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दुनिया में होली शायद एकमात्र ऐसा त्योहार है जिसकी तैयारी में नहाना कतई ज़रूरी नहीं है। बल्कि यूँ कहें कि होली के लिए तैयार होते समय नहाना निषेध है।
अन्य त्योहारों की तरह इस दिन नए-नए नहीं, पुराने-पुराने कपड़े पहने जाते हैं।
छेदवाली बनियान पर घिसे हुए परिधान पहनकर सजे हुए लड़कों की टोलियाँ सड़कों पर हुड़दंग करती हैं। लड़कियों को देखकर ऐसा लगता है जैसे ब्यूटीशियन ने उनके गालों पर काजल पोतकर, दाँतों पर हरे-नीले रंग की लिपस्टिक घिस डाली हो।
अचानक लड़कों की टोली में से एक हीरो की नज़र लड़कियों की टोली की एक हीरोइन से मिलती है। लिपे-पुते थोबड़ों में बल्ब की तरह चमकती दो जोड़ी जवान आँखें चार होती हैं। उनमें फागुन का गुलाबी रंग उतरने लगता है।
‘हुड़दंग’ जैसा परम कर्तव्य भूलकर नायक झेंपता है और अपनी भीगी हुई कमीज को अपनी हथेलियों से इस्तरी करने की चेष्टा करता है।
उधर, नायिका भी अपने झूतरों में से एक लट टटोलकर उसे कान के पीछे सेट करती है। तभी इस रोमांटिक मूमेंट पर पानी से भरा एक फुग्गा बम की तरह गिरता है। गुब्बारे से आहत नायिका के मुख से ‘उई माँ’ का मधुर स्वर निकलता है। वह अपने घटनास्थल को सहलाती हुई पानी-पानी होने लगती है।
जस्ट डिक्लेअर्ड नायक अपनी नायिका की ‘आह’ से बिलबिला जाता है और गुब्बारा मारनेवाले बालकों को कोसने लगता है। उसे उन बच्चों में नटखट कन्हैया नहीं, बल्कि क्रौंच पक्षी को तीर मारनेवाला क्रूर शिकारी दिखाई देता है।
ऐसी अनगिनत प्रेम-कहानियाँ होली की व्यस्तता में ध्वस्त हो जाती हैं।
एलीट क्लास के लोग ऐसी सड़कछाप होली नहीं मनाते! वे लोग बाकायदा किसी कोठी में होली का आयोजन रखते हैं। चिट्टे सफेद सूट पहनकर लेडीज होली स्पेशल ब्यूटी पैकेज लेती हैं। इस पैकेज में ब्यूटीशियन उनके गालों पर तीन अलग-अलग रंग की गुलाली लकीरें खींच देती है। यह गुलाल स्किन फ्रेंडली होता है।
ऐसा होलिया मेकअप करा के ये श्वेतवसना लेडीज आयोजन स्थल पर पहुँचती हैं, जहाँ श्वेत कुर्ते-पाजामे पहनकर जेन्ट्स लोग ठंडाई गटक रहे होते हैं।
बिसलेरी के पानी में ऑर्गेनिक कलर्स मिलाकर, छींटे मारते हुए, मेहमानों का स्वागत किया जाता है।
म्यूजिक सिस्टम पर गाने चल रहे होते हैं। जिनमें ‘कहियो रे मंगेतर से’ और ‘रंग बरसे’ की रिपीट वैल्यू देखते ही बनती है। ये दोनों ट्रेक उस एक ही दिन में इतनी बार बज लेते हैं कि फिर पूरे साल के लिए इनके गले बैठ जाते हैं।
एकाध कहासुनी और एकाध हाथापाई होली के रंगीन माहौल का बाई प्रोडक्ट होता है। बाई प्रोडक्ट मतलब वह उत्पाद, जो दो-तीन दिन तक डाइनिंग टेबल पर रखा रहता है और जब खराब होने के कगार पर पहुंच जाता है तो वह प्रोडक्ट कामवाली बाई को ये कहते हुए दिया जाता है- “शांता, तीन दिन से तेरी होली की मिठाई रखी है, तुझे देना ही भूल गई थी।”
होली बनावट छोड़कर असली चेहरे बाहर लाने का अवसर है, इसीलिए होली के दिन किसी भी भारतीय नागरिक की सूरत उसके आधार कार्ड से मिल ही जाती है।
✍️ चिराग़ जैन

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भारत में इन दिनों शादियों का सीज़न चल रहा है।
