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भीष्म प्रतिज्ञा का मीडिया ट्रायल

भीष्म ने प्रतिज्ञा ली थी कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसमें अपने पिता की छवि देखूंगा। भीष्म लकी थे कि उस दौर में कांग्रेसी और भाजपाई लोग नहीं थे। वरना कोई भी चैनल अपने प्राइम टाइम में विरोधी पार्टी वाले किसी बड़बोले को बुलवाकर भीष्म की प्रतिज्ञा का ऐसा हश्र करता कि भीष्म उसका एक्सप्लेनेशन देने की बजाय इच्छामृत्यु का ऑप्शन सेलेक्ट करना ज़्यादा ईज़ी समझते।
भीष्म की इस प्रतिज्ञा को अवसरवाद का उदाहरण बताकर यह कहा जा सकता था कि यह तो सरासर ओछापन है। चापलूसी की हद है कि जो भी सिंहासन पर बैठेगा उसी को बाप बना लेगा। कोई पात्रा टाइप का प्रवक्ता कहता कि ये तो इनकी पुरानी परंपरा है। इनके पिता ने भी गधे को बाप बनाया था। इनकी दादी ने भी गधे को बाप बनाया था। इनके नाना तो गधे थे ही। …कैसा दोहरा मापदंड है। गधे को बाप बना सकते हो लेकिन गाय को माता नहीं मान सकते। वाह जी वाह… ये सब नहीं चलेगा।
पूनावाला टाइप कोई प्रवक्ता कह सकता था कि बायलॉजिकली यह पॉसिबल तभी है जब डीएनए सेम हो। भीष्म ने इनडायरेक्टली यह कहा है कि जो सिंहासन पर बैठेगा उसकी शक्ल मेरे पापा से मिलती होगी। यह शुद्ध भाई-भतीजावाद है। बीजेपी हमेशा कांग्रेस को एक परिवार की पार्टी कहती रही है लेकिन बीजेपी में बेटे-बहुओं को आउट ऑफ टर्न आगे लाया जाता रहा है।
सिन्हा साहब संभाले हुए स्वर के साथ कहते महाभारत में ऐसी कोई प्रतिज्ञा का ज़िक्र ही नहीं मिलता। यह प्रतिज्ञा तो मुग़ल काल में बाबर ने ली थी कि वे रामलला के मंदिर में मस्जिद की छवि देखेंगे। इस तथ्य के ठोस प्रमाण मैगस्थनीज़ के यात्रा वृत्तांत में मिलते हैं कि जब वे बुलेट ट्रेन से दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन पर उतरे तो उन्हें प्लेटफॉर्म नंबर 7 से अयोध्या के भव्य राममंदिर का स्वर्ण शिखर दिखाई दिया।
उधर ओवैसी इस प्रतिज्ञा पर बोलते हुए बताते कि हिन्दू मैरिज एक्ट में अपनी फेयोंसी से अपने वालिद की शादी कराना ग़ैरक़ानूनी है। इसलिए जनाब भीष्म को और उनके वालिद साहब को इस जुर्म के लिए सज़ा होनी चाहिए। मुस्लिम पर्सनल लॉ में इस मुद्दे पर तफसील से साफ किया गया है लेकिन भीष्म क्योंकि हिन्दू हैं इसलिए उन पर मुस्लिम पर्सनल लॉ इम्पलीमेंट नहीं होता।
इन चारों के बयान के बाद बॉय कट हेयर स्टाइल को झटकते हुए एंकर अपना फैसला सुनाती – मतलब साफ है कि भीष्म को सिंहासन पर प्रतिज्ञा नहीं लेनी चाहिए थी। पिता की छवि सिंहासन से सुंदर है। मतलब भीष्म पिता हैं और पितामह भी। इस बुलेटिन में फिलहाल इतना ही देखते रहिये टाइम पास।

