Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
न्याय का सामान्य अर्थ है, परिस्थितियों के सम्यक आकलन के बाद पीड़ित को मरहम देना और अपराधी को दंडित करना। इस प्रक्रिया में किसी की जाति, लिंग, धर्म या आयु का प्रश्न कहाँ से जुड़ गया?
हमने विशेष-अधिकारों, वर्ग आधारित विशेष प्रकोष्ठों और इस तरह की अन्य व्यवस्थाओं से न्याय प्रक्रिया को अपाहिज बनाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया है। इन प्रावधानों ने उस वर्ग को सर्वाधिक हानि पहुँचाई है, जिसके पक्ष में ये कानून बनाए गए हैं।
महिलाओं के पक्ष में दहेज कानूनों का प्रावधान हुआ तो उसकी गाज पारिवारिक जीवन की सहिष्णुता पर गिरी। जब घरेलू हिंसा और प्रताड़ना के अपराधी को दंडित करने के लिये न्याय व्यवस्था सुसज्जित थी तो इस विशेष प्रावधान की आवश्यकता क्यों पड़ी। स्त्रियों के साथ ससुराल में होनेवाले दुर्व्यवहार की चिंता व्यक्त करते हुए ‘दहेज कानून’ बन तो गए लेकिन इस हथियार के दुरुपयोग के हज़ारों मुआमले अदालतों में ज़ाहिर होने लगे। दाम्पत्य जीवन की ज़रा-सी खटपट सीधे दहेज और घरेलू हिंसा के आक्षेपों तक जा पहुँची। लड़कियों ने परिवार बसाने के लिए प्रयास करने की बजाय थाने पहुँचना आसान समझ लिया। सास-ससुर, नंद-ननदोई, जेठ-जेठानी, देवर-देवरानी, भानजे-भानजी, भतीजे-भतीजी और यहाँ तक कि दोस्तों तक के नाम प्रताड़ना में लिखवाए; स्त्री सुरक्षा को कटिबद्ध पुलिस ने सबको लॉक अप में डाल दिया। परिवार के परिवार तबाह हो गए।
एक दिन अचानक अदालत को महसूस हुआ कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। अब लड़की की शिकायत पर प्रमाण मांगे जाने लगे। अब ससुरालवाले डरते तो थे लेकिन त्वरित गिरफ्तारी की प्रक्रिया बन्द हो गई। किन्तु परिवार में सौहार्द कायम नहीं हो सका क्योंकि लड़कियों को बता दिया गया है कि कानून लड़की के पक्ष में झुका हुआ है।
‘चार बर्तन होंगे तो आवाज़ होगी ही’ -यह कहावत हम सबने सुनी है। लेकिन दाम्पत्य में साथ रहनेवाले बर्तनों को यह बताया गया कि यदि थाली और गिलास में टकराहट हो तो गिलास को आवाज़ करने की इजाज़त नहीं है क्योंकि कानून थाली के पक्ष में झुका हुआ है।
क्यों जी, जिन लड़कियों ने दहेज कानूनों का दुरुपयोग करके अपने ससुराल पक्ष के सभी लोगों का जीवन नर्क कर दिया है, उनको किस अदालत ने दंडित किया है। पारिवारिक कलह को आधार बनाकर कन्यापक्ष, वरपक्ष से मोटी रकम वसूलता है और हमारे न्यायालय इसे सेटलमेंट का नाम देकर उस पर ठप्पा लगा देते हैं।
ग़ज़ब का न्याय है! पत्नी ने अपने पति पर बलात्कार का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर प्रताड़ना का आरोप लगाया, पत्नी ने पति पर हिंसा का आरोप लगाया। इन तीनों आरोपों में अपराधी को जेल भेजने की बजाय पैसे से पत्नी का मुँह बंद करने की सुविधा दे दी गई। अगर अदालत पति को अपराधी मानती है, तो उसे कारावास क्यों नहीं दिया जाता। और अगर अदालत जानती है कि पत्नी केवल क्रोध में उक्त आरोप लगा रही है तो किस अपराध में पति को आर्थिक मुआवजा देने के लिए बाध्य किया जाता है। कितने ही निर्दाेष लोग इस कानूनी व्यवस्था में असहाय होकर आत्मघात तक पहुँच गए।
इन प्रश्नों पर विचार करेंगे तो हम पाएंगे कि इस प्रकार की हर सेटलमेंट हमारी न्याय प्रक्रिया की विफलता को प्रमाणित करती है।