हमारे यहां शादी एक ईवेंट भर नहीं बल्कि बाकायदा एक बोर्ड परीक्षा है, जिसमें आपकी कमर से लेकर आपकी प्लेट और आपका धैर्य तक सब नप जाता है।
सबसे अलग कार्ड बनाने के चक्कर में शादियों के कार्ड में इतनी क्रिएटिविटी घुसेड़ दी जाती है कि जिस इन्फॉर्मेषन के लिए कार्ड भेजे जाते हैं, उसे लैंस लेकर ढूंढना पड़ता है।
आप घर से किसी शादी में जाने के लिए निकलो तो गाड़ी में बैठते ही मोबाइल पर कार्ड खोलकर वेन्यू तलाषा जाता है। कार्ड खुलते ही पहले घंटियां बजती हैं। फिर सितार बजता है, फिर एक-एक अक्षर हौले-हौले आसमान से अवतरित होता है। अपने धैर्य के चरम तक पहुंचकर आपको पता चलता है कि नेविगेषन में क्या लिखकर गाड़ी स्टार्ट करनी है।
घंटों के मेकअप से सजी-धजी औरतें और ट्रैफिक जाम से इर्रिटेट होकर जले-भुने आदमी जब तक विवाह स्थल तक पहुंचते हैं तब तक उनके बीच एकाध गाड़ी-युद्ध हो चुका होता है। ‘चाचा की छादी में जलूल-जलूल आना’ -कहनेवाले बच्चे मम्मी-पापा का महासंग्राम देखकर सहमे हुए छादी में पहुंच पाते हैं।
आयोजन स्थल की सजधज देखकर आपको लगता है जैसे आपका रिष्तेदार रातोंरात अम्बानी हो गया है। गेट पर चार-पांच कैमरामैन एक साथ आपकी फोटो खींचते हैं। आप खुद को सेलिब्रिटी समझते हुए पूरे तेवर के साथ पोज़ देते हैं। इतिहास गवाह है कि विवाहस्थल पर खींची गई ये वेलकम फोटो आज तक किसी ने नहीं देखी।
भीतर बड़े से लॉन में सब लोग अलग-अलग गोलमेज सम्मेलन कर रहे होते हैं। महिलाएं एक-दूसरे की ड्रेस देख रही होती हैं और पुरुष एक-दूसरे की महिलाएं।
कुछ रिष्तेदार स्नेक्स से लेकर मेन कोर्स तक एक-एक काउंटर का ऐसे मुआयना कर रहे होते हैं जैेसे हस्तिनापुर के युवराज महाभारत के युद्ध के लिए वेन्यू का मुआयना कर रहे हों।
डेढ़ दो घंटे स्नेक्स से काम चलाने के बाद जैसे ही इनके हाथ में खाने की प्लेट आती है, ये उसका ऐसा सिंगार करते हैं जैसे किसी ने फेसबुक, इंस्टा, यूट्यूब, ट्वििटर और लिंक्डइन एक ही स्क्रीन पर खोल लिए हों। वेक्यूम क्लीनर की स्पीड से भोजन निपटाकर वर-वधू को आषीर्वाद देने की सुधि आती है।
वर-वधू स्टेज पर ऐसे रखे होते हैं जैसे किसी ने पापड़ बेलकर धूप में डाल दिए हों। स्टेज के सामने एक कोने में डीजे लगा होता है। फ्लोर पर नाचनेवाले माइकल जैक्सन सारी दुनिया को भूलकर बेतहाषा नाचते रहते हैं।
ढाई-तीन घंटे में नाच-गाना-खाना वगैरा निपटाकर सभी उत्साही रिष्तेदार ‘चल खुसरो घर आपने’ का अनुसरण करते हुए घर लौट जाते हैं।
वर-वधू अपने-अपने परिवार और जबरदस्ती रोक लिए गए दो-चार खास रिष्तेदारों के साथ फेरों पर बैठ जाते हैं। शेरवानी और लहंगे का वजन अब तक दोनों को थकाकार चूर कर चुका होता है।
इधर फेरे हो रहे होते हैं और उधर हलवाई से लेकर बैंक्व्ट हॉल तक के कर्मचारी अपना-अपना सामान बटोरने लगते हैं।
रथ की तरह सजी मारुति और जूठे पतीले उठाकर ले जाने वाली ठेली साथ-साथ खड़ी होती है तो लगता है कि समाजवाद आ गया।
विदाई कराकर एक दिन के अम्बानी वापस अपने बसेरों में लौट जाते हैं। और उस वेन्यू पर अगले दिन फिर किसी परिवार को ‘अम्बानी फील’ देने की तैयारी होने लगती है।
✍️ चिराग़ जैन

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लो जी, बाज़ार में भी स्त्रीलिंग चांदी ने पुल्लिंग सोने की मोनोपॉली पर धावा बोल दिया है। अब खरे सोने की सामने टंच चांदी अकड़ कर चलने लगी है।