✍️ चिराग़ जैन

हत्यारा तंत्र

गोरखपुर मुआमले जैसे महापाप के सूतक की ज़िम्मेदारी एक बार फिर सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली ने ली है। पाकिस्तान में जब स्कूली बच्चों की लाशें बिछीं तो पूरे विश्व ने आतंकवाद से मिलकर लड़ने की शपथ उठाई थी। आज जब हमारे मुल्क में नन्हीं किलकारियों की प्राणवायु तक दफ्तरी छीन ले गए तो इस हिंसक व्यवस्था के साथ एकजुट होकर लड़ने के लिए हम क्यों शपथ नहीं ले सकते।
स्थितियां इतनी विकराल हैं कि “ईमानदारी” के साथ आप ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं बनवा सकते हैं और बेईमान होते ही आप कुछ भी कर सकते हैं। “चप्पल घिसना”; “एड़ियां रगड़ना”; “धक्के खाना”; अड़ंगा लगाना”; “पेंच फँसना”; “जुगाड़ भिड़ाना” और “ले-दे के करवाना” जैसे मुहावरों से सुसज्जित हमारे सरकारी कार्यालय स्वाधीनता दिवस के अवसर पर हर साल रौशनी में नहा जाते हैं लेकिन देश के भीतर का अंधेरा कम होने का नाम नहीं लेता। किसी दफ़्तर में आपका सामान्य-सा काम भी पड़ जाए तो इस हद तक हैरासमेंट होता है कि अराजक हो जाने का मन करने लगता है।
फॉर्म के एक कॉलम में चूक हो जाए तो खिड़की पर बैठा बाबू आपको इस तरह लताड़ता है जैसे किसी बलात्कारी को रंगे हाथ पकड़ लिया हो। किसी काग़ज़ की फोटोकॉपी करवानी पड़ जाए तो दफ्तरी आपको यह भी नहीं बताएगा कि फोटोकॉपी होगी कहाँ से। बाबू से कोई सवाल पूछ लो तो ऐसे हिक़ारत से देखा जाता है मानो उसकी जेब काट ली हो। चपरासी भी प्रतीक्षा करने वालों के साथ ऐसे बर्ताव करता हो जैसे किसी इकलखौन्डी बहू के घर उसकी ननद छह महीने से पड़ी हो।
दो और दो चार जैसे सामान्य सवाल को भी इतना जटिल बना दिया जाता है कि आदमी गिनती भूल जाए। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर और नर्स तो हैं ही; सफाईकर्मी तक किसी भी मरीज़ या उसके परिजन को अकारण धकियाने और लताड़ने के लिए अधिकृत होते हैं। रेलवे में किसी की इतनी औक़ात नहीं है कि पूछताछ खिड़की के उस पार बैठे साहब से रेल के लेट होने का कारण पूछ सके। अदालतों में जज साहब ग़लत समय पर छींकने के जुर्म में भी किसी पर अवमानना का अभियोग चला सकते हैं। और थाने तो दैवीय प्रकोप के महाभवन हैं ही।
पुलिसवाले जनता के बीच जब गाना बजाते हैं “पुलिस- आपके लिए आपके साथ” तो ऐसा सुखद अनुभव होता है मानो फरिश्तों ने खाकी पहन कर क़ौम की खिदमत का बीड़ा उठाया हो। पुलिस के जनहित में जारी विज्ञापन देखो तो ऐसा महसूस होता है मानो पूरी पुलिसफोर्स आपके पैर पकड़ कर गिड़गिड़ा रही हो कि हे जनता जनार्दन! हमारा कर्तव्य है कि आपको कोई कष्ट न हो। हमें हमारा फ़र्ज़ अदा करने का मौका दो माई-बाप! ….लेकिन अगर किसी दिन आपको थाने के दर्शन करने पड़ जाएं तो ये सारे विज्ञापन आपके पीछे तालियाँ पीट-पीट कर नाचते हुए गाना गाने लगते हैं – “अप्रैल फूल मनाया, तो उनको गुस्सा आया…”।
व्यवस्था की यह घिनौनी तस्वीर न तो जनता से छिपी है न ही सरकार से। ऐसे में किसी भी नेता की या समाजसुधारक की इच्छा शक्ति संक्रमित पतीले में दूध की तरह व्यर्थ है। सरकार संसद में बैठ कर योजनाएं बनाती है और बाबू उस योजना का सागर मंथन करके उसमें से लक्ष्मी जी के अवतरण का उपाय खोज लेते हैं। रेड लाइट जम्पिंग रोकने के लिए चालान की राशि बढ़ाकर सौ से पांच सौ की जाती है तो रेडलाइट के पार पेड़ की ओट में अपराध करने का अवसर देने वाले सार्जेंट के ईमान की क़ीमत पचास रुपये से बढ़कर स्वतः ही दो सौ हो जाती है।
भारत में कई नेता ऐसे हुए हैं जो सचमुच इस देश को एक लोककल्याणकारी गणराज्य बनाने का स्वप्न देखते थे। लेकिन उन सब स्वप्नों की फाइलें टूथपिक से कान खुजाते किसी बाबू के बासी चाय के झूठे कप के नीचे दबी धूल खा रही हैं।

✍️ चिराग़ जैन

Ref : Gorakhpur Case, Children dead in hospital due to shortage of Oxygen.

