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इतनी तो मर्यादा रखो

सामाजिक जीवन जीनेवाले लोग भी अंततः मनुष्य होते हैं। राजनीति, फ़िल्म जगत्, क्रिकेट, साहित्य, अध्यात्म या अन्य किसी भी क्षेत्र में सक्रिय व्यक्ति के दो पक्ष होते हैं, एक उसका निजी जीवन, दूसरा उसका सामाजिक जीवन।
हममें इतनी नैतिकता अवश्य होनी चाहिए कि उसके निजी जीवन को उसके सामाजिक जीवन से गड्ड-मड्ड न करें। ऐसा करके हम न केवल उस व्यक्ति को आहत करते हैं, अपितु अपनी सोच का टुच्चापन भी सार्वजनिक कर देते हैं।
राजनीति में यह सर्वाधिक होता है। फलाने जी के फलानी जी के साथ सम्बन्ध हैं, यह कहना सबसे आसान है। किसी की चरित्र हत्या करने से ज़्यादा आसान कुछ नहीं है। मुझे आज तक समझ नहीं आया कि राजनेताओं से तुम्हें देश चलवाना है, या बेटी ब्याहनी है? हाँ, यदि किसी का निजी जीवन उसके सामाजिक आचरण को प्रभावित करने लगे तब शालीनता से इस विषय पर टोकना अवश्य चाहिए।
अमिताभ बच्चन के कोरोना संक्रमित होने की ख़बर पर रेखा जी के साथ उनका नाम जोड़कर जिस तरह सोशल मीडिया पर बातें बनाना, घृणास्पद हैं। विश्वास कीजिये, सामाजिक जीवन जीनेवाला हर व्यक्ति, अपनी निजी जिंदगी में आपसे ज़्यादा समस्याएँ और चुनौतियाँ झेलता है। लेकिन वह इन समस्याओं पर न तो कभी आपसे सहयोग मांगने आता है, न ही उनका असर अपने कार्यक्षेत्र में दिखने देता है। लेकिन वह यह भी अपेक्षा रखता है कि उसकी निजी संवेदनाओं को सार्वजनिक उपहास का विषय न बनाया जाए।
आप मज़ाक़ कीजिये ना, राजनेताओं के राजनैतिक जीवन पर मज़ाक़ कीजिये। आध्यात्मिक लोगों के प्रवचनों और तहरीरों में हुई चूक पर परिहास कीजिये; क्रिकेटर्स के खेल पर सवाल उठाइये, पिच पर उसके व्यवहार का मज़ा लीजिए, साहित्यकारों के लेखन, भाषण और भाषा की ख़ूब खिंचाई कीजिये, फिल्मी सितारों की भूमिकाओं, संवादों, अभिनय आदि पर जितना चाहे लिखिए लेकिन उनकी निजता में प्रवेश करते समय इतना सतर्क अवश्य रहें कि आपके नेतृत्व, आपके मनोरंजन, आपके आधात्मिक विकास और आपके बौद्धिक विकास के लिए ये लोग अपनी निजी ज़िन्दगी को अनदेखा कर देते हैं।
मैं हास्य का पक्षधर हूँ किन्तु किसी का दिल दुखाकर हँसते हुए ओंठ एक संवेदनहीन हृदय का प्रमाण होते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

कार्यपालिका बनाम न्यायपालिका

सोशल मीडिया पर पुलिस को मिल रही बधाइयों को देखकर लगता है कि कार्यपालिका ने न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया है। अगर न्यायपालिका की आँखों में थोड़ा भी पानी होगा तो लोकतंत्र में शून्य होते अपने अस्तित्व को बचाने के लिए स्वतः संज्ञान लेगी, अन्यथा देश का लोकतंत्र पुलिसिया राज की भयावहता की ओर बढ़ने के लिए तैयार है।

