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छेड़छाड़ का विरोध

दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों को पूरे देश का सेम्पल मानने की चूक सही नीतियों के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। जेएनयू, जामिया और डीयू में किसी लड़की को राह चलते परेशान करना या छेड़ना किसी मनचले के लिए महंगा पड़ सकता है लेकिन कानपुर, इलाहाबाद, पटना, बनारस, लखनऊ जैसे शहरों में स्थिति ऐसी नहीं है। इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाली लड़कियाँ छोटे शहरों, कस्बों और गाँव से आती हैं जहाँ ‘आज भी’ जागरूकता का आलम यह है कि छेड़छाड़ के किसी मुआमले की नुक्कड़-सभाओं में लड़कियों को ही दोषी माना जाता है। यदि कहीं कानूनी प्रक्रिया लड़की का पक्ष ले भी ले तो बाद में सामाजिक कानाफूसी से उपजा जनविरोध लड़कियों के लिए किसी प्रताड़ना से कम नहीं होता। यही वह स्थिति है कि कई शताब्दियों तक ‘बदनामी’ से बचने के लिए लड़कियाँ ‘बलात्कार’ के बाद भी थाने जाने से कतराती रहीं।
दिल्ली जैसे जागरूक शहर में भी आज तक ऐसे मुआमलात खूब होते हैं कि छेड़छाड़ का विरोध करने से पहले लड़की हिचकिचाती है कि लोग उसके बारे में बातें बनानी शुरू न कर दें।
छोटे शहरों की लड़कियों के मस्तिष्क में उनके माहौल ने यह धारणा बना दी होती है कि वे बड़े शहर की लड़कियों जितनी आधुनिक नहीं हैं इसलिए न तो उनमें लड़कों से बात करने का आत्मविश्वास होता है न ही उनकी बदतमीजी का विरोध करने का। उत्तर प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ रही लड़कियों की स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें अपने हॉस्टल से मेस तक जाने के लिए भी किसी साथिन की जरूरत होती है। बेंच पर दो-चार लड़के बैठे हों और लड़कियाँ वहाँ से गुजरें तो यह मुमकिन नहीं कि उन पर फब्ती न कसी जाए। यदि किसी लड़की का दुपट्टा पेड़ की झाड़ी में अटक जाए तो वह वहां रुक कर उसे निकालने में समय लगाते हुए अश्लील डायलॉग सुनने की अपेक्षा उसे त्याग कर आगे बढ़ जाना उचित समझती है। शाम के बाद तो सड़क पर किसी भी अकेली लड़की का रास्ता रोकने, हाथ पकड़ने, छातियाँ मसलने और किसी भी हद तक बढ़ जाने का अधिकार लड़कों को मिल जाता है।
इन परिस्थितियों में पढ़ना-लिखना तो दूर, साँस लेना तक कितना दूभर होता होगा इसकी कल्पना करने के लिए कुछ क्षण स्वयं को वहाँ खड़ा करना आवश्यक है। एक लड़का किसी लड़की को दबोच कर चूम ले और फिर रोज शाम अपने दोस्तों के साथ उसकी खामोश लाचारी का जुलूस निकालकर उस पर हँसता हुआ निकले तो कैसा लगता होगा इसका अनुमान लगाना जरूरी है। हॉस्टल के बाथरूम में नहाते हुए किसी लड़की की निगाह ऊपर के झरोखे से टकराए और वहाँ दो आँखें उसे बेशर्मी से टंगी हुई दिखाई दें तो कैसा एहसास होता होगा।
शिक्षाध्य्यन के समय इन संस्थानों की लड़कियों को यह पहेली भी बूझनी होती है कि इनके सामने से गुजरते हुए बेचारे लड़कों को अपने गुप्तांग खुजाने का नियम क्यों निभाना पड़ता है?
मैं हमेशा आश्चर्य करता था कि इस दमघोंटू माहौल में रहकर पढ़ना और फिर अपनी काबिलियत सिद्ध करके उन्नति करना कितना मुश्किल होता होगा। इन छोटे शहरों की लड़कियों का चेहरा अपने ध्यान में लाकर एक बार हम सबको यह प्रश्न स्वयं से करना चाहिए कि इन मासूम परियों को हमने कितनी मुसीबत में डाल दिया है? हमें सोचना चाहिए कि इतनी सारी जिल्लत सहकर भी मौन रहने की इनकी विवशता हमारी कौन सी परंपराओं और संस्कारों के सम्मिलन से जन्मी है?
पहली बार इन डरी हुई बच्चियों ने इस देश के प्रशासन को अभिभावक समझ कर इन हरकतों की शिकायत की है। इन्हें फटकार लगाकर चुप रहने को न कहें। इनके साथ वह सुलूक न करें जो अब तक इनके माता-पिता करते आए हैं। इनके साथ मारपीट न करें हुजूर, सच मानिए, इन्हें किसी लड़के ने छेड़ा इसमें इनका कोई कुसूर नहीं है।
बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी प्रशासन उठा ले तो बेटियों को पढ़ाने में किसी परिवार में हिचक न होगी। एक बात और, ये सब लड़कियाँ किसी और मुल्क से भागकर आईं शरणार्थी नहीं हैं, ये हमारे आंगन में गूंजी वही किलकारियां हैं जिनका आकर्षण हमें दफ्तर से घर लौटने के लिए बेताब कर देता है।