मैं तो उस दिन का इंतज़ार कर रहा हूँ जब भतीजे के ब्याह से विदा होते समय बुआजी, मुँह बिचकाते हुए कहेंगी- ‘भाभी ने सोने के कंगन में बहका दिया। इकलौती ननद हूँ। एक जोड़ी चांदी की पजेब ही दे देती।’
चांदी की ऐसी चांदी हुई है कि सोने को उबासी आने लगी है। सोना ऐसा उपेक्षित-सा बैठा है जैसे राजेश खन्ना को धक्का देकर भीड़ ओमप्रकाश के ऑटोग्राफ लेने दौड़ पड़ी हो। इसी स्पीड से चांदी की कीमतें बढ़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब लोग सोने के गहनों पर चांदी की पॉलिश करवाने लगेंगे।
सर्राफा बाज़ार चांदी कूट रहा है और चांदी मिल्खा सिंह की स्पीड से भागी चली जा रही है। हमारे बाज़ारों में ज़रा-सी हलचल होते ही भविष्यवाणियों का बाज़ार गरम हो जाता है।
मेरे एक रिश्तेदार ने मुझसे पूछा- ‘कुछ मार्किट-वार्किट में इन्वेस्ट किया है या नहीं?’
मैंने संकोच के साथ डींग हांकते हुए कहा- ‘जी गोल्ड बॉन्ड लिए हैं कुछ।’
उन्होंने हिकारत से मेरी ओर देखकर कहा- ‘कुछ नहीं रखा गोल्ड में, सिल्वर देखो बेटा सिल्वर।’
मैंने गोल्ड के मुँह पर ऐसी लानत पहले कभी नहीं देखी थी।
घर-परिवार का कोई समारोह हो या फिर चाय की दुकान, हर महफ़िल में कोई न कोई कॉन्फिडेंट भविष्यवक्ता अपने अनुभव से बता रहा होगा कि चांदी छह लाख तक जाएगी। शेयर बाज़ार का यह सबसे बड़ा लाभ है, जिनकी जेब में फूटी कौड़ी न हो, वो भी हज़ार-लाख-करोड़ की बातें करने का लुत्फ़ उठा सकते हैं। और जिसने हज़ार-पाँच सौ इन्वेस्ट कर दिये हों, उसे तो टाटा, बिड़ला से लेकर अम्बानी, अडानी तक को धंधा सिखाने का लाइसेंस मिल जाता है।
नुक्कड़ की चर्चाओं में उपस्थित अर्थशास्त्री चांदी की बढ़ती कीमतों का कारण भी बताते रहते हैं। एक विद्वान सोलर एनर्जी में चांदी की खपत का पत्ता फेंकता है तो दूसरा रूस-यूक्रेन यूद्ध से चांदी को जोड़कर उसे लाजवाब कर देता है। कोई इसे डोनाल्ड ट्रंप की शरारत बता रहा है तो कोई एलन मस्क की सीक्रेट बिज़नेस पॉलिसी को सार्वजनिक करके चांदी की कीमतों का भेद खोल देता है।
मैं भी घर से साबुन खरीदने निकला था, लेकिन नुक्कड़ की बातें सुनकर चांदी खरीदने निकल पड़ा। नहाना-धोना तो होता रहेगा, अगर चांदी नहीं खरीदी तो रातोंरात अमीर होने के मौके से हाथ धो बैठूंगा।
जिन फिल्मी गीतों में चांदी शब्द का प्रयोग हुआ है, मैंने उन्हें गुनगुनाना भी बंद कर दिया है। कहीं ऐसा न हो कि चांदी मेरे मुँह से बाहर निकल जाए और मैं रेंकता रह जाऊँ।
इन दिनों चांदी ने जो छलांग लगाई है, उस पर चांदी को ऊँची कूद का गोल्ड मेडल दिया जा सकता है। ओलम्पिक संघ ने इस विषय पर विचार भी किया लेकिन फिर ये सोचकर मन मसोस लिया कि कहीं चांदी राजकुमार के स्टाइल में ये न कह दे- ‘जानी, हम चांदी हैं, गोल्ड-वोल्ड जैसों को हम मुँह नहीं लगाते।’
✍️ चिराग़ जैन
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अमेरिकी उद्योगपतियों के लिए ऑक्सीजन के बिना जीवित रहना संभव है किन्तु राष्ट्रपति जी को प्रसन्न किये बिना अपना अस्तित्व बचा पाना असंभव हो गया है। उनकी हालत देखता हूँ तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह का अमर वाक्य याद आता है- ”गब्बर के ख़ौफ़ से तुम्हें केवल एक आदमी बचा सकता है, और वो है ख़ुद गब्बर।“
