसका केवल इतना ही तात्पर्य है कि रेतीली पगडण्डी पर बड़े निर्णय की मोटर दौड़ाने से पूर्व यदि परिपक्व तैयारियों का छिड़काव कर लिया जाता तो आपकी मोटर के पीछे पुष्पवृष्टि करने वाली जनता का खाँस-खाँस कर बुरा हाल न होता।

✍️ चिराग़ जैन

नोटबंदी Day by Day

8 NOV

एक सप्ताह से काला धुआँ आँखों में जल रहा था, अब नारंगी और हरे नोट आँखों में चुभ रहे हैं।

जितने का पेट्रोल भरवा सकते हो भरवा लो, बाकी में पैट्रोल डाल कर आग लगा दो।
आदेशानुसार : मोदी उर्फ़ धो दी।

प्रधानमंत्री जी करुणानिधान हैं, वे जानते थे कि दिल के दौरे वाले मरीज़ 100 रूपये के नोट नहीं जुटा पाएंगे इसलिए अस्पतालों में काले नोट स्वीकार्य हैं।

मोदी जी की इमेज उस बच्चे की तरह हो गई है जो अपनी हर अगली शरारत से पिछले काण्ड को छोटा सिद्ध कर देता है।

इस बीच विजय माल्या ने स्टेट बैंक के जीएम से बोला है कि अपना 1700 करोड़ रुपैया लेना हो तो कल कूड़ेदानों में से बीन लेना। फिर मुझे मत बोलना कि पैसा नहीं दिया।

उधर पाकिस्तान में इस बात की खलबली है कि जो आदमी एक झटके में अपने 1000-500 के नोट की वैल्यू दो कौड़ी की कर सकता है वो हमारे दो कौड़ी के देश का क्या करेगा!

9 NOV

बॉर्डर फ़िल्म का डायलॉग याद आ गया-
सुबह नाश्ता करते हुए पोलीपैक दूध बैन कर दूंगा।
दोपहर के लंच में इंजन वाले वाहनों पर रोक लगा दूंगा। और रात के खाने मेंमिल में बना कपड़ा बंद कर पूरे देश को पेड़ के पत्ते लिपटवा दूँगा।

जसोदाबेन ने मोदी जी को फोन करके पूछा है – 1000 और 500 के नोटों ने भी तुमसे शादी कर ली थी क्या?

कुछ ख़ास बात नहीं है। करेंसी नोट का रंग रूप अमरीका जैसा बनाने के चक्कर में मोदी जी ने कच्चे के व्यापारियों की शक्ल सोमालिया जैसी बना दी।

अब तो लोग दो दिन की सब्ज़ी भी इकट्ठी नहीं ख़रीद रहे, पता नहीं मोदी जी कब लौकी को ग़ैर कानूनी घोषित कर दें।

मन की बात कोई सुन नहीं रिया था तो मेरे भाई ने मनी की बात कर दी।

लब्बो-लुआब : हज़ार और पाँच सौ के नोट एक साथ बंद कर दिए जाएं तो दो हज़ार का नोट पैदा हो जाता है।

स्मॉग हटते ही मोदी जी ने दिन में तारे दिखा दिए।

हज़ारीप्रसाद द्विवेदी जी ने काफी माखनलाल चतुर्वेदी जी लगाए लेकिन बनारसी दासने अमीर ख़ुसरो जी को भिखारी ठाकुर बनाने का फैसला वापस नहीं लिया। अब पूराभारतेंदु हरिश्चंद्र इस फ़िराक़ गोरखपुरी में है कि अपने मैथिली शरण गुप्त धनको उजागर करके मन को निर्मल वर्मा कर लें।

बिगड़ी हुई औलाद को सुधारने के लिए जेबख़र्च बंद करने का उपाय हमेशा कारगर होता है।

10 NOV

8 नवंबर को मोदी जी ने जनता बोला – 1000-500 के नोट काग़ज़ के टुकड़े रह जाएंगे।
9 नवम्बर को न्यायालय ने सरकार से पूछा – pollution कण्ट्रोल का मास्टर प्लान बताओ?
मतलब, सब जानते हैं कि नोट जलेंगे से धुआँ होगा ही होगा।

वो कौन सा दार्शनिक था जो कह कर गया था कि पैसा तो सड़कों पर बिखरा पड़ा है, समेटने के लिए हिम्मत चाहिए। निंद्य है।

