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ख़ामोश रहते हैं

बस इतना सोचकर हम लोग अब ख़ामोश रहते हैं
कि जब हम बोलते हैं और सब ख़ामोश रहते हैं

वो चुप हैं तो समझ लेना उन्हें सब कुछ पता होगा
जिन्हें थोड़ा पता होता है कब ख़ामोश रहते हैं

मिरे आदाब तक को लोग बेअदबी समझते हैं
यही सब देखकर हम बाअदब ख़ामोश रहते हैं

मुहब्बत एक दिन ऐसा भी मंज़र पेश करती है
निगाहें बोलती हैं और लब ख़ामोश रहते हैं

कभी हम भी सभी से हर ख़ुशी-ग़म बाँट लेते थे
मगर अब देखकर दुनिया के ढब, ख़ामोश रहते हैं

बड़ी मुद्दत से अपने दिल में जाने क्यों नहीं उठती
किसी को कुछ बताने की तलब, ख़ामोश रहते हैं

✍️ चिराग़ जैन

कोई बिछड़कर मिला है

जहाँ तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहाँ हमको जन्नत का मंज़र मिला है

उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तिरा दर मिला है

कहाँ कोई ऐसा क़लन्दर मिला है
जिसे मन मुताबिक़ मुक़द्दर मिला है

हुआ एक अरसे के बाद आज तनहा
लगा, जैसे कोई बिछड़कर मिला है

भले चोट की जिस्म पर दोस्तों ने
मगर ज़ख़्म उसका ज़ेह्न पर मिला है

कोई तेरी रहमत को माने न माने
तिरा नाम सबकी ज़ुबां पर मिला है

ज़माना भले उसको समझे न समझे
मगर इक इशारा बराबर मिला है

जिसे जो मिला है वो उसका मुक़द्दर
मुझे जो मिला है वो बेहतर मिला है

कोई उनसे पूछे मुक़द्दर के मानी
जिन्हें तिश्नगी में समन्दर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

कोई बिछड़कर मिला है

जहां तुमको बस एक पत्थर मिला है
वहां हमको जन्नत का मंज़र मिला है

उसे भी ग़ज़ब का मुक़द्दर मिला है
मुक़द्दर में जिसको तेरा दर मिला है

हुआ एक मुद्दत के बाद आज तन्हा
लगा जैसे कोई बिछड़कर मिला है

✍️ चिराग़ जैन

ग़लतफ़हमी

एक लमहे के लिए सारी जवानी काट दी
ठीकरों की चाह में इक फ़स्ल धानी काट दी
इक न इक दिन कोई तो समझेगा हाले-दिल मिरा
इस ग़लतफ़हमी पे सारी ज़िन्दगानी काट दी

✍️ चिराग़ जैन

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