उद्योगपति सहयोग की उम्मीद से न्यायपालिका की ओर देखते हैं, लेकिन न्यायालय अपने महंगे दुशाले में अपने कटे हुए हाथ छिपाकर चुपचाप खड़ा है। वह जानता है कि अगर थोड़ा भी हिलने-डुलने की कोशिश की तो गब्बर सिंह की हवाएँ उसका दुशाला गिरा देंगी और उसे फ्लैशबैक में जाकर हाथ कटने की पूरी कहानी सबको सुनानी पड़ेगी। इस डिप्रेसिंग सीन से बचने के लिए न्यायालय मुँह फिराकर लिबर्टी की मूर्ति से नैन-मटक्का करने लगता है।
मीडिया के एकाध जय और बीरू, बंदूक लेकर पानी की टंकी पर चढ़ ज़रूर गए हैं, लेकिन उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनके चैनल में सांभा और कालिया का पैसा लगा हुआ है। इसलिए माइक को बंदूक की तरह पकड़कर वे दोनों, गब्बर सिंह पर फूल बरसा रहे हैं। कैमरे पर वे बंदूक चलाते हुए दिखते हैं लेकिन मालिक के मालिक पर केवल फूल बरसते हैं।
उधर उद्योगपतियों को अच्छी तरह समझ आ गया है कि गब्बर का मनोरंजन किये बिना काम नहीं चलेगा, इसलिए वे ख़ुद अपनी-अपनी धन्नो को चाबुक मारकर डायलॉग बोल रहे हैं- ”चल धन्नो, तेरी बसंती के धंधे का सवाल है।“ धन्नो पूरी जान लगाकर दौड़ती है, और बसंती को गब्बर के अड्डे पर ले आती है। गब्बर के अड्डे पर पहुँचते ही बसंती मुजरे की महफ़िल जमा लेती है।
गब्बर सिंह को संगीत और कला की भी उतनी ही समझ है, जितनी मनुष्यता की। इसलिए वे ठुमरी को डिस्को कहकर दाद दे रहे हैं। बसंती गब्बर सिंह की मूर्खता को विद्वत्ता सिद्ध करने के लिए ठुमरी की कैसेट चलाकर डिस्को करने की कोशिश करती है। बाहर खड़ी धन्नो, बसंती की इस हरकत पर हँसती है, लेकिन बसंती उसकी हँसी को इग्नोर करके गब्बर स्वामी की मुस्कान पर रीझती रहती है।
जमी हुई महफ़िल में जब थोड़ी देर तक कुछ हैप्पनिंग नहीं होता तो गब्बर सिंह अपने आसन से उठकर एकाध ठुमका लगा देते हैं। गब्बर का ठुमका लगते ही बसंती उनको नृत्यकला का गंधर्व सिद्ध कर देती है। जय और बीरू ड्रोन से पुष्पवृष्टि करने लगते हैं। न्यूयॉर्क हार्बर में लिबर्टी और न्याय की देवी का नैन-मटक्का डांस-शो में बदल जाता है।
गब्बर ठुमका लगाकर ऊंघने लगते हैं और पूरा अमरीका नृत्य करने लगता है। सभी बुद्धिजीवी, सूरमा भोपाली के अंदाज में अपने-अपने मजमे जुटाकर नृत्य की डींगें हाँकते हैं।
जय और बीरू को जिस काम के लिए स्क्रिप्ट में रखा गया था, वह काम उनसे छिन गया है। इसलिए स्क्रिप्ट में बने रहने के लिए बेचारा जय, अपने ही अन्नदाता की विधवा बहू के घर के सामने बैठा माउथ ऑर्गन बजा रहा है। उसके हुनर से इम्प्रैस होकर सूने आंगन में लालटेन जलने लगती हैं।
जो मस्क ख़ुद को घर का मालिक समझकर मसका लगाता फिर रहा है वह दरअस्ल रामलाल है। जिसे बंद कमरे में ठाकुर को चादर ओढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है।
पूरा अमरीका गब्बर की दहशत से नाच रहा है। सबको पता है कि उसके केस्टो मुखर्जी अमरीका के कोने-कोने में फैले हुए हैं। जो थोड़े बहुत पुराने लोग ज़िन्दा बचे हैं वे इस सबसे उकताकर चर्च की ओर बढ़ते हुए डायलॉग बोलते हैं- “पूछूंगा ऊपरवाले से, इस देश को नचाने के लिए एकाध ट्रम्प और क्यों नहीं दिया?”
