Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सही और ग़लत के पैमाने से आगे यह बहुत महत्त्वपूर्ण होता है कि आप अपने विचारों को कितनी शिद्दत से अभिव्यक्त करते हैं। और इस पैमाने पर मुझे डॉ प्रवीण शुक्ल हमेशा अव्वल दिखाई देते हैं।
ऊर्जा का न जाने कौन सा इंजेक्शन लगाकर आए हैं कि थकान और आलस्य पर हमेशा के लिए विजय प्राप्त किए बैठे हैं। स्मरण शक्ति ऐसी कि सभागार में बैठे 500 लोगों में से 400 का नाम उन्हें याद होता है। पारिवारिक इतने कि जिनका नाम होता है उनकी पूरी पारिवारिक पृष्टभूमि का संज्ञान होता है।
एक साथ हज़ारों लोगों के बीच से गुज़र जाएँ तो एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि प्रवीण जी ने हमें देखा तक नहीं, और एक भी व्यक्ति यह नहीं कह सकता कि उन्होंने मुझे देखकर अनदेखा कर दिया।
जिसका फोन आ जाए उसने सुबह फेसबुक पर क्या लिखा है, यह वे शब्दशः बताने लगते हैं। दिन में 10 सामाजिक समारोह हों तो वे प्रत्येक में उपस्थिति दर्ज कराते हैं, फिर चाहे वे सभी कार्यक्रम NCR के अलग अलग छोर पर क्यों न हों।
और इस पर भी आश्चर्य यह कि इतनी व्यस्तता के बावजूद, वे न तो कभी फोन पर बात करते समय किसी जल्दबाज़ी में रहते हैं, न ही किसी कार्यक्रम में मंच पर बोलते समय उनके हाव-भाव अगले कार्यक्रम में पहुँचने की उतावली की सूचना देते हैं।
इतनी सारी सामाजिकता निभाते हुए भी वे कभी अनुपलब्ध नहीं होते। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि प्रवीण शुक्ल एक अकेला आदमी नहीं है, बल्कि एक जैसे दिखने वाले, एक जैसा बोलने वाले, एक जैसा सोचने वाले पंद्रह- बीस लोगों का समूह है। इनमें से एक व्यक्ति दिन भर फोन पर बात करता रहता है, एक व्यक्ति दिन भर सोशल मीडिया पर एक्टिव रहता है, कम से कम तीन व्यक्ति दिन भर सामाजिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। एक व्यक्ति स्कूल का प्रशासन देखता है, एक व्यक्ति अपने परिवार-रिश्तेदारों के हर उत्तरदायित्व को पूर्ण करने में संलग्न है, एक व्यक्ति कवि सम्मेलन बुक करता है, एक व्यक्ति मंच पर कविता पढ़ता है, एक व्यक्ति हास्य कविता लिखता है, एक ग़ज़ल कहता है, एक अतुकांत कविताएँ लिखता है और एक व्यक्ति साहित्य प्रेमी मंडल के भव्य आयोजन करता है। किसी तांत्रिक सिद्धि से इन पंद्रह-बीस लोगों की चेतना और स्नायु को परस्पर जोड़ दिया गया है।
प्रवीण शुक्ल एक मनुष्य नहीं हैं, बल्कि प्रबंधन के विद्यार्थियों के लिए शोध के विषय हैं। पौने छह फीट का एक ही आदमी इतने सारे काम एक ही काया में रहते हुए कैसे कर सकता है, इसका उदाहरण हैं प्रवीण शुक्ल।
मैंने कभी उन्हें शारीरिक व्याधि की शिकायत करते नहीं देखा। कभी किसी और के लिए तनाव उत्पन्न करते भी उन्हें नहीं देखा। मुस्कराहट उनके चेहरे पर कवच-कुंडल की तरह जुड़ी हुई है। हर क्षण सतर्क रहते हुए भी धैर्य और सहजता बनाए रखने में सिद्धहस्त डॉ प्रवीण शुक्ल का आज जन्मदिन है।
मैं उनके संपूर्ण व्यक्तित्व को जन्मदिन की ढेर सारी बधाई देता हूँ। और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि इस अति-सक्रिय व्यक्तित्व की बहुआयामी प्रतिभा की ऊर्जा इसी तरह अक्षुण्ण बनी रहे।
