Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
जीवन की अथक जिजीविषा यदि हताशा के चरम पर पहुँची है तो परिस्थितियों ने विवशता का कितना भयावह चेहरा प्रस्तुत किया होगा इसका अनुमान लगाया जा सकता है। हिमांशु रॉय जैसे बेटे को खोकर भी यदि इस राष्ट्र ने तंत्रजन्य विद्रूपताओं का सम्यक चिंतन नहीं किया तो स्थितियों का यह चेहरा इतना वीभत्स हो जाएगा कि उसके महामिलन से उत्पन्न संतति युग को महाविनाश के कुरुक्षेत्र की ओर ले जाएगी। हिमांशु रॉय की प्रेरणादायक जवानी जिस एक क्षण में आत्मघात की देहरी पर बलिदान हो गई उस एक क्षण से अपनी पीढ़ियों को बचाने के लिए अनर्गल मुद्दों में नष्ट होने वाले समय को मनुष्यता के वास्तविक विकास में समर्पित करना होगा। आह! संवेदनाएँ सिहर उठती हैं, क्या अनुभूति रही होगी उस क्षण जब कोई जुझारू जीवन अपने मुँह में पिस्तौल रख पाया होगा। कितनी मेहनत लगी होगी उन उंगलियों को ट्रिगर दबाने के लिए। उफ्फ! आत्मा काँप जाती है। हे ईश्वर, इस देश की जवानी को तंत्र की विफलताओं से बचाना। नमो नारायण!
✍️ चिराग़ जैन
Ref : Himanshu Roy Suicide
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हम एक सुदृढ़ लोकतंत्र से वापस कबीलाई समाज व्यवस्था की ओर अग्रसर हैं। और सही कहें तो अग्रसर भी नहीं ‘उग्रसर’ हैं।
हर कबीले में लड़ाकों की और अपराधियों की प्रचुर मात्रा उपलब्ध है। लेकिन हर क़बीले के अपने नियम हैं। हिन्दू क़बीले का कोई बलात्कारी यदि मुस्लिम क़बीले की किसी लड़की को दबोच लेता है, तो यह गुनाह नहीं है लेकिन यदि हिन्दू क़बीले का कोई लड़का हिन्दू क़बीले की ही किसी लड़की का बलात्कार करता है तो क़बीले को सवर्ण-दलित, कांग्रेस-भाजपा या शैव-वैष्णव के आधार पर विभक्त होकर आपस में लड़ना होगा। जिस वर्ग में लड़की आएगी, उस वर्ग के लोग अपनी क्षमता के अनुरूप दंगा, धरना, प्रदर्शन, रैली, तोड़फोड़, मारपीट, बदले की कार्रवाई, क्रिया की प्रतिक्रिया अथवा कैंडल मार्च करेंगे। ठीक इसी तरह जिस वर्ग में बलात्कारी आएगा उस वर्ग के लोग विपरीत पक्ष के किसी बलात्कारी की पुरानी फाइल को सनद बनाकर अपने प्रत्याशी के पक्ष में तर्क देगा या फिर लड़की को चरित्रहीन सिद्ध करके अपने प्रत्याशी को कर्मफलदायक घोषित कर देगा।
स्त्री-पुरुष के विभाजन से प्रारम्भ हुआ यह क्रम अमीर-ग़रीब, अगड़ा-पिछड़ा, कांग्रेसी-भाजपाई, हिंदी-मराठी-तमिल, राष्ट्रवादी-वामपंथी-सेक्युलर, मोदी खेमा-आडवाणी खेमा और साक्षर-निरक्षर तक विकसित हो चुका है। विभाजन के इस क्रम के विकास की कोई सीमा नहीं है। यह तब तक ज़ारी रह सकता है जब तक मनुष्य नितांत एकाकी न हो जाए। हर व्यक्ति स्वयं में कबीला होगा। हर व्यक्ति का निजी संविधान होगा जिसकी धाराएँ प्रतिदिन उसके अनुसार बदलती रहेंगी।