ठीक यही स्थिति एससी/एसटी कानून की भी है। दो व्यक्तियों के सामान्य से झगड़े को भी जातीय अपमान का मुद्दा बनाकर कानून की धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं। हज़ारों निर्दाेष इस प्रावधान की भेंट चढ़ गए। एक दिन अचानक माननीय न्यायालय को लगा कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है। इसमें शिकायत दर्ज होते ही तुरंत गिरफ्तारी की बजाय पहले शिकायत की वास्तविकता की पड़ताल कर लेनी चाहिए। इतना सुनते ही झूठी शिकायतों को हथियार बनाकर ब्लैकमेल करनेवाले तथाकथित दलित भड़क गए और उन्होंने देश भर में उत्पात मचाकर न्यायलय को धमकी दी कि यदि हमारी शिकायत की वास्तविकता जाँचने की कोशिश की तो हम पूरा देश जला डालेंगे। सरकार ने इन बेचारे ब्लैकमेलर्स की बात सुनी और सुप्रीम कोर्ट को कहा कि तुमने बिना सोचे-समझे बेचारे दलितों के फटे कानून में टांग अड़ाई है, चलो दोबारा अपने निर्णय की पड़ताल करो, वरना ये बेचारे देश जला डालेंगे।
समझ नहीं आता कि संसद में बैठे विधिनिर्माताओं के पास वास्तव में दूरदर्शिता है ही नहीं या फिर वे जानबूझकर अगले इलेक्शन से आगे देखना नहीं चाहते। न्याय व्यवस्था में निष्पक्षता समाज का विश्वास जीतने की प्रथम सीढ़ी है। दहेज कानूनों से बर्बाद हुए परिवार और जातीय कानूनों से त्रस्त हुए लोग आज भी देश की संसद और न्यायालय की ओर इस आशा से देखते हैं कि हम तो शहीद हो गए साहब लेकिन अयोग्य योद्धा के हाथ से इन घातक अस्त्रों को वापस ले लो। इन अस्त्रों से ये अपने आसपास के लोगों को ज़ख्मी कर रहे हैं और अंततः अपनी भी जान के दुश्मन बन चुके हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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ट्रेन में चलनेवाले मुसाफिरों से पैसे वसूलते पुलिसवालों का वीडियो देखा। मन क्षोभ और घृणा से भर गया। खाकी वर्दी की धौंस और सरकारी तंत्र के निकम्मेपन पर थूक रहा था पूरा वीडियो। सत्तर साल हो गए इस देश को आज़ाद हुए। सवा सौ करोड़ भारतीयों को मूलभूत सुविधाएँ देने में पूरी तरह नाकाम यह सिस्टम शर्म आ जाने की सीमा से कहीं आगे बढ़ चुका है।
पुलिस विभाग की अभद्रता, ढिठाई और निष्ठुरता ने जनहित के ढोंग की हर लम्हा खिल्ली उड़ाई है। अपराध और शोषण से त्रस्त नागरिक भी इन थानों में घुसने से कतराता क्यों है -इस प्रश्न का उत्तर न तो सरकार के पास है, न ही पुलिस की छवि सुधारने के लिए किए जा रहे आयोजनों के आयोजकों के पास।
भारत के विकास कार्यों हेतु रात-दिन मेहनत करके टैक्स चुकानेवाला नागरिक भी यदि किसी स्थिति में पुलिस की सहायता लेना चाहे तो उसे दुर्व्यवहार झेलने के लिए तैयार रहना पड़ता है। थाने में सहायता मिले या न मिले, एकाध गाली हर किसी को मिल ही जाती है। जनता के टैक्स के पैसों पर पलनेवाला ये विभाग, जनता की जेब से रिश्वत लूटनेवाला ये विभाग, जब किसी सभ्य नागरिक को गरियाता है, तब ऐसा लगता है जैसे कोई खाना खाने के बाद पत्तल में छेद कर रहा हो।
रिश्वत लेकर कार्रवाई करना और गाली-गलौज करना इस विभाग के कुछ नुमाइंदों को इतना भा गया है कि जो कुछ लोग ईमानदार होकर किसी पीड़ित की वास्तविक मदद करना भी चाहते हैं, उन्हें या तो निष्क्रिय हो जाना पड़ता है या फिर इनके रंग में रंग जाना पड़ता है। शहरों की पढ़ी-लिखी जनता भी इस महकमे की कारगुज़ारियों से बच नहीं पाती, फिर गाँव-कस्बों के सीधे-सादे लोगों का तो कहना ही क्या!