✍️ चिराग़ जैन
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जो लोग कला फ़िल्मों के मापदण्ड से सी-ग्रेड सिनेमा का आकलन करने निकले हैं, उनकी बुद्धि किसी का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं है।
वे आलोचना करने के प्रयास में विद्रूपता को प्रचारित कर रहे होते हैं और उन्हें आभास भी नहीं होता कि वे क्या पाप कर रहे हैं। सिद्धांत तो यह है कि जिसे लुप्त करना हो उसकी चर्चा बंद कर दो। किन्तु गंदगी की चर्चा न करने की चर्चा इतनी हो जाती है कि गंदगी का आकार बढ़ने लगता है।
धीरे-धीरे इस चर्चा में रस आने लगता है। फिर यह दंभ जागता है कि, “ये साले क्या अश्लीलता दिखाएंगे, हम चाहें तो इनसे ज़्यादा अश्लीलता कर सकते हैं।’ ऐसा कहते-कहते हम एक दिन चाह लेते हैं और अश्लीलता करने लगते हैं।
सात्विक प्रतिभा कला फिल्म की तरह चर्चा से बाहर अपनी साधना करती रहती है और सी-ग्रेड सिनेमा पीवीआर से लेकर ओटीटी तक पैर पसारने लगता है।
आश्रमों में रहकर कला की साधना करने वाले कुछ लोग कला के भौंडे पाखण्ड के दम पर उठती इमारतों को देखकर झल्लाने लगते हैं। नंगेपन को ‘आर्ट’ और नैतिक निर्लज्जता को ‘स्टारडम’ कहनेवालों के प्रति क्रोध से भरकर कला के शुद्ध साधक अपनी सृजनात्मक ऊर्जा को विद्रूपता के विरुद्ध व्यय करने लगते हैं।
…और यही तो विद्रूपता चाहती थी।
इसलिए उसकी चर्चा न करें जो आपको पसंद नहीं है। उस बिरवे को अपनी अनुशंसा का पोषण दें, जिसकी सुगंध आपको सुख देती है। धूल के बवंडर में उड़कर आपकी आँख में जा गिरे करकट से विचलित होकर आँखें बंद होना स्वाभाविक है किन्तु बिलबिलाकर, आँखें मसलते हुए पूरे बवंडर को गाली मत दीजिए क्योंकि वायु के इस वेग में तमाम करकट के साथ कुछ हरे पत्ते भी उपस्थित हैं जो अभी भी सुगंध के अस्तित्व को बचाने की कोशिश में बवंडर के प्रचंड वेग से असहाय जूझ रहे हैं।
✍️ चिराग़ जैन
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भारत एक ऐसा देश है, जहाँ सड़कें बनाई नहीं जातीं। ऐसा लगता है मानो हर सड़क भारतीयों को संघर्षों से जूझने का प्रशिक्षण देने के लिए राहों में बिछ गई हो। देश की राजधानी से प्रारंभ करते हैं। इस शहर की सड़कों के दोनों ओर फुटपाथ बनाए गए हैं। फुटपाथ, अर्थात् रेहड़ी, पटरी लगाने का स्थान। कहीं-कहीं मूत्रालय बनाकर वातावरण में इत्र छिड़कने की भी व्यवस्था की गई है।
नागरिकों की सुविधा के लिए फुटपाथ से मिलकर जो पहली लेन है वह पार्किंग के काम आती है। बीच की लेन पर मातृत्व की याद दिलाने के लिए साक्षात् गौ माता सपरिवार उपस्थित रहती हैं। दाहिनी लेन, जो डिवाइडर से चिपककर लेटी है, उस पर कभी डिवाइडर की रेलिंग उंगली करती दिखाई देती है, तो कभी पुलिसवाले अंकल बैरिकेड्स रखकर इधर-उधर चले जाते हैं।
इससे भी कोई फर्क़ न पड़े तो फास्ट लेन पर गाड़ी ख़राब हो जाएगी। और भी कुछ नहीं तो गड्ढों की व्यवस्था तो कहीं भी हो ही जाती है।