राम, कृष्ण, पैग़म्बर, ईसा, नानक, महावीर, बुद्ध, गांधी, नेहरू, अम्बेडकर और पटेल जैसे कुछ लोग कबीलाई संस्कृति के इस विकास क्रम को भंग करके मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने की फालतू बातें करने लगे तो हमने उनकी बातें अनसुनी करके उनके चित्र को ध्वजा बनाकर नए क़बीले बना लिए।
न्याय, कानून, मनुष्यता और करुणा को नपुंसक करके हम अनवरत विभक्त हो रहे इस स्वर्णयुग की आभा बढ़ा रहे हैं। बहुत जल्दी हम प्रति व्यक्ति एक क़बीले तक की व्यवस्था देख पाएंगे; लेकिन इस बीच हमें यह सावधानी बरतनी होगी कि तर्क, चिंतवन, निष्पक्षता, मनुष्यता और सहृदयता के शब्द लेकर कोई इस राह में अड़चन बनना चाहे तो उसे हर प्लेटफॉर्म पर गालियाँ बकनी आवश्यक है अन्यथा एकाकी खड़े रह जाने का सपना कभी पूरा न हो सकेगा।
✍️ चिराग़ जैन
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बचपन से देखते आए हैं। घर के एक कोने में दो झाडुएँ रखी होती थीं। एक फूलबुहारी और एक सींक वाली झाडू। कमरों के भीतर का फ़र्श बुहारना होता था तो फूलबुहारी प्रयोग की जाती थी। और आंगन या चौबारा झाड़ना होता था तो सींकों वाली झाड़ू काम आती थी। यही सिद्धांत सीख लें तो सोशल मीडिया का प्रयोग करना आ जाए। घर के भीतर कुछ गन्दगी हो तो उसे ऐसे उपकरण से साफ किया जाता है जो शोर भी न करे और कचरा भी साफ हो जाए। और घर के बाहर का कचरा पूरे ज़ोर शोर से धूम धड़ाके से रगड़ रगड़ कर साफ किया जाना चाहिए। हर समस्या पर विमर्श और चर्चा आवश्यक है लेकिन हमें यह ज्ञात होना चाहिए कि व्हाट्सएप्प फूलबुहारी है और फेसबुक सींकों वाली झाड़ू।
✍️ चिराग़ जैन
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कई बार ऐसा लगता है कि इस देश की स्थिति किसी कम्प्यूटर जैसी है। आप जो फाइल खोलते हो, पूरी स्क्रीन पर वही दिखाई देती है। फिर आप उसे क्लोज़ या मिनिमाइज़ करके दूसरी फाइल खोल लेते हो, तो पिछली फाइल की छाया तक नहीं बचती स्क्रीन पर।
इस कम्प्यूटर का ऑपरेटर दलित आंदोलन की फाइल खोल के बैठ गया तो पूरा देश फूंक दिया गया। कम्प्यूटर का प्रोसेसर जवाब दे गया। देश की रैम जाम हो गई। देश के हर राजनेता को दलितों की बेचारगी दिखने लगी। दो दिन तक यही फाइल खुली रही। जब फाइल में काम करने को कुछ न बचा, तो अगली फाइल खुलने के इंतज़ार में उसे खोले रखा गया।
तभी अचानक एक फिल्म अभिनेता को जेल हो गई। कम्प्यूटर स्क्रीन अभिनेता के वॉलपेपर्स से भर गई। जमानत याचिका पर सुनवाई न हो सकने के कारण बेचारे अभिनेता को कम से कम एक रात तो जेल में काटनी ही पड़ेगी। अब देश को लगा फिल्मस्टार का दर्द दलितों के दर्द से बड़ा है। हमने जोधपुर जेल का चप्पा-चप्पा छान मारा। इस अनुसंधान में वहाँ पहले से बंद एक बाबाजी मिल गए। हमने फिल्मस्टार और बाबाजी पर सेमी अश्लील चुटकुले गढ़े और अभिनेता के ज़ख़्मों पर मरहम लगाया।