✍️ चिराग़ जैन

वाराणसी विश्वविद्यालय में लड़कियों की सुरक्षा की मांग के संदर्भ में।

सामाजिक जीवन का मूल्य

रामायण के राम से ही यह सिलसिला प्रारम्भ हो गया था कि सामाजिक जीवन जीने के लिए व्यक्तिगत जीवन की बलि चढ़ानी होगी। कबीर ने इस बात को बिल्कुल स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो घर जारै आपना, चले हमारे साथ। सामाजिक जीवन की अपेक्षा होती है कि मनुष्य 24 में से 48 घंटे काम करे। ऐसे में जाने-अनजाने परिवार के लोगों का समय चोरी किया जाता है।
कभी-कभी यह प्रश्न मन को व्यथित करता है कि व्यष्टि की अनदेखी कर समष्टि को प्राथमिकता देनेवाले मनुष्यों के एकाकीपन का मोल कैसे चुकाया जाए? राम की पीर, बाबा तुलसी ने कही भर है किंतु उस पीड़ा को भोगने की कल्पना भी मन में सिहरन पैदा करती है। उधर कृष्ण जनहित में जारी हुए, तो जन्म से ही जन्मदात्री ने छोड़ दिया, यौवन में प्रेम छूट गया और पालनेवाली माँ की गोदी छूट गई। परिस्थितियों ने कृष्ण को इतना निष्ठुर बना दिया कि महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु, घटोत्कच्छ और यहाँ तक कि कर्ण और भीष्म तक कि मृत्यु पर भी समाज के हित को सर्वाेपरि रख स्थितप्रज्ञ बने रहे।
गंगापुत्र भीष्म, गौतम बुद्ध, कबीर, अशोक महान, पन्ना धाय, बिनोवा भावे, केशव बलिराम हेडगेवार, महात्मा गांधी, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, गुरु गोलवलकर, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, इंदिरा गांधी, किरण बेदी, एपीजे कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी तक ऐसे हजारों व्यक्तित्व हैं जिनमें से कुछ ने पारिवारिक सुविधाओं को त्याग करके सामाजिक जीवन जीना शुरू किया तो कुछ ने सामाजिक जीवन में उतरकर पारिवारिक सुख त्याग दिए।
गुरु सिख परंपरा, सनातन संत समाज, जैन संत, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक वृन्द, सीमाओं पर खड़े वीर जवान और बड़े पदों पर बैठे अफसर -ये सब वर्ग या तो अपने परिवार बसाते ही नहीं, बसाते हैं तो अपने दायित्वों के निर्वहन में परिवार की अनदेखी करते हैं और अंततः पारिवारिक सुखों से वंचित हो जाते हैं। पत्रकारिता, चिकित्सा, विज्ञान, विधि, अभियांत्रिकी, शोध, कला, राजनीति और रक्षण से जुड़े लोगों के जीवन में यह परिस्थिति कमोबेश होती ही है।
कहानियाँ सुनकर बहुत आसान लगता है किंतु एक बार यह अनुभूत करके देखें कि अपनों के अपनत्व का मूल्य चुकाकर समाज और मानवता की सेवा करनेवाले लोगों से उऋण होना लगभग असंभव है। वैचारिक मतभेद और निजि पसंद-नापसंद के कारण हम इन सब लोगों के सामाजिक योगदान की आलोचना कर सकते हैं, इन लोगों की आर्थिक स्थितियों से हम ईर्ष्या रख सकते हैं लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सबके पास समाज से प्राप्त सुविधाएँ ज़रूर हैं लेकिन अपनों से मिलनेवाले सुख का सर्वथा अभाव है।
हम कई सदियों से ऐसे लोगों को आदर और निरादर की सौगात देते रहे हैं लेकिन इन लोगों की निष्ठा को प्यार से हम कभी नहीं नवाज़ सके और यही कारण है कि समाज के लिए सर्वस्व स्वाहा करनेवाले इन योगियों के जीवन में हम अपनत्व का एक भी पल नहीं सजा सके।