✍️ चिराग़ जैन

फिल्मों से झाँकता लोकतंत्र

हिंदी फिल्मों में भारतीय समाज की पूरी तस्वीर साफ़ दिखाई देती है। एक प्रभावी संचार माध्यम होने के नाते फिल्मों ने जनमत का ही नहीं ‘जन-प्रवृत्ति’ का भी निर्माण किया।
हर फिल्म में एक नायक होता है। यह नायक जो भी करे, उसे सही मानना जनता का धर्म है। इस धर्म के निर्वाह में क़ानून की धज्जियाँ उड़ती हैं तो उड़ जाएँ। इस धर्म के निर्वाह में अदालत का अपमान होता हो, तो हो जाए। इस धर्म के निर्वाह में अराजकता पुष्ट होती हो, तो हो जाए।
जिस फ़िल्म में नायक गैंगस्टर, डॉन या स्मगलर हो, उसमें वह पुलिस को चकमा दे तो हॉल में तालियाँ बजने लगती हैं। वह पुलिस पर गोलियाँ चलाकर फरार हो जाए, तो हॉल में तालियाँ बजती हैं। वह कॉलेज में लड़की छेड़े तो तालियाँ बजती हैं। वह बैंक लूटने की फुलप्रूफ प्लानिंग करे तो तालियाँ बजती हैं। वह गाली दे तो भी तालियाँ बजती हैं। कुल मिलाकर हमें यह समझा दिया गया कि नायक जो भी करे वह प्रशंसनीय है। और हम यह समझ भी गए।
जिस फ़िल्म में नायक पुलिसवाला हो, वहाँ गुंडों की कुटाई पर, राजनेताओं की ठुकाई पर, नियम-क़ानून को ताक पर रखकर अपराधी को सबक़ सिखाने पर हम तालियाँ पीटते रहते हैं। इन फिल्मों में साफ़ दिखाया जाता है कि क़ानून का पालन करके क़ानून का पालन नहीं करवाया जा सकता।
जिन फिल्मों में नायक वक़ील हो, उसमें न्यायालय की अवमानना, पुलिस की मिलीभगत, अदालत के बाहर होने वाले प्रपंच और क़ानून की लाचारी साफ़-साफ़ दिखाई जाती है। हम अदालत में ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते एक्शन हीरो, और जज के सामने धमकी देते वकीलों को देखकर ताली बजाते हैं।
फिल्मों ने हमें यह भी बताया कि हर नायक के कुछ सहयोगी होते हैं। जिस फ़िल्म का नायक गैंगस्टर हो, उसके सहयोगी छोटे-मोटे गुंडे होते हैं। ये सहयोगी अपने नायक की दादागिरी जमाने के लिए ‘जुगाड़’ करते रहते हैं। भाई को कोई दिक्कत न हो इसके लिए पुलिस से सेटिंग और जनता को साधने के लिए ‘कभी गर्म, कभी नर्म’ की नीति, प्रतिद्वंद्वी गैंग से होने वाले पंगों का निपटारा वगैरा सब इनका काम होता है। पुलिस के आला अधिकारियों और ऊँचे-ऊँचे पॉलिटिशियन्स के साथ नायक का उठना-बैठना होता है, और छोटे-मोटे इंस्पेक्टर वगैरा को सहयोगी सम्भाल लेते हैं।
जिन फिल्मों में नायक पुलिसवाला हो, उनमें ये सहयोगी या तो जूनियर पुलिस अफसर होते हैं या फिर भूतपूर्व गुंडे। इनको साथ लेकर नायक सड़े हुए सिस्टम में पल रहे अपराध के कीड़ों को साफ़ करता है।
इन फिल्मों में भीड़ के शॉट्स भी दिखाए जाते हैं, लेकिन इन शॉट्स की तीन ही सिचुएशन्स होती हैं। या तो यह भीड़, खलनायक और उसके गुर्गों के शोषण से पीड़ित होकर रोती-पीटती दिखाई देती है, या फिर इस भीड़ को खलनायक की दहशत से घरों में दुबकते दिखाया जाता है, या फिर कभी-कभी फ़िल्म के अंत में अधमरे खलनायक को ‘मॉब लिंचिंग’ से मारकर नायक को कोर्ट-कचहरी से बचाने के लिए इस भीड़ का सीन लिखा जाता है। शेष फिल्मों में अगर भीड़ है तो तालियाँ बजाने के लिए या जयकारे लगाने के लिए।
फिल्मों ने हमें बताया कि राजनेता हमेशा भ्रष्टाचारी ही होते हैं। हम भी राजनीति के दाँव-पेंच पर्दे पर देखते रहे और मान बैठे कि राजनीति की कीचड़ में कोई बेदाग़ हो ही नहीं सकता।
मीडिया इन फिल्मों में हमेशा सच को उजागर करता ही दिखाई दिया। इसलिए भ्रष्ट पुलिस, अपराधी और राजनीति को इन फिल्मों में हमेशा मीडिया से डरता हुआ ही दिखाया जाता है। ख़बरें बेचने, ख़बरें दबाने, ख़बरें बनाने और ख़बरें घुमानेवाले सीन कभी किसी स्क्रिप्ट में लिखे ही नहीं गए। अब से कुछ दशक पहले तक न्यायाधीशों के लिए संवाद लिखने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। उनकी सिचुएशन फिक्स थी। अदालती बहस के दौरान उन्हें केवल लकड़ी का हथौड़ा टेबल पर पीटते हुए ‘ऑर्डर… ऑर्डर…’ बोलना होता था।
इस पूरे तमाशे ने हमारे मस्तिष्क में कुछ बातें गहरे तक बैठा दीं।