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का

1. लड़की शाॅप लिफ्टिंग में पकड़ी गई और जेल गई। बाप जमानत करा कर लाया और गुस्से में बोला- ‘आज से इसका कॉलेज बन्द। कोई लड़का देखकर इसकी शादी करा दो।’
2. लड़की अपनी ही सगाई में फोटोग्राफर के साथ सेक्स करती पकड़ी गई। लड़की की माँ ने देख लिया और उस पर लिपिस्टिक-पाउडर की लीपापोती करके उसे सगाई में बैठा दिया।
3. लड़की अपनी माँ से पूछती है कि मेरी शादी की इतनी क्या जल्दी है? लड़की की माँ बोलती है – ‘मुझे तुझ पर भरोसा नहीं है। तुझे वक्त दिया तो फिर से तू किसी के साथ मुँह काला कर लेगी।’
ये ऊपर की तीनों लड़कियाँ जिस भी लड़के से ब्याह करेंगी उसके प्रति समाज और कानून की क्या जिम्मेदारी है? जब आपकी पाली हुई लड़की आपके हिसाब से ‘बिगड़ चुकी है’ तब आप किसी के गले से फटे ढोल की तरह लटका कर अपनी इज्जत और आपकी जिम्मेदारियों की लीपापोती कर लेते हैं। आपके मापदंडों पर जो लड़की ‘बिगड़ी हुई लड़की’ बन चुकी है उसे किसी निर्दोष के पल्ले बांधते समय क्या आप उसकी खामियों का जिक्र करते हैं?
और इतने पर भी तुर्रा ये कि शादी के बाद जब उस लड़की की उन्हीं हरकतों से परेशान होकर वह लड़का शिकायत करने पहुँचता है तो वही माँ-बाप, वही समाज और वही कानून उल्टे लड़के को ही आँखें दिखाने लगते हैं।
लड़की के माँ-बाप उसकी हरकतों से दुखी होकर उसका कॉलेज बंद करें तो यह ‘उत्तरदायित्व का निर्वाह’ है लेकिन उसी लड़की का पति वैसी ही हरकतों की वजह से उसे घर से बाहर निकलने से मना कर तो यह ‘क्रूरता’ है।
लड़की की माँ उसे किसी लड़के से मिलने से रोके तो यह माँ की बेटी के प्रति चिंता है। लेकिन उसी लड़की का पति उसी लड़के से मिलने से उसे रोके तो वह लड़का ‘रुढ़िवादी और गँवार’ है।
समाज का यह दोहरा रवैया न्याय की अवधारणा को तार-तार करता है। माँओं द्वारा लीप-पोत कर विदा की हुई लड़कियाँ जब ससुराल पहुँच कर मेकअप उतारती हैं तो उनके अतीत के चेहरे पर पड़े हुए नील उनके वैवाहिक जीवन में अंधियारे की ऐसी लकीर खींच देते हैं जिसके साये में सैंकड़ों नौजवानों का जीवन अवसाद के संत्रास को झेलता हुआ समाप्त हो जाता है।
‘लिपिस्टिक अंडर माई बुरका’ का फिल्मकार महिलाओं की आजादी के नाम पर ‘बोल्डनेस’ का जो हवाई झरोखा खींचना चाहता है उसमें से विवाह संबंधों के इस कड़वे सच का लकवाग्रस्त चेहरा साफ दिखाई देता है।