✍️ चिराग़ जैन

सूचना पट्ट से झाँकती सभ्यता

यदि आवश्यकता आविष्कार की जननी है तो दीवारों पर लिखी हिदायतें हमारी बुरी आदतों का आईना हैं।
कल्पना करें तो शायद हम समझ पाएंगे कि अपने सपनों के घर की खूबसूरत दीवार पर तारकोल से ‘गधे के पूत, यहाँ मत मूत’ लिखनेवाला आदमी किस हद तक परेशान हुआ होगा। यत्र-तत्र-सर्वत्र मूत्रत्याग करने वाले निष्ठावान नागरिकों को रोकने की दिशा में पट्ट-लेखकों ने काफी विकास किया है। ‘देखो गधा पेशाब कर रहा है’; ‘यहाँ मूतने वाले तेरी माँ की…..’ और ‘यह मंदिर की दीवार है कृपया यहाँ मूत्रत्याग न करें’ जैसे बहुभाषी ग्रंथों से मूत्रसाधकों को सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं हो सका तब ‘एक चित्र सौ शब्दों के समान होता है’ का अनुसरण करते हुए हमने मूत्रनीय दीवारों पर ईश्वर के विराट रूप की छोटी-छोटी टाइल्स लगवा दीं। किन्तु इतने पर भी मूत्रत्यागकर्ताओं ने हार न मानी और वे अपने पूज्य देव को बचाकर अन्य दीवारों पर कार्य निष्पादन करते रहे। साईं बाबा के भक्त को हिंदू देवताओं की तस्वीर न रोक सकी और घोर रामभक्त ने साईं बाबा की परवाह नहीं की। वैष्णव, शाक्त, शैव और न जाने क्या-क्या बहाने बनाकर साधकों ने भक्तिप्रवाह का उपाय खोज ही लिया। अंततः सभी देवताओं ने मीटिंग करके एक साथ एक ही दीवार पर चिपकना स्वीकार किया तब कहीं कुछेक दीवारों के भूमिगत जल में मूत्र संवर्द्धन बन्द हुआ।
विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता का दावा करनेवाले हम लोग कितने सभ्य रहे होंगे इसके प्रमाण-पत्र पूरे देश में हिदायती सूचना-पट्टों पर शान से चिपके हुए हैं। कितने फख्र की बात है कि हमें डायरेक्टली ‘बेहया’ कहनेवाले वाक्य भी अपनी विनम्रता नहीं छोड़ते और सम्मानपूर्वक हमें लताड़ते हुए लिखते हैं- ‘कृपया पान की पीक यहाँ न थूकें।’ हम इस सम्मान से गद्गद हो उठते हैं और आभार ज्ञापन करते हुए उस इबारत पर अपने मुखारविंद से पीक अर्पण कर आगे बढ़ जाते हैं।
रेल के टॉयलेट में मग्गे से बंधी ज़ंजीर हमारी आदतों के गले में पहनाई गई स्वर्णकड़ी जैसी भूमिका निभाती है।
आज्ञाकारी हम इतने हैं कि हर बात बोर्ड पर लिखकर समझाई जाती है। ‘कृपया यहाँ न थूकें’ और ‘गंदगी न फैलाएँ’ जैसे सूचना पट्ट हमारी आदतों के गौरवशाली इतिहास की झलक दिखाते हैं। ‘कूड़ा कूड़ेदान में ही डालें’, ‘फाटक बंद हो तो लाइन पार न करें’, ‘ट्रांसफार्मर के आसपास पेशाब करना जानलेवा हो सकता है’ और ‘कृपया लाइन न तोड़ें’ जैसे प्रशासनिक वाक्यों के अतिरिक्त निजी क्षेत्र में भी सूचनाओं का विपुल भंडार है। ‘जगह मिलने पर साइड दी जाएगी’, ‘जिनको जल्दी थी वो चले गए’, ‘उड़ के जावेगा के’, ‘कुत्ता भी बिना वजह नहीं भौंकता’ और ‘सड़क तेरे बाप की है क्या बे’ -जैसे वाक्य हमारे ट्रैफिक सेंस की गौरवगाथा के स्वर्णिम अध्याय हैं।
‘मतदान अवश्य करें’, ‘राष्ट्र की संपत्ति को नुकसान न पहुँचाएँ’, ‘बस की सीट न फाड़ें’, ‘सीढ़ियों पर न बैठें’, ‘रिश्वत न लें, न दें’, ‘दलालों से सावधान’, ‘जेबकतरों से सावधान’ या ‘लेडीज सीट पर न बैठें’ और ‘बंदरों को न छेड़ें’ जैसे वाक्यों में सजा भारतीय लोकतंत्र पूरी दुनिया की चित्र प्रदर्शनियों में दमकता है, तो हमारा गौरवशाली इतिहास और भी प्रखर हो उठता है।
‘कृपया अस्पताल में शोर न करें’ और ‘एम्बुलेंस को रास्ता दें’ जैसे लौकिक मानवीय आदेशों से लेकर ‘जलती चिता में कचरा न डालें’ जैसे पारलौकिक सूचना पट्टों ने हमारी संवेदनाओं की हकीकत चेहरे पर जो श्रृंगार किया है उसे धोने के लिए पानी नहीं आँसुओं की ज़रूरत है।