यदि अभिनेता को जमानत मिल गई तो यही फाइल लम्बी चलेगी और जमानत नहीं मिली तो और लम्बी चलेगी।
नीरव मोदी, डाटा लीक, बुलेट ट्रेन, लिंगायत, पद्मावत, करणी सेना, पटेल आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, जाट आंदोलन, श्रीदेवी की मृत्यु, बॉल टेम्परिंग, विजय माल्या, केजरीवाल की माफी, रोमियो स्क्वेड, राम मंदिर, तोगड़िया, राज्यसभा चुनाव, नरेश अग्रवाल, शमी की हसीना और मणिशंकर की गाली जैसी हज़ारों फाइलें हैं जो स्क्रीन कैप्चर करती रहीं और फिर अचानक ग़ायब हो गईं। कुछ फाइलें अपनी क्षमता से स्क्रीन पर छा जाती हैं तो कुछ को ऑपरेटर जान-बूझकर देर तक खोले रखता है।
ऑपरेटर जानता है कि यदि ये सारी फाइलें बन्द या मिनिमाइज़ कर दी गईं तो डेस्कटॉप का वॉलपेपर दिखने लगेगा जिस पर ‘प्रियोरिटीज़’ लिखी हुई हैं- रोटी…. कपड़ा… मकान… स्वास्थ्य… शिक्षा…. न्याय…. यातायात…. क़ानून…. सुरक्षा…. साफ़ हवा…. साफ पानी…!
✍️ चिराग़ जैन
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हम जिस चीज़ को श्रम करके अर्जित करते हैं, उसका सम्मान करते हैं। यदि हमने संघर्ष किया हो, तो हम दूसरे के संघर्ष का भी सम्मान करते हैं। यदि हमने साधना करके प्रसिद्धि अर्जित की है तो, हम दूसरे की प्रसिद्धि का आदर करते हैं। यह तथ्य विश्व की प्रत्येक उपलब्धि पर लागू होता है। किंतु यदि हम प्रयास करने के बावजूद किसी वैभव से वंचित हैं तो हम उस वैभव के सिद्ध व्यक्ति का उपहास करके अपनी कुंठा निकालते हैं।
धनवान होने की लालसा रखनेवाला निर्धन व्यक्ति, सम्पन्न लोगों की जीवन पद्धति का उपहास करता है। सामाजिक सम्मान से हीन व्यक्ति, सम्मानित व्यक्तित्वों को ढोंगी कहने लगता है। क्रिकेट में विफल हुआ खिलाड़ी टीम इलेवन के हर सदस्य को भ्रष्टाचारी कहने लगता है। यही स्थिति राजनीति, फ़िल्म, साहित्य, पत्रकारिता, व्यापार, व्यवसाय और अन्य क्षेत्रों की है।
इन वंचित लोगों को यदि कोई अस्त्र मिल जाए तो ये उससे अपनी कुंठा निकालने का काम करते हैं। सोशल मीडिया ऐसा ही एक अस्त्र है जिस पर लोगों की चरित्र हत्या के अनगिनत उदाहरण देख चुका हूँ। भारत सरकार भी दोष सिद्ध होने तक आरोपी को अपराधी नहीं मानती किंतु फेसबुक के स्वयंभू न्यायाधीश किसी पर भी आक्षेप लगाकर उसे अपराधी सिद्ध कर देते हैं। चूँकि उसकी प्रोफाइल पर उसके जैसे ही लोगों का जुड़ाव होता है इसलिए समान वेवलेंथ के लोग उसे व्हिसलब्लोअर समझकर उसके शिकार को नोच-नोचकर खाने लगते हैं।
इन लोगों का एक ही सिद्धांत है कि किसी खटारा कार और मर्सिडीज़ की टक्कर होगी तो खटारा की प्रसिद्धि बढ़ेगी। मर्सिडीज़ के साथ उसका फ़ोटो भी अख़बार में छपेगा। इन लोगों को इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि इस टक्कर में मर्सिडीज़ का कितना नुक़सान होगा। क्योंकि इनके पास खोने के लिए कुछ है ही नहीं।