✍️ चिराग़ जैन

दिल्ली महापुराण

कलयुग में आपिये और भाजपाइयों के दो समूह थे। दिल्ली नगरी में संसदपुरी और विधानसभापुरी पर शासन करने हेतु दोनों परस्पर दूसरे को असुर और स्वयं को सुर सिद्ध करने में निमग्न रहते थे। मीडिया माइलेज के संघर्ष में वे जनहित तथा राष्ट्रहित के अस्त्र एक-दूसरे पर चलाते रहते थे। इन अस्त्रों के आघात से इनके सरकारी सिक्योरिटी गार्ड इन्हें बचा लेते थे और अपनी विशेष सिद्धि के बल पर इनकी दिशा आम आदमी की ओर मोड़ देते थे। एक दिन दोनों दल मीडिया नामक त्रिदेव के पास गए। मीडिया ने उन्हें राजनीति के सागर का मंथन करने का उपाय सुझाया। दिल्ली की राजनीति के सागर में मुद्दों का सुमेरु स्थापित किया गया जिसे मीडिया ने कश्यपावतार लेकर अपनी पीठ पर धारण किया। भाजपाइयों ने ज़ी न्यूज़, इण्डिया टीवी और दूरदर्शन जैसे चैनल्स की पूँछ पकड़ी। आपियों के हिस्से एबीपी, एनडीटीवी और आईबीएन 7 जैसे फन आए इस कारन मंथन के दौरान बेचारे आपियों को ज़हरीले डंक का भी सामना करना पड़ता था।
मंथन प्रारम्भ हुआ तो सबसे पहले उसमें से एक एलजी निकले। मीडिया ने वे एलजी टाइम पास के लिए दिल्ली में नियुक्त करवा दिए। उसके बाद दिल्ली पुलिस का अवतरण हुआ। उसे भाजपाइयों को दे दिया गया। फिर डीडीए निकली। उसे भी भाजपाई ले उड़े। आपियों के सरदार ने मीडिया प्रभु से शिकायत की कि मंथन से निकलने वाले सभी रत्न भाजपाई हड़प रहे हैं। यह अन्याय है।
मीडिया प्रभु ने उन्हें आश्वस्त किया कि अब जो भी कुछ निकलेगा उसे आपियों को सौंपा जाएगा। पुनः मंथन आरम्भ हुआ। अबकी बार सागर में से एक सीडी निकली। मीडिया प्रभु ने अपने हाथों से वह सीडी आपिये दल के एक मंत्री के नाम लिख दी।
मंथन आगे बढ़ा। सागर में से अचानक हालाहल निकलने लगा। पूरी दिल्ली ज़हरीले धुंए से घिर गई। प्राणिमात्र का श्वास लेना दूभर हो गया। न्यायालय, NGT और प्रशासन; तीनों से इस धुएँ को ग्रहण करने की अनुनय की गई किन्तु तीनों ने “I DONT SMOKE” बोलकर अपना पल्ला झाड़ लिया।
सभी आपिये और भाजपाई अपनी-अपनी वातानुकूलित गाड़ियों में जा घुसे। शेषनाग का दम घुँटने लगा। उधर सागर विष उगल रहा था, इधर आपिये और भाजपाई परस्पर विषवमन कर रहे थे।
धुएँ से मीडिया की आँखें लाल होने लगी। खाँसी कर-कर के पूरी जनता स्वयं को मुख्यमंत्री समझने लगी थी। चुनाव् आयोग के महादेव ने धूम्रपान करने की बजाय पंजाब चुनाव का बिगुल बजाने का निर्णय लिया। इससे मीडिया प्रभु का ध्यान दिल्ली के धूम्रपान से पंजाब के विषपान की ओर मोड़ दिया। और दिल्ली की जनता को धुएँ के साथ अपनेहाल पर छोड़ दिया।