इन सबकी उपस्थिति के बावजूद जो वाहन सड़कों पर चलने की हिम्मत करते हैं, उन्हें हर चौराहे पर भिखारियों और हिजड़ों का वेश बनाकर सर-ए-आम लूटने के लिए सरकारी संरक्षण प्राप्त समाजसेवकों की व्यवस्था की गई है।
सड़क का सौंदर्य बढ़ाने के लिए सरकार ने जगह-जगह ‘नो पार्किंग’ और ‘टो अवे’ के बोर्ड लगाए हैं। इन बोर्ड्स के ठीक नीचे ई-रिक्शा चालकों ने अपना डिपो बना रखा होता है।
सड़क एवं परिवहन मंत्री ने ई-रिक्शा का आविष्कार करके महानगरों के वाहन चालकों को यह बताने का प्रयास किया है कि महाभारत के युद्ध में करोड़ों सैनिकों की भीड़ के बीच से रथ निकालकर ले जाने की कला जाननेवाला शख़्स महारथी क्यों कहलाता था।
इन सड़कों को देखकर कई बार ऐसा लगता है, मानो सड़क कह रही हो… ‘क्यों व्यर्थ घर से निकलता है? आख़िर कहाँ पहुँचना चाहता है? अब तक सड़कों की धूल फाँककर भी तू कहाँ पहुँच पाया है। तेरा घर ही तेरा असली ठिकाना है। तू कितनी भी दूर निकल जा, अंततः लौटकर इसी घर में आना है। तो जब यहीं लौटना तय है तो सड़कों पर निकलना ही क्यों… घर रहेगा, ईंधन बचेगा, टेलीविजन चला, व्हाट्सएप खोल, मेसेज फॉरवर्ड कर… जहाँ तू नहीं पहुँच पाया, वहाँ अपना व्हाट्सएप भेज दे। वैसे भी तू कोई सड़कों पर भटकने वाला सड़क छाप थोड़े ही है। यह भटकाव छोड़कर थोड़ा ठहर जा पगले! घर बैठ पगले!’
✍️ चिराग़ जैन
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“मुझसे पूछा नहीं” – यह भाव किसी की भी नाराज़गी का सहज कारण हो सकता है। बल्कि यह कहा जाए कि दुनिया भर की सारी शिकायतों का अध्ययन किया जाए तो 70-80 प्रतिशत शिकायतों के मूल में यह भाव मिलेगा।
पहली बार इस भाव को सीधे-सीधे अभिव्यक्त करती हुई एक फिल्म आई है। पहली बार किसी फिल्म ने नारी-समानता के तमाम उपक्रमों को पुरुष के ठीक बराबर लाकर खड़ा कर दिया है।
“कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म” को आपने अगर एक लाइट कॉमेडी की तरह देखकर ख़त्म कर दिया तो समझ लीजियेगा कि आप गंगा किनारे से सूखे लौट रहे हैं। सामने खड़े पति को छोड़कर परमेश्वर से बतियाती स्त्री उस पुरुषप्रधान समाज पर सबसे तीखा कटाक्ष है, जिसे स्त्री की संवेदना सुनाई ही नहीं देती।
फिल्म का कहानीकार केवल मसाला परोसने के लिए कहानी को हरियाणा से निकालकर बरसाने की ओर नहीं ले गया है, वह एक ही समाज के दो अलग-अलग रंग दिखाकर स्त्री की सामाजिक स्थिति का अन्तर रेखांकित कर रहा है। एक ओर गोलियाँ बरसानेवालों के यहाँ घूंघट में छिपी स्त्री है और दूसरी ओर बरसानेवालों के यहाँ लाठी थामकर खड़ी गृहस्वामिनी है, जिसके आँगन में कोई बिना पैर धोए आ जाए तो वह कुपित हो जाती है। यह सशक्त स्त्री यह संदेश देना नहीं भूलती कि उसका साम्राज्य उसके आँगन तक है किन्तु जहाँ तक उसका साम्राज्य है, वहाँ तक उसका एकछत्र राज है। फिल्म में नायक का भाई, अध्यात्म को बाज़ार बनाकर बेचने की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य कर रहा है।
नायिका का भाई एक दृश्य में नायक को पीटता है। उसका कष्ट यह नहीं है कि नायक ने किसी लड़की को शादी से भगाया है, उसका कष्ट यह है कि नायक ने ‘उसकी बहन’ को भगाया है। समष्टि से चलनेवाले समाज मे व्यष्टि की यह व्याप्ति समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ रही है।