✍️ चिराग़ जैन

अतिवादी

गुरमेहर कौर वाले मुद्दे पर जिस तरह की चर्चाएँ उठी हैं उससे यह तो स्पष्ट है कि इस देश में अतिवादी लोग पूरी तरह सक्रिय हैं। युद्ध के विरुद्ध एक तख़्ती उठा लेने पर लड़की का जीना हराम कर डाला है हमने। “बॉर्डर” फिल्म के अंत में जब युद्ध की विभीषिका के विरुद्ध पाकिस्तान को “मेरे भाई” और “मेरे दोस्त” जैसे संबोधनों से नवाज़ा गया था तब माहौल इतना ख़राब नहीं था।
हद्द हो गई है। किसी ने चूल्हा जलाने के लिए माचिस उठाई तो उसे आगज़नी का अपराधी सिद्ध करने पर तुल गए। किसी ने सब्जी बिनारने के लिए चाकू उठाया तो उसे हत्या की साज़िश के आरोप में पथराना शुरू कर दिया। इतने भयभीत क्यों हो गए हैं कि पाकिस्तान का नाम आते ही हम चर्चा छोड़ कर नाम लेने वाले को लतियाने लगते हैं।
और अगर यह मान भी लिया जाए कि गुरमेहर ने अपराध किया ही है तो क्या बीस साल की बिटिया को समझाने का इस मुल्क में यही उपाय बचा था कि उसे बलात्कार की धमकी दे दी जाए। किसी ने फिल्म में कुछ दिखाया तो जनता उसे पीटने पहुँच गई। किसी ने तख़्ती पर कुछ लिखा तो जनता ने उसके बलात्कार की तैयारी कर ली।
क्या है ये सब। घृणा नहीं होती इस कल्पना से कि एक बीस साल की लड़की को किसी भूल अथवा अपराध की सज़ा देने के लिए चार देशभक्तों के उसका बलात्कार किया। चुल्लू भर पानी नहीं है किसी के पास इस देश की व्यवस्थाओं में पनप रही नपुंसकता के लिए? क्या हम एक अराजक समाज की निर्मिति नहीं कर रहे हैं।
अभी किसी ने गुरमेहर का एक वीडियो व्हाट्स एप्प पर भेजा है जिसमें वह लड़की कार में एक गाने पर उल्लास में नाच रही है। वीडियो के साथ यह लिखा गया है कि जिसके पिता शहीद हुए हों उसे इतना खुश होने का समय कैसे मिल गया? …कितने अमानवीय हो गए हैं हम। कल को किसी शहीद की बेटी या बीवी किसी ठेले पर गोलगप्पे खाती दिख गई तो हम उसे चरित्रहीन मान लेंगे। किसी शहीद का बेटा दोस्तों के साथ स्कूल पिकनिक पर चला गया तो हम उसे आवारा सिद्ध कर देंगे। इतने निष्ठुर कैसे हो सकते हैं हम? क्या शहीदों के परिवारों को हँसते-खेलते देखना हमारे लिए असह्य हो गया।
सोशल मीडिया के इस दौर में बेसिर-पैर के सन्देश भरे हुए हैं। चुटकुले, अश्लीलता, बेमतलब ज्ञान और वैद्यजी के नुस्खे भेड़चाल में अग्रेषित किये जा रहे हैं। लेकिन किसी बच्ची के चरित्र, किसी परिवार की खुशियों, किसी इंसान की ज़िंदगी और किसी दिल की धड़कनों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाली पोस्ट अग्रेषित करने से पूर्व इतना ज़रूर विचार लेना चाहिए कि आग की लपटें जब भड़क जाती हैं तो वे उन्हें भड़काने वाले की झोंपड़ी को बचकर नहीं निकलतीं।