इस देश की पुलिस को रामायण के बाली की तरह यह वरदान प्राप्त है कि जो भी नागरिक बिना किसी एप्रोच के किसी पुलिसवाले के सामने खड़ा हो जाएगा, उसका इज़्ज़तदार होने का भरम समाप्त हो जाएगा और चंद मिनिटों में वह स्वयं को अपराधी मानने लगेगा।
देश के हुक्मरानो! खरबों रुपये के घोटाले आपको मुबारक़, देश की अंतरराष्ट्रीय छवि भी आपको मुबारक़, देश के चुनावों की राजनीति भी आपको मुबारक़, राहुल-मोदी की महाभारत भी आप जानो; इस देश के आम नागरिक को अपनी समस्या बताकर बिना प्रताड़ित हुए थाने से घर लौट सकने की स्थितियाँ इस देश को सौंप दीजिये ताकि आप जब देश की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरने का ढोल पीटें तो कोई वायरल वीडियो आपके रंग में भंग न डाल सके।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत में सरकारें जनकल्याणकारी नीतियों पर काम करती है। माननीय न्यायालय जनता के प्रति न्याय हेतु उत्तरदायी है। कार्यपालिका जनता की रक्षा हेतु चौबीस घंटे तैनात रहती है। …ये सब बातें जब सामाजिक विज्ञान की पाठ्य पुस्तिका में पढ़ते थे तब इस देश को लेकर जैसी छवि बनती थी वह किसी गोलोकधाम से कम नहीं थी। किन्तु जैसे ही हमने अख़बार पढ़ना सीखा तब ज्ञात हुआ कि पाठ्य पुस्तिका की इबारतें असल ज़िंदगी में झूठ साबित होती हैं।
लोकतंत्र के जिन स्तम्भों के प्रति श्रद्धा और आदर उमड़ा था, बाहर आकर देखा तो वे एक-दूसरे के साथ घटिया हरक़तें करते नज़र आए। पाठशाला के स्वप्न से बाहर निकले तो महसूस हुआ कि जनकल्याण एक कवच का नाम है जिसके पीछे खड़े होकर जनता पर क्रूर वार किए जाते हैं। सरकार नीतियाँ बनाते समय सिर्फ इतना ध्यान रखती है कि उसकी सत्ता को बचाने के लिए किस-किस ‘जन’ की ज़रूरत पड़ सकती है। और उसका कितना कल्याण करने से अपनी कमीशनिंग ठीक-ठाक चलती रह सकती है।
जब दिल्ली के बिल्डर करोल बाग़, पहाडग़ंज की आवासीय संपत्तियों को फ्रीहोल्ड करा के उन पर कमर्शियल काम्प्लेक्स बना रहे थे, तब उस क्षेत्र का थाना शायद तीर्थाटन पर गया था। उस क्षेत्र के नगर निगम अधिकारी भी देश सेवा में व्यस्त थे। जब उन कॉम्प्लेक्सों की बिक्री हुई तब रजिस्ट्रार का पूरा कार्यालय भी देश निर्माण में तल्लीन था। जब उस इकाई पर बिजली-पानी के वाणिज्यिक कनेक्शन लगाए गए, तब इन दोनों विभागों को भी ध्यान नहीं आया कि यह आवासीय परिसर है। कई दशकों से सरकार इन व्यापारियों से कमर्शियल टैक्स लेती रही।
बिजली विभाग, जल विभाग, नगर निगम सब व्यावसायिक पैसा वसूलते रहे। अब अचानक माननीय न्यायालय को ज्ञात हुआ कि यह तो आवासीय परिसर है। टैक्स चूसनेवाले विभाग सारा ठीकरा व्यापारी के सिर पर फोड़कर ईमानदारी और सिस्टम की ढाल के पीछे छुप गए। नगर निगम और पुलिस विभाग, माननीय न्यायालय के आदेश का पालन करते हुए सीलिंग करने पहुँच गए। व्यापारी ठगा-ठगा सा खड़ा रह गया। दिल्ली सरकार ने कहा कि सीलिंग केंद्र सरकार करवा रही है। केंद्र सरकार ने कहा कि यह न्यायालय का आदेश है और न्यायालय के आदेश को हम कैसे टाल सकते हैं।