✍️ चिराग़ जैन

जनता की ज़िम्मेदारी

आप रेडलाइट पर खड़े हैं अचानक आपके पीछे कोई हॉर्न बजाने लगता है। उसको इस बात पर आश्चर्य है कि जब कोई पुलिसवाला नहीं खड़ा तो आप रेडलाइट का सम्मान क्यों कर रहे हो? आप बाजार से गुज़रते हैं। बीच सड़क पर कोई स्कूटर पार्क कर गया है। सारा ट्रैफिक रुक गया है। सबको परेशानी हो रही है। दस-पंद्रह मिनिट बाद स्कूटर का मालिक बेशर्मी से फोन कान पर लगाए आता है और स्कूटर स्टार्ट करके निकल जाता है।
सब लोग “उसके जाने के बाद” कुछ अपशब्द टाइप बड़बड़ाते हुए अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। नो पार्किंग के बोर्ड के ठीक नीचे पार्किंग करने वाले लोग; नो राइट टर्न से दाएं मुड़ने वाले लोग; यू-टर्न को ब्लॉक करने वाले लोग; पार्क के बेंच पर च्विंगम चिपकाने वाले लोग; बस की सीट फाड़ने वाले लोग; पैट्रोल पम्प पर पेट्रोल चुराने वाले लोग; अपने दूर के रिश्तेदार की पहुँच पर इतराने वाले लोग; चौराहों पर भीख देने वाले लोग; आसाराम की रिहाई के लिए जंतर-मंतर पर धरना देने वाले लोग; रेल लाइनों पर गंदगी फेंकते लोग; बिजली-पानी की चोरी करते लोग; रामपाल के लिए सेना को पथराने वाले लोग; रामवृक्ष के लिए पुलिस को दबोचने वाले लोग; रामरहीम के लिए देश जलाने वाले लोग और माँ की कसम देकर मेसेज फारवर्ड करने वाले लोग ….इन्हीं सब लोगों से मिलकर हमारे देश की जो तस्वीर बनती है उसमें सरकारी योगदान अथवा निकम्मेपन की कोई भूमिका नज़र तो नहीं आती लेकिन फिर भी हम अपने हर सामाजिक व नैतिक अपराध को सरकार तथा सिस्टम की ओट लेकर छुपा देने के अभ्यस्त हो गए हैं।
मैं सरकार और सिस्टम की तरफदारी या विरोध न करके केवल इतना भर सोचना चाहता हूँ कि जो सुई पिछले सात दशक से सिस्टम की ख़राबी पर अटकी है उसे एक बार जनता की अथक ईमानदारी से आगे क्यों नहीं बढ़ाया जा सकता! क्या आवश्यक है कि बर्बरीक बनकर इस देश की महाभारत को एकटक निहारते रहा जाए और हर मृत जयद्रथ तथा अभिमन्यु को वीरता के ख़िताब की डुगडुगी थमाकर उससे निंदा का रस प्राप्त किया जाए?
क्या एक सप्ताह मात्र के लिए हम यह प्रयोग नहीं कर सकते कि सरकारी नीतियों के उलाहनों को छोड़कर हम आत्म अनुशासन से इस देश की छोटी छोटी समस्याओं को बढ़ने से रोक पाएं। क्या अपने बच्चों को कल सड़क पर बेहिचक चलने देने के लिए आज हम अपनी गाड़ी थोड़ी दबा कर पार्क नहीं कर सकते? क्या कल अपनी बिटिया के निडर जीने की सुविधा देने के लिए आज अपने बेटों को संस्कार का छोटा-सा पाठ नहीं पढ़ा सकते। क्या कल अपने देश पर फख्र करने के लिए आज अपने आलस्य व प्रमाद का त्याग नहीं कर सकते? क्या हम देश को बदलने की ख़्वाहिश के लिए अपनी आदतों को सुधारने की कोशिश नही कर सकते!!!