✍️ चिराग़ जैन

प्रेस पर प्रतिबन्ध

प्रेस लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ है। इस पर प्रतिबन्ध भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को जड़ करने जैसा है। लोकतंत्र जब तानाशाही में तब्दील होने लगता है तब मीडिया को चाटुकार बनाने की अपेक्षा रख बैठता है। -ऐसे अनेक सुगढ़ वाक्य मीडिया के समर्थन में सरकार को लानत भेज रहे हैं।
मैं सरकारी कार्रवाई के पक्ष में नहीं हूँ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रश्नचिन्ह लग गया तो लोकतंत्र में श्वास लेना दूभर हो जाएगा। किन्तु एक बार हमें इस बात पर भी पुनर्विचार करना चाहिए कि क्या मीडिया वास्तव में जनहित और लोकतान्त्रिक मूल्यों को सर्वोपरि रखकर कार्य कर रहा है। कई बार तो ऐसा लगता है कि जिन सिद्धांतों को सर्वोपरि रखना था उन्हें ताक पर रख दिया गया है। टीआरपी और सबसे तेज़ की होड़ ने तथ्यों के गाम्भीर्य और पुष्टि की अवधारणा को तार-तार कर दिया है।
उत्तरदायित्व और नैतिकता को व्यावसायिक स्वार्थों ने लील लिया है। आयकर में 30 प्रतिशत की कर सीमा में भी जो पत्रकार शामिल नहीं हैं उनकी कोठियाँ कैसे बन गईं, जो स्ट्रिंगर चैनल की आईडी लेकर रियल एस्टेट में घुसता है वो ऐसा क्या कमाल करता है कि उसे फ़्लैट की चाबी अलॉट हो जाती है, ऐसा क्यों होता है कि अचानक एयर इण्डिया के खिलाफ रोज़ ख़बरें प्रकाशित होने लगती हैं (फ्लाइट डिले की नार्मल घटना को भी बुलेट मिलता है) और फिर अचानक एक दिन एयर इंडिया की ख़बरें छपनी बंद हो जाती हैं; पॉवर हाउस में कोयला ख़त्म हो जाता है, सभी चैनल्स कोयले की कमी का हंगामा बरपा देते हैं और फिर अचानक बिना लाइट गुल हुए खबर ग़ायब हो जाती है; गौहत्या और गौरक्षक जैसे मुद्दे मीडिया पर रम्भाने लगते हैं फिर बिहार चुनाव संपन्न होते ही सभी गायों को उनके हाल पर छोड़ दिया जाता है; मोदी जी की नेपाल यात्रा से पहले कोसी में बाढ़ का हड़कंप मचता है फिर मोदी जी नेपाल जाकर लिटमस कागज़ की भूमिका निभा आते हैं; अंतरिक्ष से कोई उल्कापिंड गिरता है तो हंगामा खड़ा होता है फिर मीडिया उसे कैच करके धरती को तबाही से बचा लेता है। -इन सब प्रश्नों पर कोई सवाल उठाने वाला नहीं है।
जो चैनल सरकार के चाटुकार हैं उनको कहीं भी कुछ भी शूट करने की इजाज़त है लेकिन जिनमे सरकारी आलोचना की प्रवृत्ति है उनको प्रसारण की भी आज्ञा नहीं है। हम किस व्यवस्था में जी रहे हैं भाई? जज फैसलों की दिशा मोड़ने केलिए रिश्वत लेते पकडे जा रहे हैं, राजनीति ढिठाई और सत्तासुख की अंधी होड़ में किसी भी सीमा तक जाने को तैयार है, पुलिस चौराहों पर सर-ए-आम जनता की जेब में हाथ डाल कर वसूली कर रही है, मीडिया ख़बरों की दलाली कर रहा है। इस नपुंसक व्यवस्था में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्र के शक्तिबोध जैसी बातें करनेवाले भौंडे लगते हैं।
एक NDTV को प्रतिबंधित करना सरकारी तानाशाही का प्रमाणपत्र है। नैतिकता का मापदंड हो तो भूत-प्रेत, अन्धविश्वास, अराजकता, असत्य और गैर-ज़िम्मेदाराना ख़बरें चलाने के ज़ुर्म में लगभग सभी चैनल सीखचों के पीछे हो जाएं।
न्यायालय में विचाराधीन किसी मुआमले पर चर्चा करने का अधिकार मीडिया को किसने दिया? अधकचरे ज्ञानी एंकर बनकर देश की संज़ीदा विषयों पर फैसला सुनाने लग गए हैं। जनता को चैनल पर खुली धमकी दी जाती है कि अगर हमारे पत्रकार को कुछ कहा तो हम तुम्हारी ज़रूरत के मुद्दे दबा देंगे। किस व्यवस्था की बात की जाय साहब।
पूरे कुँए में भांग पड़ी है। माखनलाल चतुर्वेदी, जुगल किशोर, गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रभाष जोशी और सुरेन्द्र प्रताप सिंह अपने सींचे पौधों पर दलाली के फल लगते देखकर दुआ मांगते होंगे कि हे ईश्वर इन मीडिया संस्थानों को बंद करवा दो।

✍️ चिराग़ जैन

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