किसी के चरित्र पर प्रश्न उठा देना। किसी के निजी जीवन की कुछ अफ़वाह उड़ा देना, किसी की मौलिकता पर सवाल खड़े करना, किसी की ईमानदारी को कठघरे में घसीटना और किसी की नीयत पर शंका ज़ाहिर करना इस प्रवृत्ति के लोगों का विशेष शौक़ है। और इसमें विशेष बात यह है कि ऐसा करनेवाले लोगों को न तो चरित्र का अर्थ पता, न निजता का, न मौलिकता का, न ईमानदारी का और न ही नीयत का। कुछ भी करके तीन चीजें हासिल करना इनका लक्ष्य होता है – 1) लोगों की संवेदना; 2) बुद्धिमान और निडर होने का भ्रम और 3) प्रसिद्धि। इस प्रयास में विवाद से हासिल होनेवाले कमेंट्स और लाइक्स इनके लिए थर्मामीटर का काम करते हैं।
किसी से इनबॉक्स में चैट करना, फिर उसके रिप्लाई को क्रॉप करके सीधे यह आक्षेप लगाना की अमुक आदमी मेरे इनबॉक्स में अश्लील बातें करता है। इस स्क्रीनशॉट में चाहे बेचारे ने सामान्य शिष्टाचार में आपके अभिवादन का उत्तर मात्र दिया हो किन्तु उसके टेक्स्ट को इनबॉक्स में संपर्क करने का प्रयास सिद्ध कर ही दिया जाता है। और कमेंट करनेवाले भी ‘बेचारी लड़की को दुःखी करने’ के आरोप में गालियों का पिटारा लिए पहुँच जाते हैं।
सत्य जाने बिना सत्य के मसीहा बननेवाले लोग ऐसे प्रकरणों में कमेंट करने में रत्ती भर भी समय नहीं गँवाते। किसी के चरित्र की रक्षा करनी हो तो सोचना भी पड़े, हत्या करने में कैसा सोचना। किसी के ज़ख़्म पर मरहम लगानेवाला ज़ख्म का अध्ययन करेगा, उसके मुताबिक दवा जुटाएगा, उसकी पीड़ा का स्तर देखते हुए दवा लगाएगा …इस सबमें समय लगना स्वाभाविक है। लेकिन जिसका ध्येय किसी को चोट पहुँचाना हो वह तो पत्थर उठाकर मार देगा। उसे यह क्यों सोचना कि सामनेवाले का सिर फूटेगा या पैर। ध्वंस आसान है और सृजन कठिन। सम्मान अर्जित करने में युग व्यतीत हो जाते हैं, अपमानित होने को तो एक क्षण ही पर्याप्त है।
सोशल मीडिया पर बढ़ रही इन प्रवृत्तियों का और कोई उपाय हो न हो किन्तु इनकी अनदेखी से इनके हौसले ज़रूर पस्त हो सकते हैं। जिसकी फ्रेंडलिस्ट में किसी क्षेत्र के सिद्ध लोग उपस्थित होंगे वह उनका ध्यानाकर्षण करने के लिए उस क्षेत्र के ही किसी व्यक्ति को निशाना बनाएगा।
हमें चाहिए कि इस प्रवृत्ति के लोगों को; चाहे वे किसी की भी चरित्र हत्या का प्रयास करें; उन्हें तुरंत ब्लॉक किया जाना चाहिए। बच्चा तभी इतराता है जब उसे देखने के लिए कोई उपस्थित हो। यदि उनकी श्रोतादीर्घा में कोई बड़ा आदमी होगा ही नहीं तो वे किसको दिखाने के लिए उछल-कूद करेंगे।
कोई भी व्यक्ति किसी भी कारण से किसी भी व्यक्ति के प्रति अभद्र भाषा का प्रयोग करे; उसकी निजता में प्रवेश करे; उसे अपमानित करने का कुचक्र रचे; उसके चरित्र की हत्या का प्रयास करे तो ऐसे व्यक्ति की प्रोफाइल पर जाकर तुरंत उसे ब्लॉक किया जाना चाहिए। इससे हमारी ऊर्जा ऐसे नकारात्मक कुकर्मों से अछूती रह पाएगी।
✍️ चिराग़ जैन