✍️ चिराग़ जैन

माचना नदी के किनारे

सतपुड़ा के घने जंगलों में माचना नदी के किनारे; जहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नहीं पहुँच पाया; वहाँ टिटहरी दल का कलरव और प्रकृति का अछूता स्वरूप देखा। जंगल के भीतर बेशक अनेक प्रकार के भय हों, किन्तु अकारण सताए जाने की आशंका कतई नहीं होती। नदी की धार भी जंगल के निष्पाप आदिवासियों की तरह बहुत सुकून के साथ बह रही है। वृक्ष, नदी, जंतु, पंछी, हवा, बादल और कहीं-कहीं गोंड आदिवासियों के गाँव; सब कुछ एक दूसरे के साथ ऐसे सुरम्य हो जाते हैं, मानो किसी कुशल संगीतज्ञ ने सात सुरों को करीने से गूँथकर किसी आनंदराग की सरगम लिख दी हो। नीला आसमान नदी में झाँककर खिलखिला रहा है और नदी अपने रास्ते में अड़नेवाले पत्थरों की शिक़ायत करने को आसमान की ओर उछल रही है।
मैंने नदी के पानी में पैर डाला तो वह नाराज़ नहीं हुई, उल्टे उसने मेरे पैरों को पखारकर मेरे रोम-रोम को आनंदित कर दिया। नदी से निकला तो मिट्टी स्नेह से भरकर मेरे पैरों से लिपट गई। मैंने नदी के बीच एक छोटी शिला पर बैठकर अपना एक गीत रिकॉर्ड करवाया। गीत की धुन के साथ नदी, हवा, टिटहरी और धूप ने ऐसे तारतम्य बैठा लिया कि गीत ने इनको अलंकार की तरह सजाकर इतराना शुरू कर दिया। रिकॉर्डिंग के समय मैंने महसूस किया कि जंगल के विशाल वृक्ष टकटकी लगाकर बड़े ध्यान से गीत का वैभव देख रहे थे।
दोपहर और सांझ के मिलन का समय था। जंगल में शाम होने लगे तो माहौल शांति का चोगा उतारकर सन्नाटा ओढ़ लेता है। नदी के पानी में पड़नेवाले प्रतिबिम्बों का रंग गहराने लगा था। सूर्य अपना लश्कर समेटकर पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। एक कारी बदरिया उसके बिछोह की बात सोच-सोचकर और काली हुई जा रही थी। बदरिया, मनौती करती हुई बार-बार सूरज के आगे अड़ती थी और सूरज, हर बार की तरह इस बार भी उसकी मनुहार को अनदेखा कर पश्चिम में डूबता जाता था।
लाचार बदली हारकर भावनाशून्य चेहरे से अपने प्रीतम को डूबते देखती रह गई। पूरे आसमान में सिंदूर बिखर गया। ऐसा लगा मानो माचना के पानी में बदली का उम्मीद भरा दिल बह निकला हो। बिरहन बदरिया की आँखों से दो बूंदें छलक पड़ीं। मौके का फायदा उठाकर पवन ने उसके आँसू पोंछे और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ बहा ले गया।
रात ने पश्चिम में बिखरे सिंदूर पर काली रजाई डाल दी और दूर आसमान से तारे उचक-उचक कर बदरी और सूरज को ढूंढते रह गये।
मैंने उस दिन माचना के किनारे जीवन के हज़ारों रंग, याद के एक ही फ्रेम में कैद कर लिए।
✍️ चिराग़ जैन