✍️ चिराग़ जैन

बच सकते हैं तो बच लें

बधाई हो!
एक बार फिर हमें धर्म के कपड़े उतारने का मौक़ा मिला है। इस बार हमाम में हिन्दू धर्म खड़ा है। कीचड़ का एक थेपा कोई हिंदू संतों पर फेंकेगा तो बदले में हिन्दू लोग भर-भर बाल्टी कीचड़ पादरियों और मौलवियों के थोबड़े पर दे मारेंगे। बाबागिरी की आड़ में अय्याशी कर रहा कोई कुकर्मी नंगा हुआ तो हमने सभी संतों को कठघरे में खड़ा कर दिया।
सामान्यीकरण की यही आदत हमें सामाजिक कुरीतियों से दूर नहीं होने देती। आसाराम गिरफ्तार हुए और हम हिंदुओं को चिढा-चिढ़ाकर नाचने लगे। इमाम बुख़ारी के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज हुई और हम मुसलमानों को गालियाँ बकने लगे। साध्वी प्रज्ञा पर आरोप तय हुए और हम सभी हिंदुओं को आतंकवादी सिद्ध करने पर तुल गए। अफजल को फाँसी हुई और हमने हर मुसलमान को आतंकी मान लिया। एक भिंडरवाला अपराध कर के भागा और हमने हर सरदार को ज़िंदा जला देने की कसम उठा ली।
इस जल्दबाज़ी में हम यह समझ ही नहीं पाते कि किसी एक डेरे के सेम्पल से पूरी सिख परंपरा का चरित्र नहीं समझा जा सकता। दो जैनियों के हवाला में लिप्त होने से पूरा जैन समाज चोर सिद्ध नहीं होता। ठीक वैसे ही ज्यों एक अम्बेडकर के संविधान लिख देने से हर बौद्धिस्ट कानून का ज्ञाता नहीं हो जाएगा। एक उंगली पर गर्म तेल गिर जाए तो पूरे शरीर पर बरनॉल नहीं डाली जाती। रामरहीम एक व्यक्ति है जिसे श्रद्धा की वेदी में बैठाया गया था। अब उसके अपराधों ने उसे आदर की वेदी से उतार कर अपराध के परिणाम तक पहुंचा दिया।
इससे वेदी बदनाम नहीं होती। कोई विवेकानन्द उस वेदी को छुए बिना ही हज़ारों रामरहीमों की करतूत से अपनी परंपराओं को अनछुआ रखने के लिए पर्याप्त है। घटना विशेष से व्यक्ति के चरित्र का आकलन और व्यक्ति विशेष से पूरी संस्कृति का आकलन एक ऐसा अपराध है जिसे हम युगों-युगों से करते आ रहे हैं। विकास के जो स्वप्न हम देख रहे हैं उसको साकार करने के लिए इस चूक से अपनी पीढ़ियों को मुक्त कराना हमारा दायित्व है।

✍️ चिराग़ जैन

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