माननीय उच्चतम न्यायालय ने एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए फैसला दिया कि इनमें कुछ नरमी बरती जाए। फैसला सुनते ही केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट के खि़लाफ़ खड़ी हो गई। जनकल्याण के कवच में घुसकर केंद्र सरकार ने जो बयान दिए, उनका वास्तविक भावार्थ ये है- ‘तुम्हारा दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या? इलेक्शन सिर पर खड़ा है। राजस्थान की मीणा कम्युनिटी, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की ट्राइब्स… सबकी वोट कट जाएगी। सरकार औंधे मुँह गिर जाएगी। उधर पासवान जान खा लेगा। मायावती पहले ही भाजपा के लिए आफत है उसे सीधा लाभ मिलेगा। कोर्ट में बैठकर कुछ भी फैसला देने से पहले वोटिंग के गणित क्यों भूल जाते हो। व्यापारियों को वोट डालने की आदत नहीं है उन्हें नोच लो, हम कुछ नहीं कहेंगे लेकिन झुग्गी-झोंपड़ी, एससी-एसटी तो हमारे वोटिंग के गढ़ हैं भाई, यहाँ हाथ डालने से पहले सौ बार सोचा करो। समझे! अब हम रिव्यू पिटीशन ला रहे हैं, चुपचाप इस फैसले को वापस लेकर पुनर्विचार के अंधे कुएं में फेंक देना।’
…कई बार ऐसा महसूस होता है कि हम ठगों के बाज़ार से गुज़र रहे हैं। जो कम ठगा गया वो ख़ुश होता है। जो ज़्यादा ठगा गया वो अराजक होता है। जिसके कपड़े उतार लिए गए वो आत्मघातक होता है। और जो ठगता है वो गाता फिरता है- ‘सारे जहाँ से अच्छा…..!’
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
किरणों के बूते गहरा अंधियार मिटाना नामुमकिन है
दिनकर अब तुमको ख़ुद ही अंधियारे बीच उतरना होगा
युग-युग से तुम जिन घोड़ों के रथ पर थे असवार दिवाकर!
उनका चाल-चलन भी जाँचो अब फिर से इक बार दिवाकर!
इनके चारे की थैली पर अंधियारे के चिन्ह मिले हैं
इनकी हर हरक़त पर तुमको पूरा अंकुश धरना होगा
ओ दिनकर! कानाफूसी में ये बातें उड़ने लगती हैं
इक निश्चित पथ पर कुछ किरणें इधर-उधर मुड़ने लगती हैं
कोष तुम्हारे श्वेत पसीने का यदि उलझा तंत्र-भँवर में
तुमको लाँछन की पीड़ा से आहत होकर मरना होगा
तुम बरसों से धधक रहे हो, फिर भी अंधियारा जीवित है
कुछ अंधी गलियों में शायद उजियारे का रथ कीलित है
पूरब से पश्चिम तक की निगरानी की मर्यादा छोड़ो
अब नभ से धरती तक तुमको आँखे खोल विचरना होगा
तुम तक आने की हर कोशिश की पाँखें घायल होती हैं
उजियारे की ओर निहारें तो आँखें घायल होती हैं
ख़ूब भरा है तुम पर उठने वाली आंखों में अंधियारा
पर अंधियारे की आँखों में आज उजाला भरना होगा
तुम ही तो इस अंधियारे की रक्षा हेतु नियुक्त नहीं हो
तुम ही ख़ुद काले वैभव के वेतन से तो युक्त नहीं हो
इन सब प्रश्नों के उत्तर दे-देकर अपमानित हो जाओ
इससे पहले तुमको जग का हर अंधियारा हरना होगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghanakshari, Lapete Mein Netaji, Poetry
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
हम लोकतंत्र की ज़मीन बेच देते हैं
एक दल बोलता है हमको थमा दो देश
जनता का धर्म और दीन बेच देते हैं
एक नेता बोला हम बन के मुंगेरी लाल
जनता को सपने हसीन बेच देते हैं
जनता ने कहा हम वायदों की बीन पर
काले कोबरा को आस्तीन बेच देते हैं
✍️ चिराग़ जैन