द ग्रेट तीतरबाज़ डेमोक्रेसी

काफी समय पहले तीतरों के समाज में एक नालायक तीतर ने लड़ाई-भिड़ाई से समय निकाल कर कुछ पढ़ने-लिखने की ठानी। युवा तीतर की इस इच्छा से तीतर समाज बहुत दुखी हुआ। कई बुज़ुर्ग तीतरों ने उसे समझाया कि बेटा, इस पढाई-लिखाई में कुछ नहीं रखा है। लड़ाई-झगड़ा करोगे तो कुछ बन जाओगे। आज का फसाद कल तुम्हें मुहल्ले में सम्मान दिलाएगा। पढ़-लिख गए तो कोई तुम्हारे साथ नहीं बैठेगा। सारे में थू-थू होगी। तुम्हारी भलाई इसी में है कि झगड़ा-झमेला करो और अपना आराम से रहो।
इतना समझाने पर भी जब वह तीतर ज़िद्द छोड़ने को तैयार न हुआ तो पूरे तीतर समाज ने यह निर्णय लिया कि यह युवा तीतर जो लड़ना नहीं चाहता इसकी इस हरक़त से बाक़ी तीतरों के बच्चों पर भी बुरा असर पड़ेगा। इसलिए समाज के हित में और अपनी परम्पराओं की रक्षा हेतु इस उद्दण्ड युवा को यह दण्ड दिया जाता है कि तीतर समाज के किसी झगड़े में इस अधम को नहीं बुलवाया जाएगा और पूरे गाँव में इसका लड़ाई-झगड़ा बंद करके इसे बिरादरी से बाहर निकाला जाता है।
मौक़ा अच्छा था, युवा तीतर ने बिरादरी छोड़ कर इतनी पढाई की कि धीरे-धीरे वह समाज सुधारक बन गया। उसने सब तीतरों को यह ज्ञान दिया कि तीतर लड़ाने वाले ये उस्ताद लोग बड़े उस्ताद होते हैं। चार-चार आने में हम तीतरों की जान आफत में डाल कर मज़े लेते हैं। जिसे तुम जीवन-मृत्यु का प्रश्न बना लेते हो, वह इनके लिए सिर्फ एक खेल है। इन लोगों की आपस में कोई शत्रुता नहीं होती, ये सिर्फ हमें उकसाने के लिए झगड़ने का अभिनय करते हैं।
समाज सुधारक की ये बातें सुनकर बड़े-बूढ़े तीतरों को चिंता हुई कि यह कुलक्षण ऐसी बातों से हमारी परम्पराओं को आघात पहुँचा सकता है। चिंता के कारण सभी बूढ़े तीतर चिंतित रहने लगे। वे युवा तीतरों को तीतरबाज़ी की महान परम्परा क़ायम रखने का मार्गदर्शन देते और चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अपनी जवानी की लड़ाइयाँ याद कर-करके शेख़ी बघारते। उधर कुछ युवा तीतरों को समाज सुधारक की बातें अच्छी लगने लगीं। वे छुप-छुप कर समाज सुधारक से मिलने लगे। और निरंतर चिंतन के बाद उन्होंने यह निर्णय लिया कि अब वे उस्तादों के साथ वही व्यवहार करेंगे, जो उस्तादों ने उनके पुरखों के साथ किया है।
अब युवा तीतर उस्तादों से मोलभाव करने लगे। एक तीतर ने उस्तादों के बीच जुमला उछाला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे एक साल का वाई-फाई मुफ़्त मिलेगा। सारे उस्ताद तीतरबाज़ी छोड़ कर वाई-फाई के ख्यालों में डूब गए। तभी दूसरा तीतर बोला कि जो मुझ पर दांव लगाएगा उसे मुफ़्त लेपटॉप मिलेगा। उस्तादों में हड़कंप मच गया। वे एक-दूसरे की लुंगियां फाड़ने लगे। उस्तादों में लट्ठ बजने लगे। कोई उस्ताद फटे हुए सर को पकड़े वाईफाई वाले तीतर के गुण गया रहा था तो कोई पैर पर प्लास्टर बांधे लेपटॉप वाले तीतर के दांव-पेंच बखान रहा था। जैसे ही हंगामा थमता दिखाई देता, कोई न कोई तीतर प्रेशर कुकर, सिलाई मशीन या बिजली बिल माफ़ जैसी घोषणा करके आराम से बैठ जाता और उस्तादों को लड़ते देख कर मज़ा लेता।
आजकल तीतरों की नई पीढ़ी और भी स्मार्ट हो गई है। घोषणाओं के ओल्ड फैशन्ड तरीके छोड़कर वे उस्तादों को इमोशनल ब्लैकमेल करने लगे हैं। पिछले दिनों एक ओवरस्मार्ट तीतर ने उस्तादों को बताया कि उसके कुनबे के बुज़ुर्ग खुल कर लड़ने नहीं दे रहे हैं। यह बात सुनकर उस्ताद लोग भावुक हो गए। उन्होंने बुज़ुर्ग तीतरों को कोसना शुरू कर दिया। उस्तादों के मन में उत्पन्न घृणा का लाभ उठाकर ओवरस्मार्ट तीतर ने सारे बुज़ुर्ग तीतरों के पर काट दिए और पूरे तीतर समाज का सरपंच बन बैठा। फॉर्मूले की सफलता देख कर आजकल कोई उस ओवरस्मार्ट तीतर की शिकायत उस्तादों से करके सिम्पेथी बटोरता है तो कोई अपनी दादी और पापा की क़ुर्बानी पर टसवे बहा कर उस्तादों को भावुक कर देता है।
हाल ही में एक चतुर तीतर ने अपने चाचा और अंकलों के अत्याचारों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उस्तादों की लड़ाई का माहौल ही बदल डाला। उस्ताद आपस में लड़ रहे हैं, तीतर अपने अपने दड़बों में भीतर ही भीतर जश्न मना रहे हैं। समाज सुधारक तीतर उन्हें आश्वस्त कर रहा है कि अब तुम आराम से दाना-पानी खाते रहो और मौज उड़ाते रहो। क्योंकि अब कभी यह निश्चय नहीं हो सकेगा कि किस तीतर पर दांव लगाना उचित है। सो, न लगेगा दांव, न होगी तीतरबाज़ी।

✍️ चिराग़ जैन

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