जनता, भीड़ है। जो उसे हाँक ले जाए वही उसका नायक है। फिर वह चाहे पुलिस हो चाहे अपराधी।
सही वही है जो नायक करे और ग़लत वही है जो खलनायक करे।
सिस्टम को सुधारा नहीं जा सकता, उससे या तो खेला जा सकता है या फिर उसको यूज़ करके रॉबिन हुड का जीवन बिताया जा सकता है।
अराजक हो जाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते अराजक होनेवाला नायक हो।
जनता का काम केवल ताली पीटना है। उसे अपने उत्थान के लिए स्वयं कुछ नहीं करना होता। उसे केवल एक नायक की प्रतीक्षा करनी होती है, जो पूरे सिस्टम से लड़कर जनता को ख़ुशी-ख़ुशी ताली बजाने का मौक़ा देगा।

इन सब धारणाओं को मस्तिष्क में बैठाए हमारी कई पीढ़ियाँ गुज़र गईं। नायकवाद की इस धारणा ने हमें ‘जनता’ से ‘प्रजा’ बना डाला। और इससे जो ख़ामोशी पसरी उसका लाभ उठाकर हमारे तंत्र ने लोकतंत्र का मखौल बनाकर रख दिया।

✍️ चिराग़ जैन

तुम लोगों की अनदेखी

छिछले बोल लुभाते हैं
नारे हिट हो जाते हैं
दोहरे अर्थ समेटे हेडिंग
मिलियन व्यू पा जाते हैं
फिर कहते हो मंचों से क्यों कविता अंतर्धान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

सीधी-सादी कविता वाली पोस्ट कहीं खो जाती है
नोकझोंक की क्लिप दिखते ही शेयर कर ली जाती है
गीत सिसकते रहते हैं
छंद बिलखते रहते हैं
कविता-साधक फॉलोवर का
रस्ता तकते रहते हैं
जो शालीन रहा हो उसकी वॉल बहुत वीरान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

सेंसेशन, वल्गर, फूहड़ता, इन पर सबका ध्यान हुआ
भद्दी बातें करती छोरी का जी भर गुणगान हुआ
अंधी हिंसक सोच चली
गाली और गलौज चली
नेगेटिव का बल देखो
वायरलियों की फौज चली
सभ्य सुसंस्कृत पोस्ट करी तो कचरे का सामान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

ट्रोलिंग करते फिरते हैं सब अपने-अपने वाद लिए
मानवता एकाकी फिरती, अंतस में अवसाद लिए
जितना शिष्ट प्रलाप हुआ
उतना पश्चाताप हुआ
ओछापन तो ट्रेंड बना
गहरा लिखना पाप हुआ
चोरी करने की आदत भी ईश्वर का वरदान हुई
तुम लोगों की अनदेखी के कारण लहूलुहान हुई

✍️ चिराग़ जैन

क्यों न करें राजनीति?