और पुरुष प्रधान समाज के गाल पर सबसे करारा तमाचा फिल्म का वह दृश्य है जिसमें ऑडी की ड्राइविंग सीट पर बैठी नायिका से नायक कहता है कि मैंने गुंडों की बहन को भगा लिया है अब वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगे। इस पर नायिका बताती है कि तूने मुझे नहीं भगाया, मैंने तुझे भगाया है। पुरुष के कर्ताभाव के अहंकार पर इससे गहरा घाव शायद ही पहले कभी हुआ हो।
बहरहाल, व्यंग्य को इतने सलीके से परोसने वाली फिल्म बहुत समय बाद देखने को मिली है। हास्य का हल्का सा स्पर्श व्यंग्य की धार को कुंद किए बिना ही फिल्म की रोचकता में वृद्धि कर रहा है।
और भी अनेक दृश्य कटाक्ष की छुरी पर रखे, संदेश के शहद का आभास कराते हैं, लेकिन मैंने सब कुछ यहाँ लिख दिया तो आपको फिल्म देखने में मज़ा नहीं आएगा।
सो, जाइए फिल्म देखिए और कमेन्ट कर के बताइये कि कटाक्ष की यह चुभन कैसी लगी।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Naavik ke teer, Prose, Quotation
वास्तविकता साकार हो चुकी कल्पना है और कल्पना साकार होने जा रही वास्तविकता है।
✍️ चिराग़ जैन
Bakodhyanam, Chirag Jain Writings, Prose, Story
लोकतन्त्र नामक राज्य के आसपास घना ‘लोभारण्य’ था; जिसमें भयानक धनपशु और लाभासुर रहा करते थे। ये लाभासुर जब-तब नागरिकों का रक्त चूसते थे और और धनपशु बर्बरतापूर्वक उनका जीवन नारकीय बना देते थे। ‘नागरिकों’ ने अपनी सुरक्षा के लिए कठिन तपस्या की और व्यवस्था का निर्माण किया। नागरिकों की रक्षा के लिए यह व्यवस्था शक्तिशाली अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित थी। अब धनपशु और लाभासुर नागरिकों को प्रताड़ित करने आते थे, तो व्यवस्था उनके प्रयासों को विफल कर देती थी। इस स्थिति का सामना करने के लिए लाभासुरों ने व्यवस्था की घेराबंदी में भ्रष्टकीट छोड़ दिए और धनपशुओं ने जगह-जगह रिश्वत का गोबर करके व्यवस्था की धरती में दीमक प्रविष्ट करवा दी। भ्रष्टकीटों ने व्यवस्था के अस्त्र-शस्त्रों को नपुंसक बना दिया और दीमकों ने व्यवस्था को भीतर से खोखला कर दिया। इस दुर्बलता का लाभ उठाते हुए लाभासुरों और धनपशुओं ने व्यवस्था के भीतर अपने प्रतिनिधियों को घुसा दिया। करत-करत अभ्यास के… ये प्रतिनिधि नियामक बन गए और इन्होंने पूरी व्यवस्था को धनपशुओं और लाभासुरों के पक्ष में नागरिकों के विरुद्ध खड़ा कर दिया। अब जो नागरिक, धनपशुओं और लाभासुरों को अपना रक्त पीने से रोकता था, उसे विकास-विरोधी कहा जाने लगा। जिसने दया की गुहार की, उसे व्यवस्थाद्रोही कहा जाने लगा।
व्यवस्था ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करके नागरिकों के हाथ-पैर बांधकर लोभारण्य में फेंक दिया और नागरिकों को यह आदेश दे दिया कि जब कोई तुम्हारा रक्त पीने आए तो प्रतिकार करके उसका अपमान न करना। बल्कि हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक कहना – ‘हमारा लोकतन्त्र महान!’
✍️ चिराग़ जैन