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अन्ना आंदोलन

आज मैंने
एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा

मैंने देखा
एक होड़ सी लगी थी
बारिश के जज़्बे से
लोगों के जज़्बे की।

झमाझम बरसात में
दिल्ली की सड़कें
उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से।

किसी को कोई डर ही नहीं था
बीमार पड़ने का
क्योकि
वे सब आए थे
देश की महामारी का
इलाज़ करने।

जहाँ तक निगाह जाती थी
सिर ही सिर नज़र आते थे।
…आज मैंने महसूस किया
कि किसी गांधी की एक आवाज़ पर
कैसे उठ खड़ा होता था
पूरा भारत!

✍️ चिराग़ जैन

सादगी की डगर

सत्य का पथ हमें क्यों जटिल सा लगा
उम्र को झूठ में ढाल कर चल दिए
सादगी की सुहानी डगर छोड़ कर
ज़िन्दगानी फटेहाल कर चल दिए

जो रवैया हमें पीर देता रहा
क्यों उसी के लिए हम पुरस्कृत हुए
ज़िन्दगी पर चढ़े पाप के आवरण
पाठ जितने पढ़े सब तिरस्कृत हुए
प्रश्न तो आत्मा ने उठाए मगर
हम उन्हें बिन सुने टालकर चल दिए

हर घड़ी भावनाएँ खरोंची गईं
हर क़दम दंभ की जीत होती रही
राजसी स्वप्न पलकें सजाए रहे
सत्व की रौशनी मौन सोती रही
लोभ की राह पर पीर रोती मिली
हम उसे और बदहाल कर चल दिए

हम ख़ुशी ही कमाने चले थे मगर
हम ख़ुशी ही गँवाते रहे उम्र भर
कौन जाने कि किस चैन के वास्ते
चैन अपना गँवाते रहे उम्र भर
उम्र भर आँकड़े ही जुटाते रहे
प्यार की जेब कंगाल कर चल दिए

भागते-दौड़ते रास्तों पर अगर
दर्द लाचार तनहा तड़पता मिला
पूस की रात में कोई बेघर दिखा
जेठ में प्यास से कोई मरता मिला
एक पल के लिए मन द्रवित तो हुआ
भावना पर क़फ़न डालकर चल दिए
✍️ चिराग़ जैन

आपदा-प्रबंधन

संकट हो कोई समक्ष खड़ा
या फिर घिर आए युद्ध बड़ा
जीवन की हर कठिनाई से
मानव का पुत्र सदैव लड़ा
मानवता का इक दिव्य भाव, अंतस् में धारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

सागर ने लांघी मर्यादा
सूनामी यम का रूप बनी
भूकम्पों की मनमानी से
जब धरा मृत्यु का कूप बनी
मानवता एक हुई सारी
विपदा उसके आगे हारी
सब मतभेदों का तिरस्कार, जीवन के कारण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

जब जीवनदायी मेघ फटें
अम्बर से मौत बरसती हो
नदियाँ सुरसा का रूप धरें
धरती किसान को ग्रसती हो
पर्वत से गिरे शिला भारी
शहरों को डसे महामारी
मानवता की रक्षा हित हम, हर स्वार्थ समर्पण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई, मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

जगती का कष्ट मिटाने को
शिव हालाहल पी जाते हैं
कान्हा गोकुल की रक्षा में
पर्वत का बोझ उठाते हैं
अस्थियाँ दान जहाँ ऋषि करें
और जनक खेत में कृषि करें
यदि समय त्याग का आया तो, हम याद कोई क्षण कर लेंगे
आपदा अगर कोई आई मिल-जुल के निवारण कर लेंगे

✍️ चिराग़ जैन

सुरों की आह

ज़माने ने सुरों की आह को झनकार माना है
कहीं संवेदना जीती तो उसको हार माना है
बड़े बईमान मानी तय किए हैं भावनाओं के
जहाँ दो दिल तड़पते हों उसी को प्यार माना है

✍️ चिराग़ जैन

वर्तमान

मुझे बेबस दिलों में पल रहे अरमान लिखने हैं
ग़रीबों के घरों के दर्द और तूफ़ान लिखने हैं
कभी मौक़ा मिलेगा तो चमन की बात कर लूंगा
अभी फुटपाथ के गलते हुए इन्सान लिखने हैं

✍️ चिराग़ जैन

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