जब भी कोई घटना घटती है तो हर कोई ऐरा-ग़ैरा मुँह उठाकर राजनेताओं को उपदेश देने लगता है कि इस घटना पर राजनीति न करो। हद्द है, क्यों न करें राजनीति! राजनीति करना उनका काम है। तुम्हारी तरह संवेदना और जनहित जैसी फालतू बातों में उलझना होता तो राजनीति में क्यों आते?
हमारा कंसेप्ट बिल्कुल क्लियर है। घटनाएँ घटती ही रहती हैं। सच्चा नेता वह है जो हर घटना का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए कर सके। बुद्धिजीवियों का काम है कि वे सच बोलें। लेकिन हमारा धर्म है कि हम उसे विपक्षी साज़िश सिद्ध कर दें।
अब राजनेता होने का ये तो मतलब है नहीं कि हम मजदूरों को गोदी में उठाकर घर पहुँचाएँ। राजनेता अगर सचमुच जनता की समस्याएँ दूर करने लग जाएंगे, तो ख़ुद सड़क पर आ जाएंगे। हमें तो बस इतना करना है कि जब हो-हल्ला बढ़ने लगे तो इसका ठीकरा फोड़ने के लिए उपयुक्त सिर ढूंढ लें। अगर हम सरकार में हों, तो विपक्ष को दोषी ठहरा दें, अगर विपक्ष में हैं तो सरकार को संवेदनहीन घोषित कर दें। राज्य सरकार में हैं तो केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर दें, केंद्र सरकार में हैं तो राज्य सरकारों को लापरवाह घोषित कर दें। हाँ, अगर कभी सरकार से लेकर विपक्ष तक और केंद्र से लेकर सरकार तक हम ही हम हों तो जनता को कामचोर कहना शुरू कर दो, पुलिस को भ्रष्टाचारी कहने लगो, बैंककर्मियों को मुनाफाखोर बता दो, कुल मिलाकर आरोप लगाते रहो।
इन आरोपों का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इससे ख़बरें असली समस्या से भटककर ट्वीट के टाइमिंग, उसकी भाषा, गालियों के स्तर और बातों के दाँव-पेंच में उलझ जाती हैं। उधर मजदूर चलते रहते हैं, इधर ख़बरें चलती रहती हैं। मजदूर सड़क पर चलते-चलते कहीं न कहीं पहुँच ही जाएंगे। इधर हम भी ख़बरों में चलते-चलते किसी न किसी सरकार का हिस्सा बन ही जाएंगे।
संसार तो दुःखों का सागर है ही। यहाँ कष्ट कभी समाप्त हो ही नहीं सकते। यह ईश्वरीय व्यवस्था है। तो फिर कष्ट ख़त्म करने का असफल प्रयास करके हम देश का पैसा बर्बाद क्यों करें। मनुष्य जीवन इन्हीं समस्याओं के मध्य सुख तलाशने के लिए मिलता है। सो, हम अपना सुख तलाश लेते हैं।
कहते हैं, नई समस्या आते ही मनुष्य पुरानी समस्या को भूल जाता है। इसीलिए किसी भी अप्रिय घटना के बाद हम सब राजनेता एकनिष्ठ होकर एक-दूसरे को गालियाँ देने लगते हैं। सिस्टम के जंजाल में फँसाकर उस समस्या के हर समाधान को इतना दुःखी कर देते हैं कि समस्या में घिरे लोगों को अपना दुःख तुच्छ लगने लगता है।
कभी-कभी किसी शुद्ध राजनेता में भी विभीषण की आत्मा जाग जाती है और वह जनहित के अभिनय को सच समझकर सचमुच जनहित करने का प्रयास करता है तो हम उसे ‘भटका हुए नौजवान’ बनने से रोकने के लिए उससे ऐसे-ऐसे काग़ज़ मांगने लगते हैं कि उसके सिर से लोक-कल्याण का भूत उतर जाता है और वह बेबस के लिए बस लेकर निकलने की बजाय ट्वीट करने लगता है। वह जानता है कि इस देश में पैदल चलना आसान है, पर सिस्टम से चलना असम्भव है।
हमने पूरी आस्था और लगन से इस देश के लिए एक ऐसा पुख्ता सिस्टम तैयार किया है कि कोई भी सवाली अपनी समस्या लेकर इसमें घुसने की कोशिश करे तो दो ही स्थितियां होती हैं, या तो वह इसकी भूलभुलैया से ज़िन्दगी भर बाहर निकल ही नहीं पाता, और अगर कोई सूरमा निकल भी आए तो अपनी समस्या का दोष अपने ही सिर मढ़कर निकलता है।
कोरोना ट्रेन और बस में फर्क नहीं करता, तो क्या राजनीति भी न करे। कोरोना सबको एक दृष्टि से देखता है तो क्या राजनीति भी यह मूर्खता करे। कोरोना सबको एक तरीके से मारता है। लेकिन राजनीति ऐसा कभी नहीं करती। वह ट्रेन से आनेवालों के लिए अलग नियम बनाती है और फ्लाइट से आनेवालों के लिए अलग नियम बनाती है। जिन्हें हमने समानता के एहसास के साथ जीने नहीं दिया उन्हें इसी एहसास के साथ मरने की अनुमति कैसे दे सकते हैं।
राजनीति जानती है कि हवाई दौरा करने से बाढ़ का पानी नहीं उतरता, लेकिन इससे यह लाभ होता है कि बाढ़ देख-देखकर बोर होते देश को थोड़ी देर हेलीकॉप्टर देखने का अवसर मिल जाता है। राजनीति जानती है कि क्वारन्टीन सेंटर्स में जाकर मनुष्य का जीवन नरक से भी बदतर हो जाता है। राजनीति यह भी जानती है कि मोबाइल से कोरोना नहीं फैलता। लेकिन फिर भी कुछ सरकारों ने क्वारन्टीन केंद्रों में मोबाइल ले जाने पर रोक लगा दी है, ताकि वहाँ के नरक का दर्शन कर बाकी देश दुःखी न हो।
राजनीति के मन की इन कोमल भावनाओं पर कोई ध्यान देता। सब एक ही बात कहते हैं, राजनीति मत करो। अरे भई, राजनीति न करें तो क्या सड़क पर आ जाएँ!

✍️ चिराग़ जैन

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