✍️ चिराग़ जैन


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देश भर में दीवाली का माहौल है और बिहार में चुनाव का। हालाँकि राजनीति तो बिहार को ही अयोध्या मानकर अपने राजतिलक की प्रतीक्षा कर रही है।
हर दल स्वयं को भरत माने बैठा है कि सत्ता के रामचंद्र जी आकर उसी से गले लगेंगे। सत्ता के गले पड़ने के लिए हर नेता ने ख़ुद के भरत होने की घोषणा कर रखी है, लेकिन बिहार जानता है कि ये सब भरत, विभीषण बन जाने का सही मौक़ा तलाश रहे हैं।
दरअस्ल चुनाव वह पंचवटी है जिसमें हर रावण, साधु बनकर सीताहरण का अवसर तलाशता फिरता है। मारीच मुद्दों को भटकाने के लिए सीता के सामने कंचनमृग बनकर विचरता है और जो लक्ष्मण, सीता की सुरक्षा के लिए उपस्थित होता है उसे सीता खरी-खोटी सुनाकर ख़ुद अपने से दूर कर देती है।
बहरहाल टिकटों की आतिशबाज़ी हो चुकी है, जिनके पटाखे फुस्स हो गए उन्होंने अपने रॉकेट की बोतल का मुँह पार्टी कार्यालय की ओर मोड़ दिया। जिनको टिकट मिल गई उन्होंने अपने भीतर के बारूद को कपूर बताकर पार्टी की आरती उतारनी शुरू कर दी।
जिन्हें टिकट की सूची में जगह नहीं मिली, उन्होंने अपने-अपने लंकेश को भ्रष्टाचारी घोषित कर दिया है। उधर हर लंकेश मन ही मन सेतुनिर्माण की सूचना से भयभीत है, किंतु अपने चेहरे पर अहंकार का मास्क चिपकाकर अपने विरोधियों को भालू-बंदर सिद्ध करने पर तुला है।
नीतीश कुमार जब भी चुनाव प्रचार पर निकलते हैं तो उन्हें यह स्मरण रहता है कि अपनी सोने जैसी इमेज की लंका में उन्होंने ख़ुद अपनी ही पूँछ से आग लगाई है।
अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारियाँ चल रही हैं और लंका भीषण युद्ध में घिरी हुई है। चुनाव के शोर-शराबे से चैन की नींद सो रहे कुम्भकर्ण भी डिस्टर्ब होकर जाग गए हैं।
कोई अपना मेघनाद दांव पर लगा रहा है तो कोई अपने लक्ष्मण के लिए संजीवनी मंगवा रहा है। कोई पराये वानरों को भी अपना बनाने में जुटा है और कोई अपने भाई को भी लतिया रहा है।
हर पटाखे की बत्ती सुरसुरा रही है, लेकिन हर उम्मीदवार इस आशंका से ग्रस्त है कि कहीं ऐसा न हो कि बत्ती उसके पटाखे की जले और धमाका किसी और के पटाखे में हो जाए।
युद्ध के बाद जिसे सीता मिलेगी उसके घर दीवाली मनेगी और बाकी सब अपने कुनबे के साथ बैठकर अमावस्या मनाएंगे। लेकिन एक बात तय है कि फ़िलहाल देश में दीवाली का माहौल है।
✍️ चिराग़ जैन
